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सरस्वती पूजन ।।

       यंत्र का आवरण पूजन सम्पन्न किया जाता है एवं विग्रह का षोडशोपचार पूजन किया जाता है। सरस्वती के पूजन के लिए हाथी दाँत के ऊपर बनी हुई मूर्ति ही श्रेष्ठ मानी जाती है। अभिषेक भी मूर्ति विग्रह का ही सम्पन्न किया जाता है। सर्वप्रथम आम के चौंकी पर श्वेत वस्त्र बिछाकर सरस्वती विग्रह को स्थापित करें तदुपरांत लघु प्राण-प्रतिष्ठा मंत्र पढ़कर विग्रह को पुष्प के द्वारा संस्पर्शित करें फिर नीचे लिखे मंत्रों को श्रद्धापूर्वक पढ़ते हुए पूजन सामग्री विग्रह पर अर्पित करते जायें अंत में क्षमा प्रार्थना एवं आरती अवश्य कर लें।

गणेश ध्यानम्

ॐ सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजगणकः। 
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥ 
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । 
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छुणुयादपि ॥ 
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । 
संग्रामे संकटश्चैव विघ्न तस्य न जायते ॥ 
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । 
प्रसन्न वदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ 
ध्यानोपरांत हाथ के अक्षत, पुष्प तथा जल को पूजा चौकी पर श्रीगणेश जी के निमित्त अर्पित करें। तदुपरांत पुन: हाथ में अक्षत लेकर निम्नवत स्वस्तिवाचन करें।

स्वस्ति वाचन

ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा स्वस्तिनः पूषा : विश्वेदाः स्वस्तिनस्तार्क्ष्यो अरिष्ट नेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु ॥
ॐ पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः पय स्वतिः प्रदिशः सन्तु मह्यम् ॥
ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्वेस्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोध्रुवोसि वैष्णवमसि विष्णवेत्ता ॥
ॐ अग्निर्देवता वातो देवता सूर्यो देवता चन्द्रो देवता वसवो देवता रुद्रो देवताऽदित्यो देवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिर्देवतेन्द्रो देवता वरुणो देवता ॥
ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष शान्तिः पृथ्वी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्ति वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्बह्म शान्ति: सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्ति सामाशान्ति रेधि ॥
ॐ विश्वानि देव सवितर्दुरितानि परासुव यद्भदं तन्न आसुव ।।            
                 ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिर्भवतु ॥
पवित्रीकरणम्

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । 
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ 
उक्त मंत्र का उच्चारण करते हुए अपने शरीर पर तीन बार जल छिड़कें तथा आचमन कर धोए ।

रक्षा-विधान

ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमि संस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते नश्यन्तु शिवाज्ञया ॥
भूत-शुद्धि के उपरांत दाएं हाथ में जल, अक्षत तथा यज्ञोपवीत लेकर निम्नलिखित संकल्प मंत्र का उच्चारण करें।

संकल्प

हरिः ॐ तत्सत् । नमः परमात्मने श्रीपुराण पुरुषोत्तमाय श्रीमद्भगवते महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्याद्य ब्रह्मणो द्वितीय प्रहरार्द्धे श्री श्वेतवाराहकल्पे जंबूद्वीपे भरतखंडे भारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गते देशैक पुण्यक्षेत्रे षष्ठि संवत्सराणां मध्ये अमुकं नाम्नि संवत्सरे, अमुक अयने, अमुक ऋतौ, अमुक मासे, अमुक पक्षे, अमुक तिथौ, अमुक नक्षत्रे, अमुक योगे, अमुक वासरे, अमुक राशिस्थे सूर्ये, चन्द्रे, भौमे, बुधे, गुरौ, शुक्रे, शनौ, राहौ, केतौ एवं गुण विशिष्टायां तिथौ अमुक गोत्रोत्पन्न, अमुक नाम्नि ( शर्मा वर्मा इत्यादि ) ऽहं धर्मार्थ काम मोक्षहेतवे श्री सरस्वती पूजनमहं करिष्ये ।
अमुक के स्थान वार माह, दिन, तिथि आदि का नाम लें।

सरस्वती ध्यानम्
अब दोनों हाथें में पुष्प अक्षत आदि लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती सरस्वती का ध्यान करें

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृत्ता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना। 
या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः ।

आवाहनम्

ध्यान के पश्चात् हाथ में पुष्प लेकर भगवती का निम्र मंत्रोच्चार के साथ आवाहन करें और पुष्पों को आसन के निकट छोड़ दें।

सर्वलोकस्य जननी वीणा पुस्तक धारिणी । 
सर्वदेवमयीमीशा देव्यांमावाहयाम्यह्यं ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि ।

आसनम्

दोनों हाथों में श्वेत कमल पुष्प लेकर अंजली बनाकर निम्म्र मंत्रोच्चार करते हुए भगवती को आसन दें

तप्तकाञ्चनवर्णाभं मुक्तामणि विराजितम् । 
अमलं कमलं दिव्यमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । आसनम् समर्पयामि।

पाद्यम्

आचमनी में जल लेकर तीन बार भगवती के चरणों में पाद्य अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

सर्वतीर्थ समुद्भूतं पाद्यं गन्धादिभिर्युतम् । 
मयादत्तं गृहाणेदं भगवती भक्त वत्सले ॥ 
ॐ बीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । पादयोः पाद्यं समर्पयामि।

(क्रमशः)
@Sanatan

सरस्वती पूजन (२)

अर्ध्यम्
आचमनी में जल लेकर भगवती को अर्ध्य अर्पित करें निम्नानुसार मंत्रोच्चारण करें

अष्टगंध समायुक्तं स्वर्णपात्र प्रपूरितम् । 
अर्घ्यं गृहाणामद्दत्तं सरस्वत्यै नमोऽस्तुते ।
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि।

आचमनम्

आचमनी में जल लेकर तीन बार भगवती के आचमन हेतु निम्न मंत्रोच्चार के साथ अर्पित करें-

सर्वलोकस्य या शक्तिर्ब्रह्मा विष्णु शिवादिभिः स्तुता ददाम्याचमनं सरस्वत्यै मनोहरम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । आचमनीयं जलं समर्पयामि।

स्नाम्

चन्दन, केसर इत्यादि से सुगंधित जल ताम्र पत्र में लेकर भगवती को स्नान करायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

पंचामृत समायुक्तं जाह्नवी सलिलं शुभम् । 
गृहाण विश्व जननी स्नानार्थं भक्तवत्सले ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । स्नानं समर्पयामि ।

वस्त्रम्

क्रमश: निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवती को वस्त्र व उपवस्त्र अर्पित करें

दिव्याम्बरं नूतनं हि क्षौमंत्वति मनोहरम् । 
दीयमानं मयोदेवि गृहाण जगदिम्बके । 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । वस्त्रं समर्पयामि ।

मधुपर्कम

दही व शहद आदि का मिश्रण पात्र में लेकर निम्र मंत्रोच्चार के साथ भगवती को मधुपर्क अर्पित करें-

कपिलं दधि कुन्देन्दु धवलं मधु संयुतम् । 
स्वर्ण पात्र स्थितं देवि मधुपर्क गृहाण मे ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । मधुपर्कं समर्पयामि ।
आभूषणम्

अपनी सामर्थ्य के अनुसार नाना प्रकार के आभूषण भगवती को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें

रत्नकङ्कणवैदूर्य मुक्ताहारादिकानि च। सुप्रसन्ने नमनसा दत्तानि स्वीकुरुष्व मे ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । नानाविधानि कुण्डलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि।

श्वेतचन्दनम्

कर्पूर आदि से संयुक्त श्वेत चंदन निम्न मंत्रोच्चार के साथ भगवती को अर्पित करें

श्री खण्डागरु कर्पूर मृमनाभि समन्वितम् । 
विलेपनं गृहाणत्वं नमोऽस्तु भक्तवत्सले ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । श्वेतचन्दनं समर्पयामि।

रक्त चन्दनम्

उपरोक्तानुसार निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती को रक्त चंदन अर्पित करें

रक्तचन्दन सम्मिश्रं पारिजात समुद् भवम् । 
मयादत्तं गृहाणाशु चन्दनं गन्ध संयुतम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः रक्तचन्दनं समर्पयामि।

सिन्दूरम्

निम्र मंत्र का उच्चारण करते हुए सिंदूर से भगवती का तिलक करें

सिन्दूरं रक्तवर्णं च सिन्दूर तिलकं प्रिये । 
भक्त्यादत्तं मयादेवि सिन्दूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः सिन्दूरं समर्पयामि।

कुंकुमम्

तत्पश्चात् निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए कुंकुम निवेदित करें

कुंकुमं कामदं दिव्यं कुंकुम कामरूपिणम् । 
अखण्ड काम सौभाग्यं कुंकुमं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः। कुङ्कुम समर्पयामि।

सुगन्धित इत्र

अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए केवड़ा आदि विभिन्न सुगंधित द्रव्यों से सुवासित तेल (इत्र) भगवती को अर्पित करें

तैलानि च सुगंधीनि द्रव्याणि विविधानि च । 
मयादत्तानि लेपार्थं गृहाण परमेश्वरी ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः सुगन्धित तैलं पुष्पसारं च समर्पयामि ।

अक्षतम्

हाथ में अक्षत (चॉवल) लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती को अर्पित करें

अक्षतान्निर्मलां शुद्धाम् मुक्तामणि समन्विताम् । 
गृहाण त्वं महादेवि देहि मे निर्मलां धियम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः अक्षतान् समर्पयामि।

पुष्पम्

अब दोनों हाथों में नाना प्रकार के सुगन्धित पुष्प लेकर निम्म्र मंत्रोच्चार के साथ भगवती को अर्पित करें

मन्दार पारिजाताद्यं पाटलं केतकीं तथा । 
मेरुवामोगरं चैव गृहणाशु मनोऽस्तु ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः पुष्पं समर्पयामि ।

पुष्पमालायाम्

अब कमल, गुलाब आदि विविध पुष्पों से निर्मित माला भगवती को अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

पद्मशंख जपापुष्पैः शतपत्रैर्विचित्रताम् । 
पुष्पमालां प्रयच्छामि गृहणत्वं सुरेश्वरि ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः पुष्पमालां च समर्पयामि ।

दूर्वा

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए दूर्वा (दूब) भगवती को अर्पित करें

दुर्वा विष्ण्वादि सर्वदेवानां प्रियां सर्व सुशोभनाम्। 
क्षीरसागर सम्भूतां दूर्वा स्वीकुरु सर्वदा ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः । दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि।

अबीर- -गुलालं

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए भगवती को गुलाल अर्पित करें

अबीरं च गुलालं च चोबा चन्दनमेव च । 
अबीरेणार्चिता देवी ह्यतः शान्ति प्रयच्छ च ॥ 

धूपम्

निम्न मंत्रोच्चार के साथ धूप निवेदित करें

वनस्पति रसोद्भूतो गंधाढ्यः गन्ध उत्तमः । 
आनेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम ।। 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः धूपमाघ्रापयामि ।

दीपकम्

शुद्ध घी का दीपक जलाकर भगवती को दिखाएँ निम्न मंत्र का उच्चारण करें

कर्पूरवर्त्ति संयुक्तं घृत युक्तं मनोहरम् । 
तमोनाशकरं दीपं गृहाण परमेश्वरी ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः दीपं दर्शयामि ।

नैवेद्यम्

नाना प्रकार के मिष्ठान मेवा आदि भगवती को नैवेद्य के रूप में अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

नैवेद्यं गृह्यतां देवि भक्ष्य भोज्य समन्वितम् । 
षड्रसैरन्वितं दिव्यं सरस्वत्यैः नमोऽस्तुते ॥ ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः नैवेद्यं निवेदयामि ।

ऋतुफलम्

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए विविध मौसमी फल भगवती को अर्पित करें.

फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । 
तस्मात् फल प्रदानेन पूर्णाः सन्तु मनोरथा ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः अखण्डऋतुफलं समर्पयामि।

आचमनीयम्

फल अर्पित करने के पश्चात् आचमन के लिए जल अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

शीतलं निर्मलं तोयं कर्पूरेण सुवासितं । 
आचम्यतामिदं देवि प्रसीद त्वं सुरेश्वरि ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः आचमनीयं जलं च समर्पयामि।

ताम्बूलम्

लौंग, कर्पूर सुपारी आदि से युक्त पान भगवती को अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

एलालवंग कर्पूर नागपत्रादिभिर्युतम् । 
पूंगीफलेन संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः मुखवासार्थे ताम्बूलं समर्पयामि।

दक्षिणाम्

अपनी सामर्थ्य के अनुसार भगवती को द्रव्य दक्षिणा अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमबीजं विभावसौः । 
अनन्तपुण्य फलदमतः शान्ति प्रयच्छ मे ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः दक्षिणां समर्पयामि।

नीराजनम्

थाली में थोड़े से चॉवल लेकर उसमें कपूर प्रज्वलित कर भगवती को निवेदित करें

चक्षुदं सर्वलोकानां तिमिरस्य निवारणम्। 
आर्तिक्यं कल्पितं भक्त्या गृहाण परमेश्वरी ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः नीराजनं समर्पयामि।

प्रदक्षिणा

अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए खड़े होकर । दाहिनी ओर से बायीं ओर घूमें (प्रदक्षिणा करें।)

यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्या समानि च । 
तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिणां पदे पदे ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नम: प्रदक्षिणां समर्पयामि ।
नमस्कारम्

दोनों हाथ जोड़कर भक्तिपूर्वक भगवती को प्रणाम करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । 
यत्पूजितं मयादेवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः नमस्कारान् समर्पयामि ।

पुष्पांजलिम्

दोनों हाथों की अंजुली बनाकर नाना प्रकार के पुष्प भगवती को अर्पित करें

केतकी जाति कुसुमैर्मल्लिका मालती भवैः । पुष्पांजलिर्मयादत्त तावत्प्राप्यै नमोऽस्तुते ॥ 
ॐ वीणापुस्तकधारिण्यै श्रीसरस्वत्यै नमः पुष्पांजलं समर्पयामि।

प्रार्थनाम्

तत्पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर भगवती से प्रार्थना करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें और भगवती के सम्मुख अपना माथा टेककर प्रणाम करें। पूजन के अगले दिन यंत्र और प्रतिमा को छोड़कर शेष पूजन सामग्री किसी नदी सरोवर में विसर्जित कर दें।

सुरा सुरेन्द्रदिकिरीट मौत्तिकैर्युतं सदायस्तव पादपङ्कजम् । परावर परतु वरं सुमंगलं नमामि भक्त्या तव काम्य सिद्धये ॥
                           शिव शासनत: शिव शासनत:

ह्रीं कार कल्प ।।

सवर्णा पार्श्व लय मध्य सिद्धि मधिश्वरं भास्वर रूप भासम।  
खन्डेन्दु बिन्दु स्फदु नाद शोभं त्वां शक्ति बीजं प्रमना प्रणौमि ॥
         तीनों भुवनों का निर्माण कार्य शुरु हुआ एवं अंतरिक्ष में सूर्य इत्यादि प्रतिष्ठित हुए प्रारम्भिक अवस्था में यह सारी प्रक्रियाएं षोडशी के अधीन थीं। जब तीनों भुवन बनकर तैयार हो गये तब षोडशी ही भुवनेश्वरी के रूप में तीनों लोकों में राज करने लगीं एवं यही राज राजेश्वरी कहलाने लगीं। शक्तियाँ पहले भी थीं, महाकाली का अस्तित्व सूर्य से पहले महा तिमिर रूप में था फिर वही षोडशी के रूप में भुवनों के निर्माण कार्य में सहायक हुईं, वही भुवनेश्वरी बनकर, राज राजेश्वरी बनकर, ब्रह्माण्ड नायिका बनकर तीनों लोकों की संचालिका बन गईं। 

          यदि भुवनों का निर्माण न होता तो शक्ति उन्मुक्त विचरण करती किन्तु त्रिभुवन के आते ही शक्ति विभिन्न स्वरूपों में आकर तीनों लोकों के कल्याण में जुट गईं। शक्ति के तीन प्रचण्ड और प्रलयंकारी रूप हैं जबकि भुवनेश्वरी के रूप में यह विनम्र और जीवन दायिनी बन गईं। इस समस्त ब्रह्माण्ड में चौरासी लाख योनियों में जो भी जीव उत्पन्न होते हैं, उनका भरण-पोषण, पालन-पोषण का कार्य भुवनेश्वरी करती हैं और सबकी भूख का शमन भी भुवनेश्वरी ही करती हैं। सृष्टि के प्रारम्भ में केवल जल ही जल था तब सूर्य का ताप ग्रहण कर भुवनेश्वरी ने अपना विस्तार किया तभी इस धरा पर जीवन और वनस्पति का प्रादुर्भाव सम्भव हो सका। भुवनेश्वरी को वरदा, गोपाल सुन्दरी एवं स्मेरमुखी भी कहा जाता है। वरदा का अर्थ है, सबको आशय देने वाली जबकि स्मेर मुखी सब पर करुणा और दया बरसाती हैं, उनके होंठो पर हमेशा मुस्कुराहट रहती है इसलिए इन्हें स्मेर मुखी कहते हैं। 

      भुवनेश्वरी के दोनों हाथों में अंकुश और पाश हैं। अंकुश का अर्थ है नियंत्रण करना, अंकुश इस बात का सूचक है कि उनकी मर्जी के बिना तीनों लोकों में पत्ता भी नहीं हिल सकता। उनके दूसरे हाथ में पाश है यह दुष्टों को दण्ड देने के लिए है। तीसरा हाथ ज्ञान मुद्रा दर्शा रहा है यही महासरस्वती हैं, यही ब्रह्माण्डीय ज्ञान प्रदान करती हैं, तत्व ज्ञान इनकी कृपा से ही प्राप्त होता है इसलिए इन्हें श्री तत्व विद्या भी कहते हैं, इन्हें पराम्बा भी कहते हैं ब्रह्माण्ड का कोई भी ज्ञान इनकी कृपा से ही प्राप्त होता है।

          चौथा हाथ अभय मुद्रा में स्थित है इन्हें यज्ञ नायिका भी कहते हैं, जब सूर्य उत्पत्ति काल में सोम आहुतियों के द्वारा यज्ञ सम्पन्न हुआ तथा तीनों लोकों का निर्माण हुआ तब यही शक्ति षोडशी के रूप में थीं, महात्रिपुर सुन्दरी के रूप में और बाद में भी यही शक्ति राज राजेश्वरी कहलाने लगीं। यह ह्रीं स्वरूपा हैं। यह करोड़ों सूर्य के समान परम प्रकाश वाली कोटी चन्द्र के समान सुशीतल एवं मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्र तक कुण्डली रूप में व्याप्त हैं, इनका मंत्र ह्रीं है एवं यह करोड़ों अरबों परमाणु बमों से भी ज्यादा महाशक्तिशाली है। भुवनेश्वरी मणिद्वीप की अधिष्ठात्री देवी हैं, हृल्लेखा, ह्रीं मंत्र स्वरूपा, सृष्टि क्रम में महालक्ष्मी स्वरूपा हैं। आदि शक्ति भगवती भुवनेश्वरी शिव के समस्त लीला विलास की साथी हैं, निखिल प्रपंचों के कारण सभी जीवों का पालन पोषण करने वाली जगदम्बा भुवनेश्वरी की अरुण कांति सौम्य है।

         उनकी अंग कांति अरुण (लाल) है ये अत्यंत सौम्य हैं, स्मेर मुखी हैं। मैं अपनी भाषा में उनके रूप, सौन्दर्य का क्या वर्णन करूं? स्वयं आदि गुरु शंकराचार्य जी ने अपनी भाषा में उनके रूप सौन्दर्य का वर्णन किया है। शंकराचार्य जी ने सौन्दर्य लहरी जैसे महाकाव्य की रचना की है, जिसमें सिर्फ उनके रूप सौन्दर्य का ही वर्णन है। जो लोग सोचते हैं कि सिर्फ संस्कृत ही देव वाणी है तो फिर बुद्ध और महावीर ने तो कभी संस्कृत में बोले और न लिखे, वे तो सिर्फ उस समय की लोक भाषा "पाली" में संवाद करते थे, अगर हम सोचे कि सिर्फ अरबी ही देव भाषा है तो फिर अरबी ग्रंथों के अलावा और कोई ग्रंथ मान्य ही नहीं रह जायेंगे, अगर हम अंग्रेजी को देव भाषा कहेंगे तो फिर बाईबिल के अलावा अन्य ग्रंथ मान्य ही नहीं रह जायेंगे। ह्रीं साधना किसी भाषा, देश, योनि एवं लिंग से परे है। 

कुण्डली स्वरूप ह्रीं के ध्यान का स्वरूप
आधार कन्दोद्गत तन्तु सूक्ष्म लक्ष्यद्भवं ब्रह्म सरोज वासम् । 
योध्यायति त्वां स्व बिन्दु बिम्बा मृतं स च स्यात् कवि सर्व भौमः ॥ 
फल श्रुति षड् दर्शनि स्व स्व मतावलैपैः, स्वे दैवते त ( त्व) न्मय बीज मेव।
 व्यात्वा तदाराधन वैभवेन, भवेद जेयः परिवारि वृन्दैः ॥ 
किं मन्त्रयन्त्रैविविधागमोक्तैःदुःसाध्यसं शीतिफला ल्पतगभै। सुसेव्यःवः(सद्यसुसेव्य )फलचिन्तितार्थाधिकप्रदश्चसिचेत्वमेकः॥ 
चौरारि मारि ग्रह रोग लूता भूतादि दोषा नल बन्ध नोत्थाः। 
भियः प्रभावात् तव दूर मेव, नश्यन्ति पारीन्द्ररवारि वेभा ॥ 
प्राप्नोत्यपुत्रः सुतमर्थहीनः श्री दायते पतिरपीतवीह। 
दुःखी सुखी चाऽथ भवेन्न किं किं, त (त्त ) द्रुपचिन्ता मणिचिंतनेन॥ 
पुष्पादि जापामृतहोम पूजा, क्रिया धिकारः सकलोऽस्तुदूरे । य केवल ध्यायति बीज मेव सौभाग्य लक्ष्मी वृर्णुत स्वयंतम् ॥ 
त्वतोऽपि लोकः सुकृतार्थ काम मोक्षान पुमर्थाश्चतुरो लभन्ते । 
यास्यन्ति याता अथ यान्तिये ते श्रेय परं त्वमहिमा लवः सः ॥ 
विधामयः प्राक प्रणवं नमाऽन्ते मध्येक (च) बीजननु जग्नपोति । 
तस्यैक वर्णा वितन्योतया बंध्या, कामार्जुनी कामित केव विद्या ॥ 
मालामिमा स्तुतिमयीं सुगुणां त्रिलोकी । 
बीजस्य यः स्वहृदये निधयेत् क्रमात् सः ॥ 
अङ्केऽष्ट सिद्धिर वशा लुठतीह तस्य नित्यं महोत्सव पदं लभते क्रमात् सः ॥

जो मनुष्य त्रैलोक्य बीज रूपा, अच्छे गुण वाली स्तुति रूपी माला को तीनों काल अपने हृदय में धारण करता है उसकी गोद में आठों सिद्धियाँ अवश्य पुत्र बनकर नित्य ही आती हैं और अंत में मोक्ष पद की प्राप्ति कराती है।

       जो राजराजेश्वरी मणिद्वीप के शिखर पर बैठी हैं और जिसका शासन तीनों लोकों में चलता है तुम्हारी पृथ्वी तो उसका बहुत छोटा टुकड़ा है। अंदर का ह्रीं तत्व जब जागृत हो जाता है, प्रकाशवान होता है तो हर जगह वही नजर आती हैं। सौन्दर्य की एक झलक जिसने एक बार देख ली वह सारे जीवन के लिए ब्रह्मचारी हो जायेगा, जिसने रूप का इतना जलवा देख लिया फिर आगे कुछ बचता ही नहीं। शंकराचार्य जी ने अपने महाकाव्य सौन्दर्य लहरी में जो वर्णन किया है तुम्हारे रूप का जो कि बाल ब्रह्मचारी थे, इतना दिव्य सौन्दर्य, इतना दिव्य स्वरूप वही देख पाए। विश्व के अधिष्ठाता त्र्यम्बक सदाशिव हैं और उनकी शक्ति भुवनेश्वरी हैं। इनके माथे पर चंद्रमा है यह अमृत से विश्व का पोषण करती हैं इसलिए भगवती ने अपनी क्रीट में चंद्रमा धारण कर रखा है। उदय होते सूर्य की कांति मृदु रस (स्मेर मुखी) शासन शक्ति की सूचक है। 

         राज राजेश्वरी अपने हाथों में अंकुश पाश धारण किए हुए है। वह ह्रींकार स्वरूपा हैं, ह्रीं उनका बीज मंत्र है पर इसकी विराटता वो ही अनुभव कर सकता है जिसकी सोच विराट हो । समस्त ब्रह्माण्ड की शक्ति इसमें समाई हुई है सबके ऊपर उनकी कृपा दृष्टि है। चौरासी लाख योनियों में जितने भी जीव जन्तु है, समस्त देव-मुनि, यक्ष, गंधर्व, भूलोक भुवः स्वाह: लोक सभी लोकों को वह तृप्त करती हैं, सभी का भरण पोषण करती है अभय प्रदान करती है उनकी शक्ति असीम है। यह सारी पृथ्वी एक है आज सबसे बड़ी समस्या यह है कि धर्म को राजनीति से बांधा गया है। अध्यात्म में विराटता चाहिए उसमें बहुत विराट सोच चाहिए। क्या देश ? क्या विदेश ? हिन्दु, मुस्लिम इत्यादि मौलिक रूप से राजनीति, कूटनीति, हिंसा, वैमनस्य इन सबको परिलक्षित करते हैं धर्म को नहीं। इस बँटवारे के कारण हमारी पृथ्वी स्वर्ग नहीं बन पाई, पृथ्वी नर्क बनकर रह गई है। हम भारत में पैदा हो गये तो हम सोचते हैं कि सिर्फ भारतीय लोग ही धार्मिक हैं, लाहौर कल तक भारत का हिस्सा था अब नहीं है। ढाका भी कल तक भारत में था अब भारत में नहीं है। जब हम भारत शब्द का उपयोग करते हैं तो कराची, ढाका, लाहौर इसमें आते थे अब नहीं आते हैं। 

       कभी अफगानिस्तान भी भारत का हिस्सा हुआ करता था, अफगानिस्तान में कई प्राचीन बौद्ध प्रतिमाएं मिली हैं। वर्मा भी भारत का हिस्सा था अब नहीं है और अभी अभी पाकिस्तान बना वो भी अब भारत का हिस्सा न रहा। अगर ह्रीं को समझना चाहते हो, भुवनेश्वरी को समझना है तो तुम्हें ब्रह्माण्डीय बनना पड़ेगा, वह ब्रह्माण्डीय शक्ति है इसलिए अध्यात्म को राजनीति से न बांधो नहीं तो राज राजेश्वरी की कृपा नहीं मिलेगी, धर्म की राजनीति से शादी मत करो। राजनीतिज्ञों का धर्म छलावा होता है। राज राजेश्वरी का तात्पर्य है सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को राज कहते हैं, जहाँ रहस्य है उसे राज कहते हैं और इस राज को जानने के लिए जिसकी साधना की जाती है उसे राजेश्वरी कहते हैं।

 राज राजेश्वरी त्वां पूर्णतां पूर्णता वदः सः योगः। 
एवते मुच्यते भोगः प्रथ्वियो नात्र संशय ॥
राज राजेश्वरी साधना करने से शरीर हल्का हो जाता है। शरीर उन सारे तत्वों से मुक्त हो जाता है जिन्हें आप मुक्त करना चाहते हैं। आप चाहे तो पृथ्वी तत्व अलग करके शरीर को बहुत हल्का बना सकते हैं इसे वायु गमन भी कहते हैं इसके विषय में फिर कभी विस्तृत चर्चा करेंगे। आप चाहे तो पृथ्वी तत्व रखकर अन्य तत्वों को निकाल दें तो शरीर बहुत भारी हो जाएगा जैसा कि हनुमान ने किया भीमकाय शरीर बनाकर। राज राजेश्वरी साधना के माध्यम से ही हनुमान ब्रह्माण्ड में कहीं भी आ जा सकें कभी शरीर को मच्छर के समान बनाकर तो कभी भीमकाय बनाकर।

         इस पंचतत्व के शरीर से अगर दो तत्व कम कर दिए जाये तो सिर्फ अग्नि, वायु और आकाश बचेगा जो कि अपने आप में बहुत हल्के और सूक्ष्म हैं अगर हमारा 100 किलों में से 99.9 किलो वजन कम हो जाये तो जो हमारे शरीर में बचता है वह अंगुष्ठ के आकार का हो सकता है। शरीर को अंगूठे के आकार का बनाकर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण कर सकें इसे हम राजराजेश्वरी साधना या महासरस्वती साधना कह सकते हैं। महासरस्वती का अर्थ है अपने सम्पूर्ण शरीर की रचना को समझना और उसे अपने अनुरूप ढाल लेना। अपने शारीरिक और मानसिक प्राण तत्व के द्वारा इसलिए इन्हें सिद्धौध गुरु रूपिणि, दिव्यौध गुरु रूपिणि और मानवौद्य गुरु रूपिणि भी कहते हैं क्योंकि बिना ज्ञान के गुरुत्व नहीं आ सकता। 


       जिनकी सोच तुच्छ है विराट नहीं है वो सिर्फ धर्म का आवरण ओढ़ सकते हैं एवं बिना ब्रह्माण्डीय हुए अध्यात्म की बात करना हास्यपद है। ऐसे लोग बड़े संकुचित, बड़े संकीर्ण, तर्कवादी होते हैं। मनुष्य त्रिमूर्ति है उसमें विज्ञान है, हैं काव्य है, धर्म है। धर्म इस पृथ्वी पर अपूर्व निर्माण कर सकता है धर्म में सृजन की बड़ी क्षमता है क्योंकि धर्म ही तुम्हारा स्वभाव है। धर्म कोई व्यक्ति नहीं है। मस्जिद, गिरजा, गुरुद्वारे अब तो यह अड्डे बन गये हैं जहर फैलाने के। यह जबर्दस्ती मिथ्था प्रचार-प्रसार करते हैं, लोगों को आपस में लड़वाते हैं, इनसे धर्म को बचाना जरुरी है। जो भेद करते हैं वह ब्रह्माण्डीय नहीं हो सकते। 

       राजराजेश्वरी की दृष्टि एक राजा के ऊपर भी है तो एक छोटे से कीट, जीव-जन्तु पर भी है, कहीं से भी आँख बंद नहीं की है सभी पर उन्होंने अपनी कृपा दृष्टि बरसायी है। ब्रह्माण्डीय साधना का मतलब है हम अपने शरीर को जैसा भी रूप धरना चाहें वैसा बना लें। विशुद्धानंद जी गेंदे के फूल को का रूप दे देते थे। कुछ आणविक रचनाएं परिवर्तित गुलाब के फूल करके ह्रीं समस्त ब्रह्माण्ड से तुम्हारा सम्बन्ध जोड़ती है। बहुत से लोगों ने सिर के बल खड़े हो जाना या पद्मासन लगाकर बैठ जाना इत्यादि को योग समझ लिया है। योग का तात्पर्य है एक बूंद ही पूरा समुद्र बन जाए, यह शरीर ब्रह्माण्ड बन जाए और यदि शरीर ब्रह्माण्ड नहीं बन पाता तो जीवन व्यर्थ है।
                           शिव शासनत: शिव शासनत:

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं भुवनेश्वर्यै नमः ।।

          गुरुजी एक कहावत कहा करते थे कि अगर गीदड़ों की फौज हो और सेनापति सिंह हो तो फौज जीत जायेगी परन्तु अगर सिंहों की फौज हो एवं सेनापति गीदड़ हो तो फौज का हारना निश्चित है। राज राजेश्वरी विज्ञान अधिनायक वाद पर आधारित है अर्थात (One man show)। लोगों का समूह कभी भी नेतृत्व की नैसर्गिक क्षमता प्रदान नहीं कर पाया। सबसे बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह चाहे किसी भी विभाग से सम्बन्धित संस्था क्यों न हो, देश क्यों न हो, विश्व क्यों न हो इत्यादि उन सबके सामने एक व्यक्ति आधारित नेतृत्व की क्षमता ही सबसे बड़ा प्रश्नवाचक चिन्ह है। इसी को लेकर समस्त विश्व एवं समस्त ब्रह्माण्ड में समय-समय पर अनुसंधान होते रहते हैं।

         वंशवाद की परम्परा बिखर गई, राजवंश टूट गये या शिथिल पड़ गये क्योंकि उनमें नै: सर्गिक नेतृत्व की क्षमता का अभाव हो गया। आप इसे यूं समझिए कि जीवन सूत्र या अनुवांशिकी संरचना के अंदर अति सूक्ष्मतम् नेतृत्व सम्बन्धित ऊर्जा के गोपनीय प्रवाह की कई पीढ़ियों तक स्थिर बनाये रखने के लिए परम गोपनीय संसाधनों की जरूरत पड़ेगी क्योंकि वंशवाद भी मिश्रण से ही उत्पन्न होता है अतः वह गोपनीय प्रयास क्या है? जिसके द्वारा एक विशेष वंश में नेतृत्व की क्षमता कई पीढ़ियों तक सुस्थिर रखी जा सकती है। यहाँ पर आकर आपको माँ भुवनेश्वरी के चरण पकड़ने पड़ेंगे। साथ ही साथ अगर वंश परम्परा में नेतृत्व प्रदान करने का गुण विद्यमान है तो उसे उभारने के लिए पुनः क्रियाशील करने के लिए भी माँ भुवनेश्वरी का सहारा लेना पड़ेगा एवं भुवनेश्वरी रहस्यम् को समझना पड़ेगा। 

       इसके अभाव में आज तक जितने भी प्रयत्न किए गये सब विफल हो गये। समस्त विश्व ने प्रजा- तंत्र अपनाया उन्हें उम्मीद थी कि शायद प्रजातंत्र उन्हें नैसर्गिक नेतृत्व की क्षमता करने वालों को प्रदान कर देगा। तंत्र की बुराई होती है तो फिर प्रजातंत्र की भी बुराई करो क्योंकि उसमें भी तंत्र शब्द जुड़ा हुआ है। विश्व के किसी भी कोने में प्रजातंत्र नैसर्गिक नेतृत्व प्रदान करने की क्षमता में घोर असफल सिद्ध हुआ है। स्वयं के देश को देख लीजिए पिछले पचास वर्षों में आपके तथाकथित प्रजातंत्र ने कितना नैसर्गिक नेतृत्व प्रदान किया है फिर कम्युनिष्ट आये, बेसिर पैर की बात करते हैं। ये तो भुवनेश्वरी के बिल्कुल खिलाफ चलते हैं। सब बराबर, सब एक जैसे जैसी बेवकूफी पूर्ण नारे देते हैं। हड़ताल, सत्याग्रह आतंक, रक्तरंजित क्रांति, हिंसा और इन सबसे बढ़कर नैसर्गिक नेतृत्व की प्रणाली का ही दमन यही इन्होंने सौ वर्षों में किया। आज इनके हाल क्या हैं? जहाँ से शुरु हुए थे जहाँ इन्होंने नये-नये भगवान बनाये थे उसी रूस एवं मध्य एशिया के सभी देशों में लोगों ने इन्हें उखाड़कर नाली में फेंक दिया, इनका अनुसंधान विफल हो गया, लोग इनसे ऊब गये। 

       तानाशाही का मार्ग तो अ मार्ग है। असुर एवं मलेच्छ इसी मार्ग से शासन करते हैं और अंत में सिंहासन से घसीटकर मारे जाते हैं, जितने भी तानाशाह हुए उनका हर्ष यही हुआ। कुछ लोगों ने धर्म का मार्ग चुना शासन करने हेतु पर हुआ उल्टा। शासन तो नहीं कर पाये अपितु उनका धर्म ही समाप्त हो गया। अब आप कहोगे कि आप कहना क्या चाहते हो ? हम कुछ नहीं कहना चाहते हम कोई नया सिद्धांत नहीं बनाना चाहते, हम तो बस माँ भुवनेश्वरी की लीला का बखान आपके सामने करना चाहते हैं। ऋषि नहुष इन्द्रासन पर विराजमान हो गये इन्द्रासन पर बैठते ही, इन्द्र मुकुट धारण करते ही वे पगला गये आज के राजाओं के समान ऊटपटांग निर्णय लेने लगे, भोग वादी हो गये, बेसिर पैर के कानून बनाने लगे और तो और कामुक हो गया ऋषित्व छूटते ही कामत्व उछाल मारने लगा एवं इन्द्राणी के प्रेम पाश में बंध गये। इन्द्राणी को अपनी जीवन संगिनी बनाने हेतु बल प्रयोग पर उतर आये। यह महानाट्य माँ भुवनेश्वरी अपने ब्रह्माण्डीय नाट्य गृह में देख रही थीं, हे माँ भुवनेश्वरी तेरा नाट्य गृह तो ब्रह्माण्ड का परम गोपनीय, परम विकसित अनुसंधान शाला है जहाँ बैठकर आप असंख्य जीवों पर नित नवीन अनुसंधान करती हैं। आपके अनुसंधान का पात्र बने नहुष से जान बचाकर इन्द्राणी देवताओं के गुरु बृहस्पति की शरण में चली गईं और वहीं पर उन्होंने पुनः ह्रींकार साधना प्रारम्भ की। 

     माँ भगवती की कृपा हुई, माँ भुवनेश्वरी बोलीं हे ऋषियों आपसे किसने कहा था सिंहासना-नुसंधान करने के लिए, किसने आपको आज्ञा दी थी नहुष को इन्द्रासन पर बिठाने की, हे बृहस्पति आप तो गुरुओं के भी गुरु हैं, यह सब आपका ही किया हुआ है। खैर जाइये मेरा आशीर्वाद है नहुष का पतन होगा। बृहस्पति पहुँचे नहुष के पास और बोले हे वर्तमान के इन्द्र शचि आपसे विवाह करना चाहती हैं परन्तु एक शर्त है कि आप ऐसे सिंहासन पर विराजमान होकर उनके पास जायें जिस पर कि आज तक कोई न बैठा हो।

भुवनेश्वरी तो पंच प्रेतासन पर विराजमान हैं, शिव तो मुण्डासन पर विराजमान हैं, भैरव तो प्रेतासन पर विराजमान हैं, गणेश तो सभी पर विराजमान हैं, ऐरावत, सिंह, गरुड़, गर्धभ, मत्स्य, भूमि इत्यादि सभी सबका आसन बने हुए हैं अतः आप ऋषि आसन पर विराजमान होइये उस पर आज तक कोई नहीं बैठा है शचि आपके गले में वरमाला डाल देंगी। 

         नहुष की बुद्धि भ्रष्ट हो गई थी उसने अगस्त, दुर्वासा समेत अनेक मुनियों को बुलवा लिया और वे सब नहुष को पालकी में बिठाकर चलने लगे। ऋषि आसन पर विराजमान नहुष ने एक लात अगस्त मुनि को मारी और बोला सर्प-सर्प अर्थात जल्दी-जल्दी चलो फिर उसने चाबुक से दुर्वासा पर प्रहार किया और बोला सर्प- सर्प अर्थात जल्दी-जल्दी चल आखिरकार ऋषियों का सब्र टूट गया वे उसे शाप देते हुए बोले जा अजगर बन जा, सर्प बन जा और देखते ही देखते इन्द्रलोक से नहुष का पात होने लगा वह सर्प बनकर पृथ्वी पर गिर पड़ा कालान्तर इन्द्र पुनः इन्द्रासन पर विराजमान हुए। यह कथा क्यों सुनाई ? सीधी बात है नै: सर्गिक नेतृत्व स्व विकसित होता है, उसका विकास कोई नहीं कर सकता। सिंहासन की महिमा ऐसी है कि वह स्वयं अपना उत्तराधिकारी खोज लेता है। सिंहासन एवं सिंहासना - रूढ़ का चोली दामन का साथ है। इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि सिंहासन भी श्राप देते हैं।

          ह्रींकार मंत्र का जप कर समस्त देवता, देवियाँ, गुरु, सिद्ध इत्यादि शक्तिकृत हो जाते हैं उनमें वर देने की क्षमता का विकास हो जाता है परन्तु उनकी वर देने की क्षमता अल्प कालीन होती है इसी अल्पकाल में वे अपनी वर देने की क्षमता का दुरुपयोग कर अनेकों बार अयोग्य नेतृत्व को सिंहासना - रूढ़ कर देते हैं। वर देने की क्षमता तो प्रजातंत्र में आम मनुष्य को भी हैं आप सब भी अपने वरदान से कुछ वर्षों के लिए किसी न किसी को सिंहासना रूढ़ करते हो और कालान्तर ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र एवं अन्य देवी देवताओं की तरह पाँच वर्षों तक छाती पीट-पीट कर रोते रहते हो । पाँच वर्ष बाद पुनः वर देते हो यह सब अप्राकृतिक है। प्राकृतिक शब्द प्रकृति से बना है और मूल प्रकृति हैं माँ भुवनेश्वरी वे ही जिस पर मुकुट लगा दे वही नैसर्गिक क्षमता से युक्त आपका कल्याणकारी विष्णु ।

      घोर जल प्रलय के पश्चात वट वृक्ष के पत्ते के ऊपर एक हाथ से पाँव पकड़कर उस पाँव का अंगूठा मुँह में चूसते हुए श्री विष्णु जल के ऊपर स्थित थे। चारों तरफ जल ही जल और कुछ नहीं मुख से ह्रीं ह्रीं निकल रहा था। मैं कौन हूँ ? कहाँ से आया हूँ? अरे मुझे बालक किसने बना दिया ? इस वट वृक्ष के पत्ते पर किसने लिटाकर मुझे अथाह जल में छोड़ दिया ? न कोई किनारा, न कोई पतवार, न कोई वृक्ष, न कोई मित्र इत्यादि बस चारों तरफ जल ही जल। किसने मेरी यह दशा की? इसी सोच में श्री विष्णु लगे हुए थे तभी भुवनेश्वरी अपनी सखियों के साथ पधार गईं हाथ में नन्हा सा मुकुट लिए। विष्णु के मस्तक पर मुकुट लगा दिया, उन्हें पालने में झुलाने लगीं। बोली हे विष्णु मैं ही महालक्ष्मी हूँ, मैं ही महामाया हूँ, मैं ही तुम्हारी सखि हूँ, मैं ही तुम्हारी रक्षिका हूँ, मैं ही तुम्हारी माता हूँ, मैं ही तुम्हारी शासिका हूँ, जो कुछ हूँ मैं ही हूँ। 
सर्वं खल्विदमेवाहं नान्यदस्ति सनातनम् ।
ऊपर वर्णित भावार्थ नीचे लिखे आधे श्लोक का है जो कि माँ भगवती ने प्रलयकाल समाप्त होने के पश्चात् श्री विष्णु को दिया। श्री विष्णु की नाभि में स्थित ब्रह्मा ने इसी आधे श्लोक को एक करोड़ श्लोकों में विभाजित कर दिया और इस प्रकार सनातन श्रीमद भुवनेश्वरी की रचना हो गई।

         कालान्तर मार्कण्डेय, व्यास, मुनि दत्तात्रेय, परशुराम इत्यादि ने इन एक करोड़ श्लोकों को लगभग 18000 श्लोकों में संकलित कर दिया और इस प्रकार भुवनेश्वरी रहस्यम्, मुकुट रहस्यम्, सिंहासन रहस्यम् का आविष्कार हुआ। तत्वमसि एक शब्द है जो भुवनेश्वरी ने श्री विष्णु से कहा अर्थात मैं ही एकमात्र तत्व हूँ। चाहे तु इसे परम तत्व कहे, परा तत्व कहे या तेरी जो मर्जी आये वह कहे। इसी तत्व से समय-समय पर अनित्य तत्वों का सृजन होता है जो पुनः समय उपरांत मुझ एकमात्र तत्व में विलीन हो जाते हैं। हे विष्णु आप तो नायक हो माँ भुवनेश्वरी के नाट्यगृह के, एक ऐसे नायक जो कि अपनी निर्देशिका के आदेशों का अक्षरशः पालन करता है यहाँ तक कि आप अपनी निर्देशिका के निर्देशानुसार पशु बन जाते हो,आपका कोई स्वरूप नहीं आप तो सिर्फ निर्देशिका के आज्ञा पालक हो, दास हो इसलिए उन्हें प्रिय हो ।

           वे जो चाहती हैं तुम हूबहु वही करते हो, यही तुम्हारे मायावी होने का रहस्य है। तुमसे बड़ा नट कौन ? तुमसे बड़ा अभिनेता कौन ? पुरुष से स्त्री बन जाते हो अर्थात मोहिनी बन जाते हो, ढाई फिट के बन जाते हो अर्थात वामन बन जाते हो, नग्न हो जाते हो निर्देशिका के आदेशानुसार अर्थात ऋषभ देव बन जाते हो, वो तो तुम्हें भरी युवावस्था मे नग्न भी घुमाती हैं, ऋषभ देव के रूप में। एक बार तुम अपनी निर्देशिका का मुख देकर हँस दिए थे, तुमने हिम्मत कर ली माँ भुवनेश्वरी का मुख देखकर हँसने मुस्कुराने की मर्यादा तोड़ी, वे कुपित हो बोल उठीं जा तेरा सिर कट जाये और जब तुम थककर धनुष के ऊपर टिककर विश्राम कर रहे थे तब ब्रह्मा द्वारा भेजे गये वर्मी ने धनुष की प्रत्यंचा काट दी और तुम्हारा मुकुट युक्त शीश कट कर क्षीर सागर में लहराने लगा, तुम शीश विहीन हो गये । निर्देशिका, ब्रह्माण्ड की निर्देशिका ने तुम्हारे धड़ पर अश्व का शीश जोड़ दिया और तुम ह्यग्रीव बन गये। 

        तुम तो मत्स्य भी बने, तुम तो कूर्म भी यहाँ तक कि निर्देशिका ने तुम्हें शूकर भी बना दिया, क्या नहीं बने तुम, कभी तुम्हें ब्रह्मचारी बना देती हैं तो कभी 16000 स्त्रियों के बीच कृष्ण के रूप में रसिक बना देती हैं। तुम कुछ नहीं हो जो कुछ है निर्देशिका है, तुम तो उनके नाट्य गृह के पात्र हो। वो तो तुम्हें रुला भी देती हैं सीता के विरह में तुम फूट-फूट कर रो रहे थे, वे तो तुम्हारा मुकुट भी छीन लेती हैं, महावीर के रूप में तुम्हारा मुकुट, राजपाट सब छीन लिया, वे कहती हैं मुकुट लगाओ, सिंहासन पर बैठो तो तुम सिंहासन पर बैठते हो अन्यथा सिंहासन पर बैठते-बैठते राम के रूप में वन की खाक छानते हो । सिंहासन तो क्या पैदल युद्ध करते हो, रथ भी नहीं मिलता तुम्हें । कभी तुम्हें हंस बना देती हैं और अपने आनंद वन में तुम्हारे साथ अठखेलियाँ करती हैं, तुम हंसावतार बन उनके चरणें में पड़े प्रसाद को चुगते हो, कहानी अभी खत्म नहीं हुई है हे महानायक आगे-आगे देखो होता है क्या ? क्या-क्या बनोगे तुम, ये तुम जानो और तुम्हारी निर्देशिका ।

            गीता क्या सुनाते हो, सुनी सुनाई बातों को दोहराते हो। गीता की पटकथा को हे माँ भुवनेश्वरी तू बहुत पहले ही सुना चुकी है, तत्वमसि का उपदेश तो तू बहुत पहले ही दे चुकी है। हाँ तेरा नायक तुझसे कला लेने में माहिर हो गये है वह भी विराट रूप दिखला लेते है। बाल मुकुन्दम् बने श्री विष्णु भगवती भुवनेश्वरी के गले में पड़ी वन माला को देख रहे थे वनमाला में लगे कमल के समान वैजन्ती पुष्पों को देख बोले हे माँ ये पुष्प तो बहुत सुन्दर हैं कहाँ से लायी हैं आप। मातेश्वरी बोलीं हे विष्णु, हे बाल मुकुन्दम् मेरी माला में लगा प्रत्येक कमल रूपी पुष्प तेरे प्रत्येक अवतार का प्रतीक है। हर अवतार के पश्चात् मैं तुम्हें अपनी वनमाला में गूंथकर सजा लेती हूँ तत्पश्चात् माँ भुवनेश्वरी ने बाल मुकुन्दम् को गोद में उठा स्तन पान कराया और श्री विष्णु पुनः युद्ध के लिए तनकर खड़े हो गये ।
                            शिव शासनत: शिव शासनत:

कुछ भी असम्भव नहीं है सब कुछ सम्भव है ।।

         कुछ भी असम्भव नहीं है सब कुछ सम्भव है। ब्रह्मज्ञानी इसी वाक्य में जीते हैं और वैज्ञानिक भी इसी वाक्य में जीते हैं। बस इसी महावाक्य को एकमात्र आधार बिन्दु मानकर सरस्वती की आराधना की जाती है तभी हाथ को प्रयोगशाला में उगाया जा सकता है, अंतरिक्ष में पहुँचा जा सकता है, सिद्धि प्राप्त की जा सकती है, बिगड़े कार्य बनाये जा सकते हैं, कुछ भी किया जा सकता है। शिव ने जीव को बुद्धि प्रदान करने की कृपा की है और इसी के सहारे उसे अभय भी प्रदान किया है कि वह जब तक चाहे, जैसे चाहे, जिस प्रकार चाहे अनंत काल तक स्वतंत्रता के साथ जहाँ भी चाहे वहाँ पर जिस रूप में चाहे उस रूप में स्वयं को प्रतिरोपित, विकसित और स्थापित कर सकता है। जीव शिव का प्रिय है। अपने प्रिय को बुद्धि के रूप में शिव ने सर्वश्रेष्ठ शक्ति प्रदान की है। यह शक्ति ही उसे आज असंख्य अवरोधों के पश्चात भी पल्लवित किये हुए हैं। 

        जीवन को विविधता बुद्धि ने ही प्रदान की है। जीव के इतिहास में कितनी भीषण समस्याएं आई हैं, कितने भीषण युद्ध आये हैं, कितनी भीषण महामारियाँ आईं हैं, प्रलय आयें हैं और आते रहेंगे परन्तु जीवन खत्म नहीं हुआ। चुनौतियों का जमकर मुकाबला जीवन ने बुद्धि के माध्यम से ही किया है और करता रहेगा। युग बदल जायेंगे, काल बदल जायेंगे, ग्रह-नक्षत्र- मण्डल नष्ट हो जायेंगे, नया ब्रह्माण्ड उदित हो जायेगा परन्तु जीव बुद्धि के माध्यम से किसी और रूप में, किसी और स्थिति में, कहीं और प्रतिरोपित एवं स्थापित हो जायेगा। बुद्धि का विकास अनंत है, इसमें तुलना नहीं हो सकती। बुद्धि अनंत जीवों के पास हैं यही सबसे बड़ी विशेषता है। एक प्रबुद्ध, प्रज्ञावान और परम चेतना से जागृत जीव अनंत जीवों को प्रकाश देने में सक्षम है। एक व्यक्ति की बुद्धि अनंत लोगों को लाभान्वित करने में सक्षम है अविष्कार एक व्यक्ति करता है अनंत लोग लाभ लेते हैं। कुण्डली जागृत एक व्यक्ति की होगी, अनंत लाभान्वित होंगे। 

       सत्ता पर बैठे एक व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होगी और अनंत काल-कवलित हो जायेंगे एवं भीषण संत्राश झेलेंगे। चेतना मस्तिष्क आधारित नहीं है, वृक्षों में तो मस्तिष्क जैसी संरचना नहीं है फिर भी आप उन्हें मूढ़ नहीं कह सकते। चेतना कोशिका आधारित है, प्रत्येक कोशिका बुद्धि की संरचना से युक्त है, यह वैज्ञानिक सत्य है तभी तो एक कोशिका से पूरा का पूरा शरीर निर्मित किया जा सकता है अर्थात कोशिका के अंदर भी मस्तिष्क है नहीं तो फिर कोशिका से निर्मित शरीर में मस्तिष्क कहाँ से आया? बीज के अंदर जड़ तो नहीं दिखा रही फिर भी जड़ बीज से ही उत्पन्न होगी। रचना के पीछे परम चेतना छिपी हुई है, अदृश्य हाथ शिव के हर जगह मौजूद हैं। दृश्य पंचेन्द्रियों का विषय है, सभी दृश्य पंचेन्द्रियाँ देखने में सक्षम भी नहीं हैं। सरस्वती उपासना एकान्त का विषय है। सरस्वती एकांत प्रदान करती है, सरस्वती अपने साधक को सबसे काटकर अलग बैठा देती है अतः उसके परम प्रिय पुत्रों को देख पाना पंचेन्द्रियों के वश में नहीं है। उपासना के पश्चात् ही पंचेन्द्रियाँ देख पाती हैं। 

          जब अविष्कार हो जाता है तब जनमानस वैज्ञानिक को देख पाता है, जब दिव्य ग्रंथ रच जाता है तब लोग उसे पढ़ पाते हैं इससे पहले तो साधक अदृश्य कर ही दिया जाता है। रामानुज बहुत बड़े गणितज्ञ हुए हैं। 25 वर्ष की उम्र में ही गणित के अनुत्तरित प्रश्नों को हल करके रख दिया था बिना किसी सहारे के बिना किसी अध्यापक के। आदि गुरु शंकराचार्य जी क्षण भर में स्तोत्र रच देते थे। तीस वर्ष की उम्र में सैकड़ों ग्रंथ लिख डाले, अनेकों अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर दे दिये। उन पर साक्षात् सरस्वती की कृपा थी। हंस देव महाराष्ट्र के बहुत बड़े संत हुए हैं कभी भी स्कूल नहीं गये थे परन्तु आठ भाषाओं में एक साथ बोलते थे, विश्व की किसी भी घटना के बारे में बता देने में सक्षम थे और मजे की बात तो यह थी कि कभी पुस्तक भी नहीं पड़ी थी।

       विलक्षणता का कोई छोर नहीं है, विलक्षणता किसी स्कूल या कालेज में प्राप्त नहीं होती। विलक्षणता तो गुरु कृपा या शिव कृपा से ही प्राप्त होती है। साधनायें भारतीय जीवन का महत्वपूर्ण अंग हैं, साधनायें अर्थात सरस्वती सिद्धि । ज्ञान, विज्ञान, साधना यह सब तो सरस्वती के ही उपांग हैं और इन्हीं के माध्यम से जैविक काया में विलक्षणना प्रस्फुरित होती है और इसी विलक्षणता के आगे दुनिया सजदा करती है। विद्या सर्वमान्य है, आपमें अगर भविष्य बताने की विद्या है तो आपके घर के आगे भीड़ लगेगी। आपमें अगर रोग निवारण की क्षमता है तो मरीज आयेंगे ही। उपासक की पदवी प्राप्त करने के लिए एकमात्र जो शक्ति बुद्धि पक्ष में प्रतिष्ठित होनी चाहिए वह है सरस्वती। कालान्तर महासरस्वती का यही रूप आपके जीवन में यश, धन, ऐश्वर्य, सम्मान इत्यादि सब कुछ प्रदान करेगा। बुद्धि दुधारी तलवार है, पतन और उत्थान बुद्धि पर ही निर्भर है। एक गलत निर्णय सम्पूर्ण पतन के लिए काफी है तो वहीं उचित निर्णय उत्थान की ऊँचाइयों पर ले जायेगा। 

        सबसे शापित होना पर गुरु के द्वारा शापित मत होना अन्यथा बुद्धि पक्ष नहीं सुधर सकता। सबने एक स्वर में गुरु को परम ब्रह्म कहा है, शिव ने गुरु को यह पद प्रदान किया है। बुद्धि शापित हो गई तो कुछ नहीं बचता। गुरु ही ज्ञान का प्रतीक है, गुरु सिर्फ ज्ञान देता है, चेतना देता है, ज्ञान और चेतना के अभाव में बुद्धिमय कोष सिर्फ अन्धकार से भर जाता है। जितने भी प्रबुद्ध एवं प्रज्ञाशील मनुष्य हुए हैं उनकी बुद्धि बाल्य सुलभ ही होती है, सयानों को कोई ज्ञान नहीं देता। जो सयाने बनने की कोशिश करते हैं उन्हें उनके सयानेपन पर छोड़ दिया जाता है। ज्ञान का उपयोग केवल आपातकालीन परिस्थितियों में ही करते हैं, मर्यादा में रहते हैं। जो अज्ञानी होते हैं, पाखण्डी होते हैं वे ही प्रदर्शन करते हैं। सिद्धियाँ प्रदर्शन के लिए नहीं हैं ज्ञान प्रदर्शन के लिए नहीं है। विलक्षण ज्ञान हमेशा गोपनीय रखा जाता है। ज्ञान की तो अत्यंत ही परम अवस्थायें हैं, सदैव से रही हैं। 
                           शिव: शासनत शिव शासनत:

ऐं नमः ।।

            ।। ॐ ह्रीं विद्याऽधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ।।

        शक्ति त्रिगुणात्मक है, महाकाली के रूप में व तमोगुण प्रकट करती हैं तो वहीं महालक्ष्मी के रूप में रजोरूप प्रदर्शित होता है और महासरस्वती विशुद्धात्मक तत्वमयी हैं। ये तीनों गुण एक साथ क्रियाशील होते हैं एवं सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति,लय और संहार हेतु इन तीनों का समान महत्व है। समस्त ब्रह्माण्ड त्रिगुणमयी शक्ति से व्याप्त है। ब्रह्माण्ड के प्रत्येक तत्व को इन तीनों स्वरूपों को समझना होगा, अनुसंधानित करना होगा एवं आत्मसात करना होगा तभी वह चेतनामय कहलायेगा। ज्ञान प्रत्येक जीव को परमप्रिय है अतः ज्ञान को गोपनीय बनाये रखने की प्रथा सभी जगह व्याप्त है। 

     एक गुरु अपने शिष्य को सम्पूर्ण ज्ञान बहुत सोच समझकर देता है। गुरु के पास शिष्य आते हैं, अनुनय करते हैं, विनय करते हैं कि हमें विशेष ज्ञान आप दे दीजिए। शिष्य ज्ञान क्यों चाहता है? शिष्य सिद्धि क्यों मांग रहा है? सीधी सी बात है क्या वह इसके योग्य है? कहीं वह गुरु की सहृदयता का लाभ उठाकर रावण तो नहीं बनने जा रहा है। एक बार अगर वह कुछ गूढ़ एवं गोपनीय पराविद्या में दक्ष हो गया तो वह समाज के लिए या अन्यों के लिए आतंक का पर्याय तो नहीं बन जायेगा। इस विषय पर गुरु अत्यंत ही सजग और कठोर होते हैं। शक्ति के मद में, ज्ञान के मद में कहीं शिष्य हाहाकारी न बन जाये अतः साधनाओं में उतनी ही सफलता दी जाती है जितनी कि आवश्यक हो, उतना ही ज्ञान दिया जाता है जिससे कि नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न न हो। 

      एक शिष्य ने गुरु से बड़ा अच्छा प्रश्न किया कि गुरुजी आपके तो असंख्य शिष्य हैं और ये सब आपसे तरह-तरह की साधनायें, दीक्षायें और महाविद्यायें सीखते रहते हैं। इन लोगों ने लाखों करोड़ो मंत्र जप कर लिये हैं, तंत्र-मंत्र, ज्योतिष और अन्य विद्याओं में पारंगतता हासिल कर ली है अगर इनमें से कुछ भ्रष्ट हो गये तो आपके नाम पर बट्टा लगायेंगे । निश्चित ही एक सद्गुरु ज्ञान देने से पहले सारी कुंजी अपने हाथ में रखता है और गुरु ज्ञान देने से पूर्व नष्ट करने या ज्ञान का दुरुपयोग न हो की व्यवस्था कर लेता है। कभी भी प्रथम श्रेणी का ज्ञान या तकनीक किसी को नहीं दी जाती अगर वह छदम तरीके से प्राप्त करने की कोशिश भी करता है तो शिष्य को सम्पूर्णतः कीलित कर दिया जाता है इसके बाद वह ढोंग ही करता है, परिणाम कुछ नहीं आते। 

       सारा का सारा प्राच्य ज्ञान गुरुओं के द्वारा कीलित है, वह केवल योग्य शिष्यों को ही प्राप्त होता है। ज्ञान गोपनीय करके रखा जाता है। ज्ञान की देवी सरस्वती हैं, सरस्वती आराधना के माध्यम से जब ज्ञान प्राप्त किया जाता है तो वह सिर्फ सृजनात्मक कार्यों के लिए ही उपयोग किया जाता है। सृजनात्मक शिष्यों की उत्पत्ति, उनका पालन, उनमें सृजन क्षमता का विकास ही गुरुओं का एकमात्र कार्य है। ज्ञान समयानुकूल होना चाहिए। जब गीता कही गई रामायण लिखी गई या किसी अन्य महामानव ने परम शब्द उच्चारित किये उनका घोर विरोध हुआ क्योंकि उस युग और काल के मनुष्यों में उनके ज्ञान को ग्रहण करने की क्षमता ही नहीं थी। अधिकांशतः ऐसा होता है, यह इस बात को इंगित करता है कि ब्रह्माण्ड में परम संवेदनशील, परम चेतनामयी और परम बुद्धिमान जीवन स्पंदित है।

     कभी-कभी भूले भटके जब कोई विलक्षण महापुरुष उनके ज्ञान को आत्मसात कर लेता है तो वह जो कुछ कहता है उसे इस पृथ्वी का पिछड़ा हुआ मानव बकवास या कपोल कल्पित समझ बैठता है। हमारे देश में पंचदेव पूजन है, ज्ञान आँख, नाक, कान, मुँह के द्वारा ही ग्रहण किया जाता है। पंचदेव पूजन का तात्पर्य है मन, बुद्धि, तर्क, सोच, चिंतन इत्यादि को सदैव स्वस्थ, सजग और क्रियाशील रखना जिससे कि ज्ञान की आवृत्तियाँ सदैव मस्तिष्क को उचित मात्रा में संस्पर्शित करती रहें। ज्ञान ने ही हमें पशुत्व से ऊपर उठाया है आज मानव जितना भी अहिंसक बन पाया है उसके पीछे ज्ञान ही छिपा हुआ है। ज्ञान हमें एक क्षण के लिए सोचने-समझने पर मजबूर कर देता है। ज्ञान चिंतन की तरफ क्रियाशील करता है, पशु अपने कर्म के बारे में चिंतन नहीं करता। उसके कर्म चिंतनविहीन होते हैं अतः चिंतनविहीन, बिना सोचे समझे किये गये कर्म पशुता की निशानी हैं।

     चिंतन ही इन्द्रिय निग्रह कराता है, चिंतन इन्द्रियों पर निग्रह है। शिष्यों का निर्माण चिंतन विहीन निर्माण नहीं है। मनुष्य के पास मुख है, वाणी है, तर्क है, मन और हृदय है अतः ज्ञान इन सबसे संस्पर्शित होते-होते कभी-कभी प्रदूषित भी हो सकता है, कभी-कभी वह तोड़-मरोड़कर भी प्रस्तुत किया जा सकता है। मानवीय ज्ञान की यही विडम्बना है, कलुषित ज्ञान जहर के बराबर है। हिटलर ने कारागृह में एक पुस्तक लिखी थी, वह पुस्तक अत्यंत ही प्रबल, तर्क संगत और मानस पर तीव्र छा जाने वाली थी। उसी पुस्तक को पढ़कर करोड़ों जर्मनवासी विश्व युद्ध कर बैठे। उलट ज्ञान वालों की बुद्धि अत्यंत ही सक्रिय होती है। दुष्ट अत्यंत ही क्रियाशील होते हैं, इन्हीं पर नियंत्रण सरस्वती आराधना के माध्यम से लगाया जाता है। ज्ञान मस्तिष्क की खुराक है, जैसी खुराक होगी वैसा मस्तिष्क निर्मित हो जायेगा। खुराक अगर विषाक्त होगी, कामुक होगी, उत्तेजनात्मक होगी तो उसी प्रकार का मस्तिष्क निर्मित हो जायेगा परन्तु अगर खुराक पुष्टिवर्धक, सात्विक और कल्याणकारी होगी तो उच्चतम मस्तिष्कों का निर्माण होगा।
                           शिव शासनत: शिव शासनत: