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शिखाधारण संक्षित्प्त विधि ।।

यदि संभव हो तो किसी पुण्यस्थल-तीर्थस्थल (गंगा/नर्मदा आदि पवित्र नदियों के तट पर जावें) 

० सर्वप्रथम तीर्थदेवताओं को नमस्कार करें।
वहाँ स्नान करें।
० शिखा हेतु मुण्डन करवाने से पूर्व दाहिने हाथ को मस्तक पर रखकर बोलें-
"आत्मनः शुद्धिकामोहं पितृणां तृप्तिहेतवे। 
वपनं कारयिष्यामि तीर्थेहं तव जाह्नवि/नर्मदा।।"
० तत्पश्चात मुण्डन करवाएँ और गौमाता के खुर जितनी मोटी शिखा रखें। (शिखा रखते समय शिखा का झुकाव दाहिने कान की ओर रखें)

राहु के नकारात्मक प्रभाव ।।

क्या करता है नकारात्मक राहू,राहू के बारे मै कुछ नकारात्मक बाते जानें। 

ये हम सब जानते है की गुरु राहु चांडाल दोष, सूर्य राहु पितृ दोष, ग्रहण दोष, चन्द्र राहु ग्रहण दोष, शनि राहु शापित दोष, मंगल राहु अंगारक दोष बनाते है। मतलब 100 लीटर दूध मै एक बून्द निम्बू दूध को फाड़ देती है । इसी तरह राहु का साथ शुभ ग्रह को खराब कर देता है । इस ग्रह का हर किसी की जिंदगी पर अलग - अलग प्रभाव पड़ता है । जिंदगी में इसका अधिक प्रभाव पूर्ण नास्तिक से लेकर पागलपन तक बना देता है । ये निर्भर करता है की राहू आपकी जिंदगी में कितने अंश का है, और प्रभावी ग्रह, स्थान कितना कमजोर है । जब कुंडली में शनि नीच राशि, कमजोर या दुष्प्रभाव में हो तब राहू और खराब असर देने लगता है। ज्योतिष के अनुसार राहु शोध, कटु भाषण, विदेश, चीज़ों की कमी और उनकी चाहत, तर्क, झूठ, चालाकी, शक्ति, गरिमा, जुआ, झगड़ा, आत्महत्या, गुलामी, गलत तर्क आदि का प्रतीक है। वहीं केतू अंतिम मुक्ति, कारावास, मोक्ष, आत्महत्या, दोषी व्यक्ति, हत्या, व्यभिचार, जानवर, उपभोग, दर्दनाक बुखार, महान तपस्या, मन की अस्थिरता तथा विदेशी लोगों से संबंध का प्रतीक माना जाता है। राहु और केतू किसी व्यक्ति को किस तरह प्रभावित करेंगे ये उस व्यक्ति की कुंडली पर निर्भर करता है। कुंडली में जिस स्थान पर पर ये ग्रह बैठे होंगे और जिन भी ग्रहों की दृष्टि इन दोनों पर पड़ रही होगी उसी के अनुसार व्यक्ति के भाग्य पर प्रभाव पड़ेगा। अगर राहु और केतू आपकी कुंडली में सही जगह पर बैठे हों तो ये संबंधित स्थान के प्रभावों को बढ़ा देते हैं लेकिन यदि इनकी स्थिति विपरीत हुई तो व्यक्ति को संबंधित क्षेत्र में सचेत रहना आवश्यक है। 

 ० अगर आपकी कुंडली में राहु दोष है तो आपको मानसिक तनाव, आर्थिक नुकसान, स्वयं को ले कर ग़लतफहमी, आपसी तालमेल में कमी, बात बात पर आपा खोना, वाणी का कठोर होना और अपशब्द बोलना साथ ही अगर आपकी कुंडली में राहु की स्थिति अशुभ हौ तो आपके हाथ के नाखून अपने आप टूटने लगते हैं।इसके साथ ही वाहन दुर्घटना, पेट में कोई समस्या, सिर में दर्द होना, भोजन में बाल दिखना, अपयश की प्राप्ति, संबंध ख़राब होना, दिमागी संतुलन ठीक नहीं रहता है, शत्रुओं की ओर से परेशान आदि आपकी कुंडली में राहु के खराब होने के संकेत है। 

 ० कई बार राहू आपको भय भी देता है, एक अज्ञात सा भय, अक्सर इसका असर अमावस्या पर दिखाई देता है, राहु ग्रह पेट की समस्या ज्यादा देता है, आप हर इलाज करवा लीजिये,पुरे संसार मै घूम लीजिये, हर रिपोर्ट ठीक आयगी,पर पेट का दर्द ठीक नही होगा जब तक राहू का इलाज नही करवाया जाए । राहु के मुख्य लक्षण(प्रभाव)- 

 ० पेट के रोग, दिमागी रोग, पागलपन, खाजखुजली ,भूत -चुडैल का शरीर में प्रवेश, बिना बात के ही झूमना, नशे की आदत लगना, गलत स्त्रियों या पुरुषों के साथ सम्बन्ध बनाकर विभिन्न प्रकार के रोग लगा लेना, शराब और शबाब के चक्कर में अपने को बरबाद कर लेना,लगातार टीवी और मनोरंजन के साधनों में अपना मन लगाकर बैठना, होरर शो देखने की आदत होना, भूत प्रेत और रूहानी ताकतों के लिये जादू या शमशानी काम करना, नेट पर बैठ कर बेकार की स्त्रियों और पुरुषों के साथ चैटिंग करना और दिमाग खराब करते रहना, कृत्रिम साधनो से अपने शरीर के सूर्य यानी वीर्य को झाडते रहना, शरीर के अन्दर अति कामुकता के चलते लगातार यौन सम्बन्धों को बनाते रहना और बाद में वीर्य के समाप्त होने पर या स्त्रियों में रज के खत्म होने पर टीबी तपेदिक फ़ेफ़डों की बीमारियां लगाकर जीवन को खत्म करने के उपाय करना, शरीर की नशें काटकर उनसे खून निकाल कर अपने खून रूपी मंगल को समाप्त कर जीवन को समाप्त करना, ड्र्ग लेने की आदत डाल लेना, नींद नही आना, शरीर में चींटियों के रेंगने का अहसास होना,गाली देने की आदत पड़ जाना,सडक पर गाडी आदि चलाते वक्त अपना पौरुष दिखाना या कलाबाजी दिखाने के चक्कर में शरीर को तोड लेना, बाजी नामक रोग लगा लेना, जैसे गाडीबाजी, आदि, इन रोगों के अन्य रोग भी राहु के है, जैसे कि किसी दूसरे के मामले में अपने को दाखिल करने के बाद दो लोगों को आपस में लडाकर दूर बैठ कर तमाशा देखना, लोगों को क्लिप बनाकर लूटने की क्रिया करना और इन कामों के द्वारा जनता का जीवन बिना किसी हथियार के बरबाद करना भी है। अगर उपरोक्त प्रकार के भाव मिलते है, तो समझना चाहिये कि किसी न किसी प्रकार से राहु का प्रकोप शरीर पर है, या तो गोचर से राहु अपनी शक्ति देकर मनुष्य जीवन को जानवर की गति प्रदान कर रहा है, अथवा राहु की दशा चल रही है, और पुराने पूर्वजों की गल्तियों के कारण जातक को इस प्रकार से उनके पाप भुगतने के लिये राहु प्रयोग कर रहा है।

० राहु का सकारात्मक प्रभाव - कभी आपने सूना की किसी को अचानक लाटरी निकल गयी, या मकान खोदने पर गढ़ा हुआ धन निकला, या राजनीति मे अचानक ऊँचे पद पर पहुंच गया,या सट्टा बाजार मै करोड़ो कमाए। ये सब राहू जी के ही कार्य है । अब फिर से समझे की ये तय हो गया की राहु राक्षस है, फिर अमृत को चख कर वो बलशाली हो गया। किन्तु उसकी आदत नकारात्मक ही होती है। लेकिन एक नकारात्मक व्यक्ति भी किसी न किसी पर मेहरबान तो होता ही है, एक गुंडा, बदमाश भी किसी को चाहता तो होगा । वैसे ही राहु सबका बुरा करता है , लेकिन जब अपने उच्च घर मिथुन पुरातन काल अनुसार कहना है वृषभ मै भी जब विराजमान होते है, कन्या राशि मे होते है, तब बहुत ही सकारात्मक प्रभाव देते है, फर्श से अर्श तक, याने जमीन से आसमान तक पहुचाने का कार्य भी इनका ही है ।

० जब शनि शुभ हो,और राहु भी शुभ हो तो समय बदलते देर नही लगती । जो इंसान के पास चाय पीने को रूपये नही रहते वो राहु के समय परिवर्तन के साथ करोड़ो की सम्पत्ति का मालिक बन जाता है । मतलब एक ग्रह गोबर को सोना भी बना सकता है, और सोने को गोबर भी बना देता है ।सही मायनो मै राहू को समझ पाना बहुत ही कठिन होता है, क्योकि उसमे नकारात्मक और सकारात्मक दोनों के गुण है, एक तरफ राक्षस प्रवर्ति , दूसरी और अमृत का अंश चखकर देव गुण । यदि एक सर्प के काटने से हमारी मौत हो सकती है, तो दूसरी और सर्प का जहर हमारी जिंदगी भी बचा सकता है । हर ज्योतिष राहु के नाम पर अक्सर नकारात्मक भ्रामक विचार रखते है, लेकिन हर भाव मे जब यह ग्रह सकारात्मक प्रभाव देता है, तो इंसान को बलशाली से लेकर प्रभावशाली व्यक्ति तक बना देता है। क्या आप जानते हो की कलाकारों की एक्टिंग मै भी राहु और शुक्र की विशेष कृपा जरूरी होती है।कई लोग शनि या राहु को गाली देकर बात करते हैं, यह अनुचित है। ये कुछ भी नहीं करते, आपके किए हुए कर्मों का तद्नुसार ही फल देते हैं। क्या आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्र भारत के अधिकांश प्रधानमंत्री राहु के कारण ही इतना ऊंचा राजयोग पा सके हैं। राहु के कारण ही इंदिरा गांधी सफल रहीं और उन्हीं के कारण राजीव गांधी का राज्यारोहण हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी को भी राहु ने बहुत कुछ दिया। उनकी दशांश कुण्डली में तुला में राहु बैठे हैं जिसकी दशा में उन्हें राजयोग मिला।

० आप सूर्य भगवान की पूजा करें और राहु की उपेक्षा करें तो यह चल नहीं सकता क्योंकि नवग्रह मण्डल में राहु को महत्वपूर्ण स्थान दिया हुआ है। सभी ग्रहों से समान कृपा प्राप्त होने पर ही हम अपने विंशोत्तरी दशा के अनुसार जीवन वर्ष प्राप्त कर सकते हैं और जीवन को सफलता से भोग सकते हैं। राहु बहुत बड़े-बड़े योग बनाते हैं और बड़े-बड़े योग भंग कर देते हैं। पाराशर राहु की प्रशंसा में कहते हैं कि यदि केन्द्राधिपति से युत होकर वे केन्द्र में स्थित हो जाएं तो महान राजयोगकारक होते हैं और अपनी दशा में शुभ फल देते हैं।

प्रेम ।।


प्रेम कोई संबंध नहीं, यह तो एक आंतरिक सुवास है।
यह तब जन्म लेता है जब भीतर की चुप्पी फूल बनकर खिल उठती है।

सच्चे प्रेम में न माँग होती है, न अपेक्षा—वहाँ केवल देना होता है।

प्रेम वह ऊर्जा है जो तुम्हें भीतर से हल्का कर देती है, जैसे किसी ने आत्मा पर से बोझ हटा दिया हो।
जब मन शांत और हृदय खुला होता है, प्रेम अपने आप बहता है।

प्रेम किसी दूसरे के लिए नहीं, पहले अपने भीतर की पूर्णता के लिए होता है—और तभी वह सचमुच दूसरों तक पहुँचता है।

प्रेम का अर्थ है—खुद को इतना संपूर्ण कर लेना कि तुम्हारी उपस्थिति ही एक आशीष बन जाए।


विरह — प्रेम का सबसे ऊँचा स्वरूप 

मनुष्य प्रेम में मिलने को लक्ष्य समझता है।
उसके लिए मिलन ही पूर्णता है,
और जुदाई — असफलता।

पर अस्तित्व की भाषा में इसका अर्थ बिल्कुल उल्टा है।
मिलन प्रेम की शुरुआत है,
विरह प्रेम की परिपक्वता।

जब तुम किसी के साथ होते हो,
तो प्रेम का सहारा उस व्यक्ति की उपस्थिति होती है।
तुम्हारा हृदय धड़कता है —
पर तुम आश्वस्त भी रहते हो,
क्योंकि प्रिय तुम्हारे पास है।

पर विरह…
विरह वह अग्नि है जिसमें प्रेम परीक्षा नहीं देता —
स्वयं को सिद्ध करता है।

किसी के पास रहकर प्रेम करना सहज है।
दूरी में प्रेम बनाए रखना — कठिन।
और फिर भी जो प्रेम दूरी में नहीं टूटता,
जो अनुपस्थिति में और गहरा हो जाता है,
जो मौन में और मुखर हो जाता है,
जो दुःख में भी सुंदर बना रहता है —
वही प्रेम अपनी चरम ऊँचाई पर पहुँच चुका होता है।

विरह तुम्हें सिखाता है कि
प्रेम व्यक्ति पर आधारित नहीं,
प्रेम अनुभूति पर आधारित है।

यदि किसी के जाने से प्रेम मर जाए —
तो वह प्रेम नहीं, निर्भरता थी।
यदि किसी के दूर हो जाने से प्रेम और बढ़ जाए —
तो वही प्रेम है।

इसलिए विरह प्रेम का अंत नहीं है।
विरह प्रेम का पवित्रीकरण है।

विरह में दो शरीरों का मिलन नहीं होता,
विरह में दो आत्माएँ मिलती हैं।
बिना स्पर्श, बिना शब्द, बिना उपस्थिति —
फिर भी एक अदृश्य पुल बना रहता है
जो टूटता नहीं,
चाहे संसार जितना भी समझा दे कि नाता समाप्त हो चुका है।

विरह में दर्द है —
पर यह वही दर्द है
जो अंधकार में पड़े बीज को अंकुर बनने के लिए सहना पड़ता है।
मिलन तुम्हें खुश करता है —
पर विरह तुम्हें जागृत करता है।

जो प्रेम विरह से गुजर चुका हो
वह तुच्छ नहीं रह जाता —
वह पूजा बन जाता है।
उसमें माँग नहीं,
आशीर्वाद होता है।
उसमें अधिकार नहीं,
स्वतंत्रता होती है।
उसमें चिपकाव नहीं,
समर्पण होता है।

मिलन में तुम कह सकते हो,
“तुम मेरे हो।”
पर विरह में एक नई भाषा जन्म लेती है —
“तुम जहाँ भी हो… मेरे ही हो।”

और एक दिन,
जुदाई की रातें अपने चरम पर पहुँचकर
एक शांत सुबह में बदल जाती हैं।
उस सुबह प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है।
प्रेम बस प्रेम बन जाता है —
बिना किसी पते के, बिना किसी नाम के,
पर पहले से कहीं अधिक जीवित।

वही क्षण है
जब तुम्हें समझ आता है —

विरह प्रेम की मृत्यु नहीं,
प्रेम का पुनर्जन्म है।

शंका - एक बालक पैदा होने पर गर्भ से रोता हुआ क्यों बाहर आता है? उसे तो जन्म लेने की प्रसन्नता होनी चाहिए?

समाधान - चिकित्सा विज्ञान के अनुसार रोने से फेफड़े खुलते है और वह सुप्त अवस्था से जागृत अवस्था में प्रवेश कर जाता है। गर्भ नाल के छेदन के पश्चात वह स्वतन्त्र जीवन जीने के लायक हो जाता है। 

जबकि दार्शनिक व्याख्या के अनुसार वह रोता इसलिए है क्योंकि उसे फिर से एक बार जन्म लेना पड़ा। 9 मास तक माता के गर्भ में उलटी लटकी आत्मा, मूत्र, रक्त आदि में सनी हुई, घोर अन्धकार से ग्रसित होती हैं। वह हर समय ईश्वर से प्रार्थना करती है कि उसे उसे दुःख से मुक्ति दिलाये। पर जब उसका जन्म होता है तो उसे यह ज्ञान होता है कि उसकी मुक्ति नहीं हुई। उसने तो फिर से जन्म ले लिया। उसे फिर से आवागमन के चक्कर में आना पड़ा। ऐसा इसलिए क्योंकि उसके कर्म ऐसे नहीं थे जिससे उसकी मुक्ति हो। ऐसा इसलिए क्योंकि वह मोक्ष मार्ग का पथिक तो बना पर अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचा। अब उसे फिर से शैशव, जवानी, बुढ़ापा देखना पड़ेगा। उसे सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास, व्याधि, मोह, क्रोध, स्वजनों का बिछड़ना आदि देखने पड़ेंगे। उसे फिर पिछले अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ेगा। उसे फिर से सांसारिक जीव बनकर मुक्ति की प्रतीक्षा चिरकाल तक करनी पड़ेगी। यह स्मृति होते ही उसका इस जगत में जन्म लेते ही रोना शुरू हो जाता हैं। यह बोध होते ही उसे अपने पूर्व कर्मों में रह गई क्षीणता का स्मरण हो जाता है। यह बोध होते ही उसे आत्मग्लानि का अनुभव होने लगता है। इसलिए उसका नया जीवन रोने से आरम्भ होता है।

जो यह कहते है कि मनुष्य खाली हाथ आता है और खाली हाथ जायेगा। वह सांसारिक पदार्थों के उपलक्ष में तो सही हो सकता है पर दार्शनिक विचार से देखे तो मनुष्य अपने साथ पूर्व जन्मों में किये गए कर्मों के फल लेकर आता है और इस जन्म में अनेकों को भोगता भी हैं। और इस जन्म में किये गए कर्मों में से अनेकों के फल भोगने के लिए अगले जन्म में भी साथ ले जाता हैं। इसलिए मनुष्य कभी खाली हाथ तो नहीं आता। 

इसलिए हे मनुष्यों! पवित्र आत्मा के जन्म के रोने से सीख लो। यह जन्म तो हो गया। पर अभी और कितने जन्मों तक माता के गर्भ का अन्धकार देखोगे? कितने जन्मों तक यह आवागमन के चक्र् में फंसे रहोगे? कितने जन्मों तक मोक्ष के चरम सुख का आनंद भोगने ने से दूर रहोगे। 
सत्कर्म करते हुए योग मार्ग का पथिक बने और दुःखों छूटकर मोक्ष के अधिकारी बने।

ज्योतिष : ग्रहों के वक्रिय सिद्धांत ।।

ग्रहों के वक्रिय सिद्धांत
वक्री ग्रहों को लेकर पुरातन काल से आज तक ज्योतिषियों के भिन्न भिन्न विचार रहे हैं।हमारे ज्योतिष ग्रंथो में भी वक्री ग्रहो को लेकर अलग अलग विचार रखे गए हैं।ज्योतिषयो द्वारा रखें गये कुछ सामान्य विचार इस तरह है।
1 कुछ लोगों का मानना है वक्री ग्रह हमेशा शुभ फल देते है।
2 कुछ लोगों का मानना है वक्री ग्रह हमेशा अशुभ फल देते हैं।
3 कुछ लोग का मानना है वक्री ग्रह हमेशा भाव से पहले भाव का फल देते है।
4 कुछ लोग का मानना है वक्री ग्रह नीच राशि में उच्च के समान फल देते हैं और उच्च राशि में नीच के समान फल देते हैं।

 इस प्रकार से कइ मान्यताये है।आज इसी विषय पर चर्चा करते हैं।सबसे पहले ये जानले सूर्य और चंद्रमा हमेशा मार्गि रहते है।राहु और केतु हमेशा वक्री रहते है बाकि बचे 5 ग्रह समय समय पर मार्गि और वक्री दोनों होते रहते हैं।
जब कोई ग्रह अपनी कक्षा में सूर्य से अधिकतम दूरी पर होता है तब वो ग्रह वक्री हो जाता हैं उसी समय वो ग्रह प्रथ्वी के सबसे निकट होता है। अब जो ग्रह वक्र हुआ है उसके अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने पर और उसी समय प्रथ्वी के सबसे निकट होने पर उस ग्रह पर क्या क्या प्रभाव पड़ता है उसपर चर्चा करते हैं।

1 देखिए वक्री ग्रह का अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने के कारण वो सूर्य के तेज और ताप के प्रभाव से काफी दूर होता हैं इसलिए उस ग्रह की गति काफी धीमी हो जाती हैं जिसका मतलब ये होता हैं की वो वक्री ग्रह अन्य मार्गि ग्रहों के अपेक्षा कुंडली में अपने कारकत्वों से सम्बंधित काफी धीमे फल देता है मतलब उस वक्री ग्रह के कुंडली मे अपनी स्थिति के अनुसार गुण दोष स्वभाव में परिवर्तन नहीं आता पर वो वक्री ग्रह अपने फल काफी उतार चढ़ाव और बाधाओं के साथ देता हैं इसी कारण वक्री ग्रह अपने फल देने मे बहुत विलंब करते है जिस कारण हमें लगता है वक्री ग्रह अशुभ फल दे रहा हैं ।वक्री ग्रह जब तक वक्र रहते है तब तक उनकी गति काफी धीमी होती हैं और इसी धीमी गति को गोचर मे उनकी सामान्य गति से संतुलन बैठाने के लिए वक्री ग्रहो की डिग्री को पीछे ले जाया जाता हैं।जिसे देखकर बहुत से ज्योतिषी कह देते है वक्री ग्रह उल्टा चल रहा है।वक्री ग्रह के अपनी कक्षा मे सूर्य से अधिकतम दूरी पर होने के कारण वक्री ग्रह मनमाने और नाटकीय ढंग से फल देने लगता हैं इसी मनमाने ढंग से फल देने के कारण वक्री ग्रह के व्यवहार को समझना मुश्किल हो जाता हैं।

 2 जब ग्रह वक्री होता हैं उस समय वो प्रथ्वी के सबसे निकट होता हैं जिस कारण अन्य मार्गि ग्रहों के अपेक्षा वक्री ग्रह का जातक के उपर ज्यादा प्रभाव पड़ता है कहलिजीये सामान्य अवस्था से तीन गुना ज्यादा इसिलिए अगर जातक की जन्म कुंडली में कोई ग्रह वक्री है तो उस वक्री ग्रह का जातक के उपर 100% प्रभाव पड़ता है।

भगवान गणेश के प्रसिद्ध नाम ।।

आदिगणेश - नित्य, स्वयंभू, शाश्वत सनातन अनंतगणेश, सर्वशक्तिमान परमात्मा जो सभी के सृजनकर्ता, पालनहार है
गणेश - गणों के ईश्वर, समस्त जीवों के स्वामी, गणपति
प्रथम पूज्य - जिन्हें सबसे पहले पूजा जाता है, प्रथमेश्वर 
विनायक - नेतृत्वकर्ता, मार्गदर्शक, सर्वेश्वर
गजानन - जिनका मुख हाथी के समान है
गौरीसुत - देवी गौरी (पार्वती) के पुत्र
शंकर सुवन - भगवान शंकर के पुत्र
विघ्नहर्ता - विघ्न बाधाओं का हरण करने वाले 
लंबोदर - लंबे उदर (पेट) वाले
एकदंत - एक दंत (दांत) वाले 
वक्रतुंड - घुमावदार सूंड़ वाले 
महाकाय - विशाल शरीर वाले, विकट
सूर्यकोटि समप्रभ - करोड़ों सूर्य के समान तेजस्वी 
भालचंद्र - जिसके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है
कपिल - भूरे या ताम्र वर्ण (रंग) वाले 
सुमुख - सुंदर मुख वाले, मनोहर 
मूषक वाहन - जिनकी सवारी मूषक (चूहा) है
मोदकप्रिय - जिन्हें मोदक (लड्डू) प्रिय है 
शुभम - जिनका प्रत्येक कार्य शुभ है, मंगलमूर्ति 
बुद्धिविधाता - बुद्धि के स्वामी, बुद्धिनाथ 
गुणिन - समस्त गुणों के ज्ञानी
यशस्कर - प्रसिद्धि और भाग्य के स्वामी

"गायत्री उपासना" किन्हें फलित होती है?

    गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। त्रिपदा का अर्थ है- तीन चरण वाली, तीन टाँगवाली। तीन टुकड़े इसके हैं, जिनको समझ करके हम गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की आधारशिला को ठीक तरीके से जान सकते हैं। इसका एक भाग है विज्ञान वाला पहलू। विज्ञान वाले पहलू में आते हैं तत्त्वदर्शन, तप, साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। यह विज्ञान वाला पक्ष है। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र का जप करने से, उपासना और ध्यान करने से उसके जो माहात्म्य बताए गए हैं कि इससे यह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनाएँ पूरी होती हैं। अब यह देखा जाए कि यह कैसे पूरी होती हैं और कैसे पूरी नहीं होती? कब यह सफलता मिलती है और कब नहीं मिलती?

    किसी भी बीज को पैदा करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है। भूमि उसके पास होनी चाहिए। भूमि के अलावा खाद और पानी का इंतजाम होना चाहिए। अगर ये तीनों चीजें उसके पास न होंगी तब फिर मुश्किल है। तब फिर वह बीज पल्लवित होगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। गायत्री मंत्र के बारे में भी यही तीन बातें हैं कि यदि गायत्री मंत्र के साथ तीन चीजें मिला दी जाएँ या किसी भी आध्यात्मिक उपासना के साथ मिला दी जाएँ तो उसके ठीक परिणाम होने संभव हैं। अगर यह तीन चीजें नहीं मिलाई जाएँगी, तब फिर यही कहना पड़ेगा कि इसमें सफलता की आशा कम है।

    गायत्री उपासना के संबंध में हमारा लंबे समय का जो अनुभव है वह यह है कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं जो सामान्य पुस्तकों में लिखे हुए हैं या बड़े से लेकर छोटे लोगों ने किए हैं। किसी को फलित होने और किसी को न फलित होने का मूल कारण यह है कि उन तीन तत्त्वों का समावेश करना लोग भूल जाते हैं जो किसी भी उपासना का प्राण हैं। उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ा हुआ है कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की एक अपने आप में शक्ति है। बहुत सारी शक्तियाँ हैं- जैसे बिजली की शक्ति है, भाप की शक्ति है, आग की शक्ति है, उसी तरीके से श्रद्धा की भी एक शक्ति है। पत्थर में से देवता पैदा हो जाते हैं, झाड़ी में से भूत पैदा हो जाता है, रस्सी में से साँप हो जाता है और न जाने क्या- क्या हो जाता है श्रद्धा के आधार पर।

    अगर हमारा और आपका किसी मंत्र के ऊपर, जप उपासना के ऊपर अटूट विश्वास है, प्रगाढ़ निष्ठा और श्रद्धा है तो मेरा अब तक का अनुभव यह है कि उसको चमत्कार मिलना चाहिए और उसके लाभ सामने आने चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा से विहीन उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित केवल मात्र कर्मकाण्ड संपन्न किए हैं, केवल जीभ की नोक से जप किए हैं और उँगलियों की सहायता से मालाएँ घुमाई हैं, लेकिन मन मैं वह श्रद्धा न उत्पन्न कर सके, विश्वास उत्पन्न न कर सके, ऐसे लोग खाली रहेंगे। बहुत सारा जप करते हुए भी अगर अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासनाएँ की जाएँ तो यह एक ही पहलू ऐसा है जिसके आधार पर हम यह आशा कर सकते हैं कि हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए और उपासना को पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।

    दूसरा, उपासना को सफल बनाने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व का होना नितांत आवश्यक है। परिष्कृत व्यक्तित्व का मतलब यह है कि आदमी चरित्रवान हो, लोकसेवी हो, सदाचारी हो, संयमी हो, अपने व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने वाला हो। अब तक ऐसे ही लोगों को सफलताएँ मिली हैं। अध्यात्म का लाभ स्वयं पाने और दूसरों को दे सकने में केवल वही साधक सफल हुए हैं जिन्होंने कि जप, उपासना के कर्मकाण्डों के सिवाय अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन, समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है।

    संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करते हैं, उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी द्वारा भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो जाए और वह शुद्ध बने। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनाने में रामनाम सफल नहीं हुआ तो जानना चाहिए कि उपासना की विधि में बहुत भारी भूल रह गई और नाम के साथ में काम करने वाली बात को भुला दिया गया। परिष्कृत व्यक्तित्व उपासना का दूसरा वाला पहलू है, गायत्री उपासना के संबंध में अथवा अन्यान्य उपासनाओं के संबंध में।

    तीसरा, हमारा अब तक का अनुभव यह है कि उच्चस्तरीय जप और उपासनाएँ तब सफल होती हैं जबकि आदमी का दृष्टिकोण और महत्त्वाकांक्षाएँ भी ऊँची हों। घटिया उद्देश्य लेकर के, निकृष्ट कामनाएँ और वासनाएँ लेकर के अगर भगवान की उपासना की जाए और देवताओं का द्वार खटखटाया जाए, तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि और विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि उसकी उपासना का उद्देश्य क्या है? किस काम के लिए करना चाहता है?

     अगर उन्हीं कामों के लिए जिसमें कि आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा कराने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाता है तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं कि यह कोई घटिया आदमी है और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जाएगा? किस काम के लिए किया जाएगा? यदि घटिया काम के लिए उसका उपयोग किया जाने वाला है, तो वे कदाचित ही कभी किसी के साथ सहायता करने को तैयार होते हैं। ऊँचे उद्देश्यों के लिए देवताओं ने हमेशा सहायता की है।

     मंत्रशक्ति और भगवान की शक्ति केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित रही है जिनका दृष्टिकोण ऊँचा रहा है। जिन्होंने किसी अच्छे काम के लिए, ऊँचे काम के लिए भगवान की सेवा और सहायता चाही है, उनको बराबर सेवा और सहायता मिली है। इन तीनों बातों को हमने प्राणपण से प्रयत्न किया और हमारी गायत्री उपासना में प्राण संचार होता चला गया। प्राण संचार अगर होगा तो हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है और सफल होती जाती है। हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में चौबीस लाख के चौबीस साल में चौबीस महापुरश्चरण किए। जप और अनुष्ठानों की विधियों को संपन्न किया। सभी के साथ जो नियमोपनियम थे, उनका पालन किया। यह भी सही है, लेकिन हर एक को यह ध्यान रहना चाहिए कि हमारी उपासना में कर्मकाण्डों का, विधि- विधानों का जितना ज्यादा स्थान है उससे कहीं ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर है कि हमने उन तीन बातों को जो आध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं, उन्हें पूरा करने की कोशिश की है।

✍️ श्रीराम शर्मा आचार्य