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नर्मदेश्वर शिवलिङ्ग का महत्व ।।

नर्मदा के कंकर सब शिव शंकर, अर्थात विश्व में यही एक मात्र अमृतदायी नदी है जिसमें प्रत्येक पत्थर लिंङ्ग का आकार ले लेता है। शास्त्रों में केव...

प्रेम ।।


प्रेम कोई संबंध नहीं, यह तो एक आंतरिक सुवास है।
यह तब जन्म लेता है जब भीतर की चुप्पी फूल बनकर खिल उठती है।

सच्चे प्रेम में न माँग होती है, न अपेक्षा—वहाँ केवल देना होता है।

प्रेम वह ऊर्जा है जो तुम्हें भीतर से हल्का कर देती है, जैसे किसी ने आत्मा पर से बोझ हटा दिया हो।
जब मन शांत और हृदय खुला होता है, प्रेम अपने आप बहता है।

प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं, पहले अपने भीतर की पूर्णता के लिए होता है—और तभी वह सचमुच दूसरों तक पहुँचता है।

प्रेम का अर्थ है—खुद को इतना संपूर्ण कर लेना कि तुम्हारी उपस्थिति ही एक आशीष बन जाए।


विरह — प्रेम का सबसे ऊँचा स्वरूप 

मनुष्य प्रेम में मिलने को लक्ष्य समझता है।
उसके लिए मिलन ही पूर्णता है,
और जुदाई — असफलता।

पर अस्तित्व की भाषा में इसका अर्थ बिल्कुल उल्टा है।
मिलन प्रेम की शुरुआत है,
विरह प्रेम की परिपक्वता।

जब तुम किसी के साथ होते हो,
तो प्रेम का सहारा उस व्यक्ति की उपस्थिति होती है।
तुम्हारा हृदय धड़कता है —
पर तुम आश्वस्त भी रहते हो,
क्योंकि प्रिय तुम्हारे पास है।

पर विरह…
विरह वह अग्नि है जिसमें प्रेम परीक्षा नहीं देता —
स्वयं को सिद्ध करता है।

किसी के पास रहकर प्रेम करना सहज है।
दूरी में प्रेम बनाए रखना — कठिन।
और फिर भी जो प्रेम दूरी में नहीं टूटता,
जो अनुपस्थिति में और गहरा हो जाता है,
जो मौन में और मुखर हो जाता है,
जो दुःख में भी सुंदर बना रहता है —
वही प्रेम अपनी चरम ऊँचाई पर पहुँच चुका होता है।

विरह तुम्हें सिखाता है कि
प्रेम व्यक्ति पर आधारित नहीं,
प्रेम अनुभूति पर आधारित है।

यदि किसी के जाने से प्रेम मर जाए —
तो वह प्रेम नहीं, निर्भरता थी।
यदि किसी के दूर हो जाने से प्रेम और बढ़ जाए —
तो वही प्रेम है।

इसलिए विरह प्रेम का अंत नहीं है।
विरह प्रेम का पवित्रीकरण है।

विरह में दो शरीरों का मिलन नहीं होता,
विरह में दो आत्माएँ मिलती हैं।
बिना स्पर्श, बिना शब्द, बिना उपस्थिति —
फिर भी एक अदृश्य पुल बना रहता है
जो टूटता नहीं,
चाहे संसार जितना भी समझा दे कि नाता समाप्त हो चुका है।

विरह में दर्द है —
पर यह वही दर्द है
जो अंधकार में पड़े बीज को अंकुर बनने के लिए सहना पड़ता है।
मिलन तुम्हें खुश करता है —
पर विरह तुम्हें जागृत करता है।

जो प्रेम विरह से गुजर चुका हो
वह तुच्छ नहीं रह जाता —
वह पूजा बन जाता है।
उसमें माँग नहीं,
आशीर्वाद होता है।
उसमें अधिकार नहीं,
स्वतंत्रता होती है।
उसमें चिपकाव नहीं,
समर्पण होता है।

मिलन में तुम कह सकते हो,
“तुम मेरे हो।”
पर विरह में एक नई भाषा जन्म लेती है —
“तुम जहाँ भी हो… मेरे ही हो।”

और एक दिन,
जुदाई की रातें अपने चरम पर पहुँचकर
एक शांत सुबह में बदल जाती हैं।
उस सुबह प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है।
प्रेम बस प्रेम बन जाता है —
बिना किसी पते के, बिना किसी नाम के,
पर पहले से कहीं अधिक जीवित।

वही क्षण है
जब तुम्हें समझ आता है —

विरह प्रेम की मृत्यु नहीं,
प्रेम का पुनर्जन्म है।

शंका - एक बालक पैदा होने पर गर्भ से रोता हुआ क्यों बाहर आता है? उसे तो जन्म लेने की प्रसन्नता होनी चाहिए?

समाधान - चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रोने से फेफड़े खुलते है और वह सुप्त अवस्था से जागृत अवस्था में प्रवेश कर जाता है। गर्भ नाल के छेदन के पश्चात वह स्वतन्त्र जीवन जीने के लायक हो जाता है। 

जबकि दार्शनिक व्याख्या के अनुसार वह रोता इसलिए है क्योंकि उसे फिर से एक बार जन्म लेना पड़ा। 9 मास तक माता के गर्भ में उलटी लटकी आत्मा, मूत्र, रक्त आदि में सनी हुई, घोर अन्धकार से ग्रसित होती हैं। वह हर समय ईश्वर से प्रार्थना करती है कि उसे उसे दुःख से मुक्ति दिलाये। पर जब उसका जन्म होता है तो उसे यह ज्ञान होता है कि उसकी मुक्ति नहीं हुई। उसने तो फिर से जन्म ले लिया। उसे फिर से आवागमन के चक्कर में आना पड़ा। ऐसा इसलिए क्योंकि उसके कर्म ऐसे नहीं थे जिससे उसकी मुक्ति हो। ऐसा इसलिए क्योंकि वह मोक्ष मार्ग का पथिक तो बना पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचा। अब उसे फिर से शैशव, जवानी, बुढ़ापा देखना पड़ेगा। उसे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, व्याधि, मोह, क्रोध, स्वजनों का बिछड़ना आदि देखने पड़ेंगे। उसे फिर पिछले अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। उसे फिर से सांसारिक जीव बनकर मुक्ति की प्रतीक्षा चिरकाल तक करनी पड़ेगी। यह स्मृति होते ही उसका इस जगत में जन्म लेते ही रोना शुरू हो जाता हैं। यह बोध होते ही उसे अपने पूर्व कर्मों में रह गई क्षीणता का स्मरण हो जाता है। यह बोध होते ही उसे आत्मग्लानि का अनुभव होने लगता है। इसलिए उसका नया जीवन रोने से आरम्भ होता है।

जो यह कहते है कि मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जायेगा। वह सांसारिक पदार्थों के उपलक्ष में तो सही हो सकता है पर दार्शनिक विचार से देखे तो मनुष्य अपने साथ पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के फल लेकर आता है और इस जन्म में अनेकों को भोगता भी हैं। और इस जन्म में किये गए कर्मों में से अनेकों के फल भोगने के लिए अगले जन्म में भी साथ ले जाता हैं। इसलिए मनुष्य कभी खाली हाथ तो नहीं आता। 

इसलिए हे मनुष्यों! पवित्र आत्मा के जन्म के रोने से सीख लो। यह जन्म तो हो गया। पर अभी और कितने जन्मों तक माता के गर्भ का अन्धकार देखोगे? कितने जन्मों तक यह आवागमन के चक्र् में फंसे रहोगे? कितने जन्मों तक मोक्ष के चरम सुख का आनंद भोगने ने से दूर रहोगे। 
सत्कर्म करते हुए योग मार्ग का पथिक बने और दुःखों छूटकर मोक्ष के अधिकारी बने।

ज्योतिष : ग्रहों के वक्रिय सिद्धांत ।।

ग्रहों के वक्रिय सिद्धांत
वक्री ग्रहों को लेकर पुरातन काल से आज तक ज्योतिषियों के भिन्न भिन्न विचार रहे हैं।हमारे ज्योतिष ग्रंथो में भी वक्री ग्रहो को लेकर अलग अलग विचार रखे गए हैं।ज्योतिषयो द्वारा रखें गये कुछ सामान्य विचार इस तरह है।
1 कुछ लोगों का मानना है वक्री ग्रह हमेशा शुभ फल देते है।
2 कुछ लोगों का मानना है वक्री ग्रह हमेशा अशुभ फल देते हैं।
3 कुछ लोग का मानना है वक्री ग्रह हमेशा भाव से पहले भाव का फल देते है।
4 कुछ लोग का मानना है वक्री ग्रह नीच राशि में उच्च के समान फल देते हैं और उच्च राशि में नीच के समान फल देते हैं।

 इस प्रकार से कइ मान्यताये है।आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं।सबसे पहले ये जानले सूर्य और चंद्रमा हमेशा मार्गि रहते है।राहु और केतु हमेशा वक्री रहते है बाकि बचे 5 ग्रह समय समय पर मार्गि और वक्री दोनों होते रहते हैं।
जब कोई ग्रह अपनी कक्षा में सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तब वो ग्रह वक्री हो जाता हैं उसी समय वो ग्रह प्रथ्वी के सबसे निकट होता है। अब जो ग्रह वक्र हुआ है उसके अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने पर और उसी समय प्रथ्वी के सबसे निकट होने पर उस ग्रह पर क्या क्या प्रभाव पड़ता है उसपर चर्चा करते हैं।

1 देखिए वक्री ग्रह का अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने के कारण वो सूर्य के तेज और ताप के प्रभाव से काफी दूर होता हैं इसलिए उस ग्रह की गति काफी धीमी हो जाती हैं जिसका मतलब ये होता हैं की वो वक्री ग्रह अन्य मार्गि ग्रहों के अपेक्षा कुंडली में अपने कारकत्वों से सम्बंधित काफी धीमे फल देता है मतलब उस वक्री ग्रह के कुंडली मे अपनी स्थिति के अनुसार गुण दोष स्वभाव में परिवर्तन नहीं आता पर वो वक्री ग्रह अपने फल काफी उतार चढ़ाव और बाधाओं के साथ देता हैं इसी कारण वक्री ग्रह अपने फल देने मे बहुत विलंब करते है जिस कारण हमें लगता है वक्री ग्रह अशुभ फल दे रहा हैं ।वक्री ग्रह जब तक वक्र रहते है तब तक उनकी गति काफी धीमी होती हैं और इसी धीमी गति को गोचर मे उनकी सामान्य गति से संतुलन बैठाने के लिए वक्री ग्रहो की डिग्री को पीछे ले जाया जाता हैं।जिसे देखकर बहुत से ज्योतिषी कह देते है वक्री ग्रह उल्टा चल रहा है।वक्री ग्रह के अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने के कारण वक्री ग्रह मनमाने और नाटकीय ढंग से फल देने लगता हैं इसी मनमाने ढंग से फल देने के कारण वक्री ग्रह के व्यवहार को समझना मुश्किल हो जाता हैं।

 2 जब ग्रह वक्री होता हैं उस समय वो प्रथ्वी के सबसे निकट होता हैं जिस कारण अन्य मार्गि ग्रहों के अपेक्षा वक्री ग्रह का जातक के उपर ज्यादा प्रभाव पड़ता है कहलिजीये सामान्य अवस्था से तीन गुना ज्यादा इसिलिए अगर जातक की जन्म कुंडली में कोई ग्रह वक्री है तो उस वक्री ग्रह का जातक के उपर 100% प्रभाव पड़ता है।

भगवान गणेश के प्रसिद्ध नाम ।।

आदिगणेश - नित्य, स्वयंभू, शाश्वत सनातन अनंतगणेश, सर्वशक्तिमान परमात्मा जो सभी के सृजनकर्ता, पालनहार है
गणेश - गणों के ईश्वर, समस्त जीवों के स्वामी, गणपति
प्रथम पूज्य - जिन्हें सबसे पहले पूजा जाता है, प्रथमेश्वर 
विनायक - नेतृत्वकर्ता, मार्गदर्शक, सर्वेश्वर
गजानन - जिनका मुख हाथी के समान है
गौरीसुत - देवी गौरी (पार्वती) के पुत्र
शंकर सुवन - भगवान शंकर के पुत्र
विघ्नहर्ता - विघ्न बाधाओं का हरण करने वाले 
लंबोदर - लंबे उदर (पेट) वाले
एकदंत - एक दंत (दांत) वाले 
वक्रतुंड - घुमावदार सूंड़ वाले 
महाकाय - विशाल शरीर वाले, विकट
सूर्यकोटि समप्रभ - करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी 
भालचंद्र - जिसके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है
कपिल - भूरे या ताम्र वर्ण (रंग) वाले 
सुमुख - सुंदर मुख वाले, मनोहर 
मूषक वाहन - जिनकी सवारी मूषक (चूहा) है
मोदकप्रिय - जिन्हें मोदक (लड्डू) प्रिय है 
शुभम - जिनका प्रत्येक कार्य शुभ है, मंगलमूर्ति 
बुद्धिविधाता - बुद्धि के स्वामी, बुद्धिनाथ 
गुणिन - समस्त गुणों के ज्ञानी
यशस्कर - प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी

"गायत्री उपासना" किन्हें फलित होती है?

    गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। त्रिपदा का अर्थ है- तीन चरण वाली, तीन टाँगवाली। तीन टुकड़े इसके हैं, जिनको समझ करके हम गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की आधारशिला को ठीक तरीके से जान सकते हैं। इसका एक भाग है विज्ञान वाला पहलू। विज्ञान वाले पहलू में आते हैं तत्त्वदर्शन, तप, साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। यह विज्ञान वाला पक्ष है। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र का जप करने से, उपासना और ध्यान करने से उसके जो माहात्म्य बताए गए हैं कि इससे यह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनाएँ पूरी होती हैं। अब यह देखा जाए कि यह कैसे पूरी होती हैं और कैसे पूरी नहीं होती? कब यह सफलता मिलती है और कब नहीं मिलती?

    किसी भी बीज को पैदा करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। भूमि उसके पास होनी चाहिए। भूमि के अलावा खाद और पानी का इंतजाम होना चाहिए। अगर ये तीनों चीजें उसके पास न होंगी तब फिर मुश्किल है। तब फिर वह बीज पल्लवित होगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही तीन बातें हैं कि यदि गायत्री मंत्र के साथ तीन चीजें मिला दी जाएँ या किसी भी आध्यात्मिक उपासना के साथ मिला दी जाएँ तो उसके ठीक परिणाम होने संभव हैं। अगर यह तीन चीजें नहीं मिलाई जाएँगी, तब फिर यही कहना पड़ेगा कि इसमें सफलता की आशा कम है।

    गायत्री उपासना के संबंध में हमारा लंबे समय का जो अनुभव है वह यह है कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं जो सामान्य पुस्तकों में लिखे हुए हैं या बड़े से लेकर छोटे लोगों ने किए हैं। किसी को फलित होने और किसी को न फलित होने का मूल कारण यह है कि उन तीन तत्त्वों का समावेश करना लोग भूल जाते हैं जो किसी भी उपासना का प्राण हैं। उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ा हुआ है कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की एक अपने आप में शक्ति है। बहुत सारी शक्तियाँ हैं- जैसे बिजली की शक्ति है, भाप की शक्ति है, आग की शक्ति है, उसी तरीके से श्रद्धा की भी एक शक्ति है। पत्थर में से देवता पैदा हो जाते हैं, झाड़ी में से भूत पैदा हो जाता है, रस्सी में से साँप हो जाता है और न जाने क्या- क्या हो जाता है श्रद्धा के आधार पर।

    अगर हमारा और आपका किसी मंत्र के ऊपर, जप उपासना के ऊपर अटूट विश्वास है, प्रगाढ़ निष्ठा और श्रद्धा है तो मेरा अब तक का अनुभव यह है कि उसको चमत्कार मिलना चाहिए और उसके लाभ सामने आने चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा से विहीन उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित केवल मात्र कर्मकाण्ड संपन्न किए हैं, केवल जीभ की नोक से जप किए हैं और उँगलियों की सहायता से मालाएँ घुमाई हैं, लेकिन मन मैं वह श्रद्धा न उत्पन्न कर सके, विश्वास उत्पन्न न कर सके, ऐसे लोग खाली रहेंगे। बहुत सारा जप करते हुए भी अगर अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासनाएँ की जाएँ तो यह एक ही पहलू ऐसा है जिसके आधार पर हम यह आशा कर सकते हैं कि हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए और उपासना को पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।

    दूसरा, उपासना को सफल बनाने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व का होना नितांत आवश्यक है। परिष्कृत व्यक्तित्व का मतलब यह है कि आदमी चरित्रवान हो, लोकसेवी हो, सदाचारी हो, संयमी हो, अपने व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने वाला हो। अब तक ऐसे ही लोगों को सफलताएँ मिली हैं। अध्यात्म का लाभ स्वयं पाने और दूसरों को दे सकने में केवल वही साधक सफल हुए हैं जिन्होंने कि जप, उपासना के कर्मकाण्डों के सिवाय अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन, समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है।

    संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करते हैं, उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी द्वारा भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो जाए और वह शुद्ध बने। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनाने में रामनाम सफल नहीं हुआ तो जानना चाहिए कि उपासना की विधि में बहुत भारी भूल रह गई और नाम के साथ में काम करने वाली बात को भुला दिया गया। परिष्कृत व्यक्तित्व उपासना का दूसरा वाला पहलू है, गायत्री उपासना के संबंध में अथवा अन्यान्य उपासनाओं के संबंध में।

    तीसरा, हमारा अब तक का अनुभव यह है कि उच्चस्तरीय जप और उपासनाएँ तब सफल होती हैं जबकि आदमी का दृष्टिकोण और महत्त्वाकांक्षाएँ भी ऊँची हों। घटिया उद्देश्य लेकर के, निकृष्ट कामनाएँ और वासनाएँ लेकर के अगर भगवान की उपासना की जाए और देवताओं का द्वार खटखटाया जाए, तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि और विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि उसकी उपासना का उद्देश्य क्या है? किस काम के लिए करना चाहता है?

     अगर उन्हीं कामों के लिए जिसमें कि आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा कराने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाता है तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं कि यह कोई घटिया आदमी है और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जाएगा? किस काम के लिए किया जाएगा? यदि घटिया काम के लिए उसका उपयोग किया जाने वाला है, तो वे कदाचित ही कभी किसी के साथ सहायता करने को तैयार होते हैं। ऊँचे उद्देश्यों के लिए देवताओं ने हमेशा सहायता की है।

     मंत्रशक्ति और भगवान की शक्ति केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित रही है जिनका दृष्टिकोण ऊँचा रहा है। जिन्होंने किसी अच्छे काम के लिए, ऊँचे काम के लिए भगवान की सेवा और सहायता चाही है, उनको बराबर सेवा और सहायता मिली है। इन तीनों बातों को हमने प्राणपण से प्रयत्न किया और हमारी गायत्री उपासना में प्राण संचार होता चला गया। प्राण संचार अगर होगा तो हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है और सफल होती जाती है। हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में चौबीस लाख के चौबीस साल में चौबीस महापुरश्चरण किए। जप और अनुष्ठानों की विधियों को संपन्न किया। सभी के साथ जो नियमोपनियम थे, उनका पालन किया। यह भी सही है, लेकिन हर एक को यह ध्यान रहना चाहिए कि हमारी उपासना में कर्मकाण्डों का, विधि- विधानों का जितना ज्यादा स्थान है उससे कहीं ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर है कि हमने उन तीन बातों को जो आध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश की है।

✍️ श्रीराम शर्मा आचार्य