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प्राण प्रतिष्ठा -


पूजन /साधना में अनेकानेक जगहों पर हमें प्राण प्रतिष्ठा की आवश्यकता होती हैं।

यह आवश्यकता यंत्र , माला, पात्र, अस्त्र, मूर्ति, गुटिका आदि किसी भी देव विग्रह पर हो सकता हैं।

उस प्राण प्रतिष्ठा विधान को लिख रहा हूँ जिसकी साधकों को आवश्यकता प्रायः पड़ता रहता हैं।

यह हमेशा यही होगा चाहे किसी भी चीज की प्रतिष्ठा करनी हो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता हैं।

हाँ यह संभव है की अलग अलग चीजों के साथ कुछ क्रिया विशेष होते हैं जैसे यंत्र के साथ आवरण पूजन आदि..


एक बात और ध्यान देने योग्य है की प्राण प्रतिष्ठा करते समय जिस देवता की प्रतिष्ठा कर रहे हैं उसका मांत्रिक या मानसिक ध्यान अवश्य करना चाहिए ।

यथा निर्देशित स्थान पर उनका नामोच्चारण भी अवश्य करना चाहिए ।

नामोच्चारण में शंसय हो तो सोऽहं का उच्चारण ही करें ।

क्योंकि सोऽहं महाप्राण हैं।

जिस प्रतिमा का प्रमाण/ आकार अधिक हो या जो नगर पूजित होना हो के प्राण प्रतिष्ठा का विधान वृहदतम होता है उतने गहरे जाने की आवश्यकता भी नहीं हैं।

वस्तुतः यह विधान प्रत्येक साधक को कंठस्थ होना चाहिए । जिससे वो जंगल में भी अपना कार्य बिना किसी पेपर, पेन, मोबाइल पर आश्रित हुए कर सकें।

यूं भी एक समय बाद यह सब झूठ बन जाएगा आपके लिए।

किसी भी विधान स्तोत्र आदि को कंठस्थ करने के लिए उसे रटना नहीं चाहिए रटने से विद्याएं कंठस्थ नहीं होते हैं जीवन में उतारने से होते हैं उसके लिए अनाहत में नित्य इष्ट की प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं।

विनियोग-

ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रम्हा विष्णु महेश्वरा: ऋषयः। ऋग्यजु: सामानि छंदांसि। क्रियामय वपु: प्राण शक्ति देवता। आं बीजम्‌। ह्रीं शक्ति:। क्रौं कीलम्‌। अमुक देव अमुक विग्रहे प्राण प्रतिष्ठापने विनियोगः।

ऋष्यादि न्यास-

ॐ ब्रम्हा विष्णु महेश्वरा: ऋषिभ्यो नमः शिरसि।
ऋग्यजुः सामच्छन्देभ्यो नमः मुखे।
प्राणशक्त्यै नमः ह्रदये।
आं बीजाय नमः लिँगे।
ह्रीं शक्तये नमः पादयोः।
क्रौं कीलकाय नमः सर्वाँगेषु।

कर न्यास-

ॐ अं कं खं गं घं ङं आं पृथिव्यप्तेजो वाय्वाकाशात्मने अंगुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ इं चं छं जं झं ञं ईं शब्दस्पर्श रुप-रस-गंधात्मने तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ उं टं ठं डं ढं णं ऊं त्वक्‌ चक्षुः श्रोत्र जिह्वाघ्राणात्मने मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ एं तं थं दं धं नं ऐं वाक्‌ पाणि पाद पायूपस्थात्मने अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ ओं पं फं बं भं मं औं वचनादान गति विसर्गा नंदात्मने कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ अं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं अः मनो बुद्धयहंकार चित्त विज्ञानात्मने करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः।

हृदयादि न्यास-

ॐ अं कं खं गं घं ङं आं पृथिव्यप्तेजो वाय्वाकाशात्मने हृदयाय नमः।
ॐ इं चं छं जं झं ञं ईं शब्दस्पर्श रुप-रस-गंधात्मने शिरसे स्वाहा।
ॐ उं टं ठं डं ढं णं ऊं त्वक्‌ चक्षुः श्रोत्र जिह्वाघ्राणात्मने शिखायै वषट्‌।
ॐ एं तं थं दं धं नं ऐं वाक्‌ पाणि पाद पायूपस्थात्मने कवचाय हुं।
ॐ ओं पं फं बं भं मं औं वचनादान गति विसर्गा नंदात्मने नेत्रत्रयाय वौषट्‌।
ॐ अं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं अः मनो बुद्धयहंकार चित्त विज्ञानात्मने अस्त्राय फट्‌।
ॐ ऐं इति नाभिमारभ्य पादान्तं स्पृशेत्‌।
ॐ ह्रीं इति हृदयमारभ्य नाभ्यन्तम्‌ स्पृशेत।
ॐ क्रीं इति मस्तकमारभ्य हृदयांतं च स्पृशेत।

ध्यान-

देव विशेष का ध्यान करें

प्राण प्रतिष्ठा मंत्र-

(निम्न मंत्र 3 बार पढें-)
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः अमुक देवस्य प्राणा इह प्राणाः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः अमुक देवस्य जीव इह जीव स्थितः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः अमुक देवस्य सर्वेंद्रियाणि इह स्थितः।
ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं हंसः अमुक देवस्य वाङ्‌मनस्त्वक्‌ चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण वाक्प्राण पाद्‌पायूपस्थानि इहैवागत्य सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा।

अब निम्न मंत्र विग्रह पर अंगुष्ठ रखकर 1 बार पढें‌-
ॐ मनो जुतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तन्नोत्वरिष्टं।
यज्ञं समिमं दधातु विश्वे देवाश इह मादयंतामो अंप्रतिष्ठ॥
ॐ अस्यै प्राणा: प्रतिष्ठंतु अस्यै प्राणा: क्षरंतु च।
अस्यै देवत्व मर्चायै मामहेति च कश्चन॥

ॐ (15 बार) मम देहस्य पंचदश संस्काराः सम्पद्यन्ताम्‌ इत्युक्त्वा।

अब प्रणाम क्षमा प्रार्थनादि कर लें ।

                           शिव शासनत: शिव शासनत:

कनकधारा स्तोत्र ।।


    वेदांत दर्शन की अनंत यात्रा में अनेको ऋषि-मुनि एवं परमतत्व ज्ञानी आते जाते रहे हैं एवं सभी ने वेदांत के संस्पर्श से अपने आप को स्वर्णमयी आभा से युक्त कर अमृत्व की प्राप्ति की परन्तु कालांतर में एकांगी एवं विकृत मानव रचित धर्मों का उदय हुआ। वेदात के विपरीत व्यक्ति पूजन ने स्थान ग्रहण किया मनुष्यों द्वारा रचित पुस्तकों से तथाकथित धर्मों का एवं उनके अनुयायियों का प्रादुर्भाव हुआ। कुछ काल ही ऐसा हो गया की धर्म के नाम पर युद्धों का संचालन होने लगा। जगह-जगह मठों, आश्रमों एवं तथाकथित कृत्रिम शक्ति स्थलों का निर्माण होने लगा।

         कलयुग में मनुष्य इतना पतोन्मुखी हो गया है कि राजाओं को भी ईश्वर पुत्र माना जाने लगा। कलयुग में जितने भी धर्म प्रादुर्भाव में आये उन सब के प्रवर्तक एकांगी ही हैं। अध्यात्म के अनंत एवं असंख्य तत्वों की उनमें झलक भी देखने को नहीं मिलती है। मात्र अहिंसा से पूर्णता प्राप्त नहीं हो सकती, न ही सूली पर लटक कर प्रेम का व्याख्यान देने से सभी प्रेममयी कोष में पहुँच जायेंगे। ठीक इसके साथ वेदांत दर्शन के कुछ सिद्धांतों को चुरा लेने से और फिर धर्म के युद्ध या जेहाद या फिर ईश्वर की मर्जी कह देने से कोई भी व्यक्ति मोक्षगामी नहीं हो जायेगा । इन तथाकथित निकृष्ट धर्मों ने मानव "जाति के मस्तिष्क को एक प्रकार से कम्प्यूटर के समान विशेष सीमाओं में या प्रोग्रामों में आबद्ध कर के रख दिया है । 

        इसीलिये इन धर्मों से कोई भी व्यक्ति छठवें चक्र तक भी नहीं पहुँच पाया सब के सब भेड़-बकरी बन गये और उनके प्रवर्तक चरवाहे, जिधर मर्जी आये उधर हांक दो । यही हाल आप के तथाकथित अध्यात्मिक संस्थानों, आश्रमों एवं मठों का है। यहाँ पर धर्म के नाम की दुकान लगती है। शिष्य के नाम पर इन्हें सिर्फ दुधारू गायों की तलाश रहती है जो कि उनकी आवश्यकताओं को पूरी कर सके । यह खुद कंगाल है, दरिद्र हैं, भिखमंगें हैं, आपको क्या देगें। कभी-कभी कटु शब्दों में भी लोगों तक सच्चाई पहुँचानी पड़ती है। किसी न किसी को तो आगे आकर भ्रम और मायाजाल को तोड़ना ही पड़ेगा।

        इन सब बातों के साथ-साथ आम आदमी भी उतना ही जिम्मेदार है। वह भी स्वार्थी है, कर्म करना ही नहीं चाहता कभी वेदों को खोलकर पढ़ता ही नहीं। बस सब कुछ गोली या इंजेक्शन के स्वरूप में प्राप्त करना चाहता है। स्वयं अनुसंधान, विचार परखने एवं समझने की क्षमता तो अब खत्म होती जा रही है। जो कुछ है वह दूसरों से प्राप्त करो खुद कुछ मत करो । योगासनों की फोटो देख लेने से या पुस्तक पढ़ लेने से आप कभी योग सिद्ध नहीं हो सकते। स्वयं भी हाथ पाँव हिलाने पड़ेगे एकांगी धर्मों के प्रवर्तकों ने बड़े ही सुनियोजित तरीके से वेदांत दर्शन को अपने कुतर्कों के द्वारा एवं जरूरत पड़ने पर हिंसा एवं बल के द्वारा भौतिक रूप में समाप्त करने की पूरी कोशिश की परन्तु बस यहीं पर वे मूर्खता कर बैठें। वेदांत दर्शन में द्वैत तो कुछ भी नहीं अद्वैत ही सब कुछ है। 

      द्वैत तो बस अद्वैत के असंख्य आयामों में से एक आयाम है। उसे नष्ट करना दुष्ट मनुष्यों की बात नहीं है वे तो स्वयं ही नष्ट हो जायेंगे। अद्वैत चिंतन ही महामंत्रों, दिव्य यंत्रों को जन्म देता है। उसी के गर्भ से दिव्य पराब्रह्माण्डी रहस्यों से भरपूर श्रीमद् भागवत् गीता की अनुगूंज होती है, वेद ऋचाओं का प्राकट्य होता है। ज्योतिर्लिंगों से लेकर माँ आदि शक्ति भगवती के पवित्र तीर्थ पिण्ड स्वरूप में प्रकट होते हैं। भारत की धर्म भूमि पर मुगलों, हूणों, कुशाण, मंगोल एवं अन्य बरबर जातियों ने हमला किया सम्पूर्ण वेदांत संस्कृति को मिटाने में कोई कसर नहीं छोड़ी, पाण्डुलिपियों को जलाया। वैदिक ब्राह्मणों के सर काट दिये । बलात धर्म परिवर्तन कराया और जो कुछ भी उन से बन पड़ा वह सब किया परन्तु अंत में क्या हुआ वेदांत दर्शन अक्षय ही रहा और यह सब अखिरकार उसी में शामिल हो गये इतिहास इस बात का गवाह है। 

       भगवान बुद्ध के अवसान के बाद बौद्ध धर्मावलम्बियों ने अपनी पूरी शक्ति वैदिक संस्कृति को समाप्त करने में लगा दी। उनका एकमात्र लक्ष्य था "बुद्धम् शरणम् गच्छाम्" अर्थात समस्त भारत वर्ष को बौद्धमय कर दो। सभी का काम सिर्फ बुद्ध की ही पूजा करना हो इस घोर अंधकारमय दशा में फिर एक बार अवतार होता है और वह अवतार वेदान्त दर्शन के प्रवर्तक आदि गुरु श्री शंकराचार्यजी के रूप में जिन्होंने मात्र 36 वर्ष की आयु में सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक सूत्र में पिरोते हुए पुनः वेदान्त दर्शन को जन-जन तक पहुँचाया अद्भुत एवं दिव्य प्रचण्डता ही इस युवा सन्यासी की शक्ति है। वे आज भी आवृत्ति स्वरूप में या फिर दिव्य अनुभूति के रूप में सत्य के मार्ग पर चलने वाले वास्तविक सन्यासियों को आशीर्वाद देने के लिये सदैव तत्पर रहते हैं।

उन्हीं के द्वारा उत्सर्जित दिव्य ऊर्जा से भारतवर्ष अनंतकाल तक प्रकाशवान होता रहेगा । उन्होंने कभी स्वयं की पादुका पूजन, मूर्ति पूजन की परम्परा नहीं डाली और तो और अपने निर्वाण षटकम् श्लोक में वे कहते हैं कि मैं न अहंकार हूँ, न बुद्धि हूँ, न विचार हूँ। मैं संज्ञाहीन एवं प्राणहीन हूँ, मैं पंचवायु भी नहीं हूँ। मैं द्वेष तथा राग से परे हूँ न मोक्ष की आकांक्षा है और न धर्म की आकांक्षा है। मुझ में जाति भेद भी नहीं है। मैं पिता-माता, गुरु-शिष्य बंधु मित्र इत्यादि बंधनों से भी युक्त नहीं हूँ। मुझे मृत्यु का भी भय नहीं है। मैं सर्वव्यापी एवं सर्वस्वरूप हूँ इत्यादि इत्यादि । 

         अर्थात परम अभेदात्मक स्थिति बस यही वेदांत है। यही प्रेम का चर्मोत्कर्ष है। सन्यासी से बड़ा प्रेममयी तो कोई होता भी नहीं है वह प्रेम करता है ब्रह्माण्ड की विचित्रता से, उसकी शक्ति से एवं उसकी विलक्षणता से अपरिग्रह की समग्रता ही वैदिक पूजन की आधारपीठ है। प्राप्त करने की लालसा, आबद्ध करने की लालसा, बलात कर्म यह सब घटिया एवं पशु तुल्य अपवित्र पूजा पद्धतियाँ हैं। इनके द्वारा निरंतरता एवं अक्षुणता में दिव्य शक्ति प्राप्त नहीं हो सकती एक बार आदिगुरु शंकराचार्य जी भिक्षा के लिये एक ब्राह्मण के घर पर पहुँचते हैं ब्राह्मण आर्थिक दृष्टि से अत्यंत ही विपन्न था परन्तु अन्य दृष्टियों से नहीं। दरवाजे पर दिव्य मूर्ति को देख ब्राह्मणी अति संकोच से भर उठी क्या करती कुछ देने को था ही नहीं परन्तु हृदय अभी भी पवित्र था। उसमें दया एवं शील भाव पूर्ण रूप से विकसित थे घर में पड़ा एक आंवला ही उसे दिखाई पड़ा उसने तुरंत उस एकमात्र आंवले को ही शंकराचार्य के भिक्षा पात्र में समर्पित कर दिया।

         शंकराचार्य ने भी उसे पूर्णता के साथ ग्रहण करते हुए मात्र आँवले के एक फल के द्वारा अपनी कई दिनों की क्षुधा को तृप्त कर लिया। देने वाली भी पूर्ण हृदय की थी और लेने वाला तो समस्त ब्रह्माण्ड को अपने हृदय स्थल में धारण किये था। आँवला तो मात्र माध्यम था पवित्रता का। ऐसे ही पवित्र संयोगों से दिव्यता एवं अमृत्व प्रफुल्लित होता है। शंकर ने आँवले के साथ-साथ उस ब्राह्मणी की दरिद्रता को भी आत्मसात कर लिया जब सद्गुरु शिष्य को ग्रहण करते हैं तो फिर समग्रता से ग्रहण करते हैं चाहे बदले में जो कुछ मिले सब स्वीकार्य होता है। मस्तिष्कीय गणित, विचार, तर्क यहाँ नगण्य होते हैं तुरंत शंकराचार्य महालक्ष्मी का आह्वान करने लगे महालक्ष्मी का आह्वान स्वयं के लिये नहीं बल्कि ब्राह्मण परिवार की दरिद्रता को दूर करने के लिये और उनके दिव्य आह्वान से जिस श्लोक का जन्म हुआ वह कनकधारा स्त्रोत कहलाता है अर्थात निष्काम, अभेद एवं परम प्रेममयी महालक्ष्मी पूजन कनक का तात्पर्य स्वर्ण तो वहीं धारा का तात्पर्य निरंतरता और जब कनकधारा के साथ स्त्रोत जुड़ जाता है तब धारा भी अनंतकालीन हो जाती है एक ऐसा महालक्ष्मी पूजन जिसके द्वारा लक्ष्मी अपने सम्पूर्ण स्वरूप में स्वर्ण आभा मण्डल से सुशोभित भक्त के सामने मातृ स्वरूप में आती ही है। 

        सन्यासी के लिए तो महालक्ष्मी सम्पूर्ण रूप से मातृ स्वरूप में ही स्थापित रहती है न कि पत्नी प्रेमिका या अन्य किसी तुच्छ स्वरूप में सारा का सारा वर्णन धनात्मक होता है कहीं भी नकारात्मक विचार प्रकट ही नहीं होते हैं। कनकधारा स्त्रोत में शंकराचार्य जी माँ लक्ष्मी को भगवान विष्णु के पत्नी स्वरूप में पूजते हैं अर्थात लक्ष्मी और विष्णु में कहीं भी कोई भेद नहीं। भेद तो लोभ का प्रतीक है। वास्तव में जहाँ विष्णु वहीं लक्ष्मी एवं जहाँ लक्ष्मी वहीं विष्णु। जब वे क्षण भर को भी अलग नहीं होते तो फिर केवल लक्ष्मी की मूर्ति को पूजने से कभी भी लक्ष्मी प्रसन्न नहीं होगी। इस प्रकार का पूजन खण्डित एवं विकृत है। इसके साथ-साथ वे तृतीय श्लोक में माँ लक्ष्मी के रक्षेश्वरी, कृपेश्वरी और दानेश्वरी स्वरूप का भी वर्णन करते हैं। 
      
         यहाँ पर भी कहीं कोई भेद नहीं। आगे वे भगवान विष्णु के साथ माँ लक्ष्मी के क्षीर सागर में विराजमान दिव्य स्वरूप का अद्भुत वर्णन करते हुए उनका आह्वान करते हैं। कनकधारा स्त्रोत में माँ महालक्ष्मी के गायत्री, सरस्वती और काली स्वरूप का भी - आह्वान है। उन्हीं को यश, धन, रूप, सौन्दर्य, पुत्र, कीर्ति इत्यादि का अक्षय स्त्रोत माना है। आदि गुरु शंकराचार्य जी जब हृदय की परम गहराई से पूर्ण समर्पित भावना के साथ निष्काम कर्म रूपी आह्वान कर रहे थे तो फिर महालक्ष्मी कैसे रुक पाती। दूसरे ही क्षण उनके समक्ष उपस्थित हो बोली “हे पुत्र" मुझे किस लिये याद किया माता के पैर हृदय की पुकार सुन कदापि नहीं रुक सकते। यह असम्भव है। अपने समक्ष माता को उपस्थित देख शंकर बोले “हे माँ" इस ब्राह्मण परिवार पर अपनी कृपा बरसाओं एवं इसकी विपन्नता दूर करो माँ बोली "हे पुत्र" यह ब्राह्मण पूर्व जन्मकृत पापों के कारण इस जन्म में दरिद्रता से कैसे मुक्त हो सकता है। इस पर शंकर बोले 'हे' माँ इस ब्राह्मणी ने इतनी घोर विपन्नता में भी मुझे एकमात्र उपलब्ध आँवले का फल भी समर्पित कर दिया तो क्या इसका यह एक मात्र कर्म ही इसके समस्त पापों को नष्ट करने के लिये काफी नहीं है।

        महालक्ष्मी निरुत्तर हो गयी और दूसरे ही क्षण ब्राह्मण धन-धान्य युक्त हो गया। ऊपर वर्णित कथा से कुछ मूलभूत बातें एक साधक को मिलती हैं तो वह यह है कि दो हाथ वाले से मांगोगे तो चार हाथ वाला कभी नहीं देगा। शंकर ने मांगा तो महालक्ष्मी से ही मांगा चार पुत्रों का पिता होना अगर गर्व की बात है तो ईश्वर पुत्र होना परम गर्व की । शंकराचार्य तो ईश्वर पुत्र थे जिन्हें स्वयं महालक्ष्मी पुत्र के रूप में पुकार रही हो वह भिक्षा मांग रहा है केवल इसलिये कि किसी की विपन्नता दूर कर सके उनका यश तो अक्षय है। जब तक ब्रह्माण्ड है शंकर की कीर्ति निरंतर बढ़ती ही जायेगी आखिर वे कनकधारा स्त्रोत के रचयिता जो हैं।

       प्रेम ही सबकुछ है प्रेमतत्व के अभाव में पूजन निर्जीव है। पद्धतियाँ शक्तिहीन है अगर देवशक्तियों को बंधन युक्त किया जा सकता है तो वह निष्काम प्रेम के ऊपर ही आरूढ़ होकर प्रकृति पुरुषों में ही वह शक्ति होती है जिसके द्वारा वे प्रकृति में भी हस्तक्षेप करने में समक्ष होते हैं शंकराचार्य की प्रचण्डता ही ब्राह्मण परिवार को कर्म बंधनों से मुक्त करा पायी। ब्रह्मा, विष्णु, महेश ही व्यवस्थापक, संस्थापक एवं दण्डात्मक स्थतियों का निर्माण करते है परन्तु मातृ शक्ति ही एकमात्र ऐसी शक्ति है जो कि इन संयोजनाओं को अपने अधीन रखती है। लक्ष्मी के आगे विष्णु की नहीं चलती और न ही पार्वती के आगे शिव की । उनके वचनों को पूरा करना त्रिमूर्तियों का ही कार्य है। सिद्ध पुरुष कभी भी सिद्धियों का प्रयोग स्वयं के लिये नहीं करते। शंकर ने स्वयं के लिए लक्ष्मी का आह्वान नहीं किया था। सिद्धियों का ह्रास उसी वक्त शुरू हो जाता है जब साधक में लिप्तता आ जाती है।

अङ्ग हरे: पुलकभूषणमाश्रयन्ती भृङ्गांगनेव मुकुलाभरणं तमालम ।
 अङ्गीकृताऽखिल विभूतिरपाङ्गलीला माङ्गल्यदातु मममङ्गलदेवतायाः 

मुग्धा मुहुविंदधती बदने मुरारे: प्रेमत्रपा-प्रणिहितानि गताऽऽगतानि ।
 मालादृशोर्मधुकरीव महोत्पले या सा से श्रियं दिशतु सागरसम्भवायाः ॥

विश्वामरेन्द्रपद-विभ्रमदानवक्ष मानन्द- हेतुरधिकं सुर - विद्विषोऽपि । 
ईषन्निषीवतु मयि क्षणमीक्षाई - मिन्दीवरोदर सहोदरमिन्दिरायाः ॥

आमोलिपाक्षमधिगम्य मुद्रा मुकुन्द मानन्दकन्दमनिमेशम नतन्त्रम् । आकेकरस्थितकनीनिकपक्ष्मनेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजङ्गशयाङ्गनायाः ॥

बाह्वन्तरे मधुजितः श्रित कौस्तुभे या हारावलीव हरिनीलमयी विभाति । 
काम्प्रदा भगवतोऽपि कटाक्षमाला कल्याणमावहतु मे कमलालयायाः ।।

कालाम्बुदालि ललितोरसि कैटभारे धराधरे स्फुरति या तडिदङ्गनेव । 
मातुः समस्तजगतां महनीयतमूर्ति र्भद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनायाः ॥

प्राप्तं पदं प्रथमतः किल यत् प्रभावान् माङ्गल्यभाजि मधुमाथिनि मन्मथेन । 
मव्यापतेत्तदिह मन्थर- मोक्षणार्ध मन्दाऽलसंच मकरालय कन्यकायाः ।।

दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधारा मस्मिन्नकिंचन विहङ्गशिशौ विषण्णे ।
 दुष्कर्म-धर्ममपनीय निराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाहः ॥

इष्टाविशिष्टमतयोऽपि यया दयार्द्र दृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभ लभन्ते । 
दृष्टिः प्रहृष्ट-कमलोदर-दीप्तिरिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्करविष्टरायाः ।।

गीर्देवतेति गरुडध्वजभामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति ।
सृष्टि स्थिति प्रलय सिद्धिषु संस्थितायै तस्यै नमस्त्रिभुवनैकगुरोस्तरूण्यै ।।

श्रुत्यै नम स्त्रिभुवनैक फलप्रसूत्यै रत्यै नमोऽस्तु रमणीयगुणाश्रयायै । 
शक्त्यै नमोऽस्तु शतपत्र निकेतनायै पुष्ट्यै नमोऽस्तु पुरुषोत्तम वल्लभायै ।।

नमोऽस्तु नालीक-निभेक्षणायै नमोऽस्तु दुग्धोदधि जन्म शूत्यै ।
नमोऽस्तु सोमामृत-सोदरायै नमोऽस्तु नारायण-वल्लभायै ।।

सम्पत्कराणि सकलेन्द्रिय नन्दनानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरुहाक्षि । 
त्वद् वन्दनानि दुरिताहरणोद्यतानि मामेव मातरनिशं कलयन्तु नान्यत् ।।

यत्कटाक्ष समुपासनाविधिः सेवकस्य सकलार्थसम्पदः ।
सन्तनोति वचनाऽगमानसै स्त्वां मुरारि हृदयेश्वरी भजे ।।

सरसिज निलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्ध माल्यशोभे भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवन-भूतिकरि प्रसीद मह्यम् ।।

दिग्धस्तिभिः कनककुम्भमुखा वसृष्ट स्वर्वाहिनी विमलचारु-ज्जलप्लुतांगीम् । 
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिराजगृहिणीममृताब्धिपुत्रीम् ।।

कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूर-तरंगितैरपांगेः । अवलोकय मामकिचनानां प्रथम पात्रमकृत्रिमं दयाया:।।

स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमूभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । 
गुणाधिका गुरुधन-भोगभागिनो भवन्ति ते भुविबुधभाविताशयाः ।।

श्रीमदाद्यशंकराचार्यविरचितं कनकधारास्तोत्रं समाप्तम्।। 

        कनक धारा यंत्र के स्थापन और कनक धारा स्त्रोत के पूर्ण पवित्र हृदय से पाठन के द्वारा ग्रहस्थ एवं सन्यासी लक्ष्मी के अभाव से मुक्त हो जाते हैं और इसके साथ कलयुग में लक्ष्मी प्राप्ति के लिये किये गये अज्ञानवश पाप कर्मों की अपवित्रता भी क्षीण हो जाती है। धन संपत्ति की अपवित्रता को दूर करने का यह अमोघ अध्यात्मिक अस्त्र है। आज के युग में समस्त शक्तियाँ अर्थ में समाहित होती जा रही है। प्रत्येक देश कागज रूपी धन को धड़ाधड़ धपता जा रहा है परंतु फिर भी लोग भूखों मर रहें हैं। धन के लिये सभी प्रकार के कुकर्म, पाप एवं हत्यायें की जा रही है। सभी तरफ धन ने अशांति फैला दी है इसका मुख्य कारण अपवित्र कर्मों की तीव्र श्रृंखला के द्वारा लक्ष्मी के स्वरूपों को प्राप्त करना है। मुख्य रूप से कागज के नोट मस्तिष्क द्वारा निर्मित लेनदेन अर्थात शक्तियों के हस्तांतरण की एक व्यवस्था है परंतु यह भी पूर्ण रूप से असफल है। लक्ष्मी मस्तिष्क के द्वारा क्रियान्वित करने पर क्या उत्पात उत्पन्न कर रही है यह तो सर्वविदित है मस्तिष्क के साथ-साथ अगर आप हृदय से भी लक्ष्मी का अनुसंधान करेगें तभी समग्रता आयेगी। मनुष्य रूपी जीवन में द्वैत एवं अद्वैत दोनों मतों का समिश्रण ही पूर्णता प्रदान कर सकता है।                
                     ।। इति शुभम् ।।

दीक्षा ।।

 

         मनुष्य के अनुवांशिक बीज में बीस गुण हैं और वहीं मनष्य के सबसे निकट के प्राणी वनमानुष के अनुवांशिक बीज में 18 गुण हैं। यह 18 गुण मनुष्य के 18 गुणों के समान हैं परन्तु मनुष्य दो गुण वनमानुष से ज्यादा लिये हुए है। अनुवांशिक बीज में गुण का तात्पर्य उन संरचनाओं से है जो कि सर्पाकार अनुवांशिक संरचना के मध्य में सीधी रेखाओं के रूप में स्थित होते हैं। मात्र दो अति सूक्ष्म आवृत्तियों के कारण मनुष्य इस ग्रह का नायक बन गया है तो वहीं दो अति सूक्ष्म आवृत्तियों की कमी के कारण वनमानुष आज भी जंगलों में भटक रहा है। अनुवांशिक बीज में एक अति सूक्ष्म आवृत्ति व्यक्ति को रूप और सौन्दर्य का प्रतीक बनाती है, एक विशेष आवृत्ति व्यक्ति को इस विश्व का सबसे बड़ा वैज्ञानिक बना देने में भी सक्षम है।

        इसके ठीक विपरीत थोड़ी सी भी अनुवांशिक विकृति मनुष्य को अनेकों प्रकार की समस्याओं से ग्रसित कर देगी। सारा जीवन अव्यवस्थित हो जायेगा, पृथ्वी उसके लिये नर्क बन जायेगी। परिणाम स्थूल एवं अति विशाल होते हैं परन्तु कारण अत्यंत ही सूक्ष्म और अदृश्य होते हैं। संतुलन और असंतुलन की यह दिव्य व्यवस्था कर्म बंधनों के साथ-साथ आशीर्वाद, वरदान, दीक्षा, शाप, हाय इत्यादि से निर्मित होती है। मनुष्य के रूप में अपने आपको पूर्ण कहना मूर्खता की निशानी है। पूर्णता क्षणभंगुर है। अपूर्णता निरंतर बनी रहती है। मनुष्य के कर्म निरंतर पूर्णता प्राप्ति के लिये सम्पन्न होते रहना चाहिये । 

           अध्यात्म का तात्पर्य प्रबल सम्भावनाओं से है। सम्भावना ही जीवन है तुरंत निर्णय पर पहुँच जाना नकारात्मक प्रवृत्ति का द्योतक है। चिंतनशील और बुद्धिमता पूर्ण जीवन ही मनुष्य जाति की पहचान है। प्रतिक्षण स्वयं में सुधार करने की प्रवृत्ति ही संत प्रवृत्ति है, एक योगी के गुण हैं। अध्यात्म किस काम का अगर वह व्यक्तिगत एवं सामूहिक तौर पर मानवता के काम न आ सके। अध्यात्म का कार्य ही निरंतर सुधार की प्रक्रिया को जारी रखना है। जिस क्षण आप अध्यात्म के क्षेत्र में प्रविष्ट होते हैं उसी क्षण सकारात्मक सुधार की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। गुरु क्षेत्र, धर्म क्षेत्र, तंत्र क्षेत्र, विज्ञान क्षेत्र, योग क्षेत्र इत्यादि इत्यादि यह सब कुछ एक संतुलनात्मक क्षेत्र को देते हैं जिसे कि अध्यात्म क्षेत्र कहा जाता है। यही सब अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। अध्यात्म क्षेत्र को स्थूल रूप में मत लीजिये ।

         स्थूल दृष्टि पशुतुल्य दृष्टि है। 99 प्रतिशत मनुष्य इसी दृष्टि के कारण भटक रहा है। पशुतुल्य दृष्टि केवल प्रतिफल को ही देख सकती है कारण जानने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि चाहिए। आध्यात्मिक दृष्टिकोण ही इतनी भेदन क्षमता रखता है कि लाख पर्दों के पीछे छिपी वास्तविकता को नग्न स्वरूप में देखने की क्षमता प्रदान कर सकता है। परिवर्तन मूल से सम्भव होगा। अव्यवस्था और समस्या मूल से समाप्त होगी। सभी समस्याओं के मूल में कुछ गिने चुने कारण ही है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मात्र बीस गुण आवृत्तियाँ मनुष्य का निर्माण कर बैठती हैं। जटिलता के मूल में सरलता ही है। 

            तुलसीदास जी एक बार गंगा स्नान कर काशी की गली से गुजर रहे थे अनजाने में उनकी धोती पर से कुछ बूंदें बगल से गुजर रही वेश्या के ऊपर गिर गई देखते ही देखते कुछ ही क्षणों में वेश्या की सम्पूर्ण मनोवृत्ति ही बदल गई और कालान्तर वही स्त्री उनकी अनन्य शिष्या बन बैठी लाख उपदेश, बड़ी-बड़ी बातें,अनेकों ग्रंथों का अध्ययन इत्यादि जो परिवर्तन नहीं कर सकते हैं वह मात्र एक साधारण से स्पर्श से हो जाता है। दीक्षा संस्कार में स्पर्श शरीर का नहीं होता है, स्पर्श किया जाता है प्राणों को । परिवर्तन किया जाता है प्राणों की आवृत्ति में, प्राणों को उर्ध्वगामी बनाया जाता है, उन्हें पहुँचाया जाता है मस्तिष्क के दिव्य आध्यात्मिक केन्द्रों में, आगे का काम अपने आप हो जाता है। वर्षा के बादल तो बस माध्यम हैं जल बरसाने का। बीज स्वतः ही गीली भूमि पर अपने आप अंकुरित हो जाते हैं। दीक्षा न तो किसी ने बनाई है, न ही व्यक्ति विशेष की अमानत है, लेने वाला कौन है, देने वाला कौन है यह भी विचार का विषय नहीं है। विचार स्थूल दृष्टि के द्योतक हैं। 
        
       अध्यात्म के इस अद्भुत मार्ग में अगले क्षण क्या होगा किसी को नहीं पता। सबके अपने अलग-अलग विधान हैं। तुलना, स्पर्धा, आलोचना इन सबका महत्व अध्यात्म क्षेत्र में शून्य है। मनुष्य को दीक्षा प्रदान करना एक गोचर विषय है। केवल मनुष्य ही दीक्षाओं का अधिकारी नहीं है। वृक्षों को भी संस्कारित किया जा सकता है, पाषाण को भी प्राण प्रतिष्ठित किया जा सकता है। शक्ति का विसर्जन वनों में भी किया जा सकता है, पशुओं को भी स्पर्श की जरूरत है इन्हें भी दीक्षायें प्रदान की जाती हैं। प्रदान करने वाले की मर्जी किसी को भी प्रदान कर सकता है। सौन्दर्य, स्वास्थ्य, चेतना केवल मनुष्यों का ही विषय नहीं है। मनुष्य को दीक्षा प्रदान करना सबसे टेढ़ी खीर है। 80 प्रतिशत पुस्तकें, प्रवचन, विचार इत्यादि इतनी प्रदूषित ध्वनि उत्पन्न करते हैं कि सारा मस्तिष्क ध्वनि तरंगों का कूड़ाघर बन जाता है। सोते वक्त भी मस्तिष्क में विचार घुमड़ते रहते हैं। मनुष्यों के साथ यही समस्या है। ध्वनि रूपी कचरा दिव्य ध्वनि की आवृत्तियों के द्वारा ही निकाला जा सकता है इसके लिये शल्य चिकित्सा या फिर अन्य कोई चिकित्सा पद्धति उपयोगी नहीं है।

      दिव्य मंत्रों का जाप इसीलिये करवाया जाता है जिससे कि दिमाग में बैठी व्यर्थ की ध्वनि तरंगें निकल भागे। यह तो हुआ गोचर विषय अगोचर विषय में भी दीक्षायें प्रदान की जाती हैं इसके लिये काल अत्यधिक आवश्यक हैं। सम्प्रेषण की क्रिया अत्यंत ही विचित्र है। इस क्रिया को मानवीय दृष्टिकोण से न देखें यह अत्यंत ही गम्भीर वैज्ञानिक और तीव्र परिवर्तनकारी में व्यवस्था है। शक्तिपात उतनी ही मात्रा में किया जाता है जितना कि आप पचा सकें । एक किलो घी पिलाने से क्या फायदा जब छटाक भर घी भी आप पचाने की क्षमता न रखते हों । आपका जीवन श्री युक्त, ऐश्वर्यपूर्ण एवं मंगलमय हो बस यही कामना है, यही लक्ष्य है। समाज ही पुस्तक पढ़ता है, आपको सम्मान देता है, आपका आदर करता है, आपके गले में पुष्प माला डालता है उसका ऋण चुकाना अध्यात्म के पथ पर चले प्रत्येक यात्री का परम कर्तव्य है। गंगा किनारे बैठा खड़ताल बजाने वाला न तो आपको सुनेगा, न ही आपको पढ़ेगा वह तो कहेगा नौकरी छोड़ दो, पत्नी छोड़ दो, घर त्याग दो इत्यादि इत्यादि बस समस्याऐं अपने आप खत्म हो जायेंगी। उनका विधान उन्हें ही मुबारक हो। इससे समाज के प्रति ऋण मुक्ति कभी नहीं हो पायेगी । जो ऋण से मुक्त नहीं है उसकी गति अधम ही होगी ।
                       
   शिव शासनत: शिव शासनत:

मंत्र करते हैं सकारात्मक ऊर्जा का संचार ।।

मंत्र सकारात्मक ऊर्जा का संचार करते हैं और नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करते हैं मंत्रोच्चारण के बाद आप भी कई बार अपने अंदर एक आध्यात्मिक शांति महसूस करते होंगे इसका कारण यही है कि जो नकारात्मक ऊर्जा हमें अशांत रखती है वह दूर हो जाती है और उसका स्थान सकारात्मक ऊर्जा ले लेती है इन मंत्रों से न केवल साधक मात्र के मन को शांति मिलती है अपितु अपने आस पास के वातावरण में इसी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने लगता है मंत्र की क्षमता और साधक की सच्चे मन से की गई साधना पर ही सकारात्मक ऊर्जा का यह संचार निर्भर होता किसी भी वैदिक मंत्र में ऋषि छंद और देवता ये तीन पक्ष होते हैं इनमें ऋषि का संबंध मस्तिष्क अथवा मन या कहें दिमाग से जुड़ा होता है छंद मंत्र के जाप उसकी बनावट अर्थात रचना और ताल अर्थात लय और गति से संबंधित होते हैं तो वहीं देवता लौकिक ऊर्जा का क्षेत्र है यदि मंत्रों के गहरे अर्थ को समझा जाये तो इन मंत्रों से सही मायनों में किसी भी व्यक्ति को लाभ निश्चित रुप से पंहुच सकता है मंत्रों की ध्वनियों से किसी न किसी अभिप्राय अर्थात अर्थ जुड़ा होना चाहिये जब तक हम उसके अर्थ से अंजान हैं तब तक वह अपना काम नहीं करते मात्र किसी किताब से मंत्र को पढ़कर उसका लाभ नहीं मिल सकता उसके लिये गुरु के मार्गदर्शन में विधि विधान के साथ उसका उच्चारण किया जाना आवश्यक होता है

मंत्रोच्चारण से होती है आनंदानुभूति
जब हम किसी भी मंत्र का जाप करते हैं तो उसकी सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव कर सकते हैं उदाहरण के लिये ॐ, गायत्री मंत्र शांतिपाठ महामृत्युंजय आदि मंत्रों को लिया जा सकता है। एक मात्र ॐ का जाप करने से ही हमारा चित शांत होने लगता है और केंद्रित भी धीरे धीरे हम अपने अंदर झांकना शुरु करते हैं एक असीम आनंद की अनुभूति भी आप कर सकते हैं

कहा जाता है किसी व्यक्ति द्वारा मंत्रों की खोज नहीं हुई बल्कि सालों साल की गई तपस्या के फलस्वरुप ऋषि मुनियों ने ये मंत्र इजाद किये वैसे ही जैसे वर्तमान युग में वैज्ञानिक नए नए आविष्का नए नए सिद्धांत खोजतें हैं एक एक आविष्कार पर कई-कई व्यक्तियों का जीवन लग जाता है उस लिहाज से हमारे ऋषि मुनियों को हम आध्यात्मिक वैज्ञानिक कह सकते हैं जिन्होंने विश्व कल्याण हेतु सकारात्मक ऊर्जा के संचार में वाहक मंत्रों की खोज की

ॐ, गायत्री मंत्र शांति पाठ और महामृत्युजय जैसे मंत्र तो मंत्रोच्चारण में भी आसान हैं और इनका अर्थ भी हर किसी की समझ में आ सकता है इसलिये यह मंत्र काफी लोकप्रिय भी हैं

पुनर्जन्म ।।


           एक गाँव की स्त्री गर्भावस्था के दौरान खेत में काम कर रही थी। अचानक प्रसव पीड़ा हुई एवं उसने खेत में ही शिशु को जन्म दे दिया। कुछ देर बाद उसने स्वयं ही शिशु को उठाया और घर की तरफ चल पड़ी। दूसरी तरफ किसी बड़े शहर में एक धनी व्यक्ति के यहाँ ठीक उसी समय संतान उत्पन्न हुई। माता को बड़े अस्पताल में भर्ती कराया गया, सैकड़ों लोग एकत्रित थे, हर तरह की सुविधाऐं थीं। एक से एक ख्याति प्राप्त चिकित्सक प्रसव कराने में जुटे हुए थे। शिशु का जन्म होते ही उत्सव का माहौल बन गया। ऐसा हमेशा से होता आया है आगे क्या होगा यह अलग बात है परन्तु जन्म के समय दोनों शिशुओं की स्थितियाँ सर्वथा विपरीत हैं। इसे कहते हैं भाग्य ।

            भाग्य है तो हैं, भाग्य की सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता। भाग्य का निर्माण कैसे होता है? अगर हम इस विषय का गहराई में जाकर विश्लेषण करेंगे तो पायेंगे कि कर्मों की श्रृंखला कभी नहीं टूटती । जिस जीवन में हमने मृत्यु के समय तक जो कर्म सम्पन्न किए होंगे उसी का प्रारम्भ अगले जन्म में पुनः होगा। टूटी हुई कड़ी पुनः जुड़ेगी। अधूरे कर्म पुनः शरीर प्राप्त करके सम्पन्न करने पड़ेगें। इसी से प्रतिपादित होता है पुनर्जन्म का सिद्धांत समस्या यह है कि लोगों का दृष्टिकोण अब वैज्ञानिक नहीं रहा। वे दो स्थितियों में जीते हैं हाँ या ना या तो किसी भी सिद्धांत को हाँ कहकर प्रतिपादित कर देते हैं या फिर न कहकर नकार देते हैं। हाँ और ना से कुछ भी हासिल नहीं होगा। हाँ या न से ऊपर उठकर सोच, विचार एवं बुद्धि रूपी शक्तियों को एक अत्यंत ही लचीला, स्थित प्रज्ञ एवं समग्र भाव देना होगा। यही तरीका है परम सत्य को समझने का जीवन के गूढ़ सिद्धांतों को आत्मसात करने का ।

           मैं क्या हूँ? मैं, कहाँ से आया हूँ? मेरी आंतरिक खोज क्या है? मेरी पसंद और नापसंद जन्म के समय मुझे कहाँ से मिली है? क्यों जब मैं अकेला बैठता हूँ तो मेरे मन में एक अलग प्रकार के विचार आते हैं? इन सब यक्ष प्रश्नों के उत्तर में पुनर्जन्म छिपा हुआ है। मेरे माता पिता या परिवार वाले मेरे गुरु से बहुत चिढ़ते हैं फिर भी मैं उन्हें असीम प्यार करता हूँ। ऐसा क्यों हो रहा है? ऐसा इसलिए हो रहा है कि शिष्य विशेष के तो गुरु से पुनर्जन्म के सम्बन्ध हैं भले ही वह उन व्यक्तियों के बीच में रह रहा हो जिनका आध्यात्मिक तल शून्य है। एक स्त्री थी उसे एक पुरुष से प्रेम था। यह सत्य घटना है। अचानक एक वर्ष बाद लड़की ने अपने प्रेमी को छोड़कर किसी दूसरे युवक से विवाह कर लिया। उसने अपने प्रेमी को इस तरह से छोड़ा कि वह उसे कभी जानती ही नहीं थी और पूर्ण रूप से अपने पति के साथ खुशी खुशी रहने लगी। प्रेमी युवक को अथाह मानसिक वेदना और कष्ट हुआ। उसने तो जीवन का अंत करने की ही ठान ली थी परन्तु अचानक चौराहे पर उसे गुरु मिल गये उसने उसे बचा लिया।

         सम्बन्धों की इतनी भयानकता किसी न किसी रूप में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में देखने को मिलती है। इन सबके पीछे परम ब्रह्माण्डीय लेन-देन का व्यवसाय छिपा हुआ है अर्थात लेखा-जोखा कर्मों का लेखा जोखा । ब्रह्माण्डीय लेखा जोखा । उस स्त्री का व्यक्ति के साथ कुछ लेखा जोखा बाकी रह गया था और जैसे ही हिसाब-किताब बराबर हुआ साथ खत्म यही होता है जीवन में। जैसे ही फल वृक्ष की डाली पर पक जाता है तुरंत टपक पड़ता है अर्थात साथ खत्म। जैसे ही शरीर वृद्ध होता है आत्मा उड़ जाती है अर्थात साथ खत्म। अब किसी और को पकड़ो हमारा समय पूरा हुआ । संकल्प, प्रतिज्ञा ये सब कर्म बंधन हैं। उन्हें पूरा करना ही पड़ता है। यही विधाता का विधान है, विज्ञान है । आपने विधाता से कहा मुझे पैसा रुपया चाहिए विधाता आपको देगा आपके कर्मानुसार मृत्यु होते ही आत्मा को सर्वप्रथम यमराज या देवदूत चित्रगुप्त के पास ले जाते हैं। वहाँ पर चित्रगुप्त व्यक्ति विशेष की आत्मा के पाप और पुण्य का हिसाब किताब देखते हैं। पुण्य हुए तो योग्यतानुसार स्वर्ग विशेष में भेजा जायेगा आत्मा विशेष को इच्छानुसार अमृत तुल्य भोगों को सम्पन्न करने के लिए। उसके लिए स्वर्ग के अनुरूप देह प्राप्त होगी ।

           दिव्य देहों से दिव्य कर्म तो वहाँ भी सम्पादित करने पड़ेंगे। अगर खाते में पापाचार ज्यादा होगा, पग-पग पर शरीर धारण करने के पश्चात् मनमानी की होगी या सृष्टि के नियमों को भंग किया होगा तो फिर योग्यतानुसार नर्क की प्राप्ति होगी। नर्क भी अनेक प्रकार के हैं। भयंकर पापाचारियों को भयंकर से भयंकर नर्क में जाना पड़ता है। जब तक उनके नारकीय स्वरूप का क्षय नहीं हो जाता उन्हें पुनः देह धारण करने का अधिकार नहीं होता है और देह भी उन्हें योग्यतानुसार ही मिलती है। प्रेत-योनियों में एक-एक हजार वर्ष तक पेड़ों के ऊपर उल्टा लटकाकर रखा जाता है। वे लोग जो धर्म का दुरुपयोग करते हैं,

दुर्योधन ने उस अबला स्त्री को दिखा कर अपनी जंघा ठोकी थी, तो उसकी जंघा तोड़ी गयी। दु:शासन ने छाती ठोकी तो उसकी छाती फाड़ दी गयी।

महारथी कर्ण ने एक असहाय स्त्री के अपमान का समर्थन किया, तो श्रीकृष्ण ने असहाय दशा में ही उसका वध कराया।

भीष्म ने यदि प्रतिज्ञा में बंध कर एक स्त्री के अपमान को देखने और सहन करने का पाप किया, तो असँख्य तीरों में बिंध कर अपने पूरे कुल को एक-एक कर मरते हुए भी देखा...।।

भारत का कोई बुजुर्ग अपने सामने अपने बच्चों को मरते देखना नहीं चाहता, पर भीष्म अपने सामने चार पीढ़ियों को मरते देखते रहे। जब-तक सब देख नहीं लिया, तब-तक मर भी न सके... यही उनका दण्ड था।
 
धृतराष्ट्र का दोष था पुत्रमोह, तो सौ पुत्रों के शव को कंधा देने का दण्ड मिला उन्हें। सौ हाथियों के बराबर बल वाला धृतराष्ट्र सिवाय रोने के और कुछ नहीं कर सका।

दण्ड केवल कौरव दल को ही नहीं मिला था। दण्ड पांडवों को भी मिला।

द्रौपदी ने वरमाला अर्जुन के गले में डाली थी, सो उनकी रक्षा का दायित्व सबसे अधिक अर्जुन पर था। अर्जुन यदि चुपचाप उनका अपमान देखते रहे, तो सबसे कठोर दण्ड भी उन्ही को मिला। अर्जुन पितामह भीष्म को सबसे अधिक प्रेम करते थे, तो कृष्ण ने उन्ही के हाथों पितामह को निर्मम मृत्यु दिलाई।

अर्जुन रोते रहे, पर तीर चलाते रहे... क्या लगता है, अपने ही हाथों अपने अभिभावकों, भाइयों की हत्या करने की ग्लानि से अर्जुन कभी मुक्त हुए होंगे क्या ? नहीं... वे जीवन भर तड़पे होंगे। यही उनका दण्ड था।

युधिष्ठिर ने स्त्री को दाव पर लगाया, तो उन्हें भी दण्ड मिला। कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी सत्य और धर्म का साथ नहीं छोड़ने वाले युधिष्ठिर ने युद्धभूमि में झूठ बोला, और उसी झूठ के कारण उनके गुरु की हत्या हुई। यह एक झूठ उनके सारे सत्यों पर भारी रहा... धर्मराज के लिए इससे बड़ा दण्ड क्या होगा ?

दुर्योधन को गदायुद्ध सिखाया था स्वयं बलराम ने। एक अधर्मी को गदायुद्ध की शिक्षा देने का दण्ड बलराम को भी मिला। उनके सामने उनके प्रिय दुर्योधन का वध हुआ और वे चाह कर भी कुछ न कर सके...

उस युग में दो योद्धा ऐसे थे जो अकेले सबको दण्ड दे सकते थे, कृष्ण और बर्बरीक। पर कृष्ण ने ऐसे कुकर्मियों के विरुद्ध शस्त्र उठाने तक से इनकार कर दिया, और बर्बरीक को युद्ध में उतरने से ही रोक दिया।

लोग पूछते हैं कि बर्बरीक का वध क्यों हुआ?
यदि बर्बरीक का वध नहीं हुआ होता तो द्रौपदी के अपराधियों को यथोचित दण्ड नहीं मिल पाता। कृष्ण युद्धभूमि में विजय और पराजय तय करने के लिए नहीं उतरे थे, कृष्ण कृष्णा के अपराधियों को दण्ड दिलाने उतरे थे।

कुछ लोगों ने कर्ण का बड़ा महिमामण्डन किया है। पर सुनिए! कर्ण कितना भी बड़ा योद्धा क्यों न रहा हो, कितना भी बड़ा दानी क्यों न रहा हो, एक स्त्री के वस्त्र-हरण में सहयोग का पाप इतना बड़ा है कि उसके समक्ष सारे पुण्य छोटे पड़ जाएंगे। द्रौपदी के अपमान में किये गये सहयोग ने यह सिद्ध कर दिया कि वह महानीच व्यक्ति था, और उसका वध ही धर्म था।

     "स्त्री कोई वस्तु नहीं कि उसे दांव पर लगाया जाए..."

कृष्ण के युग में दो स्त्रियों को बाल से पकड़ कर घसीटा गया।

देवकी के बाल पकड़े कंस ने, और द्रौपदी के बाल पकड़े दु:शासन ने। श्रीकृष्ण ने स्वयं दोनों के अपराधियों का समूल नाश किया। किसी स्त्री के अपमान का दण्ड  अपराधी के समूल नाश से ही पूरा होता है, भले वह अपराधी विश्व का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति ही क्यों न हो।।

    जय श्री कृष्णा बांके बिहारी 🙏

लोगों को ठगते एवं चोरी करते हैं उन्हें हजारों वर्षों की प्रेत योनि प्राप्त होती है।

         सांसारिक दृष्टिकोण से क्षय का तात्पर्य क्षय रोग से लगा लिया जाता है परन्तु विधाता ने क्षय के रूप में एक अद्भुत प्रक्रिया निर्मित की है। परमात्मा की परम दयालुता का परिणाम है सभी कर्मों का क्षय होना नारकीय कष्टों का भी क्षय होगा, शरीर का भी क्षय होगा, पुण्यों का भी क्षय होगा, कारावास का भी क्षय होगा और फिर से मौका मिलेगा सुधरने का क्षय नहीं हो तो पुनर्प्राप्ति कैसे होगी? शरीर का क्षय न हो तो पुनर्जन्म कैसे होगा? एक अपराधी की सजा क्षय न हो तो फिर वह जेल से कैसे छूटेगा । क्षय तो होना ही चाहिए। सभी कुछ क्षयवान है। यही सबसे बड़ा प्रमाणीकरण है पुनर्जन्म का। जेल से छूटने के बाद व्यक्ति अपराधी नहीं है। उसके अपराध का क्षय हो गया अब वह सामान्य व्यक्ति है उसने दण्ड भोग लिया। अब वह उचित कर्म सम्पन्न कर प्रतिष्ठा भी प्राप्त कर सकता है। उसे पूरा अधिकार है। आज जो निर्धन है कल वह करोड़पति हो सकता है। हो सकता है कुछ समय पश्चात उसकी निर्धनता का क्षय हो जाय। आज जो अज्ञानी है कल वह महाज्ञानी हो सकता है।

          कल तक जो कालीदास जिस डगाल पर बैठे थे उसे ही काट रहे थे, निपट महामूर्ख थे, कुछ ही दिनों पश्चात वे महाकवि बन गये। किसने क्षय कर दिया उनके अज्ञान का। गुरु ने कर दिया। गुरु को क्षय करना आता है। वह कुछ ही क्षणों में क्षय करं देगा। दूध में से पानी का क्षय कर दो मावा बन जायेगा। क्या किया आपने सिर्फ क्षय किया। बस यही खेल है गुरु का । यही पुनर्जन्म की कुंजी है। एक शिष्य के दिमाग में से कुछ सांसारिकता का क्षय कर दो उसे अपना पूर्वजन्म याद आ जायेगा। जन्म और पूर्वजन्म के बीच बस एक झीना सा पर्दा है और उसके क्षय होने की देर है । उसी पर्दे के कारण शिष्य भटकता रहता है। इसी पर्दे को हटाना गुरु का कार्य है फिर शिष्य कहीं नहीं जाता, कहीं नहीं भटकता, कहीं लिप्त नहीं होता। साधनाऐं एक जीवन का खेल नहीं हैं। चालीस पचास वर्ष में क्या खाक साधना सिद्ध होगी इसके लिए पूर्वजन्म देखना पड़ता है। अधिकांशतः शिष्य अपने साथ पूर्वजन्म की सिद्धियाँ लाते हैं। गुरु अपनी दृष्टि से समझ लेता है कि पूर्व जन्म में शिष्य किस साधना में पारंगत था बस उसी का पुरश्चरण करा के उस शक्ति को जागृत कर देता है।

         बायें हाथ से काम करने वाला व्यक्ति वाममार्गी ही होगा। वाममार्ग की साधना उसे कुछ ही क्षणों में परिणाम दे देगी। वह जन्मजात वाममार्गी है अनेकों जन्म में उसने वाम मार्ग की ही साधनाऐं सम्पन्न की हैं। अब उसे भला कहाँ दूसरे मार्ग की साधना सम्पन्न करायें। उसे शिव ही अच्छे लगेंगे। उससे विष्णु पूजन सम्पन्न कराना अत्यधिक दुष्कर है। यह पहचान है पूर्व जन्म की कुछ बच्चे उल्टे पैदा होते हैं अर्थात जन्म के समय पैर बाहर निकलता है। इनमें जन्मजात गुण होता है पूर्वाभास का। इनकी कुण्डलिनी शक्ति गर्भ में ही आज्ञा चक्र तक आकर स्वतः ही रुक जाती है अन्य बच्चों में वह मूलाधार में ही सुप्त रहती है। इस प्रकार के बच्चों को पायला कहा जाता है। दस वर्ष से कम उम्र के अगर शुद्धतम, उच्च कोटि के बच्चे मिल जायें तो ये आँखें बंद करने के पश्चात भी कमरे में रखी सब बस्तुओं को देख सकते हैं। पूर्व जन्म को जाने बिना सम्पूर्ण विकास तय नहीं किया जा सकता एवं पुनर्जन्म को भी संशोधित नहीं किया जा सकता।

          जीवन को इस प्रकार से समझ सकते हैं प्रथम पूर्वजन्म अर्थात भूतकाल द्वितीय वर्तमान जन्म तृतीय अर्थात पुनर्जन्म । सर्वप्रथम पूर्व जन्म को समझना है एवं उस जन्म में किए गये कार्यों की व्याख्या करनी है, गलतियों को सुधारना है। यह कार्य वर्तमान युग होगा और इसी के अनुसार पुनर्जन्म प्राप्त होगा। एक शिष्य आलू के अलावा कुछ नहीं खाता, उसे गर्मी अत्यधिक लगती है और ठण्ड से अत्यधिक प्रेम है। एकांतवास उसकी प्रकृति है अर्थात उस शिष्य ने पूर्व जन्म में हिमालय के ठण्डे प्रदेश में साधनाऐं सम्पन्न की हैं इसीलिए गर्मी के प्रति वह संवेदनशील है। एकांत स्थान पर साधनाओं के कारण उसे एकांतवास पसंद है। उच्च शिखरों पर साधना करने वाले अपने साथ आलू या अन्य प्रकार के कंद मूल बोरे में भरकर ले जाते हैं। उसी पर उनका जीवन निर्भर रहता है। एकांतवासी मायावी नहीं होते तथा छलप्रपंच और फरेब से सर्वथा पुरे रहते हैं।
 
    ‌ ‌                  शिव शासनत: शिव शासनत: