मैंने एक प्रश्न पूछा : 'बाबा इच्छाशक्ति और इच्छा में भेद है न?'
उन्होंने कहा : 'अवश्य, अज्ञानावस्था में इच्छा रहती है, परंतु ज्ञानपूर्ण होने पर ही इच्छा, इच्छाशक्ति का रूप धारण कर लेती है। ... शक्ति का अर्थ है, चैतन्य। जब तक आत्मा अचेतन रहती है अर्थात् ज्ञान को प्राप्त नहीं करती तब तक उसकी इच्छा, इच्छामात्र है, इच्छाशक्ति नहीं है। ज्ञान प्राप्त करने के माने ही है आत्मस्वरूप या ब्रह्मस्वरूप का साक्षात्कार।'
इसी प्रसंग में और एक दिन बाबा ने कहा : 'देखो, इच्छाशक्ति के विषय में मैं तुमको एक तमाशा दिखाता हूॅं।' उस समय मेरे साथ दो अन्य गुरुभाई भी उपस्थित थे।
बाबा ने कहा : 'तुम तीनों अपने हाथ की मुट्ठी बॉंधकर उसमें रखने लायक जिस किसी भी वस्तु की इच्छा करो।'
हम तीनों मुट्ठी बॉंधकर बाबा के निर्देशानुसार मनचाही वस्तु की इच्छा करने लगे।
बाबा ने कहा : 'देखो, तुम्हारे इच्छानुसार मुट्ठी में वस्तु आ गयी या नहीं?'
हम लोगों ने कहा : 'नहीं।' हाथ खोलकर देखने पर पहले जैसा ही खाली मिला।
बाबा ने फिर कहा : 'एक बार और मुट्ठी बॉंधो। जो वस्तु सोचते थे, पुनः उसी का चिंतन करने लगो। पहली बार तुम लोगों ने यह देख लिया कि मात्र इच्छा से कुछ नहीं होता। अब मैं यहॉं से शक्ति संचार करता हूॅं।'
बाबा ऊपर आसन पर बैठे हुए थे। यह कहकर वे अपने हाथ से तकिया को थपथपाते हुए बोले : 'देखो, मैं तुम्हारी इच्छा में शक्ति का संचार कर रहा हूॅं।'
इसके बाद हम लोगों ने मुट्ठी खोलकर देखा। तीनों की मुट्ठी में इच्छित वस्तु रखी हुई थी।
इस घटना की व्याख्या करते हुए बाबा ने बताया : 'तुम्हारी इच्छा और मेरी शक्ति दोनों मिलकर इच्छाशक्ति में परिणत हो गयीं और इसके परिणाम-स्वरूप जो वस्तु प्राप्त हुई, वह इच्छाशक्ति का फल है। जब तुम्हारा महाज्ञान उदय हो जायेगा, उस समय इस शक्ति-संचार की आवश्यकता न रहेगी।
हमने प्रश्न किया : 'इच्छाशक्ति ही तो चरम शक्ति है। उसकी प्राप्ति से योगी में ईश्वरत्व आ जाता है। क्या यही चरम सिद्धि है?'
बाबा बोले : 'नहीं, बहिर्मुखी शक्तियों में इच्छाशक्ति प्रधान है। सृष्टि-राज्य की दृष्टि से यह सर्वप्रथम शक्ति है, इसमें संदेह नहीं। परन्तु यह भी चरम नहीं है। अंत में योगी अंतर्मुख होकर इच्छाशक्ति को भी श्री भगवान् के चरणों में अर्पित कर देते हैं। इच्छाशक्ति के अर्पण के साथ ही साथ आह्लादिनी अथवा परमानंद-रूपा शक्ति का आविर्भाव होता है। जब तक इच्छा की निवृत्ति न हो, तब तक आनंद का उदय कहॉं से होगा? इच्छानिवृत्ति के साथ ही योगी महाशक्ति के पूर्णानंदमय अंक में प्रवेशलाभ करते हैं। इसके बाद अनुकूल तथा प्रतिकूल भाव बराबर हो जाने पर आनंद का भी भेदन हो जाता है। तभी चैतन्य राज्य में प्रवेश होता है। अंत में शिव-शक्ति का अभेद ज्ञान होने पर उसी के साथ अपने स्वरूप का भी तादात्म्य हो जाने पर योगी में स्वातंत्र्य का उन्मेष होता है। यही पूर्णता है।'
अंत में उन्होंने कहा : 'विभूति तुच्छ अवश्य है किन्तु उसका विकास होना चाहिए और विकास होने के अनंतर उसकी निवृत्ति भी होनी आवश्यक है।'
['मनीषी की लोकयात्रा' में गोपीनाथ कविराज जी]

0 comments:
Post a Comment