यह विषय विवादास्पद हो सकता है, लेकिन भारतीय वैदिक परंपराओं और शास्त्रों के आधार पर इसका उत्तर सरलता से मिल सकता है।
व्यासपीठ पर बैठने का अधिकार उसे मिलता है जो वैष्णव हो, वेद और शास्त्रों का ज्ञाता हो, और जिसका उपनयन संस्कार (जनेऊ) हुआ हो। उपनयन संस्कार का अधिकारी वही है जो गायत्री मंत्र जप सकता है और वीर्य की शक्ति को ऊर्ध्वगामी करने में सक्षम है। यह गुण पुरुषों में माना गया है, जिससे वे ब्रह्म तक पहुंच सकते हैं, जबकि महिलाओं का उद्देश्य रज के माध्यम से सृष्टि की वृद्धि में योगदान करना होता है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं कि महिलाओं का वेदों में अधिकार नहीं है। प्राचीन समय की विदुषी जैसे गार्गी और मैत्रेयी को वेदज्ञान प्राप्त था, लेकिन वे व्यासपीठ पर नहीं बैठीं। शास्त्रों में यह कहा गया है कि महिलाएं वेदमंत्रों के अर्थ पर अधिकार रख सकती हैं, लेकिन उच्चारण पर नहीं।
मोक्ष के साधनों पर महिलाओं का पूर्ण अधिकार है, बस वैदिक मंत्रों का उच्चारण और उपनयन संस्कार उनके लिए निषिद्ध है। जैसे अगस्त्य ऋषि की पत्नी लोपामुद्रा ने "हादी मत" की स्थापना की, जो महिलाओं को मोक्ष के पथ पर अधिकार देता है।
अन्य कारण:
1. महिला कथावाचक परंपरा में नहीं थीं, क्योंकि भागवत का ज्ञान उच्च दार्शनिकता का विषय है, जिसमें महिलाएं सामान्यत: रुचि नहीं लेतीं (कुछ अपवाद जैसे गार्गी, मैत्रेयी)।
2. मासिक धर्म जैसी स्थितियों के कारण महिलाओं के लिए भागवत कथा वाचन निषिद्ध रहा है।
3. पद्मपुराण के अनुसार भागवत का वक्ता "वैष्णव, विरक्त, उपनयनसंस्कारयुक्त ब्राह्मण" होना चाहिए।
4. श्रीमद्भागवत (1.4.25) में कहा गया है कि स्त्रियों को वेद अध्ययन का अधिकार नहीं है, हालांकि पुराणों का अनुशीलन वे कर सकती हैं।
निष्कर्ष: महिलाएं श्रीमद्भागवत का पठन-मनन स्वकल्याण हेतु कर सकती हैं, लेकिन व्यासपीठ पर बैठकर प्रवचन देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।

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