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श्री गणेश ।।

 

        लोग कहते हैं भारत विस्तारवादी नहीं है यह अर्ध सत्य है । स्थूल रूप से निश्चित ही भारत विस्तारवादी नहीं है परन्तु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, युग युगान्तरों से भारत सम्पूर्ण रूप से विस्तारवादी है और इसका विस्तार, नायकत्व निर्विघ्न है | युग बीत गये, काल बीत गये, नई-नई शाखाएं प्रशाखाएं उगती गिरती रहती हैं अध्यात्म के क्षेत्र में परन्तु भारत आध्यात्मिक गुरु के पद पर पहले भी विद्यमान था, आज भी विद्यमान है और कल भी विद्यमान रहेगा। विश्व की समस्त शक्तियाँ भारत के अध्यात्म को सदा से नमन करती आयी है, सीखती आयी है एवं इस आध्यात्मिक विस्तारवाद का एकमात्र कारण हैं श्रीगणेश ।

      आद्य एवं आद्या के दो पुत्र हैं प्रथम श्रीगणेश जो कि उनके मानस पुत्र हैं, सत्य का प्रतीक हैं, अलख निरंजन में से प्रकट हुए हैं अतः सनातन ज्योति के जीते जागते श्रीविग्रह हैं। द्वितीय स्कन्द हैं, श्री कार्तिकेय हैं जिन्हें श्री सुब्रम्णयम् के नाम से भी जाना जाता है। वे शिव तेज से उत्पन्न हुए हैं। गणेश और कार्तिकेय सृष्टि के दो बराबर के प्रतीक हैं। गणेश स्वानंद अर्थात आत्मा का प्रतीक हैं, प्राण तत्व हैं तो वहीं स्कन्द शरीर का प्रतीक हैं, स्थूलता का प्रतीक हैं एवं इन दोनों के समायोजन से ही शरीर क्रियाशील होता है। प्राण के बिना शरीर निर्जीव है और शरीर के बिना आत्मा की उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह । शरीर कई प्रकार के हें सूक्ष्म शरीर, आध्यात्मिक शरीर, परा शरीर, बिम्बात्मक शरीर, स्थूल शरीर, पंचेन्द्रियों से युक्त शरीर या फिर देव शरीर, दिव्य शरीर, लोकानुसार शरीर इत्यादि इत्यादि । 

          कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर और आत्मा कभी जुदा नहीं होते, जैसे ही एक शरीर छोड़ा दूसरा शरीर धारण करना पड़ेगा। शिवलोक में गमन करना है, विष्णु लोक या ब्रह्मलोक में गमन करना है, देव लोक या स्वर्ग लोक में गमन करना है, पितृलोक में गमन करना है या फिर पशु योनि में गमन करना है तो उस लोकानुसार आपको तुरंत ही शरीर प्राप्त हो जायेगा । हे गणेश, हे कार्तिकेय तुम दोनों में से जो पहले परिक्रमा करके लौटेगा उसी का प्रथम विवाह होगा। दोनों गलत नहीं थे, कार्तिकेय अपनी प्रवृत्तिनुसार पृथ्वी की परिक्रमा पर निकल पड़े। यह स्थूल चिंतन है कि पर्वत, वन, नदी-नाले इत्यादि ही पृथ्वी का प्रतीक हैं परन्तु सूक्ष्मातीत मूलाधार निवासी, मूल पीठ निवासी, मूल पीठ सानिध्य वासी गणेश ने सृष्टि के मूल शिव और पार्वती की परिक्रमा की एवं विजयी हुए। जो जीता वही सिकन्दर । हे पुत्रों मेरे कण्ठ में उपस्थित यह दिव्य मणियों की माला, यह दिव्य मोदक, यह दिव्य पाश, यह दिव्य अंकुश, यह दिव्य रत्न सिंहासन, गणाध्यक्ष का पद इत्यादि उसी को मिलेगा, उसी को ऐश्वर्य मिलेगा, उसी को सब कुछ मिलेगा जो कि प्रमथ नाथ बनेगा, प्रथम परिक्रमा करके लौटेगा और हर बार श्रीगणेश विजयी हुए। हर बार कार्तिकेय हारे । 

        शिव और शक्ति का यह स्पष्ट उदघोष है, स्पष्ट उवाच है, स्पष्ट सिद्धांत है कि जो कोई बुद्धि से चलेगा, प्रज्ञावान बनेगा, ज्ञान-विज्ञान आत्मसात करेगा, सत्य की दृष्टि से देखेगा वही जगत का नायक कहलायेगा और जो बाहरी दुनिया, स्थूल जगत, स्थूल प्रपंचों की तरफ भागेगा वह सदा हारेगा एवं उसके हाथ कभी कुछ नहीं लगेगा। कार्तिकेय के हाथ कभी कुछ नहीं लगा यह आपको समझना होगा। सिद्धि, बुद्धि श्रीगणेश की पत्नियाँ हैं एवं उनकी तीसरी पत्नी है पुष्टि | क्षेम और लाभ उनके पुत्र बने, सिद्धि से क्षेम का जन्म हुआ और बुद्धि से लाभ का। ऐसा व्यापार किस काम का, ऐसी नौकरी किस काम की, ऐसी स्पर्धा, ऐसा युद्ध, ऐसा प्रेम, ऐसे सम्बन्ध, ऐसा जीवन इत्यादि किस काम का कि जिससे क्षेम की जगह अशुभ उत्पन्न हो रहा हो, लाभ की जगह हानि उत्पन्न हो रही हो। आनंद-मंगल, आमोद-प्रमोद भगवान गणेश के पौत्र हैं। हसी खुशी उनकी बहुएं हैं, गणपति का परिवार बहुत विशाल है एवं उसमें सौन्दर्या, ऐश्वर्या, आनंदा, शांति, ज्ञाना, विज्ञाना इत्यादि अनेकों पुत्रियाँ हैं।

      पुष्टि से सम्पत्ति नामक पुत्री उत्पन्न हुई, सबको सम्पत्ति चाहिए अर्थात गणेश पुत्री चाहिए। इस ब्रह्माण्ड में सत्यता यही है कि आप गणेश के परिवार से सम्बन्ध गांठ लो, गठबंधन कर लो । स्त्री पुरुष की शादी के समय जब गठबंधन होता है तब गणेश मंत्र ही पढ़े जाते हैं ताकि उनके विशाल परिवार जिसका कि ऊपर वर्णन किया गया है से जातक का संबंध स्थापित हो सके। गणेश के परिवार के अलावा किसी और से संबंध जोड़ना घाटे का सौदा है। गणेश का परिवार शिव परिवार के अंतर्गत ही आता है। गणपति उपासना कीजिए इसी में सबका कल्याण है।

गणपति तंत्रम
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        सनातन धर्म को पुनः प्राण प्रतिष्ठित क्रियावान एवं सक्रिय करने के लिए आदि गुरु शंकराचार्य की दिग्विजयी यात्रा निर्वाध निर्विघ्न और अखण्ड रूप से भारत भूमि पर सक्रिय क्यों थी? क्यों आदि गुरु शंकराचार्य जी हर विघ्न पर विजय प्राप्त करते जा रहे थे। टुकड़ों टुकड़ों में, छोटी-छोटी उपासना पद्धतियों एवं विभिन्न प्रकार के मतों, विश्वासों और मान्यताओं से ग्रसित हिन्दू समाज के इन विघ्नों पर विजय प्राप्त करना आसान नहीं था। इन सब विघ्नों, विरोधों इत्यादि पर आदि शंकर इसलिए विजय कर सके क्योंकि वे गणेश तंत्र को आत्मसात कर चुके थे जो गणेश तंत्र को आत्मसात कर ले वही शंकर जो विघ्नों, बाधाओं और समस्याओं को पार करने का तंत्र हासिल कर ले वही तंत्रज्ञ। शंकर की पहचान है विघ्न हरण | शिव का आविष्कार है गणेश तंत्र, शिव के सबसे करीब है गणेश ज्ञान यही शिव बनने की कला है। 

       आदि शंकर प्रथम शंकराचार्य हैं, प्रथमेश हैं। प्रथमेश नही हो सकता है जिसकी गणेश तंत्र में पारंगतता हो क्योंकि प्रथमेश ही शुरुआत करता है। जो प्रथमेश होगा उसे ही सबसे ज्यादा बाधाओं का सामना करना पड़ेगा उसके सामने सबसे ज्यादा चुनौतियाँ होंगी, उसे सबसे ज्यादा खतरों से खेलना होगा क्योंकि प्रथमेश की परिभाषा भी यही है कि सर्वप्रथम विघ्न से सामना करने वाला, सर्वप्रथम विघ्न से लड़ने वाला एवं उसे जीतने के तंत्र एवं ज्ञान का निर्माण करने वाला। कालान्तर जो प्रथमेश के पीछे चलेंगे उन्हें विरासत में विघ्नों से लड़ने की शक्ति, विघ्न को पराजित करने का ज्ञान एवं विघ्न को निर्विघ्न में बदलने वाले तंत्र का आविष्कार स्वतः ही प्राप्त होगा। यही गणेशोत्पत्ति है। 

     आदि शंकर अद्वैत मत को लेकर अपनी दिग्विजयी धर्म यात्रा पर निकले थे परन्तु वे जानते थे कि अद्वैत की इस यात्रा में विघ्न के रूप में द्वैत तत्व ही उपलब्ध होंगे। विघ्न क्या है ? विघ्न न हो तो अद्वैत को सिद्ध करने की क्या जरूरत है? अद्वैत तो शिव है और शिव ही विश्वास है शिव की परिभाषा ही विश्वास है। विश्वास को क्या सिद्ध करना ? विश्वास कभी सिद्ध नहीं किया जा सकता। विश्वास प्रमाणित और अप्रमाणित नहीं होता, यही शिव का महात्न है। शिव अगर विश्वास है तो भगवति श्रद्धा श्रद्धा और विश्वास अध्यात्म के दो आदि स्तम्भ हैं। भगवति की प्राप्ति का एकमात्र हेतु है श्रद्धा के मार्ग पर चलना होगा, श्रृद्धा को मन मस्तिष्क में धारण करना होगा तभी श्रद्धेय तक पहुँच पाओगे। विश्वास के मार्ग से श्रद्धेय को प्राप्त नहीं कर सकते और न ही श्रद्धा के मार्ग पर चलकर विश्वास को प्राप्त कर सकते हो अर्थात शिव को। दोनों मार्ग अलग-अलग है, दोनों भाव अलग हैं। श्रृद्धा भी प्रचण्ड है और विश्वास भी उग्र है। ये दोनों सौम्य नहीं है, ये दोनों शालीन भी नहीं हैं बस यहीं पर बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों का परीक्षण असफल हो जाता है, उनका ज्ञान कुण्ठित हो जाता है, वे मार्ग से विचलित भी हो जाते हैं। मछली को देखना है तो जल मार्ग अपनाना होगा, सड़क पर मछली के दर्शन नहीं होंगे, शेर को देखना है तो वन में जाना होगा समुद्र में शेर दिखाई नहीं देगा। ऐसी ही स्थिति श्रद्धा और विश्वास की है। विश्वास तो कहता है, हैं। हैं तो हैं बात खत्म, यही सबसे आदि शिव लक्षण है। 

         शिव हैं तो हैं। कहाँ हैं? किस किस रूप में हैं? क्या चरित्र है? क्या गुण है? और क्या हैं यह आज तक कोई नहीं जान पाया बस जान पाया तो विश्वास। केवल विश्वास के माध्यम से ही मुमुक्ष गण शिव का एहसास करते हैं। यही बात श्रद्धा में है, हृदय में श्रद्धा है तो भगवति समीप खड़ी है इतनी समीप कि कल्पना से भी परे अन्यथा ढूंढ-ढूंढकर थक जाओ, चाहे ज्ञान मार्ग अपना लो, तंत्र-मंत्र, भक्ति योग और भी कोई मार्ग हो तो अपना लो। पराम्बरा का लोक कहाँ है? पराम्बरा का वास्तविक स्वरूप क्या है? पराम्बरा की उम्र क्या है ? पराम्बरा की पसंद या नपसंद क्या है ? ब्रह्माण्ड में आज तक कोई नहीं जान पाया। शिव और भगवति ने अपने अर्धनारीश्वर महाविज्ञान के द्वारा सब कुछ कीलित कर दिया है, अपने आपको सबसे परे कर लिया है एवं इस ब्रह्माण्ड के सभी मार्गों को आबद्ध कर दिया है। यहाँ पर थोड़ा सा सुधार करना चाहूँगा। मुख्य रूप से इन दोनों ने एक मार्गीय व्यवस्था बना दी है अर्थात शिव तक पहुँचने के लिए विश्वास और भगवति तक पहुँचने के लिए श्रद्धा दो ही मार्ग पूर्णतः खुले हुए हैं बाकी सब मार्ग एकांगी हैं। 
क्रमशः

      इन मार्गों से शिव और शक्ति का आवागमन तो हो सकता है परन्तु अन्य किसी का आवागमन बाधित है और बार-बार अनंत योनियों में रहने वाले चेतनावान, प्रज्ञावान, ज्ञानवान प्राणी इन मार्गों के अवरोधों में से रास्ता ढूंढने की कोशिश करते हैं परन्तु आज तक सफल नहीं हो पाये और न हो पायेंगे। यही गणेश महात्न है। गणेश महात्न इसलिए कि एकमात्र गजमुखी ही वह द्वार हैं जिसके माध्यम से शिव और शक्ति दोनों के दर्शन किये जा सकते हैं, दोनों को एक साथ प्राप्त किया जा सकता है। इस सृष्टि में गणेश तत्व की खोज, गणेश का आविष्कार, गणेश का अनुसंधान ही शिव और शक्ति का प्रमुख कार्य रहा है। आदि शंकराचार्य यह समझे बैठे थे अतः जब उनकी दिग्विजयी यात्रा दक्षिण भारत के जम्बूकेश्वर नामक पवित्र क्षेत्र में पहुँची तो वे थोड़े विचलित हो गये। यहाँ पर भगवति का एक अति प्राचीन दिव्य स्थल रहा है एवं जम्बूकेश्वर में भगवान शिव जल तत्व पर आरूढ़ दिखाई पड़ते हैं। यहाँ पर उनका विग्रह अपोलिंग के नाम से जाना जाता है जिसमें कि जल तत्व की प्रधानता है। 

       जल सबसे बलिष्ठ, सबसे उग्र और सबसे कठिनाई के साथ नियंत्रण में आने वाला तत्व है। जम्बूकेश्वर का अपोलिंग भारतवर्ष में जल तत्व को नियंत्रित करता है। यही लिंग जल तत्व को सौम्य बनाता है। भगवान साम्ब सदाशिव के इस अपोलिंग की पूजा अर्चना से समस्त भारत वर्ष में जल संबंधित व्याधियों, अकाल, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, तूफान इत्यादि का नियंत्रण होता है। आदि गुरु शंकराचार्य जी को उनके शिष्यों ने पकड़ लिया और बोले भगवन मंदिर में प्रविष्ट मत होइये क्योंकि इस गर्भ गृह में पराम्बरा, ललिता खण्डेश्वरी के रूप में अत्यंत ही तेजोमय हैं। आज तक जो भी व्यक्ति गर्भ गृह में जाता है उसकी तत्काल मृत्यु हो जाती है, वह अम्बा के तेज को सहन नहीं कर पाता। आदि शंकर एक पल के लिए ठिठके फिर दूसरे ही क्षण गणपति का विग्रह हाथ में लिया और घुस गये गर्भ गृह में एवं अम्बा की मूर्ति के सामने गणेश को स्थापित कर दिया और दूसरे ही क्षण ललिता खण्डेश्वरी के दोनों कानों में हीरे से जड़ित दो अद्भुत श्रीयंत्र पहना दिए। अम्बा की दृष्टि अब गणेश पर थी और कानों में श्रीयंत्र। देखते ही देखते ललिता खण्डेश्वरी का तेज एवं उग्रता सौम्यता और वात्सल्य में परिवर्तित हो गई। 

       मूर्ति में से सौम्यता झलकने लगी, मूर्ति में से वात्सल्य उमड़ने लगा। लोगों की भीड़ लग गई, जो भी मंदिर में प्रविष्ट होता एक दिव्य ऊर्जा को आत्मसात कर धन्य हो उठता। यही है गणेश रहस्यम् । आज भी लोग आदि शंकर द्वारा प्रतिष्ठित इस मंदिर में अम्बा के दर्शन के लिए नित्य जाते हैं। कौन उग्र है? कौन प्रचण्ड है ? कौन क्रोधी हैं? कौन भीषण है? किसने सर्वप्रथम उग्रता को धारण किया ? किसने सर्वप्रथम तेजोमय रूप ग्रहण किया? निश्चित ही वे शिव और शक्ति हैं। ब्रह्माण्ड में किस ग्रह की इतनी ताकत है कि जो इनके तेज को झेल सके, इनके सानिध्य में निवास कर सके, इन दोनों के एकांश से ही तो सूर्य तप रहा है। जब एकांश अनंत सूर्यों को तपा सकता है तो पूर्णांश को भला कौन झेल सकता है? अतः कौन सा मार्ग है जिसके द्वारा इन दोनों को जन मानस देख सकता है ग्रहण कर सकता है। वह है गणेश मार्ग जो शिव को सौम्य कर दे, रुद्र को साम्ब कर दे, जो ललिता खण्डेश्वरी को वात्सल्यमय बना दे, जो अम्बा में शालीनता फूंक दे, उन्हें प्रेममयी बना दे, ममतामयी बना दे उसका नाम है गणेश अन्यथा गणेश के अलावा जितने भी हुवे उम्र को और उग्र बनाते हैं, रुद्र को और रौद्र बनाते हैं, प्रचण्ड को और ज्वालामुखी बनाते हैं। 

       गणेश के अलावा जो भी हैं वे ठीक उसी प्रकार का कार्य करते हैं जैसे कि प्रचण्ड अग्नि के सम्पर्क में अगर वन आते हैं, घरौंदे आते हैं, जीव आते हैं तो वह और प्रचण्ड होती है, उसकी ज्वाला की लपटें और ऊंची उठती हैं। गणेश ही अनियंत्रित को परम नियंत्रित में परिवर्तित करते हैं बस यहीं पर गणेश प्रथम पूजनीय हैं, यही पर समस्त जीव जगत हार जाता है। अगर एक चिकित्सक का हाथ चाकू लेकर मरीज के घाव पर उठता है तो गणेश तत्व के अभाव में घाव और गहरा होगा, उसका निदान नहीं होगा। वह घाव को और प्रचण्डता देगा परन्तु अगर गणेशत्व होगा तो उसके द्वारा उठा हाथ घाव रूपी विघ्न का समूलोच्छेदन कर देगा, परिवर्तन का यही महाबिन्दु ओंकार है। 

          ओंकार ही गणेश है जो कि भावनाओं को सद्भावनाओं में परिवर्तित कर देंगे। मंत्रों में ॐ लगा दिया जाता है, जितने भी वैदिक मंत्र हैं उनकी शुरूआत ॐ से होती है। ॐ क्यों लगा दिया गया? प्रथम में ही क्यों लगाया गया अंत में भी लगा सकते थे। वैज्ञानिक भली भांति मंत्र रहस्यों को समझ रहे हैं, उन्हें मालूम है कि हमने मंत्रों की रचना कल्याणार्थ की है, मंत्र कल्याण की ब्रह्माण्डीय सोच के अनुरूप रचे गये हैं अतः कहीं ऐसा न हो कि मंत्र जप करने वाला साधक किसी भी कारणवश जाने अनजाने अकल्याणकारी भावनाओं से ग्रसित हो या फिर किसी परिस्थिति या घटनावश अपने दूषित मानस से मंत्र जप कर बैठे और उसकी भावनायें मंत्र मार्ग के माध्यम से अकल्याणकारी परिस्थितियाँ पैदा कर दे। अतः मंत्र की शुरूआत में ॐ लगा देने से चाहे साधक की मानसिकता कैसी भी हो प्रदूषण नहीं फैल पाता। 

       भावनाएं ॐ के संस्पर्श से निष्क्रिय हो जाती है, वे परिवर्तित हो जाती हैं। यह स्पंदन का खेल है। ॐ का महत्व इसीलिए सर्वाधिक है। शिव ने अध्यात्म का आविष्कार करते समय स्पष्ट रूप से घोषणा कर दी कि किसी भी अनुष्ठान, जप, यज्ञ, मंत्र विधान इत्यादि के साथ-साथ जो भी कार्य जीव सम्पन्न करेंगे अगर उससे पूर्व ओंकारनाद नहीं किया गया अर्थात गणपति पूजन नहीं किया गया तो अनुष्ठान से उत्पन्न समस्त कर्म एवं फल मुझ तक नहीं पहुँच पायेंगे और गणेश विहीन कर्मों का फल अधर्म खायेगा, असुर प्राप्त करेंगे, पाप आत्माएं प्रेत आत्माएं इन्हीं कर्मों के फलों पर पुष्टिवर्धक होंगे। आप घर बनाइये, विवाह कीजिए, संतानोत्पत्ति कीजिए, नया व्यापार शुरू कीजिए किसने रोका है ? कर्म की पूरी छूट है परन्तु अगर इन सब क्रिया कलापों से पहले अगर आपने गणपति पूजन नहीं किया, प्रथमेश का आह्वान नहीं किया तो फिर उग्र, घोर, प्रचण्ड एवं भीषण शक्तियाँ स्वतः ही निमंत्रित हो जायेंगी।

         प्रथमेश का आह्वान, प्रथमेश की उपासना इन सब शक्तियों के आह्वान को निरुद्ध करती है। लोग मकान बनाते हैं, उल्टी क्रिया शुरू जाती है, मुसीबतें टूट पड़ती हैं। गणेश विहीन विवाह भी होते हैं एवं उनसे हाहाकार ही हाहाकार उत्पन्न होता है। अध्यात्म की किसी भी शाखा में, किसी भी पंथ में, किसी भी पद्धति में अगर गणेश का आह्वान नहीं है, गणेश क्रिया का अभाव है तो फिर विध्वंस ही विध्वंस एवं अनाचार ही अनाचार होगा। वास्तव में अध्यात्म तो एक तरह से पराब्रह्माण्डीय महा आवृत्ति अनुसंधान है एवं इससे उत्पन्न होने वाली ऊर्जा अत्यंत ही तीक्ष्ण होती है अतः कैसे नियंत्रित होगी यह कैसे जीवन दायिनी बनेगी यह ? इसके लिए तो गणेश की ही जरूरत पड़ेगी ।

पञ्चश्लोकी गणेशपुराणम्
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श्री विघ्नेश पुराणसार मुदितं व्यासाय धात्रा पुरा, तत्खण्डप्रथमं महागणपतेश्‍चोपासनाख्यं यथा ।
संहरतु त्रिपुरं शिवेन गणपस्यादौ कृतं पूजनं, कर्तुं सृष्टिमिमां स्तुतः स विधिना व्यासेन बुद्धयाप्तये ॥ 

संकष्ट्याश्च विनायकस्य च मनोः स्थानस्य तीर्थस्य वै, दूर्वाणां महिमेति भक्ति चरितं तत्पार्थिवस्यार्चनम् ।
 तेभ्यो चर्चदभीप्सितं गणपतिस्तत्तत्प्रतुष्टो ददौ, ता सर्वा न समर्थ एव कथितुं ब्रह्मा कुतो मानवः ॥

 क्रीडाकाण्डमथो वेदे कृतयुगे श्वेतच्छवि: काश्यपः, सिंहांकः च विनायको दशभुजो भूत्वाय काशी ययौ ।
 हत्वा तत्र नरान्तकं तदनुजं देवान्तकं दानवं, त्रेतायां शिवनन्दनो रसभुजो जातो मयूरध्वजः ॥ 

हत्वा तं कमलासुरं च सगणं सिन्धुं महादैत्ययं, पश्चात् सिद्धिमति सुते कमजलस्तस्मै च ज्ञानं ददौ ।
द्वापारे तु गजाननो युगभुजो गौरीसुतः सिन्दूरं, सम्म स्वकरेण तं निजमुखे चाखुध्वजो लिप्तवान् ॥ 

गीताया उपदेश एव हि कृतो राज्ञै वरेण्याय वै, तुष्टायाथ च धूम्रकेतुरभिधो विप्रः सधर्माधिकः । 
अश्वांको द्विभुजो सितो गणपतिम्लैच्छान्तकः स्वर्णदः, क्रीडाकाण्डमिदं गणस्य हरिणा प्रोक्तं विधात्रे पुरा ॥

 एतच्छ्लोक सुपञ्चकं प्रतिदिनं भक्त्या पठेद्यः पुमान् । निर्वाणं परमं व्रजेत् स सकलान् भुक्त्वा सुभोगानपि ॥ 

इस पञ्चश्लोकी पुराण का भक्तियुक्त होकर तीनों सन्ध्याओं में जो साधक पाठ करता है, वह इस जगत् में सब सुखों को भोग कर मोक्ष को प्राप्त होता है । उपर्युक्त पञ्चश्लोकी पुराण का उपदेश स्वयं भगवान् विष्णु ने श्री ब्रह्मा जी को दिया था।
         
    ।।इति श्री पञ्चश्लोकी गणेशपुराणम् ॥

लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गणपति स्तोत्र
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ॐ नमो विघ्नराजाय सर्वसौख्य प्रदायिने ।
 दुष्टारिष्ट विनाशाय पराय परमात्मने ॥ 

लम्बोदरं महावीर्यं नागयज्ञोपशोभितम् । 
अर्धचन्द्रधरं देवं विघ्न व्यूह विनाशनम् ॥ 

ॐ ह्रां ह्रीं ह्र हैं ह्रौं ह्रः हेरम्बाय नमो नमः । सर्वसिद्धिप्रदोऽसि त्वं सिद्धिबुद्धिप्रदो भव ॥

 चिन्तितार्थप्रदस्त्वं हि सततं मोदकप्रियः । सिन्दूरारुणवस्त्रश्च पूजितो वरदायकः ॥ 

इदं गणपति स्तोत्रं यः पठेत् भक्तिमान् नरः । 
तस्य देहं च गेहं च स्वयं लक्ष्मी न मुञ्चति ॥

सम्पूर्ण सौख्य देने वाले विघ्नराज गणेश को नमस्कार है । जो दृष्ट अरिष्ट ग्रहों का नाश करने वाले परात्पर परमात्मा हैं, उन गणपति जी को नमस्कार है। 
जो महापराक्रमी, लम्बोदर, सर्पमय यज्ञोपवीत से सुशोभित, अर्धचन्द्रधारी और विघ्नसमूह का विनाश करने वाले हैं, उन गणपति देव की मैं वन्दना करता हूँ । 
ॐ ह्रां ह्रीं ह्रूं हैं ह्रौं ह्रः हेरम्ब को नमस्कार है। भगवान् ! आप सब सिद्धियों के दाता हो, आप हमारे लिए सिद्धिबुद्धिदायक हो । 
आप मन के द्वारा चिन्तित अर्थ को देने वाले हैं तथा आपको सदा ही लड्डू प्रिय हैं, सिन्दूर और लाल वस्त्र से पूजित होकर आप सदा ही वर प्रदान करते हैं । 
जो मनुष्य भक्ति -भाव- युक्त होकर इस गणपति स्तोत्र का पाठ करता है, स्वयं लक्ष्मी उसके देह गेह को नहीं छोड़ती। इस स्तोत्र के नित्य 108 जप किये जायें, मोदकों का प्रसाद चढ़ाया जाये तो छः मास में लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। नित्य 11 पाठ करते रहने से धनलाभ के अवसर आते रहते हैं।

कुबेर ।।

        कुबेर आदि दिव्य पुरुष हैं, इन्हें शिव एवं माता जगदम्बा की असीम कृपा और सानिध्य प्राप्त है। सभी ऋषियों संत गणों महात्माओं ने इन्हें आदर दिया है एवं महाभारत, वाल्मीकी रामायण, पदमपुराण, ब्रह्मवैवर्तपुराण, शिवपुराण, रुद्रयामल तंत्र में सविस्तार के साथ इनका अनेकों कल्पों में अवतरण का वर्णन किया गया है। कुबेर को सभी ने एक स्वर में संत महात्मा, यज्ञ परायण, धर्मात्मा एवं इन सबसे ऊपर उठकर प्रचण्ड, समर्पित शिव भक्त के रूप में वर्णित किया है अतः इतनी उच्च कोटि की शक्ति क्या इस प्रकार का स्वरूप ग्रहण कर सकती है जो कि आजकल मूर्ति और चित्रों में कुबेर का दिखाया जाता है। इस देश में छवि विकृत करने वालों की कमी नहीं है। शिव का मित्र, देवताओं का सहायक, यज्ञ कर्मों को सम्पन्न करने वाला योगीराज, परम तपस्वी कुबेर स्थूल, भोगी, वृद्ध कभी नहीं हो सकता। भारत भूमि तो 33 कोटि देवी देवताओं की भूमि है एवं रोज नये-नये देवी देवता पैदा होते रहते हैं। शिव और वैभव दो अलग धारायें हैं। वैभव बुरी बात नहीं है एवं भारत वर्ष ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ पर कि राजाओं ने अकल्पनीय वैभव का सानिध्य होते हुए भी भी धर्म अर्थात शिव को नहीं भूले हैं। राम, कृष्ण, युधिष्ठिर, महावीर, बुद्ध, ययाति, हरिशचन्द्र, अशोक इत्यादि से लेकर अनेक राजाओं ने वैभव, ऐश्वर्य, विलासिता, धन होते हुए धर्म का मार्ग पकड़ा, धर्म को समर्पित हो गये। महाराजा रणजीत सिंह, वीर शिवाजी महाराणा प्रताप इत्यादि राजाओं ने अपना सर्वस्व धर्म को समर्पित किया। धर्म भूमि की यही विशेषता है एवं इस प्रकार के विहंगम दृश्य केवल भारत वर्ष में ही देखने को मिलते हैं। यही धन का, वैभव का सदुपयोग है, यही मुक्ति का मार्ग है, यही कुबेर तंत्र का मर्म है। कुबेर तंत्र से ही इस प्रकार के धर्म प्रेमी शासक निकलते हैं और कुबेर तंत्र के अभाव में रावण, कुम्भकरण, मेघनाथ जैसे असुर उत्पन्न होते हैं जिनका पतन निश्चित होता है।

         प्रकृति द्वारा प्रदत्त विभिन्न भौतिक भण्डारों, निधियों एवं पदार्थों का प्रबंधन, दोहन, उपयोग मनुष्य का मूलभूत अधिकार है। जीवन को सुलभ, सरल, मनोरंजक, आनंदमयी बनाने का हर व्यक्ति को सम्पूर्ण अधिकार है। कुबेर साधना के माध्यम से, कुबेर तंत्र के द्वारा शिव के महात्मय् को समझकर जीवन को शिवमयी बनाने से व्यक्ति एक अच्छा भोगकर्ता बन सकता है। पंचभूतीय शरीर भोग का एक श्रेष्ठतम मार्ग है। धनवान होना अपराध नहीं है, ज्ञान वान होना अपराध नहीं है, सिद्धि प्राप्त करना अपराध नहीं है, खोज, करना भी अपराध नहीं है अपितु यह सब तो जीवन की श्रेष्ठता का प्रतीक हैं। आमोद-प्रमोद, मनोरंजन, सौन्दर्य उपासना, सौन्दर्य को आत्मसात करने की कला तो मनुष्य को श्रेष्ठतम मार्ग पर ले जाती है एवं इन्हीं सब कारणों से क्लेश, युद्ध, आक्रोश, हिंसा इत्यादि का जीवन में क्षय होता है। विस्तृत होने की प्रक्रिया ही मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ बनाती है। 

       धन का विस्तारीकरण ही किसी देश की सम्रद्धता का प्रतीक है। वही राष्ट्र या समुदाय ज्यादा हितकर मनुष्यों के लिए होता है जहाँ पर धन की प्रचुरता होती है, सौन्दर्य होता है, ज्ञान विज्ञान होता है। अनुपयोगी को उपयोगी में बदलने की कला ही कुबेर विज्ञान है एवं यही समृद्धि का सूचक है। धन प्रचण्ड शक्ति है, धन के माध्यम से रेगिस्तान को भी नखलिस्तान में परिवर्तित किया जा सकता है, मरु भूमि में भी नहर बनाई जा सकती है। धन के माध्यम से मनुष्य में मौजूद असीमित ऊर्जा भण्डार को किसी भी विहंगम क्रांतिकारी रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। धन के अभाव में मानव समुदाय में एकता असम्भव में है। मनुष्यों को एक जुट करके कर्म का सम्पादन धन के अभाव में कदापि नहीं किया जा सकता। साधना के माध्यम से मनुष्य को विशेष पराइन्द्रिय शक्तियां प्राप्त होती हैं। लोग भूमि के नीचे जल का पता लगा लेते हैं, भूमि के नीचे छिपे हुए धन का पता भी कुबेर साधना के माध्यम से लगाया जा सकता है। धन की चोरों से रक्षा, उसका अनावश्यक क्षय भी कुबेर साधना के माध्यम से रोका जा सकता है। औषधियों के गुण, भूगर्भ सिद्धि में कुबेर साधना अत्यंत ही हितकर है। भविष्यवाणी विशेषकर मौसम सम्बन्धी कुबेर यंत्र के माध्यम से ही की जाती है। आकस्मिक धन प्राप्ति, अनायास भाग्योदय, अचानक सहायता प्राप्तार्थ कुंबेर साधना महत्वपूर्ण है।

कुबेर रहस्यम्

     प्राचीन काल में धर्म दत्त नाम के एक ब्राह्मण थे वे विष्णु के द्वादक्षर मंत्र का पूर्ण निष्ठा के साथ अनुष्ठान एवं जप किया करते थे। एक दिन वे प्रातः काल पूजन सामग्री लेकर मंदिर की तरफ जा रहे थे तभी रास्ते में एक राक्षसी दिखाई पड़ी जो कि पूर्व जन्म के पाप कर्मों के कारण यह दशा भोग रही थी। विष्णु दत्त कांप उठे एवं उन्होंने तुरंत ही जल अभिमंत्रित कर उस राक्षसी पर फेंक दिया। दूसरे ही क्षण उस राक्षसी के अंदर से एक दिव्य दैवीय स्वरूप निकल पड़ा और विष्णु लोक से आये यान पर सवार हो वह प्रस्थान कर गईं। यह है संसर्ग की महिमा संकर्षण के अंदर संसर्ग छिपा हुआ है।

           एक और अद्भुत कथा है संसर्ग की प्राचीन काल में एक चोल राजा अनन्य विष्णु भक्त थे। विष्णु की कृपा से उनके राज्य में दुख, दरिद्रता निर्धनता का नामों निशान नहीं था। राजा के राज्य में विष्णुदास नामक एक अनन्य विष्णु भक्त ब्राह्मण था जो कि प्रतिदिन विष्णु की पूजा तुलसी दलों से करते थे। एक दिन मंदिर में राजा ने भगवान विष्णु की पूजा बहुमूल्य सामग्रियों एवं रत्न इत्यादि से की। तभी विष्णु दास ने आकर तुलसी दलों से पूजा प्रारम्भ कर दी एवं राजा की दिव्य सामग्रियाँ तुलसी दलों से ढंक गई। इस पर राजा कुपित हो गये और दोनों में बहस होने लगी। राजा ने कहा हे ब्राह्मण तुमने कितने यज्ञ, दान और विष्णु मंदिर बनवाये हैं जो तुम्हारी भक्ति को मुझसे श्रेष्ठ करती हो, मैं ही पहले भगवान विष्णु के साक्षात् दर्शन पाऊंगा। ब्राह्मण को भी बात लग गई उसने भी राजा की चुनौती स्वीकार कर ली। चोल राजा ने मुदगल ऋषि को आचार्य बनाकर दिव्य विष्णु अनुष्ठान का कर्म काण्ड प्रारम्भ कर दिया जिससे कि भगवान विष्णु के उन्हें साक्षात दर्शन हो सकें मुदगल ऋषि के अनुष्ठान चमत्कारिक होते थे, दूसरी तरफ विष्णु दास ने एक प्राचीन विष्णु मंदिर में अपनी यथाशक्तिनुसार भक्ति विधान से पूजन प्रारम्भ किया।

        पूजन से पूर्व ही विष्णु दास भोजन बनाकर रख लिया करते थे परन्तु प्रतिदिन उनका भोजन चोरी होने लगा। विष्णुदास भूखे पेट विष्णु भक्ति में लगे रहे, एक दिन उन्होंने देखा कि एक दुबला पतला कंगाल भोजन चुराने आ रहा है परन्तु विष्णुदास को देखकर वह भागने लगा। विष्णुदास द्रवित हो गये और स्वयं भोजन लेकर उस दुर्बल चोर के पीछे भागने लगे कहने लगे कि रुक जाओ-रुक जाओ भोजन छोड़कर क्यों जा रहे हो। बड़ा ही विचित्र दृश्य था, वह चाण्डाल थककर गिर पड़ा। विष्णु दास उसके पास पहुँचे एवं उस मूर्च्छित, अत्यंत ही दुर्बल चोर के ऊपर करुणावश अपने वस्त्रों से हवा करने लगे। दूसरे ही क्षण चाण्डाल का वेश छोड़ भगवान नारायण साक्षात् प्रकट हो गये। चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा एवं कमल धारण किये हुए, कटि में पीताम्बर, हृदय में श्री वस्त का चिन्ह, मस्तक पर क्रीट शोभा पा रहा था। वक्ष स्थल पर कौतुक मणि जगमगा रही थी। विष्णुदास को दिव्य विमान में बिठाकर वे विष्णुधाम की तरफ जाने लगे चोल राजा ने देखा कि यह क्या ? मैं तो अनुष्ठान कर रहा हूँ परन्तु विष्णुदास तो बिना अनुष्ठान के ही भगवान नारायण को प्राप्त हो गया। चोल राजा ने ग्लानिवश यज्ञ कुण्ड में कूदकर प्राण त्याग दिए। मुदगल ऋषि ने क्रोध में आकर अपनी शिखा उखाड़ी और यज्ञं कुण्ड में डाल दी तब से लेकर आज तक मुद्गल गोत्र में उत्पन्न हुए ब्राह्मण शिखा नहीं रखते। चोल राजा को भी विष्णुलोक प्राप्त हुआं। विष्णु दास पुण्यशील एवं चोल राजा सुशील नाम से लक्ष्मी जी के दो प्रमुख द्वार पाल बने अर्थात विष्णु लोक में भी कुबेरत्व की संस्थापना हुई।

        श्री का मूल विग्रह तो भगवान विष्णु के पास ही है, वहाँ पर भी तो द्वारपाल चाहिए, वहाँ पर भी तो लक्ष्मी को रक्षक चाहिए कुबेर का पद चाहे इन्द्र लोक में हो, विष्णु लोक में हो या पृथ्वी लोक में हो उस पर बैठने वाले का धर्म से संसर्ग अत्यधिक आवश्यक है।संसर्ग ही प्राप्ति का विधान है। सतयुग, त्रेता और द्वापर में देश, ग्राम और कुल भी मनुष्य के किये हुए पुण्य और पाप के भागी होते हैं, परन्तु कलियुग में केवल कर्ता को ही पुण्य और पाप का फल भोगना पड़ता है।

       संसर्ग इतना महत्वपूर्ण क्यों है? क्योंकि जीव का निर्माण एकांत के लिए नहीं किया गया है। ब्रह्मा ने सब तत्व अलग-अलग निर्मित किये, उनमें जन्मजात एकांतता है, जन्मजात युद्ध है अतः इन सबको समायोजित करने के लिए ब्रह्मा को जीव तत्व का निर्माण करना पड़ा। सृष्टि को मैथुनी बनाना पड़ा। मैथुन तो संसर्ग का महाअनुष्ठान है, योनिज जीवन केवल मैथुन की प्रक्रिया पर ही आश्रित है अतः संसर्ग को सम्पूर्णता के साथ शक्तिवान बनाना शिव और ब्रह्मा के लिए आवश्यक हो गया इसलिए संसर्ग के माध्यम से भी अध्यात्म की प्राप्ति का विधान रचा गया। संसर्ग के माध्यम से भी शिव सानिध्य प्राप्त करने की प्रक्रिया रची गई। संसर्ग के अंदर आता है स्थानांतरण, तो समाज ने ऐसी व्यवस्था बनाई कि पिता का धन पुत्र को नैसर्गिक रूप से प्राप्त होगा, पिता का ऋण भी पुत्र के ऊपर स्थानांतरित होगा । जो घर पिता ने बनाया है, जो सम्पत्ति पिता ने अर्जित की है वह पुत्र को नैसर्गिक रूप में प्राप्त होती है। देश की प्रत्येक सम्पत्ति पर देश वासियों का नैसर्गिक अधिकार है। 

        प्रथम उपयोग, प्रथम भोग की प्राथमिकता उन्हीं को मिलती है जिनसे कि संसर्ग तीव्रतम है। पत्नी पुरुष की सम्पत्ति की अधिकारी है क्योंकि उसका संसर्ग पुरुष से तीव्रतम है यह तो सभी मानते हैं। संसर्ग नजदीकियां पैदा करता है, संसर्ग दूरियों को मिटाता है। यह अधिकार क्षेत्र है, जाने अनजाने में भी संसर्ग के फायदे मिल जाते हैं। वृद्धावस्था में माता पिता की देखभाल करना पुत्र का नैसर्गिक एवं प्राकृतिक कर्तव्य है क्योंकि पुत्र ने तीव्रतम संसर्ग भोगा है और वह तो साक्षात माता पिता के संसर्ग का प्रतिफल है। यह व्यवस्था हर तल पर है। पुत्र को रूप, रंग, रोग, आरोग्य, गुण, अवगुण, शरीर, रक्त, नैसर्गिक रूप से माता पिता से मिलता है अतः आध्यात्मिक तल पर भी उसके कुलदेवता, उसका गोत्र, उसकी वंशावली, उसका पूजा विधान भी माता-पिता से कहीं न कहीं संसर्गात्मक होगा ही। 

         एक साधक को साधना पथ में उसके देश के गुरु, विश्व के गुरु, तंत्र क्षेत्र के गुरु, ब्रह्माण्ड के गुरु, शरीरी गुरु, अशरीरी गुरु, सिद्ध गुरु निश्चित ही कुबेर के रूप में उसे दिव्य आवृत्तियां एवं कोश प्रदान करते ही रहते हैं। सिक्ख धर्म सनातन धर्म का मुकुट है, क्योंकि उन्होंने गुरु द्वार की परम्परा चलाई। एक तरफ समाज बीच में गुरु का द्वार अर्थात गुरु द्वारा और उसके आगे अध्यात्म की विलक्षण दुनिया अध्यात्म गुरु के द्वार से ही प्राप्त होता है। राम गुरु के द्वार पर गये, कृष्ण सान्दीपनी के द्वार पर पहुँचे, शंकराचार्य केरल से ओंकारेश्वर चलकर पहुँचे अपने गुरु गौणपाद के द्वार पर परशुराम दत्तात्रेय के द्वार पर पहुँचे, समस्त असुर एवं दैत्य शुक्राचार्य के दरवाजे पर पहुँचे । देवता बृहस्पति के दरवाजे पर जाते हैं कहीं भी गुरु आज तक चलकर शिष्य के दरवाजे पर नहीं जाते। जब शिष्य गुरु के दरवाजे पर पहुँचता है और कहता है भिक्षांदेहि-दीक्षांदेहि, शिक्षांदेहि गुरुवर तभी वह कुछ प्राप्त कर पाता है, तभी वह कुबेर बन पाता है, तभी वह धनाध्यक्ष बन पाता है, तभी वह सिद्ध बन पाता है। तभी वास्तविक संसर्ग होता है गुरु और शिष्य के बीच।

पूर्वकाल की बात है धनेश्वर नामक एक ब्राह्मण था परन्तु वेश्यागमन, खोटी बुद्धि, मदिरा पान, जुआ खेलना ही उसकी आदत में शामिल था। एक बार वह चमड़े के व्यापार के लिए महिषमतिपुरी जा पहुँचा महिषमतिपुरी नर्मदा तट पर ओंकारेश्वर के पास स्थित हैं, यहीं पर प्रख्यात मंडन मिश्र उत्पन्न हुए थे जो कि कालान्तर आदि गुरु शंकराचार्य जी के अनन्य शिष्य बने, आस्तिक जगत के कुछ लोग वहाँ पर भगवान विष्णु की पूजा आराधना कर रहे थे। एक माह तक उस ब्राह्मण ने अनमने मन से वहाँ पर निवास किया एवं अनजाने में ही उसका संसर्ग पुण्यात्माओं से हो गया। अचानक रात्रि में उसे सर्प ने काट लिया और उसकी मृत्यु हो गई। यमराज के दूत उसे मुद्गर से पीटते हुए यमलोक ले गये एवं उस अधम आत्मा को तेल के खौलते कड़ाहे में डाल दिया परन्तु दूसरे ही क्षण नर्क की अग्नि शांत हो गई। जाने अनजाने में उसकी आत्मा धर्म के संसर्ग में जो आ चुकी थी। यमराज ने कहा यह तो नर्क का भी नाश कर देगा अतः इसे शीघ्र अतिशीघ्र यक्ष योनि में डाल दो और उस धनेश्वर ब्राह्मण की आत्मा को यक्ष योनि में स्थानांतरित करं दिया। 

        संसर्ग में कौतुक का विशेष महत्व है, संसर्ग कौतुहल के कारण भी हो जाता है। यक्ष योनि कौतुहल वश ही अधिकांशतः को मिलती है उस योनि में संसर्ग तो होता है परन्तु भोग अल्पतम होता है। यक्षों के राजा कुबेर के पास किन्नर योनि, गंधर्व योनि के जीव भी होते हैं। इन योनियों में तृप्तता भौतिक कारणों से नहीं होती अपितु संसर्ग की सूक्ष्मतम आवृत्तियों के कारण होती है। अप्सरायें भी इसी श्रेणी में आती हैं। प्रत्येक दिव्य सरोवर, दिव्य तीर्थ क्षेत्र, दिव्य पर्वत श्रृंखलाओं के आसपास यक्ष एवं यक्षिणियां निवास करती हैं। भूमि में गड़े धन, धातुओं की खदान, मणियों एवं रत्नों के भूमिगत भण्डार, भूमि के नीचे दबे खजानों की रक्षा यक्ष एवं यक्षिणियाँ ही करते हैं। सौन्दर्य के उपासक हैं यक्ष एवं यक्षिणी धन के रक्षक हैं यक्ष एवं यक्षिणी । मनुष्य को दुर्लभ वनस्पतियों, तांत्रोक्त वस्तुओं, गोपनीय आध्यात्मिक स्थलों की जानकारी प्रदान करते हैं यक्ष एवं यक्षिणियाँ, अप्सरा दर्शन के लिए यक्षराज कुबेर की ही तांत्रोक्त उपासना की जाती है। अप्सरा स्थापत्य यक्ष राज कुबेर की उपासना के माध्यम से ही होती है। एक स्त्री शरीर के साथ अप्सरा शक्ति 15 से 17 वर्ष तक ही चलती है जब तक उसे अप्सरा का सानिध्य प्राप्त होता है उसमें सौन्दर्य, आकर्षण, सम्मोहन, आरोग्यता की विशेष चमक दिखाई देती है। 

          यक्षराज कुबेर को सूर्य के द्वारा पारद को स्वर्ण में परिवर्तित कर लेने की गोपनीय कल्प सिद्ध है। यक्ष एवं यक्षिणियां सूर्य सिद्धांत के माध्यम से क्रियाशील होते हैं। यह किसी भी अनुपयोगी वस्तु को मनचाहे स्वरूप में परिवर्तित कर सकते हैं। विश्वामित्र ने गोपनीय यक्ष कल्प नामक ग्रंथ रचा है जिसमें कि सूर्य शक्ति के द्वारा पदार्थ परिवर्तन की सम्पूर्ण व्याख्या है। पृथ्वी पर एक से एक गोपनीय धन के भण्डार हैं जो कि मानव दृष्टि से सदैव दूर बने रहते हैं। अनेकों ऐसे स्थल हैं जहाँ मानव आज तक पांव भी नहीं रख पाया इसी पृथ्वी पर, केवल सिद्धों को ही यहां से प्राप्ति की अनुमति है। यक्षराज कुबेर नागों का पहरा बिठा देते हैं गोपनीय एवं दिव्य वनस्पति एवं दिव्य भण्डारों पर । तेलिया कंद अत्यंत ही दुर्लभ वनस्पति है एवं इसके नीचे सर्प निवास करते हैं इस के रस से तो कैंसर भी ठीक हो जाता है, पारद को स्वर्ण में बदलने के लिए तेलिया कंद का रस ही काम में आता है। सामान्य निधियों से संसर्ग आम जनता का हो जाता है, आम जनता के लिए धन का तात्पर्य है कपड़े, गहने, कागज के टुकड़े, मोटर, मकान, इत्यादि इत्यादि इन सब के लिए कुबेर उपासना की कोई जरूरत नहीं है । कुबेर उपासना अर्थात यक्षराज से संसर्ग करने पर तो दिव्यतम भोग एवं निधियां प्राप्त होती हैं जिसके बारे में सामान्य मनुष्य जानते भी नहीं हैं।

यक्ष राज कुबेर का जो चित्र, मूर्ति, विग्रह आप आजकल देख रहे हैं वह बिल्कुल बकवास है, अध्यात्म की आलोचना एवं विवेचन पिछले सौ वर्षों से वे लोग कर रहे हैं जिन्हें संस्कृत का एक श्लोक भी लिखना नहीं आता है। आजकल एक मोटा, स्थूल, गंजा स्वरूप कुबेर का दिखलाया जा रहा है। यह उनकी छवि को विकृत करने का कुप्रयास है यह तो भोगी चरित्र का चिंतन है। वास्तव में कुबेर एवं यक्षों और यक्षिणिओं के शरीर योगमय, अत्यंत ही गौरवर्ण एवं सुगठित हैं। यह मैं ग्रंथों के आधार पर कह रहा किसी स्थूल व्यापारी या सुनार को कुबेर का स्वरूप नहीं माना गया है धर्म शास्त्रों में धर्म शास्त्रों का अध्ययन किये बिना कुछ भी ऊल-जलूल चित्रण कर देना धर्म को हानि पहुँचाने के समान है। 

        प्राचीन रोम में भी कुबेर की उपासना की गई है, वहाँ पर उन्हें अत्यंत ही सुन्दर एवं सुगठित शारीरिक सौष्ठव वाले युवक के रूप में दर्शाया गया है। मिश्र एवं माया सभ्यता में भी धनाढ्य कुबेर की प्रतिकृतियाँ मिलती हैं वहाँ पर भी उन्हें सौन्दर्य का प्रतीक माना गया है। कुबेर की जो आकृति आजकल प्रचारित की जा रही है वह तो चीन का एक महात्मा कन्फ्यूसियस की आकृति है जो कि वहाँ के राजाओं का धर्म गुरु था, वह कब से कुबेर हो गया। जाने अनजाने में आप कुबेर की उस आकृति से संसर्ग मत कर बैठना। मैं सप्रमाण कह रहा हूँ, ग्रंथों को साक्षी मानकर कह रहा हूँ, कुबेर का सौन्दर्य दिव्य है।

कुबेर तंत्रम

      सृष्टि के आरम्भ काल से ही इस पृथ्वी पर आस्तिक जगत की आत्माएं एवं नास्तिक जगत की पाप आत्माएं कोषमय जीवन ग्रहण करती रही हैं। यह चैनल आस्तिक जगत की पुण्य आत्माओं के लिए एक तृप्ति का स्रोत है। नास्तिक जगत की पाप आत्माएं सदैव आध्यात्मिक ग्रंथों, पुराणों एवं लेख इत्यादि से दूर भागती हैं एवं इन पाप आत्माओं के लिए आध्यात्मिक ज्ञान एक तरह से विष है इसीलिए वे सदैव नाना प्रकार का रूप धर, नाना प्रकार के मिथ्या प्रचार के द्वारा, तर्क कुतर्क के द्वारा आस्तिक जगत की अमृतमयी शब्द आवृत्तियों का विरोध करती रहती हैं।

          नास्तिक जगत की पाप आत्माएं मंत्र, तंत्र, पूजन, यज्ञानुष्ठान, कर्म काण्ड, योग, ईश्वर, सतसंग इत्यादि की सृष्टि के आरम्भ से घोर विरोधी रही हैं। इन पाप आत्माओं का वश चलता तो अध्यात्म के विभिन्न स्रोत कब के नष्ट हो गये होते, देव पूजन प्रणाली लुप्त हो गई होती, धर्म और सत्य का विनाश हो गया होता परन्तु समुद्र मंथन के समय उल्टा हो गया अमृत देवताओं को मिला, निधियाँ देवताओं को मिल, धनवन्तरी का आशीर्वाद देव शक्तियों को प्राप्त हुआ। कामधेनु, कल्प वृक्ष उच्चैः श्रवा अश्व, ऐरावत इत्यादि सब कुछ देवताओं को मिला एवं असुरों को कुछ नहीं मिला। सृष्टि का आरम्भ ही कुछ इस प्रकार का है कि सिर्फ युद्ध ही युद्ध, मृत्यु ही मृत्यु, पतन ही पतन अनुभूत करने को मिलता है। युद्ध से क्लिष्टता उत्पन होती है, युद्ध से हार भी उत्पन्न होती है। 

         ब्रह्मा ने शिव के आदेशानुसार सृष्टि की रचना कर दी परन्तु प्रारम्भ में सृष्टि बड़ी भीषण थी एवं सृष्टि का प्रारम्भ ही युद्ध से हुआ है। सृष्टि का निर्माण करते समय ब्रह्मा ने कोशमय जीवन को प्रादुर्भावित किया, नाना प्रकार का कोषमय जीवन उदगमित् हुआ पर कौन श्रेष्ठ है? कौन उत्तम है? कौन योग्य है ? इसका निर्धारण ब्रह्मा ने नहीं किया। यह तो उन्होंने समय पर छोड़ दिया, कोश आधारित जीवन की योग्यता पर छोड़ दिया। जो योग्य होगा, जो अपनी सर्वश्रेष्ठता प्रदर्शित करने में सक्षम होगा, जो विकास के पथ पर चर्मोत्कर्ष के साथ गतिशील होगा वही श्रेष्ठतम होगा अन्यथा समय के साथ कोशमय जीवन नष्ट हो जायेगा। कालान्तर विभिन्न प्रवृत्तियों से युक्त कोषमय जीवों ने विशेष योग्यताएं हासिल करना शुरु कर दीं, सबने चर्मोत्कर्ष में अनुसंधान शुरु कर दिया, घनघोर संघर्ष मच गया। देवता और असुर आपस में भिड़ गये, पशु और मनुष्य आपस में भिड़ गये, ग्रह नक्षत्र आपस में युद्ध कर रहे थे। पंचभूत जिन्हें हम अग्नि, वायु, भूमि, जल, आकाश कहते हैं आपस में युद्धरत थे। 

           पंचभूतों का अस्तित्व बिल्कुल अलग- अलग है एवं इनमें आपस में कभी भी सामन्जस्य नहीं बैठता। यह सतत् एक दूसरे पर श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए युद्धरत रहते हैं। कभी जल, पृथ्वी पर भारी पड़ता है तो पृथ्वी जल मग्न हो जाती है। वायु अपना प्रचण्ड स्वरूप दिखा जल को भी उड़नशील बना देती है। दहकती हुई अग्नि जल के कोष को सुखा देने में कोई कसर नहीं छोड़ती तो वहीं अथाह जल राशि अग्नि के न्यूनतम बीज को भी शांत करके रख देती है एवं हजारों वर्षों तक अग्नि जल के अंदर विलीन होकर रह जाती है। प्रकाश को भी खा जाती है वायु कभी-कभी विचित्र समायोजन भी जो जाता है, वायु और जल मिलकर एक अद्भुत संरचना तैयार कर लेते हैं एवं हजारों वर्षों तक भूमि पर प्रकाश की एक किरण भी नहीं आ पाती है। प्रकाश को न्यूनतम स्थितियों में पहुँचा देता है मेघमय आकाश। जल को हिम में परिवर्तित करके रख देती है सूर्याग्नि की विशेष अवस्था कितना युद्ध है पंचभूतों में, बेमतलब का युद्ध। 

         इन सबसे ऊपर है चेतना। चेतना के परम कोष से ही चिंतन, तर्क, बुद्धि, सोच, ज्ञान, संवेदना, विलक्षणता, विद्या इत्यादि का प्रादुर्भाव होता है। कालान्तर ऊपर वर्णित प्रत्येक स्थिति एक विशेष कोश एवं ग्रंथि का स्वरूप ग्रहण करती है। ब्रह्मा ने सर्वप्रथम तत्व निर्मित किये, पंचभूत निर्मित किये। पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, अग्नि इत्यादि निर्मित किये, असुरत्व निर्मित किया, देवत्व निर्मित किया पर तत्वों से काम नहीं चलता। सूर्यत्व से काम नहीं चलेगा, बुद्धत्व से काम नहीं चलेगा क्योंकि इनमें एकात्मकता नहीं है बल्कि सम्पूर्णता के साथ विभिन्नता है एवं इस प्रकार की सृष्टि तो अलयात्मक हो जाती है। ब्रह्मा पुनः शिव के पास गये क्या करें? किस प्रकार लयात्मकता लायें, शिव ने कहा जीवत्व का निर्माण करो, जीवत्व के रूप में एक ऐसे परम तत्व का निर्माण करो जो कि मेरा ही अंश हो, जो कि समस्त तत्वों को एकत्रित कर सके, एक सूत्र में पिरो सके, एक लय में बांध सके, एक दूसरे पर निर्भर कर सके एवं जीवन का उदय हो सके।

       ब्रह्मा ने बस यही ब्रह्म विद्या शिव से प्राप्त की और ब्रह्म विद्या के कारण ही ब्रह्मा कहलाये। ब्रह्मा वह जिसने सर्वप्रथम शिव के परम ज्ञान कुबेरत्व को समझा। कुबेरत्व का तात्पर्य ही है बैर विहीन, शत्रुता विहीन, एकत्रीकरण, समायोजन सृष्टि का निर्माण तभी ब्रह्मा के लिए सार्थक हुआ जब उन्होंने जीवत्व के रूप में जीव का निर्माण किया। जीव रूपी महाकोष में से ही आत्मा का उदय हुआ, इसी कोष में से परमात्मा का उदय हुआ, इसी कोष में से पाप आत्माओं और पुण्य आत्माओं का भी उदय हुआ। अतः मुमुक्षजनों को आत्म की खोज करनी पड़ती है, आत्मा का अनुसंधान करना पड़ता है। कालान्तर इसी जीवात्मा ने शरीर का निर्माण किया चार आयामी शरीर, पाँच आयामी शरीर, दो आयामी शरीर, तीन आयामी शरीर और इस प्रकार कोषमय जीवन का प्रारम्भ हुआ। 

          कोष के अधिष्ठाता हैं कुबेर कोष के रक्षक हैं कुबेर, कोष के प्रतिष्ठित देव हैं कुबेर कुबेर लोकपाल हैं, वह इन्द्र के समान लोकेश्वर हैं, कुबेरत्व रक्षात्मक शैली का परिचायक है। देखो एक छोटा सा कीड़ा शंख जैसा मजबूत हड्डी का खोल बना लेता है, स्वयं की रक्षा के लिए वह शंख को इस प्रकार से बनाता है कि उसका जीवन दीर्घ हो सके, वह पूर्णता के साथ भोग कर सके। वह सुगमता के साथ चैन की नींद सो सके। उसका अस्तित्व काल के द्वारा प्रभावित न हो, वह जन्म जन्मांतर तक अपनी आने वाली पीढ़ियों को आगे बढ़ाता रहे इसलिए उसने भीषण तप किया, स्वयं के अंदर से अस्थियों का एक अद्भुत बाहरी खोल रच दिया। खुद अस्थिविहीन होता है, हाँ शंख का जीव आंतरिक रूप से तो अस्थिविहीन है पर बाह्य अस्थि की रचना ब्रह्माण्ड में सर्वश्रेष्ठ है। चाहे एक आयामी जीव हो या पांच आयामी जीव इन्होंने अपने रहने के लिए जो कोश तैयार किया उसमें ब्रह्मा द्वारा सर्वप्रथम निर्मित विभिन्न तत्वों का ही संग्रहण है। 

         वनस्पति में चंद्रत्व भी है, सूर्यत्व भी है, अग्नितत्व भी है अर्थात सभी तत्वों का संग्रहण है, सभी तत्वों का. संगठन है। एकत्रीकरण का यही खेल जीवन के विभिन्न रंग उत्पन्न करता है। कुछ ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुछ छूट गया हो, कुछ नहीं छूटता। कुछ न छूटना, समस्त तत्वों का हां ब्रह्माण्ड के समस्त तत्वों का एकत्रीकरण ही कुबेर सिद्धि है। क्योंकि जीव है इसलिए कुबेर सिद्धि तो होगी ही, जीव को किसी से बैर नहीं है वह तो प्रवृत्ति से ही संग्राहक है। संग्रह ही जीव का प्रारम्भिक लक्षण है। जीवात्मा प्रकृति से ही संग्रह करती है अगर संग्राहक न होती, संग्रह करने की शक्ति न होती तो वह अद्वैत रहती एवं द्वैत स्वरूप का निर्माण ही नहीं होता। अद्वैत तो शिव हैं, द्वैत तो जीव है। अद्वैत के पास ही द्वैत होता है। अद्वैत तो मोक्ष है और भोग द्वैत है। कुबेर के सानिध्य में ही शिव निवास करते हैं। भोग के बगल में ही मोक्ष होता है। हो सकता है जीव ने जिस कोश का निर्माण किया है उसमें ब्रह्म निर्मित कुछ तत्व न्यूनतम हों, सूक्ष्मतम हों, अल्पतम हों पर होंगे सब, यह एक वैज्ञानिक सत्य है। 

           यह विभिन्नता का खेल है, यह जीव की शक्ति और प्रवृत्ति पर निर्भर करता है। वायु सभी ग्रहण करेंगे, सभी प्रकार के जीवन में अग्नि तत्व विराजमान होगा। कम होगा या ज्यादा ये जीव की अवस्था पर निर्भर करता है। समुद्र में भी स्वर्ण तत्वं है, वायु में भी स्वर्ण तत्व है, प्रत्येक मनुष्य के शरीर में भी स्वर्ण होता है, प्रत्येक व्यक्ति में स्वर्णत्व मौजूद है। इस पृथ्वी पर निवास करने वाली प्रत्येक जैविक कोशिका में स्वर्णत्व है, सूर्यत्व है एवं सूर्य रूपी जीवित जागृत ग्रह व्यवस्था में भी स्वर्णत्व है, जलत्व भी है, गुरुंत्व भी है। हाँ यह बात और है कि किस रूप में है, कितनी मात्रा में है पर है जरूर इसे कहते हैं कुबेर रहस्यम् इससे सिद्ध होता है कि जीवन ब्रह्माण्ड के प्रत्येक ग्रह पर है। ब्रह्माण्ड का प्रत्येक ग्रह एवं पिण्ड पूर्ण जागृत, चैतन्य, जीवित और स्पंदित है। सभी जगह भोग है। भोग की विभिन्न आवृत्तियाँ हैं, भोग की विभिन्न दशायें हैं सनातन धर्म इसी गूढ़ चिंतन पर आधारित है। 

        सनातन का मतलब सत्य, परम सत्य जो कि अकाट्य है। मैं उस सत्य की बात नहीं कर रहा हूँ जो पंचेन्द्रियों पर आधारित है, सनातन धर्म पंचेन्द्रियों से अलग है। सनातन धर्म की व्याख्या पंचेन्द्रियों से सम्भव नहीं है। पंचेन्द्रियों से तो मनुष्य द्वारा निर्मित अदालतों में तथाकथित सत्य की व्याख्या होती है और इस प्रकार का सत्य, सत्यत्व के परम कोश से नहीं आता। यह तो नकली सत्य है एवं इस सत्य के आधार पर दुनिया नहीं चलती इस प्रकार का सत्य आस्तिक जगत में नहीं चलता, सत्य की यह परिभाषा नास्तिकों द्वारा निर्मित कृत्रिम सत्य है जो कि घातक और झूठ को सत्य से ढँकने की मिथ्या कोशिश है इसलिए निरापराध अपराधी ठहराये जाते हैं, अपराधी निरपराध बनकर घूमते हैं।

       हिन्दुत्व क्या है ? हिन्दुत्व पूर्ण रूप से पुनर्जन्म के आधार स्तम्भ पर टिका हुआ है। सनातन धर्म में जीव व्यवस्था का वैज्ञानिक एवं सूक्ष्मातीत ब्रह्म सिद्धांत लागू होता है। कृष्ण, राम, दत्तात्रेय से लेकर सभी ऋषि-मुनियों ने कहा है कि जिस प्रकार की वृत्ति होगी उसी प्रकार जीव विभिन्न सूक्ष्मातीत लोकों में जाकर शरीर ग्रहण करेगा बस इसी सिद्धांत पर सारा हिन्दू धर्म टिका हुआ है। भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों को एक साथ रखकर हिन्दू धर्म सोचता है। भूतकाल में हमारे पास क्या शरीर था ? वर्तमान में हमारे पास किस प्रकार का शरीर है एवं आने वाले भविष्य में हम किस-किस प्रकार के शरीर ग्रहण कर सकते हैं? किस-किस प्रकार के लोकों के निवासी बन सकते हैं? हमारी जीवात्मा किस प्रकार के दिव्य एवं पतित कोशों की अधिष्ठात्री बन सकती है यह सब कुछ निर्भर करता है हमारे कर्मों पर कर्मों का क्या तात्पर्य है ? कर्मेन्द्रियां क्या हैं? हमें ब्रह्मां ने कर्मेन्द्रियां क्यों प्रदान की हैं ? इसका विलक्षण चिंतन है सनातन धर्म में कर्मेन्द्रियों का तात्पर्य है संग्रहण करने वाले तंत्र, वह विशेष तांत्रकीय प्रणालियां जिसके माध्यम से जीव संग्रहण करता है। इन प्रणालियों में सूक्ष्म, परा एवं स्थूल तंत्र आते हैं। हाथ, आँख, नाक, कर्ण इत्यादि स्थूल कर्मेन्द्रियां हैं परन्तु कर्म तो मन के द्वारा भी सम्पन्न होते हैं, बुद्धि के द्वारा भी कर्म सम्पन्न होते हैं, स्वप्न में भी कर्म सम्पन्न होते हैं, गुप्त रूप से भी कर्म सम्पन्न होते हैं, गुप्त पाप भी होते हैं, गुप्त दान भी होता है, मन के द्वारा व्याभिचार भी होता है, सब कुछ होता है और कर्म की अनेकों अवस्थायें चेतन, अवचेतन, मूच्छित, निद्रित इत्यादि अवस्थाओं में सम्पन्न होती रहती है। 

          उन्हीं के आधार पर जीव के शरीर रूपी कोश में प्रतिक्षण परिवर्तित होता रहता है एवं उसे प्रतिक्षण विभिन्न प्रकार की प्राप्ति शरीर के ऊपर स्पष्ट दिखाई देती है। कर्म ही जीव का तप है और तप के अंदर प्राप्ति की लालसा छिपी हुई रहती है। कर्म से एक निश्चित फल की प्राप्ति होती है, यह सत्य है। आप चलेंगे तो एक निश्चित स्थान पर पहुँच ही जायेंगे चाहे आप मन से चलें या बेमन से, पूर्ण एकाग्रता के साथ चलें या अर्ध एकाग्रता के साथ परन्तु लक्ष्य प्राप्त हो ही जाता है क्योंकि कर्मेन्द्रियां गतिशील हैं अतः सनातन धर्म के दिव्य कोष में अगर आपको मनुष्य के रूप में जन्म मिला है तो निश्चित ही आपको सनातन धर्म के उद्धारक, प्रवर्तक, प्रचारक प्रसारक दिव्य आत्माओं द्वारा निर्मित ब्रह्म ज्ञान को आत्म सात कर लोक परलोक, पाप पुण्य, पुनर्जन्म पर आस्था के साथ जीवन निर्वाह करना होगा अन्यथा आप हिन्दू कहलाने योग्य नहीं हैं।

स्वरविज्ञान और ज्योतिष शास्त्र ।।

स्नेह वंदन...!!! 

मानव - शरीर पंचतत्त्वों का बना हुआ ब्रह्माण्ड का ही एक छोटा स्वरूप है। ईश्वर की असीम कृपा से जन्म के साथ ही मानव को स्वरोदय-ज्ञान मिला है। यह विशुद्ध वैज्ञानिक आध्यात्मिक ज्ञान-दर्शन है, प्राण ऊर्जा है, विवेक शक्ति है।

संसार के सब जीवों में से मनुष्य ही एकमात्र कर्म योनि है। शेष सब भोग योनियाँ हैं। स्वर-साधना से ही हमारे
ऋषि-मुनियों आदि ने अनुभव से भूत, भविष्य और वर्तमान को जाना है। अब यह मनुष्य के हाथों में है कि इस स्वरोदय-
विज्ञान का कितना उपयोग और उपभोग करता है। भारतीय ज्योतिषशास्त्र में अंक-ज्योतिष, स्वप्न-ज्योतिष, स्वरोदय-ज्योतिष, शकुन-ज्योतिष, सामुद्रिक-हस्तज्योतिष, शरीरसर्वांगलक्षण ज्योतिष आदि पर अनेकानेक ग्रन्थ हैं। इन सबमें अति प्राचीन, तत्काल प्रभाव और परिणाम देने वाला स्वरोदय-विज्ञान है।मनुष्य की नासिका में दो छिद्र हैं-दाहिना और बायाँ। दोनों छिद्रों में से केवल एक छिद्र से ही वायु का प्रवेश और बाहर निकलना होता रहता है। दूसरा छिद्र बन्द रहता है। जब दूसरे छिद्र से वायु का प्रवेश और बाहर निकलना प्रारम्भ होता है तो पहला छिद्र स्वत ही स्वाभाविक रूप से बन्द हो जाता है अर्थात् एक चलित रहता है तो दूसरा बन्द हो जाता है। इस प्रकार
वायुवेग के संचार की क्रिया-श्वास-प्रश्वास को ही स्वर कहते हैं। स्वर ही साँस है। साँस ही जीवन का प्राण है। स्वर का दिन-रात २४ घंटे बना रहना ही जीवन है। स्वर का बन्द होना मृत्यु का प्रतीक है।

स्वर का उदय सूर्योदय के समय के साथ प्रारम्भ होता है। साधारणतया स्वर प्रतिदिन प्रत्येक अढ़ाई घड़ी पर अर्थात एक-एक घंटे के बाद दायाँ से बायाँ और बायाँ से दायाँ बदलते हैं और इन घड़ियों के बीच स्वरोदय के साथ पाँच तत्त्व-पृथ्वी (20 मिनट), जल (16 मिनट), अग्नि (12 मिनट), वायु (8 मिनट), आकाश (4 मिनट) भी एक विशेष समय-क्रम से उदय होकर क्रिया करते रहते हैं। प्रत्येक (दाहिना-बायाँ) स्वर का स्वाभाविक गति से 1 घंटा-900 श्वास संचार का क्रम होता है और
पाँच तत्त्व 60 घड़ी में 12 बार बदलते हैं। एक स्वस्थ व्यक्ति की श्वास-प्रश्वास-क्रिया दिन-रात अर्थात् 24 घंटे में 21600 बार होती है। 

नासिका के दाहिने छिद्र को दाहिना स्वर या सूर्यस्वर या पिंगला नाडी-स्वर कहते हैं और बायें छिद्र को बायाँ स्वर या चन्द्रस्वर या इडा नाडी-स्वर कहते हैं। इन स्वरों का आत्मानुभव व्यक्ति स्वयं मन से ही करता है कि कौन-सा स्वर चलित है, कौन-सा स्वर अचलित है। यही स्वरविज्ञान ज्योतिष है।
कभी-कभी दोनों छिद्रों से वायु-प्रवाह एक साथ निकलना प्रारम्भ हो जाता है, जिसे सुषुम्ना नाड़ी-स्वर कहते हैं । इसे उभय-स्वर भी कहते हैं । शरीर की रीढ़की - हड्डी में ऊपर मस्तिष्क से लगाकर मूलाधारचक्र (गुदद्वार) तक सुषुम्ना नाड़ी रहती है। इस नाड़ी के बायीं ओर चन्द्रस्वर नाड़ी और दायीं ओर सूर्यस्वर नाड़ी रहती है। स्वर-संचार-क्रिया में अनेकानेक प्राणवाही नाड़ियाँ होती हैं, जिसमें प्रमुख इडा, पिंगला और सुषुम्ना ही हैं। हमारे शरीर में 72 हजार नाड़ियों (धमनियों, शिराओं, कोशिकाओं) का जाल फैला हुआ होता है, जिसका नियन्त्रण-केन्द्र मस्तिष्क है। मस्तिष्क से उत्पन्न मन के शुभ-अशुभ विचारों का प्रभाव नाड़ी तन्त्र पर पड़ता है, जिससे स्वरों की संचार गति धीमी और तेज हो जाती है। इसका प्रभाव मूलाधारचक्र, स्वाधिष्ठानचक्र, मणिपूरचक्र, अनाहतचक्र,
विशुद्धचक्र, आज्ञाचक्र और सहस्त्रारचक्र पर भी पड़ता है। इससे शारीरिक और मानसिक परिस्थितियों एवं घटनाओं का पूर्वाभास हो जाता है। यही स्वरोदय ज्योतिष है।

स्वरोदय-विज्ञान में चन्द्रमा को अधिष्ठात्री माना गया है। वर्षभर की अनुकूलता-प्रतिकूलता के सन्तुलन का पता
चैत्रशुक्ल प्रतिपदा से तृतीया तक स्वर-संचार गति को देखकर
मालूम किया जाता है कि वर्ष कैसा रहेगा? इन तीन दिनों की तिथि में सूर्योदय के समय शय्यात्याग के साथ प्रातःकाल चन्द्रस्वर (बायाँ स्वर)-का उदय-संचार अनुकूल-शुभ माना जाता है, जबकि सूर्यस्वर का उदय-संचार प्रतिकूल-अशुभ माना गया है। 

चन्द्रमा की गति के अनुसार प्रत्येक मास में पन्द्रह-पन्द्रह दिनों के शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष होते हैं। इनमें तिथियों की गणना सूर्यस्वर के समय से ही दिन-रात 24 घंटे की मानी जाती है। सूर्यस्वर के साथ स्वर और तिथियों का नैसर्गिक घनिष्ठ सम्बन्ध है। स्वस्थ पुरुष का स्वरोदय दोनों पक्षों में निम्न प्रकार है।

शुक्लपक्ष में स्वरोदय..शुक्लपक्षमें 1,2,3,7, 8,9,13,14,15 (पूर्णिमा) तिथियों तक प्रात: काल सूर्योदय काल में शय्या त्याग के साथ चन्द्रस्वर (बायें स्वर) का संचार होता है और इसी प्रकार 4,5,6,10,11,12 तिथियों को सूर्यस्वर (दायें स्वर) का संचार होता है।

कृष्ण पक्ष में स्वरोदय..कृष्ण पक्ष में 1,2,3,7,8, 9,13,14,15 (अमावस्या) तिथियों में सूर्योदयकाल में प्रात:काल शय्यत्याग के साथ सूर्यस्वर (दाहि ने स्वर)- का संचार होता है। इसी प्रकार 4, 5, 6, 10, 11, 12 तिथियों को चन्द्रस्वर का संचार होता है।

कभी-कभी तिथि के घटने पर 2 दिन में और बढ़ने पर 4 दिन में स्वर स्वत: बदल जाते हैं। 

स्वरों के गुण, धर्म, प्रकृति और कार्य.. (1) चन्द्रस्वर में सभी प्रकार के स्थिर, सौम्य और शुभ कार्य करने चाहिये। यह स्वर साक्षात् देवी स्वरूप है। यह स्वर शीतल प्रकृति का होने से गर्मी और पित्तजनित रोगों से रक्षा करता है।

(2) सूर्यस्वर में सभी प्रकार के चलित, कठिन कार्य करने से सफलता मिलती है। यह स्वर साक्षात् शिवस्वरूप है। उष्ण प्रकृति का होने से सर्दी, कफजनित रोगों से रक्षा करता है। इस स्वर में भोजन करना, औषधि बनाना, विद्या और संगीत का अभ्यास आदि कार्य सफल होते हैं।

(3) सुषुम्ना स्वर साक्षात् कालस्वरूप है। इसमें ध्यान, धारणा, समाधि, प्रभु-स्मरण और कीर्तन श्रेयस्कर है। स्वरोदय शास्त्र और आरोग्यता-आरोग्यता के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मनुष्य बड़ा उदासीन है। वह यम-नियम, आहार-विहार, आचार-विचार रहन-सहन, जल्दी सोना, जल्दी उठना आदि अनेकानेक नियमों तथा सिद्धान्तों का पालन करता दिखायी नहीं देता। इसके
विपरीत देर से सोने तथा देर से उठने का फैशन बन गया है। इसके परिणामस्वरूप स्वरों की गति-चाल में अनियमितता पैदा होने से व्यक्ति बीमार हो जाता है, रोगग्रस्त हो जाता है। वह चिकित्सा में धन और समय दोनों का व्यय करता है। जबकि स्वरोदय सरल, सुबोध, सस्ती, अहिंसक और अनौषधि चिकित्सा पद्धति है। इसमें किसी भी प्रकारका आर्थिक व्यय और समय नष्ट नहीं होता है। व्यक्ति स्वयं ही स्वरोदय-चिकित्सा द्वारा दमा, बुखार, सिरदर्द, पेटदर्द, अजीर्ण, रक्तचाप आदि
अनेकानेक बीमारियों को दूर भगा सकता है। इसके लिये स्वर-परिवर्तन विधियों की जानकारी होना आवश्यक है। स्वर की अमूल्य निधि का सही उपयोग करने वाला सर्वदा सुखी और स्वस्थ रहता है।

स्वर-परिवर्तन की विधियाँ

(1) जो स्वर चलाना चाहो, उसके विपरीत करवट बदलकर उसी हाथ का तकिया बनाकर लेट जाओ। थोड़ी देर में स्वर बदल जायगा। जैसे यदि सूर्यस्वर चल रहा है और चन्द्रस्वर चलाना है तो दाहिनी करवट लेट जाओ।

(2) कपड़े की गोटी बनाकर या हाथ के अंगूठे से नासिका का एक छिद्र बन्द कर दो। जो स्वर चलाना हो, उसे खुला रखो, स्वर बदल जाएगा।

(3) बगल में तकिया दबाकर रखने से भी स्वर बदल जाते हैं।

(4 ) अनुलोम-विलोम, नाडीशोधन, प्राणायाम, पूरक, रेचक, कुम्भक, आसन तथा वज्रासन से भी स्वर- परिवर्तन हो जाता है। स्वर-परिवर्तन में मुँह बन्द रखना चाहिये। नासिका से स्वर-साधन करें।।

चलित स्वर की प्रधानता में कार्य

(1) प्रात:काल सूर्योदयकाल के बाद भी चलित स्वरवाली करवट से उठो और बैठकर उसी तरफ की हथेली के दर्शन कर मुँह पर घुमाओ। फिर दोनों हथेलियों को देखकर, मिलाकर रगड़ो, फिर चेहरे पर घुमाओ, फिर सारे शरीर के हाथ-पैर पर घुमाओ। इसके बाद मंत्र बोलो-

"कराग्रे वसते लक्ष्मीः करमध्ये सरस्वती।
करमूले स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम" 

अर्थात्... हाथों के अग्रभाग में लक्ष्मी, मध्य में सरस्वती और मूल में ब्रह्माका निवास है। ऐसे पवित्र हाथों का प्रात:काल स्वर के साथ दर्शन करना चाहिये। कर्म का प्रतीक हाथ ही है। कुछ भी प्राप्त करने के लिये कर्म जरूरी है। इसके बाद बिस्तर त्यागने के साथ जिस ओर का स्वर चल रहा हो, उसी ओर का पैर पृथ्वी पर बढ़ायें और मन्त्र बोलें।

"समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डिते।
विष्णुपनि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्व मे॥"

अर्थात्... समुद्ररूपी वस्त्रों को धारण करने वाली पर्वतरूपी स्तनों से मण्डित भगवान् विष्णु की पत्नी पृथ्वीदेवि! आप मेरे पादस्पर्श को क्षमा करें। इस मन्त्र से सिद्ध होता है कि भारतीय संस्कृति में जड़ वस्तुओं में चेतन को देखने की क्षमता है। तत्पश्चात् चलित स्वर के अनुसार कदम बढ़ाये। यदि चन्द्रस्वर है तो 2, 4, 6 सम में और सूर्यस्वर है तो 1, 3, 5 विषम में कदम बढ़ाये। ऐसा करने से दिन का प्रारम्भ शुभ होता है और इच्छित कार्य में सफलता मिलती है। आरोग्यता के साथ मनोकामना सिद्ध होती है।

(2) चलित स्वर की ओर से हाथ-पैर डालकर कपड़े पहनने से प्रसन्नता बनी रहती है।

(3) दूसरे को देने में, उससे ग्रहण करने में, घर से बाहर जाने पर जिस तरफ का स्वर चलित हो उसी हाथ तथा पैर को आगे करके कार्य करने में सफलता मिलती है। ऐसा करने से व्यक्ति सर्वदा सुखी और उपद्रवों से बचा रहता है।

(4) चलित स्वरोंके अंगोंको प्रधानता देकर हर स्थिति में कार्य किया जा सकता है और सफलता प्राप्त होती है। स्वर-ज्योतिष की जानकारी से मनुष्य शरीर और मन को नियन्त्रित कर रोग, कलह, हानि. कष्ट और असफलता को दूर कर सकता है, इसके साथ ही वह जीवन को आनन्दमय बनाकर परलोक को भी सुधारकर कल्याणको प्राप्त हो सकता है।

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय


श्री यंत्र ।।

         मनुष्य समाज में शब्दों को लेकर सबसे ज्यादा भ्रांति चारों तरफ देखने को मिलती है। अगर हम यंत्र का नाम लेते हैं, मंत्र के बारे में चर्चा करते हैं या फिर यंत्र का उपयोग बताते हैं तो लोग या तथाकथित बुद्धिजीवी तुरत ही आपके बारे में एक विशेष नकारात्मक मानसिकता का निर्माण कर लेते हैं। इसमें बहुत कुछ दोष उन ठगों और तथाकथित अध्यात्मिक संस्थानों और धर्म के ठेकेदारों का भी है जो कि प्रत्येक विद्या के शून्य मात्र ज्ञान के अभाव में भी प्रवचन देते हैं। अध्यात्म को स्वयं की महत्वाकांक्षा पूर्ति का साधन समझते हैं। परंतु एक बात स्पष्ट रूप से समझ लीजिये किसी विद्वान ने ठीक ही कहा है जब तक लोग मूर्ख बनते रहेगें, मूर्ख बनाने वाले भी पैदा होते रहेगें। ऐसा आदिकाल से चला आ रहा है। और आदिकाल तक हमेशा चलता रहेगा, इसमें भी दो मत नहीं है। हर युग में ठगों की भरमार होती है। इसका मतलब यह नहीं है कि किसी विशेष ज्ञान, तकनीक का अस्तित्व ही नहीं है। 
  
          अध्यात्म में अस्तित्व, अनास्तित्व जैसे तथाकथित शब्दों के लिये स्थान ही नहीं है। जो कल था वह आज है कल भी रहेगा। ब्रह्मण्ड लीलाधारी क्रिया से भरा हुआ है। आपको सत्य स्वय पहचानना होगा जब आप सत्य पहचानने के लिये या समझने के लिये अंदर से उठेगें तो ईश्वर कृपा से मार्ग में आये अवरोधों को हटाने वाले भी स्वयं ही उत्पन्न हो जायेंगे। अस्तित्व और अस्तित्व शून्यता व्यक्ति विशेष की मानसिक स्थिति या साक्षात्कार पर निर्भर होती है।

       आज आप किसी क्षण विशेष में शक्ति विशेष का प्रदर्शन करते हैं तो आपको लगता है कि अमुक शक्ति अस्तित्व में है अन्यथा आपका मन डावाँडोल ही होता रहता है। यह आपका सौभाग्य है कि आपने शक्ति विशेष से साक्षात्कार प्राप्त किया परंतु यह जरूरी नहीं है कि आपके परिवार या मित्र भी उस शक्ति विशेष का आश्रय पा लें। चाहे वे आपके साथ ही क्यों न खड़े हों। सभी तांत्रिक हैं। सभी मंत्र पर निर्भर हैं एवं सभी मंत्र शक्ति का उपयोग कर रहें है। इनके अभाव में जैविक संरचना तो क्या अन्य संरचनायें भी सेकेण्ड के करोड़ेवें हिस्से में भी जीवित नहीं रह सकती। ब्रह्माण्ड का प्रत्येक गृह निश्चित ज्यामिती में निश्चित दूरी में स्थित रहकर परिक्रमा कर रहा होता है। प्रत्येक कोशिका का छोटे से छोटा हिस्सा भी अणु परमाणुओं के निश्चित क्रम से आबद्ध है। आपको बीज में मौजूद अनुवाशिक गुण एक निश्चित संरचना लिये हुये हैं। सदगुरु देव ने ठीक ही कहा है जीवन में सब कुछ निश्चित है। 

         आपकी आशुवांशिकता में या फिर प्रत्येक जैविक संरचना की अनुवाशिकता में परिवर्तन इतना निश्चित है कि समय आने पर शरीर की प्रत्येक कोशिका स्वयं कार्य करना बंद कर देगी। जन्म होते से ही प्रत्येक क्षण आने पर कोशिका एक निश्चित स्वरूप धारण करती जायेगी। जैविक तकनीक में परमता है परमतत्व की उपासना इसीलिये गुरु मंत्र में की जाती है। जैसे-जैसे विज्ञान अपने कदम बढ़ाते जा रहा है वैसे-वैसे लोग वेदो और ऋषियों की वाणी बोलने लगे है। जैसे-जैसे अनुवाशिक विज्ञान में शोध होते जा रहे हैं पाश्चात्य सभ्यता मंत्र, तंत्र और यंत्र के प्रति नतमस्तक होती जा रही है। शक्ति मनुष्य की प्रारंभिक आवश्यकता है। शक्ति को आप देव कहते हैं, देवी कहते हैं एवं इस शक्ति को आप अपने लिये विशेष लक्ष्य की प्राप्ति हेतु उपयोग करना चाहते हैं और करना भी चाहिये उसके लिये आपको तकनीक की आवश्यकता पड़ेगी। तकनीक का निर्माण यंत्र की उत्पत्ति करेगा। बिना यंत्र के तकनीक हो ही नहीं सकती। ब्रह्माण्ड में मौजूद चेतना को अगर पंचभूतों का शरीर न प्राप्त हो तो फिर सब कुछ अद्वैत ही होगा। 

            शरीर की आवश्यकता तो आवश्यक है। शरीर के माध्यम से ही शक्ति परिवर्तनकारी हो सकती है। यंत्र को आप शरीर के रूप में अच्छी तरह समझ सकते हैं। शक्ति का निर्माण मनुष्य नहीं कर सकता कदापि यह संभव नहीं है। हां, पर तकनीक और यंत्र के सहारे वह उसे समायोजित कर सकता है। उसकी तीव्रता घटा या बढ़ा सकता है। उसे कार्य विशेष या लक्ष्य सिद्धि के लिये उपयोग कर सकता है। आपके मस्तिष्क के अग्र भाग में दोनों तरफ समस्त गणनाओं के कार्य संपन्न होते हैं। इन दो हिस्सों के अलावा तीसरा हिस्सा तो उपलब्ध नहीं है परंतु तकनीक और कम्प्यूटर रूपी यंत्र के सहारे आप तीसरा क्या चाहे जितना गणना संबंधित कार्य कर सकते हैं। ऐसी अद्भूत शक्ति आपके जीवन में उपलब्ध है जिसके द्वारा आप मस्तिष्क की प्रत्येक क्षमता को बाहरी आयाम देकर असंख्य गुना बढ़ा सकते हैं। यही यंत्र का महत्व है। ठीक इसी प्रकार आपके अंदर उपलब्ध अनेको सम्भावनायें अध्यात्मिक तौर पर मंत्र, तंत्र और यंत्र के द्वारा बढ़ाई जा सकती हैं।

            ऐसा संभव नहीं है कि प्रत्येक मस्तिष्क अति में विकसित हो। मस्तिष्क का विकास लंबी प्रक्रिया है। सदियां बीत जाती हैं। योग, उपवास, ध्यान, समाधि, प्राणायाम भिन्न-भिन्न पूजा विधियां प्रत्येक का महत्व यही है कि मस्तिष्क को एक दूसरे आयाम का बोध कराया जाय। उस आयाम में मस्तिष्क क्या ग्रहण करता है, कैसे क्रिया करता है और किस प्रकार दृश्य विशेष को देखता है यही आवश्यक है। आप 365 दिन भोजन करते हैं तो फिर शरीर में अन्नमय कोष में ही क्रियाशील रहेगा। तीन दिन भोजन छोड़कर देखिये किस प्रकार मस्तिष्क क्रिया संपन्न होती है। पूरी की पूरी सोच ही बदल जायेगी। प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया भिन्न हो जायेगी। ठीक इसी प्रकार सिर के बल खड़े होकर देखिये पता चला सारी प्रक्रियाऐं शरीर के अंदर एकदम बदली हुई नजर आयेगी। चाहे वायु का बहाव हो, नदियों की गति हो या फिर ऋतु परिवर्तन हो इत्यादि इत्यादि सबकी सब क्रियायें तंत्र विशेष में ही संपन्न होती हैं। एक तंत्र में थोड़ा सा बदलाव या फिर नदी की धारा का थोड़ा सा भी मार्ग का बदलना, करोड़ो अरबों उससे जुड़े हुये तंत्रों को बदलकर रख देगा तंत्र स्थूल ही नहीं होते हैं। अति सूक्ष्म अति संवेदनशील तत्रों और आवृत्तियों का जाल आपके चारों तरफ बिहा हुआ है। इन तंत्रों को सफलता पूर्वक संचालित करना इन तंत्रों में से शक्ति को सफलता पूर्वक प्राप्त करना ही सिद्धि है और तंत्रों को भेदकर निकल जाना परम सिद्धि है। 

         शुरू में आप श्री यंत्र को पूजें फिर उसे शरीर में उतार लें। प्रत्येक कण या रक्त की बूंद में उसका स्थापत्य हो इसके पश्चात उसे संप्रेषित करने की ताकत आपमें विकसित होनी चाहिये तब जाकर यंत्र सिद्धि पूर्ण मानी जायेगी। विश्वामित्र ने अनेकों वर्ष की तपस्या के पश्चात् गायत्री मंत्र को प्राप्त किया और फिर जन साधारण में वितरित कर अमर हो गये। ऐसा ही बुद्ध ने किया सबने पहले स्वयं शक्ति को आत्मसात किया और उसके पश्चात् शक्तिकृत होकर जनसाधारण को भी शक्तिवान किया। आप पुस्तकों के माध्यम से प्रवचनों के माध्यमों से या अन्य माध्यमों से जो कि यंत्र का प्रतीक है, स्वयं के जैविक यंत्र रूपी शरीर को ज्ञानवान बनाते है या ज्ञान से शक्तिकृत करते हैं फिर उसे फैलाने का कार्य करते हैं। तकनीक जैविक हो या मानव निर्मित दोनों ही शरीर से जुड़ी हुई है। मानव निर्मित तकनीकों पर तो बहुत ही अच्छा कार्य हुआ है। इसमें दो मत नहीं है परंतु जैविक तकनीक का तो समझने में अभी हम शैशव अवस्था में हैं। इन दोनों का समिश्रण ही एक नये मनुष्य को जन्म देगा। 

         आने वाला युग पूर्ण रूप से तंत्रमय है। तंत्रमय युग में यंत्र रूपी शरीर और मंत्र रूपी शक्ति तो निश्चित तौर पर अति परिष्कृत अवस्था में समायोजित होगी तभी मानव ब्रह्माण्ड के अनेकों ग्रहों पर अस्तित्व में आयेगा। आने वाले भविष्य में वेद वर्णित तकनीकों के अनुसार ही यानों का निर्माण होगा। एक ग्रह से दूसरे ग्रह की यात्रा इन्हीं परम तकनीकों के आधार पर सम्भव हो पायेगी। वेदों में वर्णित तरीकों से ही जीवन का गर्भ धारण होगा। इस प्रकार के मनुष्य परिवर्तनकारी हो सकते हैं। पृथ्वी तो कुल सौ वर्षो में रहने योग्य भी नहीं रह जायेगी। तब कहीं दूर किसी ग्रह पर वेदमय सृष्टि का निर्माण हो रहा होगा। इसे आप भविष्यवाणी कहें या कुछ और परंतु यह परम सत्य है। उपरोक्त बातें इसलिये आवश्यक थीं क्योंकि आगे मै अब तक के यंत्रों में श्रेष्ठ एवं यंत्र राज या महायंत्र जिसे श्री यंत्र के नाम से जाना जाता है का वर्णन करने जा रहा हूं।

           श्री यंत्र मां भगवती त्रिपुर सुंदरी का गृह है। अर्थात परम मोक्ष दायिनी, ऐश्वर्य दायिनी माँ भगवती जिस व्यवस्था में स्थित रहती हैं वह श्री यंत्र स्वरूप ही होता है। इस यंत्र में समग्र ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विकास के दर्शन मौजूद होते हैं एवं इसके साथ ही मानव शरीर की सम्पूर्ण संरचना इस यंत्र में समाहित होती है। श्री यंत्र के भीतरी चक्र में वृत्त के केन्द्रस्थ बिंदु के चारो और 9 त्रिकोण हैं। इनमें से 5 त्रिकोण तो अर्ध्वमुखी हैं एवं चार त्रिकोण अधोमुखी हैं और ऊर्ध्व मुखी 5 त्रिकोण देवी के द्योतक हैं और शिव युवती कहे जाते हैं। अधोमुखी 4 त्रिकोण शिव के द्योतक हैं और श्री कण्ठ कहे जाते हैं। पांचों शक्ति त्रिकोण ब्रह्माण्ड में उपस्थित पंच महाभूत पंचज्ञानेन्द्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय, पंचलोक एवं पंच प्राण के द्योतक हैं। मनुष्य के शरीर में यही 5 त्रिकोणात्मक अष्टक, मांस, मेद तथा अस्थि रूप में स्थित हैं और चारों शिव त्रिकोण ब्रह्माण्ड में चित् बुद्धि अहंकार तथा मन रूप में स्थित है और पिण्ड स्वरूप में मज्जा, शुक्र, प्राण तथा जीव रूप में विद्यमान हैं।

           श्री यंत्र का निर्माण एवं पूजा दो तरीकों से होती है। आदि गुरु शंकराचार्य जी के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण सृष्टि क्रम के अनुसार होना चाहिये एवं उसकी पूजा भी सृष्टि क्रम के अनुसार ही होनी चाहिए। शंकराचार्य द्वारा स्थापित प्रत्येक मठ में श्री यंत्र सृष्टि क्रम के अनुसार ही निर्मित या अंकित किया जाता है। दूसरा क्रम संहार क्रम कहलाता है। इस पद्धति के अनुसार श्री यंत्र में 5 शक्ति त्रिकोण, अधोमुखी बनाये जाते हैं और 4 शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुखी । मुख्य रूप से कौलमत के अनुयायी इसी क्रम से श्री यंत्र की उपासना करते हैं और विशेषतः कौलसम्प्रदाय काश्मीरी पंडितों में देखने को मिलता है इसीलिये कश्मीर में श्रीनगर की स्थापना हुई। उपरोक्त वर्णित 9 त्रिकोण निराकार शिव या रुद्र की 9 मूल प्रकृतियों को दर्शाते हैं जो कि मुख्य रूप से यजुर्वेद में वर्णित हैं। इन 9 त्रिकोणों के समिश्रण से 43 अन्य त्रिकोणों का निर्माण होता है। भीतरी वृत्त के बाहर 8 दल का कमल है। यहां पर में थोड़ा सा विषय से हटकर कुछ बातें आज के युग के हिसाब से लोगो को बताना चाहता हूँ। जब कोई भी क्रिया जैविक संरचनायें सम्पन्न करती हैं तो वह इस पृथ्वी पर अति परिष्कृत अवस्था में होती हैं। उदाहरण के लिये आप किसी भी पुष्प विशेष तौर पर कमल या गुलाब को देखिये जब वह कली स्वरूप में होता है तो सभी पंखुड़ियां आंतरिक शक्ति से एक दूसरे से सटी हुई होती हैं, परंतु धीरे-धीरे जैसे-जैसे पुष्प खिलता है प्रत्येक पखुड़ी विशेष आकार लेकर एक के बाद एक पूर्ण स्वरूप ग्रहण करके एक ज्यामिती का निर्माण करती है।

             इस संरचना के बीच पुष्प रूपी बीज पूरी तरह से सुरक्षित रहता है और इन्हीं पंखुड़ियों के कारण स्त्री रूपी या पुरुष रूपी बीज का मिलन सम्भव हो पाता है। पंखुड़ियों में न तो स्प्रिंग होती है और नही मोटर परंतु कार्य अत्यंत ही सुनियोजित तरीके से होता है। ठीक इसी प्रकार श्री यंत्र के बीच स्थित शिव शक्ति ही कमल दलों में सुरक्षित और पल्लवित होती है। अंतरिक्ष में भेजे जाने वाले उपग्रह या दूसरे ग्रहों पर उतरने वाले यान भी कमल दलों की नकल के अनुसार ही विकसित किये गये हैं वे भी वहां पर जाकर विचित्र वातावरण में ठीक इसी प्रकार खुलते हैं जिस प्रकार से कमल खिलता है। अंत में जैविक तकनीक का सहारा मनुष्य को लेना ही पड़ता है। मानव निर्मित तकनीक कुछ हजार वर्ष पुरानी है परंतु जैविक तकनीक असंख्य वर्षों में परिष्कृत हुई। न जाने कितने ग्रहों और ब्रह्माण्डों की यात्रा के बाद जीवन रूपी बीज पृथ्वी पर स्थापित हो पाया। 8 दल कमल के पश्चात् 16 दलों का कमल निर्मित है और इन सबसे बाहर भूपुर है। आदि गुरु शंकराचार्यजी द्वारा रचित आनंद लहरी में इसका वर्णन निम्न प्रकार से है।

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पञ्चभिरपि प्रभिन्नाभिः शम्भोर्नवभिरपि मूलप्रकृतिभिः । चतुश्चत्वारिंशद्वसुदलकलाब्जत्रिवलय- त्रिरेखाभिः सार्ध तव भवनकोणा: परिणताः ।।

जैसा कि पहले कहा है श्री यंत्र में 9 चक्रों का समायोजन है और इनके विषय में रुदयामल ग्रंथ में इस प्रकार से उल्लेख है
बिन्दुत्रिकोणवसुकोणदशार मन्वस्त्रनागदलसंयुत्तषोडशारम् 
वृत्तत्रयंञ्च धरणीसदनत्रयं च श्रीचक्रराजमुदितं परदेवतायाः ।।

अर्थात राजयंत्र रूपी श्री यंत्र में बिंदु, त्रिकोण, आठ त्रिकोणों का पुनः समूह, 14 त्रिकोणों का समूह, 8 दलों वाला कमल, 16 दलों वाला कमल एवं भूपुर का अद्भुत एवं अद्धितीय समायोजन है। कमलों के भीतर स्थित दो, तीन, चार, पांच और 6 चक्रों के 43 छोटे कोण भी स्थित हैं।
इन 9 चक्रों को निम्नलिखत नामों से पुकारा हैं।

१ सर्वानंदमय चक्र (केन्द्र में उपस्थित रक्तबिंदु)
२ सर्वसिद्धि प्रद चक्र (पीले रंग का त्रिकोण)
३ सर्वरक्षाकारी चक्र ( हरे रंग के 8 त्रिकोण)
४ सर्वरोगहर चक्र ( काले रंग के 10 त्रिकोण)
५ सर्वार्थसाधक चक्र (लाल रंग के 10 त्रिकोण)
६ सर्वसौभाग्यदायक (नीले रंग के 14 त्रिकोण)
७ सर्वसंक्षोमण ( गुलाबी रंग के 8 दलों का कमल)
८ सर्वाशापरिपूरक (पीले रंग के 16 दलों का कमल)
९ त्रैलोक्यमोहन (हरे रंग का बाहरी स्थल)

ऊपर वर्णित चक्रों से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि प्रत्येक चक्र अपना एक विशेष रंग लिये हुये हैं। जब श्री यंत्र का समग्रता से निर्माण किया जाता है तब रंगों का विशेष महत्व होता है। रंग शक्ति की प्रकृति को दर्शाते हैं।

         अब प्रत्येक चक्र की व्याख्या नीचे वर्णित की जा रही है। जहां पर व्याख्या शब्द का इस्तेमाल किया जाता है वहां साधक के पास पूर्ण रूप से यह भाव उपलब्ध होता है कि वह अपने साधना बल या ज्ञान के हिसाब से वर्णन करें। व्याख्या का वैसे तो पूजा प्रणाली में कोई विशेष महत्व नहीं है। श्रृद्धा एवं पूजन अति दुर्लभ तत्व हैं परंतु व्याख्या में बुद्धि और ज्ञान का पुट भी आ जाता है।

         प्रथम चक्र का केंद्र बिंदु माँ भगवती त्रिपुर सुन्दरी है। इस बिंदु का निर्माण ॐ कार रूपी नाद या फिर तीन बिन्दुओं या त्रिशक्ति के संयोग से होता है। प्रथम चक्र की अधिष्ठात्री त्रिपुर सुंदरी कहीं अष्ट मातृकाओं में सर्वश्रेष्ठ कही गई हैं तो कहीं अष्टवाशिनी देवताओं की अधिनायिका कही गई हैं। प्रथम चक्र में स्थित बिंदु मणिक द्वीप भी कहा जाता है। इसी द्वीप में शिव और शक्ति संयुक्त रूप से निवास करते हैं। माँ भगवती अपनी चार भुजाओं में स्थित अस्त्र-शस्त्र, राग द्वेष, मन तथा पञ्चतन्मात्राओं के बधनों द्वारा निराकार शिव को साकार लीला में प्रयुक्त करती हैं अर्थात शिव जैसी निराकारी प्रवृत्ति शिवत्व के रूप में इस पृथ्वी पर माँ त्रिपुर सुंदरी के बंधनों के कारण ही प्रकट हो पाती है। दूसरा चक्र एक त्रिकोण से बना है। इस त्रिकोण मे तीनों कोण कामरूप पूर्ण गिरी और जालंधर पीठ है। इन तीनों पीठों की अधिष्ठात्री देवी कामेश्वरी, वर्जेश्वरी और भगमालिनी है। तीनों कोणों के बीच में औडयाणपीठ ऊपर वर्णित तीनों देवियां प्रकृति महत एवं अहंकार रूपा है।

            तीसरे चक्र में 8 त्रिकोणों का समूह है एवं ये आठ त्रिकोणों की अधिष्ठात्री देवी शक्तियां निम्न हैं। वशिनी, कामेश्वरी, मोहिनी, विमला, अरुणा, जयिनी, शर्वेश्वरी तथा कौलिनी। ये शक्तियां क्रमश: शीत, ऊष्ण, सुख दुख, इच्छा, सत्व, रज, तथा तम की स्वामिनी है। इस चक्र की सिद्धि साधक को गुणों से मुक्ति दिलाती है एवं जीवन में द्वंद की स्थिति का नाश करती है। चौथे चक्र में 10 त्रिकोणों की शक्तियां इस प्रकार से है। सर्वज्ञा, सर्वशक्ति प्रदाय सर्व ऐश्वर्य प्रदाय, सर्वज्ञानमयी, सर्वव्याधिनाशिनी सर्वधारा, सर्वपापहारा, सर्वानंदमयी, सर्वरक्षा तथा सर्वेप्सिताफलप्रदा। यह शक्तियां ऊपर वर्णित शक्तियां क्रमश: रेचक, पाचक, शोषक, दाहक, प्लावक, क्षारक, उद्धारक, शोभक, जम्भक तथा मोहक बहिकलाओं की स्वामिनी है। चौथे चक्र की उपासना साधक को जीवन में समग्रता प्राप्त होती हैं। उसे जो कुछ भी प्राप्त होता है वह उसकी आशा से कई गुना ज्यादा होता है अर्थात अगर रोगों का नाश होता है तो समग्रता से होता है। समग्र रोगनाश का तात्पर्य शारीरिक, मानसिक, अध्यात्मिक एवं परमदैहिक रोगों से है। सभी अनुवाशिक पापों का भी नाश होता है। इसी प्रकार फल प्राप्त होते हैं तो वे भी सम्पूर्णता लिये होते हैं।

        पांचवें चक्र में स्थित 10 देवियों के नाम इस प्रकार से हैं सर्वसिद्धिपदा, सर्वसम्पत्प्रदा, सर्वप्रियङ्करी, सर्वमंगलकारिणी, सर्वकामप्रदा सर्वदुः खविमोचनी, सर्वमृत्युप्रशगनी, सर्वविघ्ननिवारिणी, सर्वाङ्गसुन्दरी तथा सर्वसौभाग्यदायिनी है। पांचवे चक्र में वर्णित दसों देविया प्राणों को जल प्रदान करती है इनके द्वारा प्राप्त फल प्राणों को बलशाली करते हैं। प्राणशक्ति का विकास पांचवे चक्र की विशेषता है। 

          छठवें चक्र में 14 त्रिकोण हमारे शरीर में 14 मुख्य नाड़ियों के द्योतक हैं। वेद एक बात साफ तरीके से कहते हैं कि जो कुछ ब्रह्माण्ड में है वही शरीर में है। फर्क सिर्फ लघुता और विशालता का है। इन 14 नाडियों के नाम नीचे वर्णित हैं

           इन नाड़ियों के नाम अलम्बुसा, कुहु, विश्वोदरी, वारणा हस्तिजिहा, यशोवती, पयस्विनी, गान्धारी, पूषा, शङ्खिनी, सरस्वती, इडा, पिङ्गला तथा सुषुम्णा हैं।

   एवं इन नाड़ियों की स्वामिनी देवियाँ सर्वसक्षोभिणी, सर्वविद्राविणी, सर्वाकर्षिणी, सर्वाह्लादिनी, सर्वसम्मोहिनी, सर्वस्तम्भिनी, सर्वजम्भिनी सर्वशङ्करी, सर्वरज्जिनी, सर्वोन्मादिनी सर्वार्थसाधनी, सर्वसम्पत्तिपूरणी, सर्वमंत्रमयी, सर्वद्वन्द्वक्षयङ्करी हैं।

        मंत्र हमारे शरीर के समान जीवित, चैतन्य एवं जाग्रत संरचनायें हैं। इसे आप अच्छी तरह से मन में बिठा लें जिस प्रकार शरीर अस्थि, मांस, नाड़ियाँ, गथ्रियां, रक्त ज्ञान, बुद्धि, प्राण, इत्यादि इत्यादि ठीक उसी प्रकार यंत्र की नाड़ी युक्त होते हैं। बिना नाड़ियों के शक्ति प्रवाह संभव नहीं है। हर नाडी अपना महत्व रखती है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार हमारे शरीर में उपस्थित प्रत्येक तंत्रिका तंत्र अपना महत्व रखती है। जिस तंत्रिका तंत्र में से प्रकाश को निकलना होगा उसमें से ध्वनि नहीं निकल सकती एवं जिस तंत्रिका तंत्र का कार्य मूत्र निष्कासन होगा उसमें से रक्त नहीं निकल सकता। जो तंत्रिका तंत्र ज्ञान को ग्रहण करते हैं वे दर्द का अनुभव नहीं कर सकते।

       सातवें चक्र में आठ कमल दल हैं एवं प्रत्येक दल अलग-अलग शक्तियों का ग्रह स्थान है। वचन, आदान, गमन, निसर्ग, आनंद, दान, उपादान तथा उपेक्षा की बुद्धियों के स्थानापन हैं। इन दलों की स्वामिनी देवियां इस प्रकार है अनङ्ग कुसुमा, अनङ्ग मेखला, अनङ्ग मदना, अनङ्गमदना तुरा, अनरेखा, अनङ्गवेगिनी, अनङ्गमदनांकुशा तथा अनङ्गमालिनी हैं। इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि बुद्धि का स्थान हमारे शरीर में सातवें चक्र में आता है। इससे पहले के चक्र में बुद्धि की उपयोगिता शून्य हैं। वे शुद्ध शक्ति का प्रतीक है। बुद्धि का उद्भव अंत में ही उचित होता है। 

        आज के युग में अधिकांशतः मनुष्य इस चक्र में सिद्ध होता है। क्योंकि कालान्तर बौद्धिक ग्रंथियों का विकास समाज के अनुसार अत्यधिक हुआ है। आठवे चक्र में मौजूद 16 दलों का संबंध मन, बुद्धि, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, चित्त, धैर्य, स्मृति, नाम, वार्धक्य, सूक्ष्म शरीर जीवन तथा स्थूल शरीर से है और इनकी स्वामिनी देवियाँ इस प्रकार से हैं कामाकर्षिणी, बुद्धयाकर्षिणी, अहङ्कारकर्षिणी, शब्दाकर्षिणी, स्पर्शाकर्षिणी, रूपाकर्षिणी, रसाकर्षिणी, गन्ध कर्षिणी, चित्ताकर्षिणी, धैर्याकर्षिणी, स्मृत्याकर्षिणी, नामाकर्षिणी, बीजाकर्षिणी, आत्माकर्षिणी, अमृताकर्षिणी तथा शरीराकर्षिणी हैं।

        उपरोक्त वर्णन से साधक को यह समझ लेना चाहिये कि उसकी अधिकांशतः शिक्षा या ज्ञान मात्र आठवें चक्र का विषय है। आठवां चक्र मेरे हिसाब से पशुतुल्य शक्ति का प्रतीक है। अधिकांशतः सभी पशुओं में यह चक्र विकसित होता है एवं समस्त जीवन इस चक्र के इर्द-गिर्द भी घूमता है।

मंत्र शक्ति ।।

       कंठ के अंदर मटर को फली के बराबर लगभग एक इंच का एक ऐसा दिव्य यंत्र लगा हुआ है जिससे कि मनुष्य के अंदर ध्वनि का प्रादुर्भाव होता है। सिर्फ मनुष्यों के ध्वनि यंत्र में ही एक मटर के दाने के बराबर की एक ऐसी ग्रंथि है जिससे कि ध्वनि शब्दों में परिवर्तित होती है। इस ध्वनि केन्द्र का नियंत्रण कक्ष मस्तिष्क में स्थित है। जरा आप सोचिए एक मटर के दाने के बराबर का जैविक यंत्र इस ब्रह्माण्ड में कितनी ध्वनियाँ उत्पन्न कर रहा है। इसी ध्वनि के कारण अखबार, प्रवचन, पुस्तक, दूरदर्शन, वाक युद्ध, गायन, नृत्य इत्यादि इत्यादि सभी प्रादुर्भाव में आये हैं। ध्वनि परम आदि ब्रह्माण्डीय शक्ति है। इस ब्रह्माण्ड का प्रत्येक कण और हमारे शरीर की प्रत्येक कोशिका ध्वनि की शक्ति से सम्पुट है। 

           प्रत्येक कोशिका ध्वनि अनुसार ही क्रियान्वित होती है। जिस प्रकार शरीर को पुष्ट रखने के लिए शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध अग्नि, शुद्ध प्राण शक्ति और शुद्ध भूमि की आवश्यकता होती है उसी प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग को पूर्ण आयु प्रदान करने के लिए दिव्य एवं पवित्र ध्वनि तरंगों की भी आवश्यकता होती है। ध्वनि की तरंग एक माध्यम है जिनके ऊपर सुर-असुर एवं अन्य शक्तियाँ आरूढ़ होती है। ध्वनि केवल मनुष्यों के बीच सम्प्रेषण का ही माध्यम नहीं है, बल्कि इस ब्रह्माण्ड की दिव्य से दिव्य योनियों और दैव शक्तियों से इसके माध्यम से सम्प्रेषण किया जाता है। सम्प्रेषण ही निकटता है। निकटता से ही प्रेम सम्बन्ध और आदान-प्रदान सम्भव है।

             जब तक दैव शक्तियों से सम्प्रेषण नहीं होगा उन्हें समझना, उनका आह्वान करना और उन्हें स्थापित करना नामुमकिन है। ध्वनि की तरंगें पूर्ण रूप से चेतनामयी है। हमारे शरीर में अगर अमृत्व की प्राप्ति किसी आवृत्ति विशेष को है तो वह ध्वनि की आवृत्ति ही है। शरीर मिट सकता है परन्तु नाम नहीं मिटता। नाम अमर हो जाता है। अमृत्व की कला मात्र ध्वनि में है। एक बार जो शब्द उच्चारित हो गये वे निरंतर ब्रह्माण्ड में घूमते रहते हैं और कभी भी नष्ट नहीं होते हैं। ध्वनि हो वह माध्यम है जिसके द्वारा मस्तिष्क में मौजूद सभी कोशिकाऐं विसर्जन की क्रिया सम्पन्न कर सकतीं हैं। क्रोध, प्रेम, भक्ति, दया, ज्ञान, विज्ञान, दर्शन, वेदना, सुख दुख, सम्बन्ध इत्यादि सभी कुछ ध्वनि के माध्यम से पूर्णता के साथ व्यक्त किये जा सकते हैं। 
      अस्तित्व ही ध्वनि है। हमारे मस्तिष्क में चाही-अनचाही नाना प्रकार की ध्वनि तरंगें जिनके ऊपर पता नहीं क्या-क्या आरूढ़ होता है हम प्रतिक्षण ग्रहण करते रहते हैं। क्रोध तो दिखाई नहीं देता, अपमान तो दिखाई नहीं देता, गलत भावनाओं का तो कोई शरीर नहीं होता इत्यादि इत्यादि फिर भी यह सब अद्वैत हमारे मस्तिष्क में ध्वनि के माध्यम से प्रविष्ट हो दुर्गन्ध फैला देते हैं। ध्वनि को ध्वनि के माध्यम से ही निकाला जा सकता है। हम ध्यान करने बैठते हैं, अनुष्ठान में बैठ हैं तो हमारे मस्तिष्क में बाल्यावस्था में हुआ अपमान चेतना पटल पर आ जाता है और हम विचलित हो उठते हैं। मस्तिष्क में एकत्रित इन अनुपयोगी ध्वनि रूपी कचरे को दिव्य मंत्र जाप के द्वारा ही निकाला जा सकता है। वेद मंत्र कुंजी हैं मस्तिष्क में स्थापित विभिन्न देव कोषों के दरवाजों की शरीर एवं मस्तिष्क में उपस्थित प्रत्येक कोशिका खुलती और बंद होती है। ठीक वैसे ही जैसे कि कमल का पुष्प कली से खिलकर सम्पूर्ण रूप धारण करता है। यहीं पद्म कला है। से लेकर गुदा भाग तक प्रत्येक अंग और कोशिका पद्म के समान ही खुलती और बंद होती है। इसीलिए महालक्ष्मी कमल पर आरूढ़ हैं भगवान विष्णु के साथ मंत्र शक्ति के द्वारा सभी देव कोष खुल जाते हैं एवं उनके मध्य दिव्य शक्तियाँ साक्षात विराजमान दिखाई पड़ने लगती हैं इसके अलावा कोई और दूसरा माध्यम नहीं है।

          मस्तिष्क की अनंत क्रियाओं को संचालित करने का प्राचीन काल से ऋषियों ने मंत्र शक्ति के महत्व को समझकर इसे अपनी दिनचर्या में शामिल किया है। साधक का तात्पर्य है पारंगतता पारंगतता एक दिन का विषय नहीं है। इसे प्राप्त करने के लिए प्रतिदिन नियमित रूप से मंत्रोच्चार का अभ्यास करना पड़ेगा मंत्रोच्चार को हौआ न बनाकर शालीनता के साथ प्रतिदिन बाल्यावस्था से ही इसे धारण करना चाहिए। एक दिन में कोई साधक नहीं बन जाता। यही विधान सनातनियों में अनंत वर्षों से चला आ रहा है। 40 वर्ष की उम्र में दीक्षा सम्पन्न होगी और फिर मंत्रोच्चार प्रारम्भ होगा तो फिर असहजता तो दिखाई पड़ेगी ही। खैर शुरू तो करना ही पड़ेगा।

         मंत्र शब्द बड़ा ही व्यापक है इसके अंतर्गत अनंत वर्षों में अनगिनत अनुसंधान हुए हैं प्रत्येक व्यक्ति को प्रत्येक मंत्र सिद्ध हो जाये ऐसा भी जरूरी नहीं है। वैदिक मंत्र मूल स्तोत्र है। कालान्तर इन्हीं से तांत्रोक्त, साबर, औघड़ और अन्य प्रकार के मंत्रों का जन्म हुआ। वेद मंत्रों में ब्रह्माण्डीय समग्रता है। संस्कृत सामान्य भाषा न होकर दैव भाषा है। अतः मैं वेद मंत्रों को ही प्रमुखता देता हूँ। साबर मंत्र व्यक्ति विशेष के लिए कारगर हो सकते हैं परन्तु इनका हस्तांतरण मूल रूप में सम्भव नहीं है। यह व्यक्ति विशेष की शक्ति पर निर्भर करते हैं। मुख्य रूप से मंत्र गुप्त परामर्श हैं आपके और दिव्य शक्ति के बीच जिन्हें मंत्र सिद्ध हो जायें उनके लिए मंत्रोच्चार अत्यंत ही सहज और सरल हैं। मंत्रोच्चार यांत्रिक क्रिया नहीं हैं। मंत्रोच्चार के समय श्रद्धा, भक्ति, भाव और समर्पण का होना नितांत आवश्यक है। 

            मंत्र गुरु मुख से प्राप्त करना चाहिए। गुरु के द्वारा लिखकर दिया गया मंत्र भी कारगर होता है इसके अलावा ब्रह्माण्ड से भी मंत्र प्राप्त होते हैं। गुरु अगर सशरीर है तो फिर उनके मुख से प्राप्त कीजिए अन्यथा परमेष्ठि गुरु आकाश मार्ग के द्वारा भी प्रदान कर देते हैं। मंत्रानुष्ठान स्वयं ही करना चाहिये। यह सर्वोत्तम कल्प है। यदि श्री गुरुदेव ही कृपा करके कर दें तब तो पूछना ही क्या। यदि ये दोनों सम्भव न हों तो परोपकारी, प्रेमी, शास्त्रवेत्ता, सदाचारी ब्राह्मण के द्वारा भी कराया जा सकता है। अनुष्ठान का स्थान इन स्थानों में से कोई होना चाहिए। सिद्धपीठ, पुण्यक्षेत्र, नदीतट, गुहा, पर्वतशिखर, तीर्थ, संगम, पवित्र जंगल, एकान्त उद्यान, बिल्ववृक्ष, पर्वत की तराई, तुलसीकानन, गोशाला (जिसमें बैल न हो), देवालय, पीपल या आँवले के नीचे, पानी में अथवा अपने घर में मंत्र का अनुष्ठान शीघ्र फलप्रद होता है। सूर्य, अग्नि, गुरु, चन्द्रमा, दीपक, जल, ब्राह्मण और गौओं के सामने बैठकर जप करना उत्तम माना गया है। 

         यह नियम सार्वभौमिक नहीं है। मुख्य बात यह है कि जहाँ बैठकर जप करने से चित्त की ग्लानि मिटे और प्रसन्नता बढ़े, वही स्थान सर्वश्रेष्ठ है। घर से दस गुना गोशाला, सौगुना जंगल, हजारगुना तालाब, लाख गुना नदी तट, करोड़ गुना पर्वत, अरबों गुना शिवालय और अनन्त गुना गुरु का सन्निधान है। जिस स्थान पर स्थिरता से बैठने में किसी प्रकार की आशंका अथवा आतंक न हो, म्लेच्छ, दुष्ट, बाघ, साँप आदि किसी प्रकार का विघ्न न डाल सकते हों, जहाँ के लोग अनुष्ठान के विरोधी न हों, जिस देश में सदाचारी और भक्त निवास करते हों, किसी प्रकार का उपद्रव अथवा दुर्भिक्ष न हो, गुरुजनों का सानिध्य और चित्त की एकाग्रता सहजभाव से ही रहती हो, वही स्थान जप करने के लिये उत्तम माना गया है। यदि किसी साधारण गाँव अथवा घर में अनुष्ठान करना हो तो पहले कूर्म भगवान का चिन्तन करना चाहिये। जैसे कूर्म भगवान की पीठ पर स्थित मन्दराचल के द्वारा समुद्रमन्थन किया गया था, वैसे ही मैं कूर्मा कार भूमिप्रदेश में स्थित होकर उन्हीं के आश्रय से अमृतत्व की प्राप्ति के लिये प्रयत्न कर रहा हूँ। ऐसी भावना करनी चाहिये ।
                          शिव शासनत: शिव शासनत: