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श्री प्रत्यंगिरायै नमो नम: ।।

ॐ नमो भगवती महाप्रत्यंगिरा स्वरूपिणी त्वरिता मातृका मम समस्त प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष शत्रून नाशय नाशय हुं फट् स्वाहा।

    हे महाकालिके, हे प्रथमा, हे आद्या, हे महाविपरीत प्रत्यंगिरे जब साधक के बड़े पुण्य भाग जागते हैं तब वह तेरे नाम का उच्चारण करता है। वह साधक परम सौभाग्यवान है जो तुझे भजता है, साथ ही साथ जब तू स्वयं साधक को अपना लेती है तो इस प्रकार के कालिकामय साधक के दिव्य भाग्य पर देवता भी विस्मित हो जाते हैं। हे कालिका तेरी साधना से साधक के जीवन में परा ब्रह्माण्डीय प्रत्यंगिरा शासन प्रारम्भ हो जाता है और उसकी एकमात्र शासनाध्यक्षा तू होती है। तू ही साधक के जीवन में घटने वाले प्रत्येक क्षण को प्रत्यक्ष रूप से देखती है, प्रत्यक्ष निर्णय लेती है और इस प्रकार वह साक्षात् काल और महाकाल से परे अकाल हो जाता है। इस प्रकार काल एवं महाकाल साधक के जीवन में मौजूद काल के क्षणों को प्रभावित नहीं कर पाते तो फिर औरों की क्या बिसात? ग्रह, नक्षत्र, देवी-देवता, राशियाँ, असुर, गंधर्व यहाँ तक कि शिव और ब्रह्मा, रुद्र, विष्णु, रोग, मृत्यु कोई भी साधक के जीवनकाल में प्रविष्ट हो क्रियाशील नहीं हो पाता। जो सबका प्रवेश निषेध कर दे, सबके कर्म साधक के ऊपर वर्जित कर दे, सभी प्रकार के कृत्य-कुकृत्य का निरोध कर दे, निषेध कर दे ऐसा है तेरा स्वरूप हे महाविपरीत प्रत्यंगिरे जो तुझे पूजता है, तुझे भजता है तू उसे किसी अन्य को पूजने भजने नहीं देती एवं उसके जीवन का लक्ष्य-निर्धारण, उसकी जरूरतें, उसकी इच्छाएं इत्यादि का तू स्वयं भरण-पोषण करती है। यही रहस्य है हे कालिके तेरा महाकाल के ऊपर नर्तन करने का अतः कालिका के साधक के लिए तो महाकाल भी शव स्वरूप होता है तो फिर काल की क्या बिसात?

          ऐसे साधक का जीवन घड़ी की सुइयों से निर्धारित नहीं होता। वर्ष, महीने, दिन, मुहूर्त इत्यादि महाप्रत्यंगिरा के साधक के लिए कोई मायने नहीं रखते क्योंकि इन सबका अधिनायक महाकाल तो स्वयं हे प्रत्यंगिरे तेरे चरणों में पड़ा हुआ है भला वह तेरी आज्ञा कैसे टाल सकता है ? ब्रह्माण्ड की सबसे अति विकसित युद्ध मशीन अर्थात समग्र शस्त्र प्रणाली के रूप में तू अपने साधक के अंदर और बाहर क्रियाशील हो उठती है। "ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रूं ह्रूं...... हूं हूं स्वाहा" इस मंत्र का तात्पर्य है कि अगर मेरे जातक की तरफ नजर उठाकर देखी, उससे छेड़खानी की, उससे खेलने की कोशिश की, उसे परेशान करने की कोशिश की, उससे कुछ मांगने या छीनने की कोशिश की तो शव बना दिए जाओगे, मुर्दे में परिवर्तित कर दिए जाओगे और तुम्हारा स्थान होगा महाश्मशान जहाँ मेरी समस्त प्रत्यंगिरा स्वरूपिणीं काली-नित्याएं, महायोगिनियाँ तुम्हारा उसी प्रकार भक्षण करेंगी, तुम्हारा उसी प्रकार मर्दन करेंगी जिस प्रकार श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित युद्ध में असुरों का हुआ था।

        हे महाप्रत्यंगिरा तू महायुद्ध की नायिका है, तेरे अंदर से ही समस्त प्रकार के युद्धों का जन्म होता है, तू शस्त्र-बिन्दु है। इस ब्रह्माण्ड में जितने भी स्थूल, जैविक, सूक्ष्म, आणविक, परमाणविक, दैवीय, परादैवीय, मंत्रात्मक, तंत्रात्मक, संकलात्मक इत्यादि-इत्यादि शस्त्र हैं अस्त्र हैं वे सब तुझी में से उत्पन्न होते हैं। हे प्रत्यंगिरे तू परम काट है, तू दिव्य तोड़ है, तू परम औषधि है तू परा निदान है। संसार में ऐसा कोई रोग नहीं, ऐसा कोई शत्रु नहीं, ऐसा कोई वाक्य नहीं, ऐसा कोई मुण्ड नहीं, ऐसा कोई षडयंत्र नहीं, ऐसा कोई मारकेश नहीं, ऐसा कोई शास्त्र नहीं, ऐसा कोई मंत्र नहीं, ऐसा कोई विज्ञान नहीं इत्यादि इत्यादि जिसकी काट, जिसका तोड़ तेरे पास मौजूद न हो एवं यही श्री दुर्गा-सप्तशती में वर्णित युद्ध में तूने स्पष्ट रूप से दिखाया है। तू शिवास्त्र की भी काट रखती है उसे भी क्षण भर में बेकार कर सकती है यही तेरे अट्ठाहास और हूँ हूँ के नाद का रहस्य है।

       हमारी पृथ्वी पर जीवन की सर्वांग रक्षा मनुष्य का मूलभूत अधिकार है। प्रत्येक देश का संविधान एक तरह से प्रत्यंगिरा विद्या का ही अनुसरण करता है। प्रत्येक देश के चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, आध्यात्मिक व्यक्तित्व, प्रत्यंगिरा के मूलभूत के सिद्धांत पर चलते हैं अर्थात जीवन की रक्षा होनी चाहिए। जो जीवन में विघ्न डालते हैं, जीवन को मृत्यु के मुख में ले जाते हैं, जीवन को कष्टमय बनाते हैं, जीवन को कमजोर करते हैं वे दण्ड के पात्र हैं और यही रहस्य हैं तेरे खड्ग धारण करने का। मनुष्य एवं जीव जंतुओं को कर्म करने का नैसर्गिक अधिकार प्राप्त है, कर्म के इस नैसर्गिक अधिकार का ज्यादातर मनुष्य दुरुपयोग ही करते हैं। जाने- अनजाने में या आदत -वश कर्म करने के अधिकार का सामूहिक तौर पर, व्यक्तिगत तौर पर, गुप्त रूप से, मानसिक रूप से, आध्यात्मिक रूप से मुझे तो सिर्फ हिंसात्मक रूप में उपयोग ही दिखाई पड़ता है। कौन कहता है कि पृथ्वी सभ्य हो गई है ? पृथ्वी सुसंस्कृत हो गई है ? पृथ्वी पर हिंसा की मात्रा कम हो गई है ? यह सब पूरी तरह से बकवास हैं। भले ही स्थूल रूप में आज बड़े-बड़े हिंसक प्राणी न दिखाई देते हों पर हिंसा ने रूप बदल लिया है, चोला बदल लिया है वह और पैनी, सूक्ष्म एवं न पकड़ में आने वाली हो गई है। कौन सभ्य ? सूट बूट पहना आदमी, पढ़ा-लिखा आदमी, बुद्धिमान आदमी, पैसे वाला आदमी, राजनेता, अभिनेता, ऊंचे औहदे पर बैठा अफसर, आम मनुष्य, व्यापारी इत्यादि- इत्यादि। क्या परिभाषा है सभ्य होने की, सुसंस्कृत होने की, इन सबके कर्मों में घोर हिंसा छिपी हुई है। इन सबके कर्म अत्यधिक पीड़ादायक, मानव रक्त से सने हुए, परम शोषक एवं चरम हिंसा लिए हुए हैं।

           जब तक कर्म का अधिकार हम नहीं समझेंगे कृत्य जो कि कर्म से उत्पन्न होता है वह हिंसा से मुक्त नहीं होगा। वहीं सभ्य, सुसंस्कृत एवं शालीन कहलाने योग्य हैं जो प्रत्येक कर्म को हिंसा विहीन कर लें परन्तु यह सैद्धांतिक बात है अतः अति परिष्कृत, परा-आध्यात्मिक युद्ध मशीन जो कि स्वतः जीवित जागृत हो, पूर्णांग हो, सहस्वांग हो, अनताग हो, जिसमें से कि अपने आप प्रतिरोध की क्षमता, निरोध की क्षमता, शत्रु को पहुंचने की क्षमता, उसे निष्क्रिय करने की क्षमता, उसके कृत्यों को काटने की क्षमता हो ऐसी परा आध्यात्मिक सम्पूर्ण आयुध प्रणाली नितांत आवश्यक है और यह प्राप्त होती है महाप्रत्यंगिरा अराधना से। अगर आप ज्योतिषी है तो आपको कुण्डली में देखना चाहिए कि सामने की विष कन्या तो नहीं बैठी हुई है? इसको जन्म कुण्डली में विष कन्या योग तो नहीं है। सामने बैठता जातक कहीं कृत्या-पुरूष तो नहीं है, कहाँ इसकी कुण्डली में महाषडयंत्र कारी योग तो नहीं है, क्षदम् योग तो नहीं है। यह तो हुई पैथालॉजी रिपोर्ट फिर आपको चाहिए विष कन्या के विष का तोड़, पुरुष के क्षदम् योग का तोड़ ढूंढना चाहिए। ऐसा टीका जो विष कन्या के विष को निष्प्रभावी बना दे, क्षदम् पुरुष योग को तोड़-फोड़ कर रख दे तभी आप जीवन में सफल हो सकते हैं अन्यथा विष कन्या का योग लिए हुए कोई स्त्री, आपको पत्री, आपकी पत्नी, आपकी प्रेमिका, आपकी सहयोगी, आपकी मित्र इत्यादि-इत्यादि बनकर आयेगी और अपनी विष ग्रंथि से आपका काम तमाम कर देगी। पूतना कृष्ण को विषाक्त दुग्ध पिलाने आयी थी पर खुद ही स्वर्ग सिधार गई। सूर्पणखा विषकन्या थी लक्ष्मण ने उसे पहचान लिया, वह सीता का भक्षण करना चाह रही थी। श्रीविद्या का तात्पर्य है जीवन की तीन अवस्थाएं जागृत, सुषुप्त एवं स्वप्न की स्थिति में सौन्दर्य का दर्शन, परम सौन्दर्य का दर्शन। जागृत अवस्था भी सौन्दर्यवान हो, जागृत अवस्था स्थूल कर्म की अवस्था होती है। सुषुप्त अवस्था में स्थूल कर्म शून्य होते हैं ऐसी अवस्था में भी आप सौन्दर्य के दर्शन कर सकें और आपके स्वप्न भी सौन्दर्य से परिपूर्ण हों। सुन्दर सपने देखो, सुन्दर चिंतन करो, कालिका के सौन्दर्य को निहारो यही श्रीविद्या है। नमो सुन्दरिम्-नमो सुन्दरिम् श्री सुन्दरिम् नमो नमः ।
   
                        शिव शासनत: शिव शासनत:

क्रीं ह्रीं ह्रीं दक्षिण कालिके स्वाहा ॥


            महाकाली नाचे जा रही है, वह परम कामरता हैं, उनमें काम तत्व बहुत है, उन्होंने ही इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की है, इस सृष्टि में सब कुछ उन्हीं से निकला है, वही इस सृष्टि की सृजनकर्ता है। उन्होंने ही बुद्ध को बनाया था, उन्होंने ही राम को बनाया था, उन्होंने ही कृष्ण को बनाया था, उन्हें अभी इससे भी बेहतर कुछ और बनाना है। राम, कृष्ण, महावीर, बुद्ध सभी आ गये लेकिन वह तृप्त नहीं हुई, चाहे वह कितनी भी अच्छी रचना क्यों न बना ले पर वह कभी तृप्त नहीं होती हैं, वह निरंतर नयी नयी रचनाएं रचती चली जा रही हैं, उनकी अतृति का कोई अंत नहीं है। जिस रचना को एक बार बना दिया फिर वह उस मॉडल को पुनः दुबारा नहीं रचती हैं वह न दुबारा राम को रचती है, न वह दुबारा कृष्ण को रचती है, किसी चीज को दुबारा नहीं रचती हैं जिनमें मौलिकता की कमी होती है, जो ओरिजनल नहीं हैं, जो मौलिक नहीं है वही लोग एक ही क्रिया को बार-बार दोहराते रहते हैं।

          एक गीतकार कोई बहुत अच्छा गीत लिख देता है फिर लोग उसी गीत को अपने हिसाब से, उसमें नई नई कड़ियाँ जोड़कर गाये चले जाते हैं, एक चित्रकार बहुत सुन्दर चित्र बना लेता है फिर कुछ लोग वैसा ही चित्र अपने हिसाब से बनाकर उसकी नकल करने लगते हैं उसी प्रकार आप लोग भी अपनी पुरानी, घिसी- पिटी दिनचर्या में उसी पुरानी जीवन शैली में जिये चले जा रहे हो, जिन्दगी भर आप वही क्रियायें जन्म से लेकर अंत समय तक दोहराते रहते हो लेकिन काली अद्भुत है इस पृथ्वी पर आज तक न जाने कितने अरबों-खरबों लोग जमीन पर पैदा हुए है और निरंतर पैदा हो रहे है। पर उनमे से किसी की भी रचना में रिपीटेशन नहीं हुआ है क्योंकि उनकी रचना बड़ी ही सृजनात्मक एंव भौतिक है, वह प्रतिपत्त नित्य नए-नए जीव को पैदा करती है, वह यहां से बूढ़े को विदा कर देती है, बच्चों को खड़ा कर देती है एवं वह बुजुर्गों से कहती हैं अब आप लोग पीछे हट जाइए, अब आप बहुत पुराने हो गए है, अब आप मंच के पीछे आ जाइए और नए बच्चो को मंच पर सामने लाकर खड़ा कर देती है। वह जानती है बूढ़े में जिंदगी भर का अनुभव होता है वह अनुभव जो उसने अपने ज्ञान से अर्जित किया है फिर भी वह उसे विदा कर देती है, उसकी जगह वह एक अंजान अपरिचित को खड़ा कर देती है जिस पर बिलकुल भरोसा नहीं किया जा सकता। यह क्या करेगा क्या नहीं करेगा, इसका चाल चलन कैसा होगा, यह चोर होगा, बेईमान होगा, साधु संयासी होगा, इसका कुछ भी अता पता नहीं फिर भी वह एक नए को पुराने के सामने लाकर खड़ा कर देती है। काली कहती है, अब तुम पुराने हो गए हो, अब तुम हट जाओ नए में जीवन है, पुराने में मृत्यु है, जो पुराना है वह अब मरने के करीब पहुँच गया है। जो नया है जियेगा, फलेगा-फूलेगा और आगे बढ़ेगा, जो लोग जीवन के विरोध में है मैं उन्हें धार्मिक नहीं कहता इसी शिक्षा के कारण आज हमारी पृथ्वी धार्मिक नहीं हो पाई। 

         जीवन को छोड़ना असम्भव है, कोई भी जीवन छोड़ना नहीं चाहता, सभी को जीवन से अत्यंत प्रेम होता है, हर माता पिता अपने बच्चों के लिए चिंतित रहते हैं, उसी प्रकार एक गुरू भी अपने शिष्यो के लिए बहुत ज्यादा चिंतित रहता है। जीवन नई-नई शक्लों में हमारे सामने आता है, जिंदगी से कोई भाग नहीं सकता, हम जहाँ भी जाएगें यहां जिंदगी को पास में पाएगें, हर जगह जीवन है हम रूप बदल सकते हैं, सूरत शक्ल बदल सकते हैं, द्वार बदल सकते हैं। 

      काली कहती हैं आनन्दपूर्ण रहो, सदा आनन्दमय रहो, तुम अपने आप से भागोमत बल्कि तुम हालात का डटकर मुकाबला करो तुम्हे अवश्य सफलता मिलेगी। इससे क्या फर्क पड़ता है कि तुम किस मकान में रहते हो, तुम क्या खाते हो, इससे क्या फर्क पड़ता है। इससे आपके अंदर एक प्रकार की हिप्पोक्रेसी पैदा होती है, आपके अंदर एक प्रकार का पाखण्ड झूठा दिखावा पैदा होता है हम सदा दूसरे की नकल करते रहते है उसने मकान लिया तो हम भी उससे अच्छा मकान लेंगे, उस औरत ने एक मंहगी साड़ी ली है मैं भी वैसी ही साड़ी लूंगी बस दूसरों से होड़ करने में लगे रहते हैं अगर हम जिंदगी को सीधे-साधे ढंग से स्वीकार कर लें तब हमें किसी प्रकार का कोई झूठा पाखण्ड नहीं करना पड़ेगा, न ही हमें किसी प्रकार की कोई बेईमानी खोजनी पड़ेगी, न झूठा दिखावा करना पड़ेगा। मैंने अपने जीवन में ऐसे बहुत से सन्यासी वस्त्र धारण किए हुए व्यक्ति देखे हैं वह अपने पास पैसा नहीं रखते, वह अपने साथ एक आदमी को रखते हैं जो पैसा रखता है वह लोग कहते हैं मैंने पैसे का बंधन छोड़ दिया है इसलिए अब मैं पैसों को अपने पास नहीं रखता हूँ, अब मैं पैसों को हाथ भी नहीं लगाता हूँ। जो व्यक्ति उनके साथ में चलता है वही उनके सारे लेन-देन है, वही आटो टेक्सी का लेन-देन करता है,  

वही होटल में रुकने की व्यवस्था करता है, जितने भी प्रकार के हिसाब किताब है वही देखता है। यह भी एक प्रकार का उपद्रव है कहीं भी जाओ तो एक व्यक्ति पैसा रखने के लिए साथ में होना चाहिये क्योंकि वह तो पैसा छूते नहीं है यह सब एक प्रकार का झूठा दिखावा है, यह सब एक पाखण्ड है, अगर आप किसी भी आटो या टेक्सी, बस, रेल इत्यादि में बैठेंगे तो आपको पैसा तो देना ही पड़ेगा। अब वह पैसा चाहे आपकी जेब में रखा हो या आपके साथी की जेब में इससे क्या फर्क पड़ता है। 

            जिंदगी से भागने का परिणाम पाखण्ड है मैं देखत हूँ चारों तरफ एक नंगा पाखण्डं खड़ा हो गया है जिन्दगी से भागोगे कैसे वह तो चारों तरफ है अगर आप कमायेंगे नहीं तो आपको भीख मांगनी पड़ेगी, भीख मांगने का मतलब है हमारे लिए कोई ओर कमायेगा, हम किसी और पर निर्भर रहेंगे। लोग पैसा कमाने को पाप कहते हैं वहीं लोग दूसरे की कमाई को लेने और उसे खर्च करने को पाप नहीं समझते हैं यह तो सिर्फ एक प्रकार की लीगल कानूनी तरकीबें हैं। जिन्दगी से पलायन करना ठीक नहीं है आप जहाँ भी जायेंगे वहाँ पर जिन्दगी को हाथ जोड़कर सामने खड़ा पायेंगे, वह कहेगी आइये यहाँ पर आपका स्वागत है, आप भी जिंदगी है, मैं भी एक जिंदगी हूं, हम सब एक जिंदगी है अगर आप सबसे भाग भी गये तो अपने आप से कैसे भागोगे ? लोगों ने अध्यात्म के क्षेत्र में भी कई तरकीबें निकाल रखी हैं, लोग ऐसी बेवकूफी करते हैं जिसे सोचकर मुझे बड़ी हैरानी होती हैं। जिन्दगी से भागो मत, जिन्दगी को देखे, उसे समझे आपके अंदर जीवन को देखने का इकहरा मापदण्ड होना चाहिए जो जीवन को ठीक से देखता है, वह इकहरा मापदण्ड बनाता है। आप अपने को जिस तराजू में तोलते है दूसरे को भी उसी तराजू में तोले, किसी से भेदभाव मत रखो जो व्यवहार आप अपने लिए पसंद नहीं वह आप दूसरे के साथ भी मत करो। जो व्यक्ति एक तराजू बनायेगा वह अपने आप में बहुत करुणावान हो जायेगा फिर वह कभी कठोर नहीं रह सकता, जो लोग दो तराजू बनाते हैं वह बहुत कठोर हो जाते हैं, दूसरों को वह बिल्कुल पापी समझते हैं वह कहेंगे यह बहुत दुष्ट है, इसे तो नर्क में डाल देना चाहिये वह कहेगा इसे अदालत में घसीटो, बड़ी से बड़ी सजा दो, इसको तो फाँसी पर लटका दो। 

         प्राचीन काल से ही हमारा इतिहास दोहरे मापदण्ड का काल है इसलिए मनुष्य नैतिक नहीं हो पाया क्योंकि नैतिकता का मूल बिन्दु करुणा है जब किसी व्यक्ति में कम्पेशन अर्थात करुणा पैदा नहीं होती तो वह व्यक्ति बहुत कठोर हो जाता है हम कठोर व्यक्ति को नैतिक कहते हैं। आपको अगर जिन्दगी खोजनी है तो पहले अपने घर जाओ आपका घर कहाँ है? जहाँ से आप आये हो वही आपका घर है, वहीं से जीवन के आनंद की यात्रा शुरु होती है। जीवन की यात्रा काली से ही शुरु होती है क्योंकि अध्यात्म की प्रथमा काली ही हैं वही जीवन का द्वार है, वही पराम्बा है, उन्हीं से जीवन शुरु होता है, उन्हीं पर जीवन का अंत होता है। महाकाली रहस्य को आप जीवन के आनंद के बिना समझ नहीं सकते जब महाकाली की कृपा होती है तब जातक के जीवन में आनंदमय कोष जागृत हो जाता है, महाकाली की कृपा से ही आनंदमय कोष जागृत होता है तब आपका जीवन धीरे-धीरे आगे बढ़ेगा, चारों ओर उसका प्रकाश फैलेगा यह पहाड़, वृक्ष, चाँद तारे आपमे समा जायेंगे, सारे लोग आपमे समा जायेंगे, सारा ब्रह्माण्ड आपमे समा जायेगा, आपकी चेतना जितनी फैलती जायेगी उतने बड़े आनंद को, उतने ही बड़े जीवन को आप उपलब्ध होते चले जाओगे फिर आपकी आँखों में आनंद होगा, आपके जीवन में सौन्दर्य होगा, आपके जीवन में सत्य होगा, आपके जीवन में संगीत होगा, आपके जीवन में रस होगा, आपकी आँखों में पराम्बा होगी इसी को मैं जिन्दगी कहता हूँ।

            मनुष्य ने अपने जीवन में चाहे कितने भी पाप क्यों न किये हों काली सहस्त्रनाम स्तोत्र का पाठ करने से ब्रह्म की प्राप्ति होती हैं, धन धान्य की विपुलता रहती है, वहाँ पर सर्वदा मंगल होता है महामारी, राज्यभय, चोरभय, अग्निभय, सभी भयों से वह मुक्त हो जाता है इससे अति घोर व्याधियाँ समाप्त हो जाती हैं, इससे शत्रुओं के संकट का निवारण होता है इसके पाठ मात्र से साधक को इष्ट सिद्धि प्राप्त होती है। राम ने भी काली के सहस्त्र नाम स्तोत्र का पाठ किया और उनका पूजन किया, सभी साधकों को इस सहस्त्र स्त्रोत का पाठ करना चाहिये जो। इसका पाठ करने से जीवन में परम तत्व की प्राप्ति होती है, इसका पाठ करने वाले साधक को अतुल लक्ष्मी, अद्भुत पराक्रम की प्राप्ति होती है उसके शरीर से सभी प्रकार के रोग एवं समस्त प्रकार की व्याधियाँ साधक को गुप्त धन एवं गुप्त ज्ञान की प्राप्ति होती है। 

            काली के विभिन्न नामों में उन्हें कामा भी कहा गया है, उन्हें काम तत्परा भी कहा गया है, उन्हें कामाचार वर्धिनी भी कहा गया है। 

लोगों ने समझा काली काम की देवी हैं, काम को परिभाषा लोगों ने अपने-अपने अर्थों में लगा ली, काम तत्परा का मतलब होता है जो सदा काम करने को तत्पर रहती हैं, काम विनोदनी का मतलब है वह बड़े से बड़ा कार्य खेल-खेल में ही कर देती हैं वही शक्ति देती हैं, काम का मतलब है अद्भुत पराक्रम करने की शक्ति जो कि साधक को महाकाली ही प्रदान करती हैं महाकाली को काम विशारद भी कहते हैं। इसका मतलब होता है किसी दिव्य काम को करने के लिए जिस दिव्य ज्ञान की आवश्यकता होती हैं वह ज्ञान साधक को भगवती महाकाली ही प्रदान करती हैं क्योंकि बिना ज्ञान के गुरुत्व नहीं आ सकता, गुरुत्व काली ही प्रदान करती हैं। क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति और भाव शक्ति यह तीनों शक्तियाँ अनायास ही काली के साधक को प्राप्त हो जाती है फिर ऐसा कोई कार्य नहीं है जो साधक के लिए असम्भव हो। काली ही भयहारिणी, भक्तारिणी, भव भामिनी एवं भव बंधन मोचनी हैं काली की प्रामाणिकता इस कलियुग में भी देखी जा सकती है अगर माथे पर मिट्टी और भस्म लगाने से मोक्ष मिलता तो आज मिट्टी में पाये जाने वाले समस्त जीव-जन्तु, कीटाणु मुक्त हो जाते और मोक्ष को प्राप्त हो जाते अगर घर-परिवार छोड़कर वन में जाने से मोक्ष मिलता तो आज सभी वन्य प्राणी मोक्ष प्राप्त कर चुके होते, बिना महाकाली की कृपा के मोक्ष पाना असम्भव है। 

          जब महाकाली कृपा करती हैं तब वह अपनी कृपा दृष्टि से साधक को दिव्य ज्ञान चक्षु प्रदान करती हैं, वह आत्मा को मोह के बंधन से मुक्त कर देती है। साधक को तत्व ज्ञान भी काली ही प्रदान करती हैं "आगम निगम बखानी" आगम निगम का बखान वही प्रदान करती है, उन्हें दो रूपो में पूजा जाता है रक्ता और श्यामा उनके काले स्वरूप को देखकर ब्रह्मा भी कह उठते हैं "नमामि कृष्ण रूपिणि" हे काली तुझे मेरा नमन है। रक्ता रूप में वह श्री सुन्दरी कहलाती हैं, श्री सुन्दरी श्रीविद्या को कहते हैं श्री विद्या श्रीविद्या, कालिका को विद्याराज्ञी भी कहा जाता है, रक्ता और कृष्णा के रूप में भगवती काली ही प्रतिष्ठित हैं, विद्याराज्ञी ही भोग और मोक्ष प्रदान करती हैं इस बात को सभी ऋषि-मुनियों ने स्वीकार किया है। कालिका के अत्यंत प्राचीन एवं प्रामाणिक ग्रंथों में भी इस बात का उल्लेख है वह कहते हैं महाशक्ति अलग-अलग आसनों पर विराजमान होकर शोभायमान हो रही हैं। 

          जब वह पूर्व आमान्य में बैठ जाती है तब वह षोडशी कहलाती है, जब वह पश्चिम आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह सारे क्लेशों का निवारण करती है तब वह कुब्जिका कहलाती है। जब वह दक्षिण आमान्य के सिंहासन पर बैठती है तब वह विश्वेश्वरी कहलाती है। पूर्व आमान्य में उन्हें पूर्णश्वरी भी कहा जाता है, उत्तर आमान्य में वह भोग, मोक्ष तथा समस्त सिद्धियों की दात्री कहलाती है तब हम सब उन्हें कालिका के नाम से जानते हैं। तुम ही अध्यात्म की माता हो, मैंने भगवती तुम्हारे किसी भी रूप की साधना की हो पर तुमने सदा मेरे सिर पर हाथ कालिका के रूप में ही रखा है, तुम ही सत्य हो, तुम ही शिव हो, तुम ही सुन्दर हो तुम ही सुन्दर हो, माँ तुम कितनी सुन्दर हो । 

    जब आप किसी काली दीवार अर्थात ब्लेक बोर्ड पर चॉक से लिखते है तब दीवार जितनी ज्यादा काली होगी उस पर लिखाई उतनी ज्यादा सफेद होगी। सफेद दीवार पर आप सफेद चॉक से नहीं लिख सकते, सफेद दीवार पर सफेद चॉक से आप कुछ भी नहीं लिख सकते अगर कुछ लिखने की कोशिश भी करोगे तो वह किसी के समझ में नहीं आयेगा और आपका सारा लिखना बेकार चला जायेगा। यदि काली दीवार मिट जाये तो तुम्हारी लिखाई भी मिट जायेगी। किस दीवार पर क्या लिखना है, क्या नहीं लिखना है इसका सारा ज्ञान भी महाकाली ही देती हैं। बिन्दु-बिन्दु तो सब कहते हैं पर आखिर बिन्दु क्या है? सिर्फ एक तत्व ज्ञानी व्यक्ति ही बिन्दु को समझ सकता है उस बिन्दु में जब आप छलांग लगाते हो तब आपके अंदर एक प्रकार का अद्वैतभाव आता है, बिन्दु में छलांग लगाने से पहले द्वैत हो, द्वैत और अद्वैत की बात करने से कुछ नहीं होगा इसका खण्डन-मण्डन करने से भी कुछ नहीं होगा आत्मा-परमात्मा की बात करने से भी कुछ नहीं होगा, दो चार शास्त्र रटकर प्रवचन करने से भी कुछ नहीं होगा इससे तो बस एक प्रकार का मरघटिया ज्ञान की प्राप्ति होती है। काली का साधक जब उस बिन्दु के अंदर छलांग लगाता है उस छलांग के बाद उसके भीतर से जो अद्वैतवाद आता है तब वह आँखों में करुणा लाता है, आँखों में रस लाता है जीवन में अमृत लाता है फिर सारे विरोध स्वत: समाप्त हो जाते हैं, दोनों ध्रुव समाप्त हो जाते हैं तब न कोई निगेटिव रहता है न ही कोई पॉजीटिव रहता है, दोनों एक साथ मिल जाते हैं, एक दूसरे को काट देते हैं और समास हो जाते हैं तब एक शुद्ध और निर्दोष आत्मा बची रहती है यह आत्म ज्ञान महाकाली प्रदान करती है।
                     शिव शासनत: शिव शासनत:

शिव रहस्यम् ।।

            शिव नगरी काशी से एक विशेष शिव पंचाग प्रकाशित होता है जिसमें तिथि अनुसार शिवाभिषेक का महत्व वर्णित होता है। शिव-वास विचार नाम इस पंचांग में यह देखा जाता है कि विशेष तिथि पर शिव का वास कहाँ है? शिव श्मशान में हैं तो उस समय विशेष शैवानुष्ठान आयोजित करने पर मृत्युतुल्य कष्ट होता है, शिव अगर क्रीड़ा में हैं तो शैवानुष्ठान करने पर संतान को संताप होता है, शिव अगर सभागार में हैं तो उस समय शैवानुष्ठान करने परं शारीरिक कष्ट होता है, शिव अगर पार्वती सानिध्य में हैं तो शैवानुष्ठान सुख समृद्धि देने वाला होगा, शिव अगर वृषभ पर आरूढ़ हैं तो शैवानुष्ठान के द्वारा विजय प्राप्ति होती है, शिव अगर हिमालय पर हैं तो शैवानुष्ठान सुख की वृद्धि करता है, शिव अगर ध्यान में हैं तो शैवानुष्ठान सिद्धियों को साधक के चरणों में डाल देता है इत्यादि इत्यादि। यह उच्च स्तर का शैव चिंतन है एवं यह उनके लिए है जिन्होंने शिव ज्ञान में पारंगतता हासिल कर ली है, जिनकी संज्ञा में शिव तत्व की संवेदनशीलता रूप ले चुकी है परन्तु अगर नियमित रूप से ज्योतिर्लिङ्गों पर या विशेष शैव स्थान पर अनुष्ठान इत्यादि होता है तो उपरोक्त पंचांग को महत्व नहीं दिया जाता। नूतन शिवलिङ्ग की प्राण-प्रतिष्ठा व्यक्ति विशेष के नाम से किया जा रहा महामृत्युञ्जय अनुष्ठान इत्यादि में शिव पंचांग के दृष्टिकोण का अत्यंत ही सटीक महत्व है। 

          अनुष्ठान तंत्र क्षेत्र के अंतर्गत आते हैं अतः त्रुटियां न हों इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए । दीक्षाएं, रुद्राक्ष धारण इत्यादि में परिणामों की तीव्रता शिव-वास विचार पर अत्यधिक निर्भर करती है। शिवरात्रि वह दिन है जब शंकर का दरबार खुला होता है, सारे नियम शिथिल होते हैं, ब्रह्माण्ड मण्डल स्थित समस्त शक्तियाँ शिवार्चन में लीन होती हैं, ब्रह्माण्ड का एक-एक अणु एवं परमाणु से भी अल्प कण शिवत्व से परिपूर्ण होता है। इस दिन की गई साधना, इस दिन मांगी गई मनोकामना, इस दिन प्राप्त की गई दीक्षा, इस दिन शिवलिङ्ग का स्पर्श, शिवलिङ्ग का स्थापन एवं शिवार्चन असंख्य गुना फल देने वाला होता है। सम्पूर्ण सृष्टि में केवल शिव ही चलते हैं, यह है शिवरात्रि महात्म्न । 

           प्रभु श्रीराम लक्ष्मण के साथ जलती चिता में सीता के वियोग में दुःखी हो आहूत होने जा रहे थे। विष्णु अवतार आज पूर्ण रूप से मनुष्य हो गया था । मानुषिक प्रवृत्तियों के वेग ने श्रीराम के मस्तिष्क को कुण्ठित कर दिया था, वे स्वयं की दिव्यता को कुछ क्षण के लिए तिरोहित कर चुके थे। यह विडम्बना है, यह दोष है परम शक्तियों के पंचभूतीय जीव शरीर धारण करने का, मस्तिष्क ग्रहण करने का । जब भी अवतार होते हैं परम शक्तियों को भी मनुष्य रूपी पंचभूतीय शरीर धारण करना पड़ता है जिसके ऊपर मस्तिष्क आकार लिए हुए होता है। मानव शरीर की अपनी निश्चितताएं हैं ठीक वैसे ही जैसे कि अगर हमें वायुयान में बैठा दिया जाय तो हमारी 90 प्रतिशत शरीरिक क्रियाएं बाधित हो जायेंगी। हम दौड़ नहीं सकते, हम सीधे सो नहीं सकते, हम चल फिर भी नहीं सकते, हम बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि हम एक निश्चित, सीमित आकृति के अंदर आबद्ध हो गये हैं। हमें उस आकृति की न्यूनताओं, अल्पताओं और सीमितताओं के साथ स्वयं को अनुशासित करना होगा। लम्बे समय तक इस प्रकार की स्थिति में रहने से हमें हमारी मूलभूत शक्तियों को कुछ देर के लिए तिरोहित करना ही पड़ेगा । मनुष्य पृथ्वी पर उत्पन्न नहीं हुआ है, मनुष्य पृथ्वी पर स्थानांतरित किया गया है, मनुष्य पृथ्वी पर रोपा गया है केवल कार्य विशेष के लिए। पृथ्वी मनुष्य की अंतिम और पहली भूमि भी नहीं है। आने वाले युगों में मनुष्य को पृथ्वी से स्थानांतरित भी किया जा सकता है, मनुष्य को किसी और जगह पर भी बसाया जा सकता है, यही शिव उवाच है, यही शिव का महात्न हैं। 

             मेरे हाथ पर एक मच्छर बैठ रहा था, मैंने मार दिया। क्यों मारा? मेरी मर्जी । मारना था, मार दिया। यही शिव भाव है। मैं शिवार्चन करता हूँ, लिंगार्चन करता हूँ- बुद्ध या महावीर की उपासना नहीं करता, कृत्रिम अहिंसा को नहीं ओढ़ता, कृत्रिमता में नहीं जीता। महाकाल मेरा ईष्ट है। प्रलय क्यों होगा? कब होगा ? क्या कारण है प्रलय के ? किसी को नहीं मालूम। प्रलय क्यों हुए हैं? किसी को नहीं मालूम। यह शिव का क्षेत्र है। एक क्षण में या क्षण के करोड़वे हिस्से में सूर्य, चंद्र, पृथ्वी, ग्रह, तारे, आकाश, पाताल, देवलोक, नागलोक, समस्त ब्रह्माण्डं मण्डल को शिव रच देता है। क्यों रचा ? उसकी मर्जी । किसी की हिम्मत नहीं पूछने की, क्यों समस्त जगत को सेकेण्ड के करोड़वे हिस्से में मिटा देगा? यह भी शिव की मर्जी । 

कोई जवाब सवाल नहीं, कोई सफाई नहीं, कोई कारण नहीं, कोई क्षोभ नहीं। मिटाना है तो मिटा दूंगा, पुनः निर्मित करना है तो निर्मित कर दूंगा। प्रलय के लिए न शिव किसी से राय लेते हैं, न कारण ढूंढते हैं क्योंकि यह उनका क्षेत्र है और न ही किसी में हिम्मत है उनसे कारण पूछने की क्योंकि वे कारणों के भी कारण हैं उनकी मर्जी चलती है। शैव चिंतन सबसे अलग है, शिव के आगे किसी की नहीं चलती, उनकी क्रियाएं विचारों, कारणों, चिंतन, बुद्धि, मन इत्यादि सबसे परे हैं। मुझे क्षमा करना हे शिव कहीं शिव गीता तो नहीं खोल दी क्योंकि शिव गीता ब्रह्माण्ड का सबसे गोपनीय तंत्र है। 

               जैसे ही राम चिताग्नि में चढ़ने के लिए उद्धत हुए अगत्स्य मुनि आ पहुँचे बोले आप यह क्या कर रहे हैं? एक स्त्री के लिए विष्णु अवतार को आहूत करने जा रहे हैं, नाना प्रकार से प्रभु श्रीराम को समझाया परन्तु श्रीराम बोले मुनि मेरा शोक कम नहीं हो रहा है, मेरा अशांत चित्त शांत ही नहीं हो रहा तब अगत्स्य ने श्रीराम को उसी क्षण शिव की शरण में जाने के लिए कहा एवं तुरंत उन्हें विरजा दीक्षा दी एवं शिवार्चन की विशेष विधि बता दी। श्रीराम लक्ष्मण सहित व्याघ्र चर्म धारण कर शिवार्चन में लीन हो गये तभी ब्रह्माण्ड मण्डल से तेजोमय ज्योर्तिपुंज का प्रादुर्भाव हुआ। देवाधिदेव महादेव पार्वती सहित वृषभ पर आरूढ़ राम के समीप आ पहुँचे एवं प्रभु श्रीराम को तुरंत अपनी गोद में उठाया और तेजोमय रथ पर सवार हो अंतरिक्ष में अंतरध्यान हो गये, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार कृष्ण ने अर्जुन को रथ पर बिठाकर श्रीमद्गीता का संदेश दिया था उसी प्रकार शिव ने स्वयं प्रभु श्रीराम को शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात शिव ने अपने मुख से विष्णु के सामने आज शिव रहस्य खोले एवं शिव के विराट स्वरूप का दर्शन कराया, तत्व का बोध कराया । प्रभु श्रीराम के महामाया से ग्रसित मस्तिष्क को योग माया से काटकर शिव वैभव के दर्शन कराये, परम सत्य से परिचित करवाया उन्हें पाशुपतास्त्र, अघोरास्त्र, कालिकास्त्र, चण्डिकास्त्र, ब्रह्मास्त्र इत्यादि प्रदान कर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का अजेय योद्धा बनाया महामाया अलग हैं, योगमाया अलग है। शिव ने योग माया, महामाया से अलग की हैं। 

             शिव के पास योग है, वे योगियों के भी योगेश्वर और योगेश्वरों के भी ईष्ट हैं। योगमाया के माध्यम से ही महामाया का भेदन सम्भव है। योगमाया, शिव गीता के अंतर्गत निहित हैं। स्कन्द ने सर्वप्रथम शिव गीता सनत् कुमार को प्रदान की, सनत् कुमार ने कालान्तर यही शिव गीता सूत जी को प्रदान की परन्तु शिव ने कह दिया कि इसे परम गोपनीय रखना। इसे शिव उन्हीं को प्रदान करते हैं जिनसे उन्हें कार्य लेना होता है, जिन्होंने कि शिव की विशेष कृपा प्राप्त कर ली हो अन्यथा शिव गीता बाजार में उपलब्ध नहीं है, यह गोपनीय है, इसे महादेव ने गोपनीय किया है। महर्षि व्यास ने सोलह पुराण लिखे हैं पता नहीं कितने ग्रंथ, उपनिषद इत्यादि भगवान व्यास ने रचित किये हैं। व्यास मुनि परेशान थे कि किस प्रकार ग्रंथों का निर्माण करूं, कैसे शिव वाणी को उच्चारित करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा था बस काशी पहुँचे और व्यासेश्वर शिवलिङ्ग की स्थापना की एवं शिव ध्यान में डूब गये। समय बीतता गया एक दिन भगवान विश्वनाथ अन्नपूर्णा सहित आ पहुँचे। व्यास के कण्ठ को छुआ, उनके हाथों को स्पर्श किया और अचानक ज्ञान गंगा फूट पड़ी, शब्द धारायें बनकर बहने लगे। व्यास जी सीधे बद्रीनाथ की हिम गुफाओं में जाकर बैठ गये और एक-एक करके सनातन धर्म के अनेकों ग्रंथ रच डाले। 

             शिव ने कहा और पार्वती ने सुना, यही आगम विज्ञान है। शिव के मुख से शिव रहस्य केवल पार्वती के कानों को संतुष्ट करने के लिए ही उच्चारित होतें हैं। शिव और पार्वती के मध्य हुए संवाद से ही शिव रहस्य इस ब्रह्माण्ड में आज तक खुले हैं एवं इन दोनों की कृपा से ही व्यास मुनि ने उन दिव्य शिव आवृत्तियों को ग्रहण कर ग्रंथों के रूप में लिपिबद्ध किया जिसे शिव गीता प्राप्त होने वाली होती है उस पर ब्रह्माण्ड की सभी देव शक्तियाँ कुपित हो जाती हैं। जैसे ही साधक शिव गीता प्राप्ति हेतु प्रयत्न करता है देव शक्तियाँ, मनुष्य शक्तियाँ, असुर शक्तियां, यक्ष, किन्नर इत्यादि उसे परेशान करने लगते हैं, इन्द्र थर्रा उठता है क्योंकि शिव गीता मिल गई तो जीव मनुष्य बन जायेगा । पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता और देवता से जैसे ही वह शिव गण की परिधि में आने लगेगा महामाया से सम्बन्धित शक्तियाँ भी उसकी घोर विरोधी हो जाती है क्योंकि यह तो मनुष्य का महापरिवर्तन हो गया। उसने मानव मण्डल, जीव मण्डल, उपदेवता मण्डल, असुर मण्डल, ग्रह मण्डल, सूर्य मण्डल के साथ-साथ महामाया के चक्र का भी भेदन कर डाला। 

                  कौन भेदन होने देगा अपना ? कौन अपना अस्तित्व खोना चाहेगा? कौन किसको उठते देखना चाहता है ? कोई नहीं। कौन अपने भेद खोलना चाहता है ? कौन अपने आवरण इस ब्रह्माण्ड में हटने देना चाहता है ? कौन अपने गुलाम को मालिक बनने देना चाहता है ? कल तक जो तुम्हारे दरवाजे । पर नतमस्तक हो रहा था, तुम्हें प्रणाम कर रहा था, तुम्हारी आज्ञा का पालन कर रहा था, तुम्हारे सामने सिर झुकाये खड़ा था, तुम्हारे भय से थर्रा रहा था, तुम्हारे कोप को नहीं झेलना चाह रहा था आज उसी के सामने तुम थर्रा रहे हो, तुम्हारा मस्तक झुका हुआ है, तुम उसे सम्मान दे रहे हो। इस तरह की विपरीत स्थिति भला इन्द्र देखना चाहेंगे? क्या मनुष्य देखना चाहेगा? आपके मित्र देखना चाहेंगे? क्या देवी शक्तियाँ देखना चाहेंगी? भूत-प्रेत और यक्ष या ऋषि मुनि इत्यादि किसी के भी हृदय इतने विशाल नहीं हैं, देवताओं के भी हृदय इतने विशाल नहीं रहे अतः यही कारण है कि योगियों का तो विरोध होता ही है, उनके पीछे तो लोग पड़े ही रहते हैं, मेरा भी व्यक्तिगत यही तर्जुबा है। लोग पचा नहीं पा रहे हैं मुझे। कल तक जो साथ थे वे ही विरोध करते हैं। बस इशारा ही काफी है इसीलिए शिव गीता इस ब्रह्माण्ड की सब से परम गोपनीय ग्रंथ है जिसे मिल गया, जिस पर शिव कृपा हो गई हो गई। कोई नियम नहीं, महादेव नियमों से परे हैं, महादेव का अर्चन भी नियमों से परे है। 

             एक चोर था, चोरी उसका कर्म था। उसने देखा कि शिवलिङ्ग के ऊपर एक धातु का घण्टा बंधा हुआ है वह तुरंत ही शिवलिङ्ग के ऊपर खड़ा हो गया और घण्टा चुराने लगा बस महादेव जागृत हो उठे, साक्षात् उसके सामने प्रकट हो गये। महादेव बोले लोग मेरे ऊपर कुछ धन चढ़ाते हैं, कुछ जल अर्पित करते हैं, कुछ फल फूल वा पत्ती इत्यादि चढ़ाते हैं पर तूने तो अपना सर्वस्व ही मुझे न्योछावर कर दिया, स्वयं को मुझे अर्पित कर दिया अतः मैं तेरी भक्ति से प्रसन्न हुआ, तुझे शिव लोक में स्थानं देता हूँ। अब कौन सा नियम ? शिव पूजा में, यही तो शिव की गोपनीयता है। शिकारी राजा का पुत्र तिण्ण अपने मित्रों के साथ शिकार करने निर्जन वन में गया, एक सुअर का शिकार किया तभी जोरों की प्यास लगी। उसके मित्रों ने कहा थोड़ी दूरी पर एक जलाशय है वही चलते हैं। तिण्ण ने जलाशय पर जाकर प्यास बुझाई और ऊपर पहाड़ी पर जाकर देखता है कि एक शिव मंदिर बना हुआ है। उसके मित्रों ने कहा इस निर्जन स्थान पर बस एक ब्राह्मण पता नहीं कैसे उल्टे सीधे शब्द बोलता हुआ शिव की रोज पत्तों, ठण्डे जल और फूल इत्यादि से पूजा अचना करता है। 

            तिण्ण के पाँव अपने आप मंदिर की ओर खिंचने लगे। वह जैसे ही मंदिर में पहुँचा उसका प्रेम महादेव पर उमड़ आया, वह वशीभूत हो गया एवं बोला हाय इतने सुन्दर देवता और उनके ऊपर कोई मूर्ख जल डालता है, पत्तों से ढकता है, इन्हें भोजन भी नहीं कराता । वह लिपट गया शिव से, उसका मन रम गया शिव में तुरंत जंगली सुअर का मांस पकाया, मुख में पानी भरा, बालों में कुछ जंगली पुष्प खोंसे और चल पड़ा शिव की सेवा हेतु । पहले मांस को चखकर देखा फिर भोग लगाने के लिए उसे पत्तल में लेकर चला। उसने मूर्ती पर लगे पत्ते और फूलों को साफ किया, शिव को मांस परोसा, मुख का जल शिव पर अर्पित कर दिया। अघोरेश्वर जाग उठे, प्रसन्न हो गये। भोले नाथ भोली भक्ति के आश्रित हो गये, रात भर तिष्ण धनुष बाण लिए देवता की रक्षा करता रहा कि कोई जंगली जानवर आकर उसके शिव का अहित न कर दे। सुबह ब्राह्मण आया, उसने देखा कि मंदिर में मांस है वह कुपित हो गया, सरोवर में ढेर सारा जल लाकर शुद्धिकरण किया, यज्ञ किया, वेद मंत्रों का उच्चारण किया। तिण्ण फिर संध्या के समय शिकार किए गये पशुओं का मांस लेकर आया, पुनः मुख में जल भर लाया और अपनी ही विधि से शिवार्चन किया। ब्राह्मण दूसरे दिन फिर वही दृश्य देख आशंकित हो उठा तभी रात्रि में महादेव ने उसे स्वप्न दिया और कहा सुनो ब्राह्मण वह मेरा निर्मल, कोमल और भोला भक्त है, वह मुझे प्रिय है। क्यों प्रिय है ? यह तुम्हारा विषय नहीं है। उसका पूजन मुझे स्वीकार्य है अतः उसे परेशान मत करना, यह मेरा आदेश है। मेरी उपासना कैसे होगी ? यह मैं निश्चित करूंगा, पुजारी या ब्राह्मण नहीं करेगा। सारा जगत मेरे अधीन है, मैं किसी के अधीन नहीं हूँ। 

                  ब्राह्मण घबरा कर उठ गया एवं मूर्ति के पीछे छिपकर तिण्ण की प्रतिक्षा करने लगा। तभी तिण्ण हाथ में मांस लिए हुए आ पहुँचा, वह देखता है कि भगवान की एक आँख से रक्त की धारा बह रही है। उसने सोचा शायद मैं अपनी आँख से रक्त की धारा निकाल दूं तो भगवान की आँख ठीक हो जायेगी। उसने अपने आँख में तीर चुभोकर रक्त की धारा निकाल दी उसी क्षण भगवान की आँख से रक्त की धारा रूक गई परन्तु दूसरे क्षण दूसरी आँख से रक्त निकलने लगा। तिष्ण वनोषधियाँ ले आया, भगवान की आँखों पर लगाने लगा परन्तु रक्त की धारा नहीं रूकी, उसने सोचा क्यों न मैं अपनी आँख निकालकर भगवान को लगा दूं । एक आँख तो फूट ही गई थी अत: पाँव से उसने भगवान की दूसरी आँख पर लात रखी कि कहीं मैं गलत जगह अपनी आँख न लगा दूं। जैसे ही अपनी आँख निकालने को वह उद्धत हुआ, शिव प्रकट हो गये एवं बोले रुक जाओ कण्णप्य! मेरे कण्णप्य ! ठहर जाओ। (कण = आँख, अप्य- वत्स,कण्णय कण+अप ।) मैं तुम्हारी भक्ति पर प्रसन्न हुआ। ब्राह्मण देखता ही रहा शिव ने पुनः कण्णप्य को दृष्टिवान बना दिया, दिव्य दृष्टि से सुशोभित कर दिया, उसे शिव गीता प्रदान कर दी अर्थात जहाँ तक दृष्टि भी भेदन न कर सके उसके आगे का महाभेदन भी शिव ने कण्णप्य को सिखा दिया अतः शिव पूजन का कोई नियम नहीं है कोई धर्म नहीं है कोई विधान नहीं हैं ।

            तीन बार महादेव बोलोतो सीधे शिव दौड़े चले आते हैं जैसे कि रम्भाते बछड़े को देख गाय सब कुछ छोड़कर भागी चली आती है । तीन बार शिव - शिव बोलो तो महादेव एक बार में ही कार्य कर देते हैं और दो बार का शिव उच्चारण कर्ज के रूप में ओढ़ लेते हैं अर्थात कर्जवान बन जाते हैं, स्वयं को बाधित कर लेते हैं, स्वयं दो बार ऋण उतारने की जुबान दे बैठते हैं। यह है शिव का चिंतन, सभी चिंतनों से परे । लोग शिव ने ऋण का निर्माण तो लोक कल्याण के लिए किया है। ऋण का भार ही तो उपकार का मार्ग है, ऋण का भुगतान ही तो भारहीन होने का विधान है। ऋणी होने में अपना एक अलग मजा है। शिव स्वयं ऋण ओढ़ते हैं, जितने बार शिव- शिव बोलोगे उतने वार शिव ऋण ओढ़ लेंगे और बार-बार जीव के पास आकर उसका कष्ट निवारण करते रहेंगे, उसे कुछ न कुछ देकर कर्ज से मुक्त होने की चेष्टा करते रहेगें। वह भक्त के पास आने के लिए ऋणी बनते है, यह उनका दृष्टिकोण है। कभी वह विष्णु के चरणों में लेट जाता है,कभी वह ब्रह्मा को प्रणाम कर उठते है, कभी वह स्वयं अपने हाथों से विष्णु का अभिषेक करने लगते है, कभी वह हिमालय छोड़ कृष्ण की रासलीला, की तरफ भागने लगते है और वह भी रोते हुए, रूदन करते हुए कृष्ण के समीप जाना चाहते है क्योंकि वह अवधूत है, क्योंकि वह माया से ऊपर है, क्योंकि वह महामाया के अधीन नहीं है । अतः वह शाश्वत् है, निष्कलंक है, निद्वंद है, उसमें द्वंद नहीं है, वह निश्चल है, यही उसका परम वैभव है, यही उसकी रुद्रता है, यही उसकी महानता है। 

           पुष्पदंत ने कहा समुद्र के जल में अगर हिमालय पर्वतों की अनेकों श्रृंखलाओं जितने काजल को घोलकर स्याही बनाई जाये एवं कल्प वृक्ष की कलम से स्वयं मां सरस्वती शिव की महिमा को इस पृथ्वी के ऊपर लिखे तो भी शिव की महिमा वर्णित नहीं की जा सकती तो भला पुष्पदंत में इतनी ताकत कहाँ कि वह शिव महिम्न स्तोत्र लिखे फिर भी इस भव सागर से संतृप्त यह शिव भक्त मुक्ति हेतु शिव महिम्न कह रहा है और जैसे ही रोते हुए पुष्पदंत ने इतना कहा ही था कि शिव कारागृह के समस्त द्वारों का भेदन करते हुए पुष्पदंत के समीप आ खड़े हुए। रूंदन तो होगा ही, रूंदन तो शिव प्रदान करते ही हैं क्योंकि क्षय होने की प्रवृत्ति को केवल तरलता रोक सकती है और रूदन जीव को तरल बनाता है, रूदन जीव के अंदर तरलता का निर्माण करता है। देखो ब्रह्माण्ड कितना तरल है पता नहीं कहाँ तक फैला हुआ है। कितना वेग है उसके पास, कितनी विराटता है उसके पास, देखो वायु कितनी तरल है, कहीं भी फैल जाती है, छोटे-से-छोटे छिद्र में से भी निकल जाती है। नदियों में कितनी तरलता है तभी तो वह वेगवान हो समुद्र की तरफ भागती रहती हैं। तरलता ही वेग का निर्माण करती है क्योंकि तरलता तभी आती है जब बंधन मुक्ति होती है। 

            सरसों का बीज तो कुछ समय में नष्ट हो जायेगा, उसका क्षय निश्चित है अतः समय रहते उसके अंदर से तरलता निकाल लो, तेल तो कई हजार वर्षों तक नष्ट नहीं होगा क्योंकि वह तरल है, शिव रुद्र भी हैं। रुद्रता से ही तरलता का जन्म होता है एवं तरलता के अंदर रुद्रता की ही शक्ति निहित है। बीज को पीसोगे तो रूदन तो होगा ही परन्तु तभी तरलता भी उत्पन्न होगी और तरल को जब गर्म करोगे अर्थात पुनः रुद्रता प्रदान करोगे तो वायु निर्मित होगी ही और परम तरलता वायु के रूप में अस्तित्व में आयेगी ही। यही सृष्टि का नियम हैं, रुद्र सूर्य की पकड़ से निकल भागने के लिए रोती चिल्लती, विकट अ‌ट्ठाहस करती हुई रुद्र किरणें कुछ ही क्षणों में समस्त ब्रह्माण्ड में आच्छादित हो जाती हैं एवं समस्त ब्रह्माण्ड प्रकाशमय हो जाता है अगर उनमें रूदन नहीं होगा, अगर वे रुद्रता से परिचित नहीं होगीं, अगर वे शिव की रुद्रता से संस्पर्शित नहीं होंगी तो यात्रा रुक जायेगी, सृष्टि रुक जायेगी। 

           मैंने कहा शिव मुक्त करता है, मुक्त करना ही शिव की पहचान है, वह प्रकाशत्व है क्योंकि सर्वप्रथम उसकी रुद्रता प्रकाश को भी मुक्त होना सिखाती है। सूर्य के गुरुत्व से सूर्य की पकड़ से आखिकार प्रकाश की किरणें निकल ही भागती हैं, यही सूर्य के जन्म की कहानी है, यही सबके पहचान की कहानी है, यही सृष्टि के उदय की कहानी है। रुद्र स्त्री पुरुष काम के वेग में आवेशित हो सम्भोग की पराकाष्ठा तक पहुँच जाते हैं, वीर्य स्खलित होता है रुद्रता के कारण, पुरुष के एक अंश वीर्य में 55 लाख रुद्र शुक्र कीट होते हैं जो कि पूर्ण प्रतिस्पर्धा, रुद्रता और रूदन के साथ स्त्री के डिम्ब कोश से उत्सर्जित मात्र एक अण्ड से मिलन के लिए भागते हैं सम्पूर्ण रुद्रता एवं वेग के साथ जैसे कि सौर किरणें सूर्य को छोड़कर भागती है। 55 लाख शुक्र कीट और एक अण्ड कितनी घोर, कितनी रुद्र प्रतिस्पर्धा, कितनी भीषण मारकाट, कितना उग्र भाव । लाखों शुक्र कीट आपस में लड़- कटकर मर जाते हैं, कुछ रास्ते में ही न्यून उग्रता के कारण नष्ट हो जाते हैं, कुछ अयोग्य होते हैं, कुछ बीमार होते हैं, कुछ लूले लंगड़े होते हैं, कुछ अर्ध विकसित होते हैं परन्तु इन 55 लाख शुक्र कीटों में से जो सबसे ज्यादा स्वस्थ, सबसे ज्यादा बलवान, सबसे ज्यादा रुद्र होता है वह अण्ड का भेदन करता है और इस प्रकार एक नये जीवन की गर्भ में स्थापना होती है।

             कुम्भ का मेला लगा था मैं देख रहा था लाखों करोड़ों नर मुण्ड खड़े थे, कुछ गृहस्थ थे, कुछ बूढ़े थे, कुछ बालक थे, कुछ संन्यासी थे परन्तु सबसे आगे खड़े थे पूर्ण नग्न, पूर्ण स्वस्थ (शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक धरातल पर), पूर्ण रुद्र, हाथों में अस्त्र-शस्त्र लिए नागा संन्यासी एवं जैसे ही शाही स्नान का क्षण आया सबसे पहले तेज वेग से हर हर महादेव चिल्लाते हुए ये नागा संन्यासी कूद पड़े सबको पीछे छोड़ते हुए शिव के मस्तक से उद्गमित हो बहने वाली गंगा की जल धाराओं में। शाही स्नान ही पहले होता है। कुम्भ भी शिव क्षेत्र में ही लगते हैं, सब जगह एक जैसा ही होता है चाहे वह कुम्भ स्नान हो, माता का गर्भ हो या सूर्य मण्डल। रुद्रता ही पहले चलती है, यही सृष्टि का नियम है, यही शिव क्षेत्र की विहंगमता है। रोना बुरी बात नहीं है, गुरु रूलाते भी हैं जो गुरु शिव स्वरूप होते हैं वे तो रूलाते ही हैं । वे तो रूदन अंदर उत्पन्न कर ही देते हैं। रूदन से ही तम का नाश होता है।
                          शिव शासनत: शिव शासनत:


शुक्राचार्य जी द्वारा रचित महामृत्युंजय स्तोत्र ।।

      यह पृथ्वी पुरुष क्षेत्र है। पुरुष वही है जिसमें कि पुरुषार्थ का सृजन होता है। इस पृथ्वी पर भले ही अवतारी व्यक्तित्व ही क्यों न हो उसे भी पुरुषार्थ का प्राकट्य करना पड़ता है। राम ने भी पुरुषार्थ किया, कृष्ण से लेकर सभी महामानव पुरुषार्थ का ही प्राकट्य करते हैं। पुरुषार्थ के अभाव में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। जो । रोते हैं, भाग्य को कोसते हैं, अपने आपको दीनहीन समझते हैं, नाना प्रकार के प्रपंच रच अकर्मणता प्रस्तुत करते हैं निस्संदेह वे पुरुषार्थहीन हैं। अध्यात्म में पुरुषार्थ के बल पर ही सिद्धि, ज्ञान, तपस्या इत्यादि प्राप्त की जाती है। सनातन धर्म के ऋषि मुनि अत्यंत ही पुरुषार्थी रहे हैं। इन्हीं में से एक भृगु नंदन शुक्राचार्य जी भी हैं। वे असुरों के महागुरु हैं, उन्होंने अपने पुरुषार्थ से मृत संजीवनी विद्या प्राप्त की है। शिव जी उन्हें निगल गये थे। शिव जी के जठर में उन्हें निकलने का मार्ग दिखाई नहीं पड़ रहा था तब उन्होंने दिव्य मंत्रों के साथ शिव जी की स्तुति की कालान्तर उनके वीर्य मार्ग से वे प्रकट हुए और शिव पुत्र कहलाये। 

           शुक्राचार्य जी को स्वयं शिव जी के जठर में जीवित रहकर अपनी सिद्धि की परीक्षा देनी पड़ी। गुरु चलता-फिरता, जीवित जाग्रत मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह है। जीवन के चौराहे पर खड़े शिष्य को वह नवजीवन प्रदान करता हैं। अनिर्णय को निर्णय में परिवर्तित करता है। जब- जब सनातन धर्म की अनेकों धाराओं में ज्ञान, तंत्र, ज्योतिष, सिद्धि, उपासना इत्यादि लुप्त होने की कगार पर पहुँचती है कोई एक ऋषि मृत्युञ्जय रूपी शिव विग्रह बन पुनः धर्म की संस्थापना कर देता है। पुनः शिष्यों की एक अखण्ड श्रृंखला को चलायमान कर देता है। स्तोत्र जड़ हैं कल्पवृक्ष की। शुक्राचार्य जी द्वारा रचित मृत्युञ्जय स्तोत्र से ही कालान्तर विभिन्न प्रकार के मृत्युञ्जय अनुष्ठान मंत्र इत्यादि प्रकट हुए हैं। नीचे मूल स्तोत्र को हिन्दी अर्थ के साथ प्रस्तुत कर रहा हूँ। संकट काल में मात्र एक आवृत्ति हृदयंगम भाव से पढ़ने पर जातक की रक्षा निश्चित ही होती है। इसके साथ ही शिव जी के 108 नामों से की गई अंधक द्वारा स्तुति भी दे रहा हूं । जिसके पठन से जातक को तुरंत ही शिव सानिध्य की प्राप्ति होती है। 

      शिव जी का एक-एक नाम उच्चारित करते हुए एक-एक अखण्डित बिल्वपत्र शिवलिङ्ग पर अर्पित करने से शुक्रेश्वर पूजन सम्पन्न होता है। शुक्र ही सबसे महत्वपूर्ण ग्रह है। शुक्र ही पराक्रम, पुरुषार्थ, यश, प्रसिद्धि कीर्ति और नाना प्रकार के वैभव प्रदान करता है। जिसका शुक्र अस्त हो अर्थात कुण्डलिनी में शुक्र का प्रकाश क्षीण हो वे जीवन के हर क्षेत्र में असफल होते हैं। शुक्र अस्त व्यक्तियों का वैवाहिक, पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन पूरी तरह से बर्बाद होता है। शुक्र पर्वत के दबे होने के कारण व्यक्ति कायर, अवसाद से ग्रसित, सम्मोहन एवं वशीकरण हीन निर्जीव बनकर रह जाता है। शुक्र पर्वत के बिगड़े होने के कारण या शुक्र पर्वत पर काला तिल होने से व्यक्ति चरित्रहीन, यौन रोगों से ग्रसित और विकृत कामुक प्रवृत्ति का होता है। जीवन की लय ही शुक्र है। शुक्र प्रधान व्यक्ति उच्च श्रेणी के दार्शनिक, गुरु पद पर आसीन शास्त्रार्थ में निपुण, यौद्धा, वीर और सदैव चमत्कारिक सम्मोहन एवं वशीकरण से युक्त होते हैं। पूर्ण विकसित शुक्र पर्वत सौन्दर्य, स्वास्थ्य एवं सर्व सफलता का द्योतक है। 

शुक्र को विकसित करने के लिए 11 अखण्डित बिल्व पत्र इस मंत्र के साथ शिवलिङ्ग पर अर्पित करने चाहिए। मात्र 21 दिनों में जातक को अनुकूल परिणाम मिल जाते हैं।
॥ ॐ नमः शिवाय शुभं शुभं कुरु कुरु शिवाय नमः ॐ ॥ 

ॐ नमस्ते देवेशाय सुरासुरनमस्कृताय भूतभव्यमहादेवाय हरितपिङ्गललोचनाय बलाय बुद्धिरूपिणे वैयाघ्र वसनच्छ दायार णे याय त्रैलोक्यप्रभवे ईश्वराय हराय हरिनेत्राय युगान्तकरणायानलाय गणेशाय लोकपालाय महाभुजाय महाहस्ताय शूलिने महादंष्ट्रिणे कालाय महेश्वराय अव्ययाय कालरूपिणे नीलग्रीवाय महोदराय गणाध्यक्षाय सर्वात्मने सर्वभावनाव सर्वगाय मृत्युहन्त्रे पारियात्रसुव्रताय ब्रह्मचारिणे वेदान्तगाय तपोऽन्तगाय पशुपतये व्यङ्गाय शूलपाणये वृषकेतवे हरये जटिने शिखण्डिने लकुटिने महायशसे भूतेश्वराय गुहावासिने वीणापणवतालवते अमराय दर्शनीयाय बालसूर्यनिभाय श्मशानवासिने भगवते उमापतये अरिंदमाय भगस्याक्षिपातिने पूष्णो दशननाशनाय क्रूरकर्तकाय पाशहस्ताय प्रलयकालाय उल्कामुखायाग्निकेतवे मुनये दीप्ताय विशाम्पतये उन्नयते जनकाय चतुर्थकाय लोकसत्तमाय वामदेवाय वाग्दाक्षिण्याय वामतो भिक्षवे । 

भिक्षुरूपिणे जटिने स्वयं जटिलाय शक्रहस्तप्रतिस्तम्भकाय वसूनां स्तम्भकाय कृतवे ऋतुकराय कालाय मेधाविने मधुकराय चलाय वानस्पत्याय वाजसने तिसमाश्रमपूजिताय जगद्धात्रे जगत्कर्त्रे पुरुषाय शाश्वताय ध्रुवाय धर्माध्यक्षाय त्रिवर्त्मने भूत भावनाय त्रिनेत्राय बहुरूपाय सूर्यायुतसमप्रभाव देवाय सर्वतूर्यनिनादिने सर्वबाधाविमोचनाय बन्धनाय सर्वधारिणे धर्मोत्तमाय पुष्पदन्तायाविभागाय मुखाय सर्वहराय हिरण्यश्रवसे द्वारिणे भीमाय । भीमपराक्रमाय ॐ नमो नमः ।

ॐ जो देवताओं के स्वामी, सुर-असुरद्वारा वन्दित, भूत और भविष्य के महान् देवता, हरे और पीले नेत्रों से युक्त, महाबली, बुद्धिस्वरूप, बांबंबर धारण करने के वाले, अग्निस्वरूप, त्रिलोकी के उत्पत्तिस्थान, ईश्वर, हर हरिनेत्र प्रलयकारी अग्निस्वरूप, गणेश, लोकपाल, महाभुज, महाहस्त, त्रिशूल धारण करने वाले, बड़ी बड़ी दाढ़ोंवाले कालस्वरूप, महेश्वर, अविनाशी, कालरूपी, नीलकण्ठ, महोदर, गणाध्यक्ष, सर्वात्मा, सबको उत्पन्न करने वाले, सर्वव्यापी, मृत्यु को हटानेवाले, पारियात्र पर्वत पर उत्तम व्रत धारण करनेवाले, ब्रह्मचारी, वेदान्तप्रतिपाद्य, तप की अन्तिम सीमा तक पहुँचने वाले, पशुपति, विशिष्ट अंङ्गों वाले, शूलपाणि, वृषध्वज, पापापहारी, जटाधारी, शिंखण्ड धारण करने वाले, दण्डधारी, महायशस्वी, भूतेश्वर गुहा में निवास करने वाले, वीणा और पणव पर ताल लगाने वाले, अमर, दर्शनीय, बालसूर्य- सरीखे रूपवाले श्मशानवासी, ऐश्वर्यशाली, उमापति, शत्रुदमन, भग के नेत्रों को नष्ट कर देने वाले, पूषा के दाँतों के विनाशक, क्रूरतापूर्वक संहार करने वाले, पाशधारी, प्रलयकालरूप, उल्कामुख, अग्निकंतु, मननशील, प्रकाशमान प्रजापति, ऊपर उठानेवाले, जीवों को उत्पन्न करने वाले, तुरीयतत्त्वरूप, लोकों में सर्वश्रेष्ठ वामदेव वाणी की चतुरतारूप, वाममार्ग में भिक्षुरूप, भिक्षुक, जटाधारी, जटिल दुराराध्य इन्द्र के हाथ को स्तम्भित करने वाले, वसुओं को बिजड़ित कर देने वाले, यज्ञस्वरूप, यज्ञकर्ता, काल, मेधावी, मधुकर चलने-फिरने वाले, वनस्पति का आश्रय लेनेवाले वाजसन नाम से सम्पूर्ण आश्रमों द्वारा पूजित, जगद्धाता, जगत्कर्ता, सर्वान्तर्यामी, सनातन, ध्रुव, धर्माध्यक्ष भूः भुवः स्वः - इन तीनों लोकों में विचरने वाले, भृतभावन त्रिनेत्र बहुरूप, दस हजार सूर्यो के समान प्रभावशाली, महादेव, सब तरह के बाजे बजानेवाले सम्पूर्ण बाधाओं से विमुक्त करने वाले, ।बन्धन स्वरूप सबको धारण करने वाले, उत्तम धर्मरूप, पुष्पदन्त विभागरहित, मुख्यरूप, सबका हरण करने वाले सुवर्ण के समान दीप्त कीर्तिवाले मुक्ति के द्वारस्वरूप, भीम तथा भीमपराक्रमी हैं, उन्हें नमस्कार है. नमस्कार है।

अंधक द्वारा शिव जी की 108 नामों से स्तुति

महादेवं विरूपाक्षं चन्द्रार्धकृतशेखरम् । 
अमृतं शाश्वतं स्थाणुं नीलकण्ठं पिनाकिनम् ॥ 
वृषभाक्षं महाज्ञेयं पुरुषं सर्वकामदम् । 
कामारिं कामदहनं कामरूपं कपर्दिनम् ॥ 
विरूपं गिरीशं भीमं सृविकणं रक्तवाससम् । 
योगिनं कालदहनं त्रिपुरघ्नं कपालिनम् ॥ 
गूढव्रतं गुप्तमंत्रं गम्भीरं भावगोचरम् । 
अणिमादिगुणाधारं त्रिलोकैश्वर्यदायकम् ॥ 
वीरं वीरहणं घोरं विरूपं मांसलं पटुम् । 
महामांसादमुन्मत्तं भैरवं वै महेश्वरम् ॥ 
त्रैलोक्यद्रावणं लुब्धं लुब्धकं यज्ञसूदनम्। 
कृत्तिकानां सुतैर्युत्त मुन्मत्तं कृत्तिवाससम् ॥ 
गजकृत्तिपरीधानं क्षुब्धं भुजगभूषणम् । 
दत्तालम्बं च वेतालं घोरं शाकिनिपूजितम् ॥ 
अघोरं घोरदैत्यघ्नं घोरघोषं वनस्पतिम् । 
भस्माङ्गं जटिलं शुद्धं भेरुण्डशतसेवितम् ॥ 
भूतेश्वरं भूतनाथं पञ्चभूताश्रितं खगम् । 
क्रोधितं निष्ठरं चण्डं चण्डीशं चण्डिकाप्रियम् ॥ 
चण्डतुण्डं गरुत्मन्तं निस्त्रिंशं शवभोजनम् । 
लेलिहानं महारौद्रं मृत्युं मृत्योरगोचरम् ॥ 
मृत्योर्मृत्यं महासेनं श्मशानारण्यवासिनम् । 
रागं विरागं रागान्धं वीतरागं शतार्चिषम् ॥ 
सत्त्वं रजस्तमोधर्ममधर्मं वासवानुजम् । 
सत्यं त्वसत्यं सद्रूपमसद्रू पमहे तुकम् ॥ 
अर्धनारीश्वरं भानुं भानुकोटिशतप्रभम् । 
यज्ञं यज्ञपतिं रुद्रमीशानं वरदं शिवम् ॥ 
अष्टोत्तरशतं ह्येतन्मूर्तीनां परमात्मनः । 
शिवस्य दानवो ध्यायन् मुक्तस्तस्मान्महाभयात् ॥.

                          शिव शासनत: शिव शासनत:


शास्त्रों के अनुसार शिव भस्म बनाने कि विधि ।।

 जिसे शुद्ध व पावन माना जाता है। ये हैं चीज़ें जिसे मिलाकर बनाई जाती है गृहस्थ आश्रम शिव भस्म 

1- गाय के गोबर कंडे 
2- बिल्व वृक्ष की लकड़ी
3- शमी की लकड़ी
4- पीपल की लकड़ी
5- पलाश की लकड़ी
6- बड़ (बरगद) की लकड़ी 
7- अमलता की लकड़ी 
8- बेर वृक्ष की लकड़ी
9- नीम की छाल
10- काजू
11- बदाम बड़े वाले
12- शुद्ध गाय का घी
13-त्रिफला चूर्ण आदि - जब भस्म बनकर तैयार हो जाए तो उस भस्म का सफ़ेद भाग निकालकर अलग रख लें, यही सफ़ेद भाग (भस्म) पूजा में काम आता है ।

भगवान शिव के शिवलिंग पर तीन आड़ी रेखायें इस भस्म से बनायें, इसे त्रिपुण्ड्र कहते हैं ।
मध्यमा और अनामिका दो अँगुलियों से दो रेखायें खींचें और अंगूठे से बीच की रेखा विपरीत दिशा में खींचें ।

शिवजी को लगाने के बाद स्वयं भी शिव पञ्चाक्षर मंत्र "नमः शिवाय" का 3 बार उच्चारण करते हुए पहले मस्तक पर, दोनों भुजाओं पर, ह्रदय में एवं नाभि आदि इन पांच स्थानों पर त्रिपुण्ड्र अवश्य लगायें।