🥗हनुमान जी और लक्ष्मण जी को 'जती' (यति) की उपमा मिलना मात्र एक अलंकार नहीं है, बल्कि यह उनके अंतस की उस गहरी अवस्था का संकेत है जहाँ ऊर्जा खंडित नहीं होती। जब हम 'जती' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो इसका अर्थ केवल शारीरिक ब्रह्मचर्य नहीं होता, बल्कि एक ऐसी चित्त की दशा है जहाँ व्यक्ति अपनी संपूर्ण ऊर्जा को 'एक' केंद्र पर थाम लेता है।
🥗 जती की उपमा का आध्यात्मिक अर्थ
साधारण मनुष्य की ऊर्जा वासनाओं और विचारों के हज़ार रास्तों पर बिखरी हुई है। 'जती' वह है जिसने अपनी इस ऊर्जा को ऊपर की ओर (ऊर्ध्वरेता) मोड़ दिया है।यह 'अनुशासन' थोपा हुआ नहीं है, बल्कि सजगता का एक ऐसा परिणाम है जहाँ कोई संघर्ष नहीं बचता।
🥗हनुमान जी को अष्ट जती में सर्वोपरि माना जाता है। उनकी जती अवस्था का आधार 'समर्पण' है।हनुमान जी का ब्रह्मचर्य दमन नहीं था। उन्होंने अपनी काम-ऊर्जा को 'राम-ऊर्जा' (भक्ति) में रूपांतरित कर दिया।
🥗 योग शास्त्र कहता है कि जो व्यक्ति बारह वर्ष तक अखंड ब्रह्मचर्य का पालन करता है, उसमें 'मेधा नाड़ी' जागृत हो जाती है। हनुमान जी ने इसे अनंत काल तक साधा, जिससे उन्हें 'अतुलितबलधामं' (अतुलनीय बल का धाम) होने की उपमा मिली।
🥗 लक्ष्मण जी
लक्ष्मण जी को जती की उपमा उनके उस कठोर संकल्प के कारण मिली जो उन्होंने वनवास के १४ वर्षों के दौरान निभाया। कहा जाता है कि लक्ष्मण जी १४ वर्षों तक निद्रा से दूर रहे (गुडाकेश) और पूर्णतः ब्रह्मचर्य का पालन किया। रावण का पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) केवल उस व्यक्ति द्वारा मारा जा सकता था जिसने वर्षों तक ब्रह्मचर्य साधा हो और स्त्रियों के मुख की ओर न देखा हो। लक्ष्मण जी ने केवल सीता माता के चरणों के नूपुरों को पहचाना था, उनके मुख को कभी नहीं देखा। यह उनके 'जती' होने का सबसे बड़ा प्रमाण बना।
🥗भारतीय परंपरा और ग्रंथों में मुख्य रूप से आठ महापुरुषों को 'जती' की उपमा दी गई है, जिन्हें 'अष्ट जती' कहा जाता है। इनके नाम इस प्रकार हैं:
🥗हनुमान जी (अखंड राम भक्त)
🥗लक्ष्मण जी(शेष अवतार, त्याग की प्रतिमूर्ति)
🥗भीष्म पितामह(जिन्होंने अपनी प्रतिज्ञा के लिए काम का त्याग किया)
🥗ऋषि श्रृंगी (अद्भुत तपोबल के धनी)
🥗गोरखनाथ जी (नाथ संप्रदाय के महान योगी)
🥗भैरव जी(रुद्र के अवतार)
🥗दत्तात्रेय जी (त्रिदेवों के स्वरूप)
🥗राजा बलि(अपने दान और आत्म-संयम के कारण)
(कुछ क्षेत्रों में सुग्रीव या अंगद के नाम भी लिए जाते हैं, किंतु उपरोक्त आठ सर्वाधिक मान्य हैं।)
🥗यदि हम इसे गहराई से देखें, तो जती होना कोई पदवी नहीं है जिसे समाज देता है। यह एक 'Inner Flowering'(आंतरिक प्रस्फुटन) है। जती वह है जो अपनी कामुकता के पार चला गया, इसलिए नहीं कि वह कामुकता से डरता था, बल्कि इसलिए क्योंकि उसे 'राम' (परम आनंद) मिल गया। जब तक आपको हीरा नहीं मिलता, आप कंकड़-पत्थरों को पकड़कर रखते हैं। हनुमान और लक्ष्मण को वह हीरा मिल गया था, इसलिए वे 'जती' हो गए।लक्ष्मण और हनुमान की यह उपमा हमें याद दिलाती है कि जब चेतना जागरूक होती है, तो व्यक्ति का व्यक्तित्व ही 'जती' (अनुशासित और अखंड) हो जाता है।

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