उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अंत:करण में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करे।
इस अर्थ पर विचार करने से उसके अंतर्गत तीन तथ्य प्रकट होते हैं–
(1) ईश्वर के दिव्य गुणों का चिंतन
(2) ईश्वर को अपने अंत:करण में धारण करना
(3)सद्बुद्धि की प्रेरणा के लिए प्रार्थना।
ये तीनों ही बाते असाधारण महत्व की हैं।
गायत्री की शिक्षा है कि अपनी बुद्धि को सात्विक बनाओ, आदर्शों को ऊंचा रखो, उच्च दार्शनिक विचारधाराओं में रमण करो और तुच्छ तृष्णाओं एवं वासनाओं में नचाने वाली कुबुद्धि को मानस लोक में से बहिष्कृत कर दो। जैसे-जैसे कुबुद्धि का कल्मष दूर होगा, वैसे-वैसे ही दिव्य गुण संपन्न परमात्मा के अंश की अपने में वृद्धि होती जाएगी और उसी अनुपात से लौकिक और पारलौकिक आनन्दों की अभिवृद्धि होती जाएगी।
✍️ पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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