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नरसिंह रहस्यम् ।।

             दिव्य महाकैलाश पर विराजमान परम शिव अपने तीनों नेत्रों से अनंत ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण एवं प्राणी को निहार रहे थे। शिव त्रिनेत्रों के माध्यम से ही समस्त देवताओं के साथ- साथ प्रत्येक सूर्य, चंद्र, नक्षत्र इत्यादि को नियंत्रित करते रहते हैं एवं उनकी प्रत्येक गतिविधियों पर लगाम लगाये रखते हैं तभी अचानक उमा ने लीलावश परम शिव के दोनों नेत्र अपनी हथेलियों से ढँक दिए। शिव तीसरे नेत्र के माध्यम से सृष्टि का अवलोकन कर रहे थे तभी उमा ने उनका तीसरा नेत्र भी ढँक दिया। आद्या ने लीलावश प्रथम बार समस्त सृष्टि को पाश विहीन होने का अनुभव दे दिया। अचानक सृष्टि प्रकाश विहीन हो उठी एवं नैतिकता, मर्यादा, आध्यात्मिकता, सामाजिकता, मानसिकता इत्यादि के पाश समाप्त हो गये।

              कुछ क्षण के लिए उमा की इस लीला से शिव की सर्वव्यापकता, नित्य व्यापकता इत्यादि का समस्त जगत में विलोप हो गया। चारों तरफ उन्मुकता ही उन्मुकता, पशुता ही पशुता बची। उमा और शिव के इस अद्भुत मिलन से, विचित्र संयोग से प्रथम सकंर वर्ण निर्मित हो उठा अर्थात अंधक जन्म ले बैठा। एक ऐसा जीव जो कि न तो मनुष्य था,न पशु,न असुर था,न देव क्योंकि बंधन नष्ट हुए थे, मर्यादा खत्म हुई थी शिवाभाव का ह्रास हुआ था अन्यथा इस प्रकार की विचित्र सृष्टि सम्भव नहीं होती। सभी मर्यादा में रहते हैं, जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में रहता है। जीवन का प्रत्येक तल मर्यादा में ही संसर्ग करता है। पशु योनि पशु ही उत्पन्न करती है, मनुष्य योनि मनुष्य ही उत्पन्न करती है, देव योनि में देव ही उत्पन्न होते हैं। वनस्पति जगत में वनस्पति का ही प्रादुर्भाव होता है। 

          मर्यादा का शिव भय के कारण ही सृष्टि में सभी पालन करते हैं। आद्य और आद्या का अनैसर्गिक प्रणय, अकारण प्रणय, कुछ विचित्र सा मिलन सम्पन्न हुआ जिसके कारण विचित्र जीव अंधक का प्रादुर्भाव हुआ। उमा की चेतना जागी, शिव के त्रिनेत्रों पर से आवरण हटा परन्तु तब तक देर हो चुकी थी और अंधक सृष्टि में आ ही गया, पशुत्व और शिवत्व का अद्भुत चित्र रच ही गया। यह है भावावेश में हुआ सृजन । उमा ने भावावेश में शिवं की आँखें मूंदी अर्थात भावावेश के कारण शिव और शक्ति का मिलन हुआ। भाव के आवेश में उन्मुक्तता ही उन्मुक्तता होती है, भावावेश स्त्री पुरुषों को देखिए वे सब कुछ भूल जाते हैं, पूर्ण उन्मुक्त हो जाते हैं। प्रेम के भाव में ग्रसित, धन के भाव में ग्रसित, सौन्दर्य के भाव में ग्रसित, राज्य के भाव में ग्रसित, सत्ता के भाव में ग्रसित जातक उन्मादी होते हैं, अंधे होते हैं एवं किसी मर्यादा किसी नियम, किसी सिद्धांत को नहीं मानते। उनकी आँखों के सामने समस्त जगत की समस्त गतिविधियाँ अदृश्य हो जाती हैं। वे सिर्फ एक भाव में जीते हैं। वे पाप पुण्य, अच्छा-बुरा, सही-गलत, जीवन-मृत्यु, हिंसा-अहिंसा, भूख प्यास इत्यादि सब भूल जाते हैं। दिन और रात का फर्क भी समाप्त हो जाता है, भावावेश में काल तो क्या महाकाल की उपस्थिति भी नगण्य हो जाती है। 

            भान की समाप्ति, प्रकाश की समाप्ति, अस्तित्व की समाप्ति का नाम है भावावेश। श्रीहरि का भावावेश अवतार भाव के आवेश में आकर अवतार लेना, भाव के आवेश में आकर कुछ नये रूप में सृजित होना। नरसिंह किसी की कोख से पैदा नहीं हुए, किसी के पुत्र नहीं बने, उनकी कोई माता नहीं है अपितु वे तो भक्त के भाव के आवेश में आकर खम्भा फाड़कर प्रकट हो गये। उन्होंने राज नहीं किया, कुछ क्षण के लिए पृथ्वी पर रहे, कार्य सम्पन्न और नरसिंह अवतार का गमन । अदृश्य से आये कुछ क्षण के लिए, दृश्यमान हुए और पुनः अदृश्य में विलीन । शिव और उमा की लीला ने प्रथम बार ब्रह्मा को भावावेश का अनुभव कराया। 

            भाव का वेग कितना प्रचण्ड होता है, भाव की अनुभूति कितनी परम है ब्रह्मा यह समझ गये। भाव तत्व अब ब्रह्मा ने सीख लिया था तत्काल ही ब्रह्मा ने समस्त रचनाओं में भाव का स्थापत्य कर दिया। महाउन्मुक्तता विष्णु को भी भा गई वृषभ अवतार ले बैठे। ऋषभ देव को जैन सम्प्रदाय अपना प्रथम तीर्थंकर मानता है परन्तु सनातन धर्म में वे हैं विष्णु अवतार। ऋषभ अवतार के रूप में विष्णु सर्वथा नग्न, शरीर के भान से भी मुक्त, समस्त क्रियाकलापों से मुक्त, न उम्र की परवाह, न काम की परवाह, न स्त्री का आकर्षण, न धन और राज्य का आकर्षण, न चोट का एहसास, न मृत्यु का भय, न शारीरिक गतिविधियों के कारण शर्म का भय अर्थात महाउन्मुक्तता। ऋषभ देव इतने महाउन्मुक्त थे, इतने भावातीत ध्यान में मग्न रहते थे कि बालकों के समान जब जरूरत पड़ी कहीं पर भी मल-मूत्र त्याग कर देते थे। सर्वथा मुक्त ऋषभ जी परम शिव के ध्यान में बस खोये रहते थे, यही है पाशुपत व्रत्त।

           वन में घोर अग्नि अनुसंधान हो रहा था, दक्षिण क्षेत्र में वन धू-धू करके दधक रहे थे और भावातीत ध्यान में मग्न ऋषभ देव शिव के भावावेश में वन में प्रविष्ठ हो गये, वन के साथ साथ शरीर भी धू-धू करके जल उठा, वन में ही विलीन हो गये ऋषभ देव । जो शिव ने अनुभव किया उमा के सानिध्य में प्रचण्ड भावावेश वही अनुभव प्राप्त करने के लिए श्रीहरि ने भी ऋषभ देव नरसिंह, परशुराम इत्यादि के रूप में अनेकों बार भावावेश अवतार ग्रहण किए। आसमान में बिजली कड़कती है, समुद्र में ज्वर उठते हैं, वायु अंधड़ का रूप लेकर सब कुछ उड़ा ले जाने को तत्पर हो जाती है, वर्षा के बादल फट जाते हैं, पृथ्वी डोल उठती हैं, अग्नि की लपटें ज्वालामुखी से निकल निकल कर आसमान को छू लेने की कोशिश करती हैं, दैत्य पगला उठते हैं, मनुष्य नृत्य कर उठते हैं,स्त्री-पुरुष आवेशित हो क्या-क्या नहीं करते? सभी भावावेश में आते हैं। भावावेश क्षणिक है परन्तु सत्य है। भावावेश न हो तो युद्ध ही न हो, प्रेम ही न हो, स्त्री- पुरुष का मिलन ही न हो, सब कुछ मंद पड़ जायेगा,चारों तरफ नीरवता ही नीरवता छा जायेगी। आवेशित नदियाँ न बहें तो जल प्रपातों की रचना सम्भव नहीं,पहाड़ों का सीना चीरना सम्भव नहीं। नर्मदा जब आवेशित होती है तो अपने साथ बड़े-बड़े प्रस्तर खण्ड भी बहा ले जाती है, सिंह जब आवेशित होता है तो भैरव नाद करता है। भैरव नाद क्या है ? यह समस्त पशुओं की समझ में आ जाता है। सिंह का नाद ही महाभैरव नाद है हिलाकर रख देता है समस्त पशुओं, मनुष्यों के हृदय को । 
          नरसिंह अवतार में जब विष्णु ने यही महाभैरव नाद किया था तो दैत्यों के हृदय फट गये थे, हिरण्यकशिपु के समस्त पाप धुल गये थे, वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया था, मल-मूत्र का त्याग कर बैठा था। अंधक का तो जन्म ही आद्य और आद्या के भावावेश के कारण हुआ था अतः वह तो जीता जागता भाव जगत का पिण्ड था और उसे ग्रहण किया पुत्र के रूप में हिरण्याक्ष ने। हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप सदैव भावावेश में ही इष्टोपासना, शिवोपासना, ब्रह्मोपासना सम्पन्न करते थे। हिरण्याक्ष इतना भावावेशी था कि कहीं पृथ्वी पर जीवन न सृजित हो जाये अतः वह पृथ्वी को रसातल में उठा ले गया। ब्रह्मा यह देख आवेशित हो उठे, उनकी भौंहें तन गईं, नासिका लाल हो गईं और अचानक आवेशित हो फड़कने लगीं तभी जोर की छींक आयी । ब्रह्मा के इस आवेशित ब्रह्मचित्र से उनकी नासिका छिद्र के द्वारा विष्णु का वराह अवतार सम्पन्न हो गया।देखते ही देखते एक अद्भुत वराह मुख लिए हुए स्वस्थ शिशु सृजित हो गया, ब्रह्मा अपनी इस भाव आवेशित संरचना को देख मुस्कुरा उठे, पुनःभाव के परम आवेश में आ परम आनंदित हो उठे।भाव जगत की यह विशेषता है कि उसमें अगर किसी चित्र का निर्माण हो गया तो वह अकल्पनिक गति से विकसित होता जाता हैभाव जगत में उत्पन्न चित्र देखते ही देखते सम्पूर्ण भाव जगत में सर्वमय हो उठता है ठीक इसी प्रकार विष्णु के वराह अवतार ने देखते ही देखते अति विशाल रूप धारण कर लिया और जल में प्रविष्ठ हो हिरण्याक्ष का वध कर डाला एवं पृथ्वी को पुनः रसातल से निकालकर स्थापित कर दिया।

            हिरण्याक्ष वधं का समाचार मिलते ही भानुमति पति वियोग में आवेशित हो उठी, उद्वेलित हो उठी, जाग गया उसका भाव केन्द्र, भूल गईं सब कुछ। जब भाव केन्द्र जाग उठता है तो सिर्फ अनियंत्रण ही अनियंत्रण होता है। जाग तो मीरा का भी भाव केन्द्र गया था, राजमहल छोड़ पग में घुंघरू बांध नाच उठी थीं। विष्णु का तो प्रत्येक अवतार एक विशेष भाव में आवेशित होता ही है। भाव केन्द्र को आवेशित करना, भाव केन्द्र को जागृत करना,भाव केन्द्र के माध्यम से भक्तों को दर्शन देना,भाव जगत का प्राणी बनाकर रख देना, भावों को मथकर रख देना यही तो विष्णु की विशेषता है चाहे कृष्ण के रूप में पूर्णांश हों,राम के रूप में अंशांश हों या फिर परशुराम, नरसिंह, वामन इत्यादि रूपों में भावांश हों। 

           विष्णु भाव केन्द्र को ही मथते हैं,अर्जुन का भाव केन्द्र जागृत कर उसे विराट स्वरूप दिखा दिया, असुरों के भाव केन्द्र को जागृत कर मोहिनी अवतार ले उन्हें ठग बैठे।यहाँ तक कि जब विष्णु ने अपना परम मोहिनी स्वरूप शिव को दिखाया तो शिव भी स्खलित हो बैठे,विष्णु के पीछे दौड़ उठे।तब से लेकर आज तक विष्णु की माया भाव केन्द्र के माध्यम से ही काम करती हैं। भाव केन्द्र अच्छा है या बुरा यह विषय नहीं है अपितु विषय यह है कि भाव केन्द्र के अभाव में कोई भी जातक अध्यात्म जगत से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकता परन्तु भाव केन्द्र से ऊपर भी कुछ है वह शिव क्षेत्र है।अभी उस पर चर्चा करना जरूरी नहीं है फिर कभी चर्चा करेंगे। हिरण्याक्ष की पत्नी भानुमती सति होने जा रही थीं सबने समझाया पर नहीं मानी। दैत्य, असुर कौन हैं ? यह सबके सब मानसिक विक्षप्त हैं अर्थात अंग्रेजी में साइको हैं ।
            दैत्यों और असुरों में मानस का वेग असंतुलित होता है,संतुलन दैत्यों और असुरों का स्वभाव नहीं है। 50 फीसदी आध्यात्मिक साधक मानसिक विक्षप्त होते हैं, उनका मानस पूरी तरह से नाना प्रकार की विक्षप्ताओं से ग्रसित होता है। एक प्रकार से यह जीव संरचना में कुछ कमी, कुछ न्यूनता का द्योतक है। आवेशित ब्रह्मा द्वारा भावावेश में की गई संरचना से ही असुरत्व का निर्माण हुआ है एवं यह भव जगत का सबसे बदनुमा दाग है। मानसिक विक्षप्त, मानसिक रोगी कमजोर नहीं होते हैं अपितु अन्य जातकों की अपेक्षा ज्यादा शक्तिशाली, ज्यादा प्रचण्ड साधक, सनकी, धुन के पक्के होते हैं। इनमें जीवन जीने की शक्ति अन्यों की अपेक्षा कई करोड़ गुना ज्यादा विकसित होती है। मानसिक विक्षप्त नाना प्रकार की अलौकिक, गोपनीय, मानसिक, बौद्धिक, वैज्ञानिक, तार्किक, शारीरिक इत्यादि क्षमताओं से अन्यों के मुकाबले जयादा सम्पन्न होते हैं। 

           जिन लोगों में देवत्व होता है उनके चेहरे की बनावट अंग प्रत्यंग की बनावट, अत्यंत ही संतुलित, सुगठित एवं दर्शनीय होती है इसके विपरीत असुरत्व से ग्रसित स्त्री-पुरुषों के चेहरे की बनावट हमेशा असंतुलित होती है। इनके शरीर और मस्तिष्क में तार्तम्य नहीं होता, ये असंतुलित देह और मस्तिष्क के स्वामी होते हैं। ईश्वर शारीरिक लक्षणों के माध्यम से सब कुछ वर्णित करके भेज देता है, आँखें सब बता देती हैं। देखने का तरीका, स्थूलता, भद्दापन, आँखों की गतिविधियाँ इत्यादि जातक में असुरत्व है, देवत्व है, मनुषत्व है या पशुत्व है स्पष्ट रूप से इंगित कर देती है । भानुमति बोलीं अगर आप लोग मुझे जीवित रखना चाहते हैं तो प्रतिदिन मेरे उठने से पूर्व मेरी शय्या के नजदीक एक विष्णु भक्त का कटा हुआ, रक्त से सना हुआ शीश अवश्य रखा मिलना चाहिए। मेरी दृष्टि सर्वप्रथम विष्णु भक्त के कटे सिर पर पड़नी चाहिए।

         भानुमति के भाव केन्द्र में विष्णु शत्रु के रूप में विराजमान हो गये। विष्णु की उपासना करने का अद्भुत विधान हैं। भजो चाहे शत्रु के रूप में, मित्र के रूप में, पति के रूप में, परम स्वरूप में, भगवान के स्वरूप में पर भजना मुझे ही पड़ेगा। विष्णु को शत्रु उपासना भी उतनी ही प्रिय है जितनी कि युद्धोपासना या प्रेमोपासना मार्ग कोई सा भी हो, लीला किसी भी प्रकार की रचनी पड़े आखिर में ले देकर विरहोपासना हो ही जाती है और जातक को किसी न किसी माध्यम से अंत में विष्णु मुक्ति प्रदान कर ही देते हैं। विष्णु छोड़ते नहीं है क्योंकि एक बार भाव जगत में बैठ गये, भाव केन्द्र के क्षीर सागर में शेषनाग पर विराजमान हो गये तो अंत में जातक को बैकुण्ठधाम प्राप्त हो ही जाता है। 

           भावावेश में विक्षप्त होना असुरों का दैत्यों का प्रमुख लक्षण है। हिरण्यकशिपु भी विष्णु भाव से ग्रसित हो गया सोते, उठते बैठते, जागते बस शत्रु के रूप में विष्णु ही विष्णु। विक्षप्तों के समान विष्णु को ढूंढ रहा था कहीं तो मिल जायें विष्णु, किसी भी तरह मिल जायें, किसी भी रूप में मिल जायें उसे तो विष्णु चाहिए थे। विष्णु नहीं मिले तो उसने समस्त विष्णु भक्तों को मार डाला, विष्णु पूजन प्रतिबंधित कर दिया, विष्णु उपासना केन्द्रों को ध्वस्त कर दिया, विष्णु साहित्य को नष्ट कर दिया। विष्णु विरोध, विष्णु द्रोह के माध्यम से ही वह "ॐ श्री विष्णवे नमः, ॐ श्री विष्णवे नमः" का उल्टा जप कर रहा था। उसने सभी विष्णु उपासकों को कारागृह में डाल दिया। उधर हिरण्याक्ष पुत्र अंधक भी भावावेशित हो उठा, आद्या के रूप पर मोहित हो उठा। आद्या को ही प्राप्त करने चल बैठा। शिव गणों से घोर युद्ध हुआ । भव अर्थात शिव को यह अच्छा नहीं लगा, शिव भव जगत से परे हैं तुरंत आद्या को छोड़ महापाशुपत अनुष्ठान के लिए प्रस्थान कर गये एवं आद्या के भाव से मुक्त हो गये। आद्या एकांत गुफा में शिव गणों के साथ शिव का इंतजार करने लगीं तभी पुन:अंधक ने आक्रमण कर दिया। 

           भव रोग से ग्रसित होने के कारण शिव गण परास्त होने लगे तभी आद्या ने विष्णु का ध्यान किया, वे भाव जगत के राजाधिराज हैं देखते ही देखते विष्णु अपनी समस्त मायावी शक्तियों के साथ युद्धरत हो गये, घोर युद्ध चलने लगा अचानक शिव का पाशुपत अनुष्ठान सम्पन्न हुआ वे आ पहुँचे। मैंने पूर्व में कहा भाव जगत की विशेषता यह है कि भवातीत प्राणी अतिशीघ्र ही अलौकिक वृद्धि को प्राप्त होते हैं आश्चर्य जनक रूप से वृद्धि सिद्धि उन्हें प्राप्त होती है। विष्णु तो सर्वमय भाव जगत के कारण ही हुए हैं, अंधक परम भाव सिद्ध था अतः जैसे ही शिव का त्रिशूल उसका छेदन करता उसके लहु की प्रत्येक बूंद से एक और अंधक निर्मित हो जाता । निराभाव शिव ने तत्काल ही विष्णु को अपने कर्ण में प्रविष्ट कर उन्हें योग विद्या के द्वारा स्त्री के रूप में परिवर्तित कर दिया। एक ऐसी स्त्री जो कि भूख से व्याकुल कंकाल के समान, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए उनके कर्ण से बाहर निकली और उसके साथ असंख्य मातृकाएं शिव ने सृजित कर दीं जो सबकी सब भूख के भाव से व्याकुल, परमक्षुधा भाव से ग्रसित और इस प्रकार माँ धूमावती के साथ चलने वाली अनेकों मातृकाएं उदित हो उठीं। कुछ ही क्षणों में उन सबने अंधक एवं उसकी सेना के समस्त लहू का पान कर लिया फिर भी चिल्लाती रहीं कि हमें भूख लगी है हमें भूख लगी है। धूमावती एवं उनकी गणिकाओं का यही स्वरूप है।

           अंधक का समस्त शरीर शक्तिविहीन हो गया, लहू विहीन हो गया फिर भी वह परम भाव सिद्ध होने के कारण अपने नाखूनों से, सिर से, दाँतों से, पंजों से शिव पर प्रहार करने से नहीं चूक रहा था। अंत में शिव ने महाघोर भैरवनाद करते हुए अंधक का पेट फाड़ डाला त्रिशूल से एवं उसके हृदय कमल को निकालकर हाथों में ले लिया। विष्णु यह देख रहे थे कालान्तर नरसिंह रूप में विष्णु ने भी यही सब किया । शिव ने अंधक को त्रिशूल में पिरो लिया और उसे सुखा दिया। मातृकाएं पैदा तो हो गईं परन्तु उनका क्षुधाभाव नहीं गया, धूमावती ने शिव को ही निगल लिया परन्तु शिव धुंआ बन नासिका से निकल आये। महाकैलाश पर मातृकाएं चिल्लाने लगीं कि हमें भूख लगी है- हमें भूख लगी है। हम सब समस्त जीव, देव,असुर इत्यादि को खाकर अपनी भूख मिटायेंगे। शिव ने समझाया कि यह सृष्टि के नियम के विरुद्ध है परन्तु क्षुधा भाव से आवेशित मातृकाएं कहाँ मानने वाली थीं? 

         अंत में शिव ने ध्यान लगा विष्णु स्तवन किया। देखते ही देखते बिजलियाँ कड़कने लगीं, आकाश पिण्ड हिलने लगे, समस्त लोक डोलने लगे, समस्त जगत स्तम्भित हो गया और एक विराट नरसिंह आकृति ब्रह्माण्ड में उदित हो उठीं जिसकी देह में समस्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ था, जिनके नेत्र द्वादश आदित्यों से भी ज्यादा प्रकाश वान थे, जिनके दंत और नख में असंख्य सृष्टि द्रोही दैत्य असुर मरे हुए चिपके थे, जिनके शरीर पर असुरों के रक्त के छींटे स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। मातृकाएं घबरा गईं, उनका भावावेश जाता रहा। भाव का सामना महाभाव से हुआ, भैरवियों का सामना महाभैरव से हुआ और इस प्रकार सृष्टि में प्रथम भावेशित नरसिंह अवतार शिव ने रच दिया। चाहे कोई कितना भी भावेशित क्यों न हो, महाभावेशित नरसिंह अर्थात शिव के राजकुमार श्रीहरि जिन्हें आप महाविष्णु के नाम से भी जानते हैं समस्त भावों को अपने अंदर समाहित कर लेते हैं। 

          राम, कृष्ण, बुद्ध, वामन, परशुराम या नर-नारायण, ऋषभ देव इत्यादि अनेकों विष्णु अवतार माता के गर्भ से उदित हुए हैं। इन्होंने मनुष्यों के रूप में बाल्यावस्था देखी है, पुत्र उत्पन्न किए हैं, राजपाट किया है अर्थात जो एक मनुष्य अपने जीवनकाल में समस्त क्रियाएं सम्पन्न करता है वे सब इन अवतारों ने की है परन्तु नरसिंह अवतार जो कि चाक्षुष मनवंतर में हुआ वह सबसे अल्पतम काल के लिए सम्पन्न हुआ अतः इस अवतार में महाविष्णु ने जो रूप दिखाया वह वास्तव में शिव तुल्य है, रुद्र तुल्य है। विष्णु ने हर अवतार में रुद्रात्मकता धारण की कुछ अंश तक परन्तु पूर्णांश में रुद्रात्मकता केवल नरसिंह अवतार में ही धारण की।

         हिरण्यकशिपु का हिरण्यपुर अविभाजित पंजाब के मुलतान शहर में है। यहीं पर विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए थे। हिरण्याक्ष और हिरण्यकशिपु महर्षि कश्यप के पुत्र थे और महर्षि कश्यप की तपोस्थली का ही नाम मूल स्थान है। मूल पुरुष की भूमि को ही मूल स्थान कहा जाता है कालान्तर मूल स्थान नामक जगह मुलतान में परिवर्तित हो गईं। आज भी मुलतान के किले में भगवान नरसिंह का विराट मंदिर है एवं भक्त प्रहलाद के राजमहल के सभी अवशेष विराजमान हैं। जब भी भारतवर्ष पर आक्रमण हुआ मुलतान केन्द्र बिन्दु रहा। यह श्रीमाली कुल का स्थान है, यहाँ के शासक श्रीमाली कहलाते थे। 

        कई शताब्दियों तक श्रीमालियों ने मुलतान पर शासन किया, सिकन्दर ने भारत वर्ष पर आक्रमण किया मुलतान के श्रीमाली शासकों ने घोर युद्ध किया। सिकन्दर को पहली बार छाती में गम्भीर चोट लगी, एक गहरा घाव हो गया वह मृत्यु को प्राप्त होने ही वाला था तभी आपस की फूट का उसे लाभ मिला और मुलतान में श्रीमालियों का रक्त बहा । सिकन्दर के आदेश से असंख्य नर श्रीमालियों की हत्या हुई। मुलतान शहर वृद्ध, जवान, बाल्य पुरुष श्रीमालियों के रक्त से सन गया परन्तु सिकन्दर विजय प्राप्त नहीं कर पाया। श्रीमाली यौद्धाओं द्वारा प्राप्त घाव ही कालान्तर उसकी मृत्यु का कारण बना। यह इतिहास के पन्नों से लिया गया है। नरसिंह ने श्रीमालियों की रक्षा की। तुर्क आक्रमणकर्ताओं से लेकर सिकन्दर तक कोई भी मुलतान के किले में स्थापित नरसिंह अवतार के चिन्हों को नहीं मिटा पाया कालान्तर मुलतान सिक्खों का केन्द्र बिन्दु बना गुरु गोविन्द सिंह ने मुलतान के किले में पुन: पूर्ण विधि-विधान के साथ नरसिंहोपासना प्रारम्भ करवाई। सिक्खों के रूप में पुनः भारतवर्ष को नरसिंह तत्व प्राप्त हुआ एक परम आवेशित ऊर्जा प्राप्त हुई जिसने कि हिन्दु धर्म को संरक्षित करने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

                      शिव शासनत: शिव शासनत:

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