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महाकाल ।।

          महाकाल के प्रांगण में बैठकर काक भुशुण्डी शिव शिव चिल्ला रहे थे। काक भुशुण्डी सशंकित, तार्किक प्रवृत्ति के साधक थे परन्तु उनके गुरु महाकाल क्षेत्र में निवास करने वाले अत्यंत ही सरल हृदय महात्मा थे । वे गुरु से रोज जिद करते थे कि "प्रकट करके दिखाओ प्रकट करके दिखाओ"। शिव को गुरु से ज्यादा महत्व दे रहे थे । अचानक एक दिन उनके गुरु शिव शिव चिल्लाते-चिल्लाते काक भुशुण्डी के पास से निकले। काक भुशुण्डी ने गुरु की अवहेलना कर दी, गुरु के चरण स्पर्श नहीं किए और मंत्र जपते रहे। सहृदय गुरु शिष्य की अज्ञानता को भुला बैठे परन्तु तभी हूंकार के साथ महाकाल प्रकट हो गये और एक लात मारी काक भुशुण्डी को, बोले तूने शिवापराध किया, गुरु का तिरस्कार किया जा काक योनि में प्रविष्ट हो जा।

        महाकाल क्षमा नहीं करते। मनुष्य गुप्त पाप करता है, बड़ी ही चालाकी और सफाई से पापकर्म सम्पन्न करता है एवं दुनिया की नजरों से बच जाता है। न्याय व्यवस्था को भी अंगूठा दिखा देता है। राज्याध्यक्ष, शक्ति सम्पन्न, सिद्ध इत्यादि स्वयं ही तथाकथित नियम गढ़ लेते हैं पाप कर्म को पुण्य में परिवर्तित कर लेते हैं। सब छले जाते हैं परन्तु महाकाल का दृष्टांत, महाकाल की दिव्य दृष्टि और महाकाली की शक्ति के आगे असत्य कभी नहीं छिपता, दण्ड भोगना ही पड़ता है । महाकाल चक्र में महाकाल के साथ मृत्यु प्रदान करने वाली शक्तियाँ, दुर्घटना ग्रस्त करने वाली शक्तियाँ, असाध्य रोग निर्मित करने वाली शक्तियाँ, अभिशप्त करने वाली शक्तियाँ, अंग-भंग करने वाली शक्तियाँ इत्यादि चलती हैं। आत्म हत्या की तरफ प्रवृत्त करने वाली शक्तियाँ, प्रेत ग्रस्त करने वाली शक्तियाँ, विक्षिप्त एवं पागल बना देने वाली शक्तियाँ इत्यादि सब की सब महाकाल के प्रांगण में विद्यमान हैं। 

         जब व्यक्ति अपने गुप्त कर्मों से जघन्य पाप करता है तब महाकाल कुपित हो इन शक्तियों को आदेशित करते हैं एवं ये सब जीवों को महादण्ड प्रदान करती इन दण्डों का ब्रह्माण्ड में कोई तोड़ नहीं है। समूह के समूह नष्ट हो जाते हैं, शहर के शहर उजड़ जाते हैं, बड़े-बड़े शासनाध्यक्ष काल कवलित हो जाते हैं। यही महाकाल की हूंकार का रहस्य है, वे दण्डेश्वर हैं तो न्यायेश्वर भी हैं। वे ही मह तत्व देते हैं और मह तत्व छीनते हैं। वे ही संहारकर्ता निर्मित करते हैं और वे ही संहारकर्ताओं का भी संहार करते हैं। कब क्या रच दे ? किसी को पता नहीं क्योंकि वे आदि पुरुष हैं । महाकाली प्रथम महाविद्या हैं और महाकाल प्रथम शिव हैं। बहुत से कल्प आये जीव भूल गया, बहुत से कल्प आयेंगे जीव को अभी कुछ नहीं मालूम परन्तु महाकाल साक्षी हैं। 

        वायवी कल्प आया, वायु में गति करने वाले जीवों की प्रचुरता थी। जलीय कल्प में जलीय जीवों की प्रचुरता थी, वनस्पति कल्प आया केवल वनस्पतियाँ ही वनस्पतियाँ थीं अग्नि कल्प आया तो केवल अग्नि ही अग्नि थी। आये और चले गये परन्तु महाकाल स्थिर रहे, चिर स्थिर रहेंगे। प्रत्येक जीव के अंदर जैविक काल रचना है। प्रत्येक कल्प के अंदर काल रचना महाकाल ने निर्मित कर दी है। कब उठेगा ? कब मरेगा ? कब नाचेगा? सब कुछ महाकाल ने पूर्व निर्धारित कर दिया है। कब किसको बिखरना है, कब किसको जुड़ना है, कब काल को बढ़ाना है, कब काल को घटाना है और कब किसको किसका काल बन जाना है यह सब कुछ महाकाल की संहिता में पूर्व निर्धारित है। महाकाल की संहिता से ही समस्त ब्रह्माण्ड का निर्धारण होता है ।

महाकाल स्तोत्रम्
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      यह स्तोत्र महाकाल भैरव के नाम से तंत्र ग्रंथ में मिलता है। इस स्तोत्र को स्वयं भगवान महाकाल ने भगवती भैरवी के पूछने पर बतलाया था। भगवान महाकाल तथा उनके विभिन्न नामों का इसमें स्मरण हुए उन्हें नमन किया है। अंत में ॐ ह्रीं सच्चिदानन्दतेजसे स्वाहा। इस मंत्र का तथा सोऽहं हंसाय नमः इस मंत्र का स्वरूप भी व्यक्त किया है। इस स्तोत्र के पाठ से भगवान महाकाल के पूजन का फल प्राप्त होता है और यह साधकों को सुख प्रदान करने वाला हैं।

महाकाल स्तोत्र--
 ॐ महाकाल महाकाय, महाकाल जगत्पते ।
 महाकाल महायोगिन्, महाकाल नमोऽस्तुते ॥ 

महाकाल महादेव, महाकाल महाप्रभो । 
महाकाल महारुद्र, महाकाल नमोऽस्तुते ॥
 
महाकाल महाज्ञान, महाकाल तमोऽपहन् ।
 महाकाल महाकाल, महाकाल नमोऽस्तुते ॥ 

भवाय च नमस्तुभ्यं, शर्वाय च नमो नमः ।
 रुद्राय च नमस्तुभ्यं, पशूनां पतये नमः ॥

 उग्राय च नमस्तुभ्यं, महादेवाय वै नमः । 
भीमाय च नमस्तुभ्यमीशानाय नमो नमः ॥ 

ईश्वराय नमस्तुभ्यं, तत्पुरुषाय वै नमः । 
सद्योजात नमस्तुभ्यं, शुक्लवर्ण नमो नमः ॥ 

अधः कालाग्नि रुद्राय, रुद्ररूपाय वै नमः । स्थित्युत्पत्ति-लयानां च हेतु-रूपाय वै नमः ॥

 परमेश्वर-रूपस्त्वं नीलकण्ठ नमोऽस्तुते।
पवनाय नमस्तुभ्यं हुताशन नमोऽस्तुते ॥

सोमरूप नमस्तुभ्यं, सूर्य रूप नमोऽस्तुते । 
यजमान नमस्तुभ्यमाकाशाय नमो नमः ॥ 

सर्वरूप नमस्तुभ्यं, विश्वरूप नमोऽस्तुते । 
ब्रह्मरूप नमस्तुभ्यं, विष्णुरूप नमोऽस्तुते ॥ 

रुद्ररूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोऽस्तुते । 
स्थावराय नमस्तुभ्यं, जङ्गमाय नमो नमः ॥ 

नम उभय रूपाभ्यां शाश्वताय नमो नमः ।
 हुं हुङ्कार ! नमस्तुभ्यं, निष्कलाय नमो नमः ॥ 

अनाद्यन्त महाकाल, निर्गुणाय नमो नमः । 
सच्चिदानन्द रूपाय, महाकालाय ते नमः ॥

 प्रसीद मे नमो नित्यं, मेघवर्ण ! नमोऽस्तुते ।
 प्रसीद मे महेशान दिग्वासाय नमो नमः ॥ 

ॐ ह्रीं माया स्वरूपाय, सच्चिदानन्द-तेजसे । 
स्वाहा सम्पूर्णमन्त्राय, सोऽहं हंसाय ते नमः ॥

फलश्रुति--
 इत्येवं देव-देवस्य, महाकालस्य भैरवि ! । कीर्तितं पूजनं सम्यक्, साधकानां सुखावहम् ॥
        
महाकाल रहस्यम्

             तीनों लोकों के नायक विष्णु के दरवाजे पर खप्परधारी दक्षिणामूर्ति शिव "भिक्षां देहि" कह उठे । ब्रह्माण्डीय राज सिंहासन पर विराजमान विष्णु अचानक दम्भ ग्रसित हो उठे और भिक्षुक दक्षिणामूर्ति शिव को भिक्षा देने की बजाय तर्जनी दिखा लौटाने लगे। अचानक भिक्षुक दक्षिणामूर्ति शिव ने हूंकार भरी क्योंकि विष्णु काल के अधीन हो गये थे, भूतकाल को भूल गये थे, स्वयं के निर्माता की अबहेलना कर उठे । काल की महिमा ही ऐसी है कि गद्दी पर बैठने वाला गद्दी पर बैठाने वाले को भूल जाता है। भुलाना ही काल का महाअस्त्र है, स्मृति विहीन कर देना ही काल की शक्ति है अगर जीव स्मृति विहीन न हो तो वह काल को जीत लेगा एवं कालजयी हो जायेगा। दक्षिणामूर्ति शिव ने देखा कि विष्णु काल के अधीन हो रहा है अर्थात यह तो कालान्तर काल कवलित हो जायेगा, काल इसे धूल में मिला देगा, इसकी छवि काल के साथ विस्मृत हो जायेगी एवं कालान्तर लोग विष्णु कभी हुआ भी था कहने लग जायेंगे। अतः काल ग्रसित विष्णु की तर्जनी शिव ने अपने त्रिशूल से काट ली । रक्त की धारा बह उठी, खप्परधारी शिव ने भिक्षा के रूप में विष्णु के काल प्रदूधित रक्त को अपने भिक्षा पात्र में भर लिया और इस प्रकार विष्णु की चेतना जाग उठी वे पुन: दक्षिणामूर्ति गुरु को पहचान गये, वे इस ब्रह्माण्ड के सम्राट को पहचान गये, वे आदि देव महाकाल को पहचान गये, वे प्रथम पुरुष महाकाल की हूंकार के सामने नतमस्तक हो गये। भिक्षा पात्र में से कुछ बूंदे पृथ्वी पर गिर पड़ी और शिप्रा मचल उठी। 

         विष्णु के रक्त से शिप्रा का जन्म हुआ शिप्रा साक्षी है दक्षिणामूर्ति शिव गुरु के विष्णु को कालजयी बनाने की अर्थात विष्णु को महाकाल तत्व प्रदान करने की। दक्षिणामूर्ति शिव गुरु ने जिस स्थान पर अपना त्रिशूल ठोका वह भारतवर्ष की मानवाकार आकृति का नाभि बिन्दु बन गया अर्थात उज्जयिनी का उदय हो गया। शिव ने कहा विष्णु तेरा कार्य सृष्टि का पोषण करना है, ब्रह्मा को मैंने समझाया था कि सृष्टि की रचना में जल्दी न कर। ब्रह्मा की मदद हेतु शिव ने ब्रह्माण्डीय क्षीर सागर में गोता लगाया और औषधि एवं वनस्पति का निर्माण ही कर पाये थे कि ब्रह्मा की चीख पुकार सुन ब्रह्माण्डीय क्षीर सागर से बाहर निकलना पड़ा। ब्रह्मा ने जल्दी बाजी में सृष्टि की रचना कर दी, भक्षण करने वाले जीव सामने खड़े थे और ब्रह्मा को ही खाने दौड़ रहे थे। ब्रह्मा ने कहा शिव रक्षा करो, मेरे द्वारा रचित जीव मेरा ही भक्षण करने को तत्पर हैं। शिव की दृष्टि पड़ते ही कुछ जीव । कह उठे “वयं यक्षामः" अर्थात हम उपासना करेंगे, पूजन करेंगे, सृष्टि को कुछ अलग नजरिये से देखेंगे शिव कह उठे ब्रह्मा सृष्टि की रचना तो हो गई, जैसी होनी थी तुमने कर दी। इस सृष्टि में अधिकांशतः जीव सारा जीवन भोजन के लिए मारामारी करता रहेगा, भोजन ही उसका आधार होगा परन्तु तेरे द्वारा बनाये गये मुख, कर्ण, नासिका, नेत्र, इन्द्रियाँ, रोम छिद्रों के अलावा भी भक्षण के कुछ और मार्ग होंगे एवं इन सबसे पहले पोषण नाभि के द्वारा होगा यही एकमात्र उपाय है। 

      यही शिव का तंत्र है, यही अध्यात्म का बीज है कि जब तक जीव में ब्रह्मा द्वारा प्रदत्त समस्त भक्ष्य-कर्ता अंग विकसित नहीं हो जाते, जीव का पोषण शिव करेगा, उसे नाभि मार्ग के द्वारा सभी तत्वों की प्राप्ति होगी अन्यथा जीव तो ब्रह्मा को ही खा जायेगा, पुरुष के वीर्य में उपस्थित जीवन पुरुष का ही भक्षण कर जायेगा, माता के गर्भ में उपस्थित अण्ड मातृत्व ही खा जायेगा। माता पिता के संयोग से निर्मित पूर्ण जीव गर्भ के अंदर ही अपने भक्षणकर्ता अंगों की मदद से माता को ही खा जायेगा । अतः उसे बांधना होगा, विष्णु का पोषण कर्म गर्भ से बाहर आने के बाद प्रारम्भ होगा, गर्भ के अंदर तो नाभि केन्द्र ही जीव का पोषण करेगा अर्थात अध्यात्म ही जीवन को विकसित करेगा। नास्तिक से नास्तिक, पापी से पापी, अधर्मी से अधर्मी, अति में कुमार्गी मनुष्य भी अनंत काल से अध्यात्म को नहीं नकार पाये। अनेकों बार इस पृथ्वी पर कोशिश हुई कि अध्यात्म को समाप्त कर दिया जाय, अध्यात्म का नामोनिशान मिटा दिया जाय परन्तु कभी ऐसा न हो सका क्योंकि जीवन के प्रथम नौ मास सभी ने महाकाल के सानिध्य में बिताये हैं और नाभि से पोषण प्राप्त किया है।
क्रमशः

            गर्भावस्था के नौ मास में जीव काल से परे होता है और महाकाल के सानिध्य में होता है। वह देख रहा होता है अपने पूर्व जन्म के कर्मों को, वह देख रहा होता है काल की मार को, वह देख रहा होता है अपने अनेक घटिया जन्मों को तभी वह तड़फ कर कह उठता है कि जन्म लेते ही मैं धर्म के मार्ग पर चलूंगा, मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होऊंगा, जन्म और मरण के कालरूपी चक्र से मुक्त होऊंगा इसलिए रोता हुआ पैदा होता है, पश्चाताप करता हुआ पैदा होता है, एक मौका और मिला भक्ष्य भक्ष्य की इस दुनिया से छुटकारा पाने हेतु इसलिए शिशु सहमा हुआ होता है। दक्षिणामूर्ति शिव के हाथ में उपस्थित खप्पर ब्रह्मा द्वारा रचित भक्ष्य भक्ष्य की इस घटिया सृष्टि की ओर ही इंगित करता है। बड़ी विकट है भक्षण की सृष्टि, पुरुष की काम वासना स्त्री का भक्षण कर रही है एवं स्त्री की कामवासना पुरुष का भक्षण कर रही है, जीव-जीव का भक्षण कर रहा है। कहीं प्रकाश का भक्षण हो रहा है, कहीं जल का भक्षण हो रहा है, कहीं अग्नि का भक्षण हो रहा है। बनाना आसान है, निर्माण काल के अधीन है इसलिए निर्माण काल ग्रसित होता है। शरीर चरमराते हैं, भवन ढहते हैं, सभ्यताएं मिटती हैं, ग्रह नक्षत्र टिमटिमाना बंद कर देते हैं, सूर्य लय खोता है, अग्नि भी मंद पड़ती है क्योंकि सबके सब काल के अधीन हैं। 

          देवताओं को आहुति चाहिए भक्षण के रूप में, विष्णु को पूजन चाहिए, अनेकानेक ग्रह नक्षत्रों, पिण्डों, देवी-देवताओं इत्यादि को स्तुतियाँ चाहिए, स्तोत्र चाहिए, उपासना चाहिए, देवालय चाहिए क्योंकि यह सब उनके भक्ष्य पदार्थ हैं, यह सब उनकी संतुष्टि का हेतु हैं, उनकी आनंद प्राप्ति के पोषक तत्व हैं। राजा को गद्दी चाहिए, कोई किसी का पोषक नहीं है अपितु सबके सब शोषक हैं। पोषक केवल शिव हैं, पोषक केवल दक्षिणामूर्ति हैं, वह भक्ष्य भक्ष्य से परे हैं। जहाँ जीव गर्भ से बाहर आया नाभि की क्रियाशीलता समाप्त वह सूक्ष्मातीत हो गई उसे पोषण की जरूरत नहीं है उसे भक्षण की जरूरत नहीं है। वह तो शिव कृपा है जीव को पुनः पंचतत्वीय जीवन प्रदान करने की। अतः महाकाल भारत वर्ष की धर्म भूमि के नाभि केन्द्र पर स्थित हैं। नाभि खिसकी तो हाजमा खराब एवं भक्ष्य भक्ष्य की आदत से ग्रसित जीव उदर पकड़कर बैठ जायेगा उसे अपना अस्तित्व बिखरता दिखाई पड़ेगा तभी तो संन्यासी कहते हैं कि नाभि पर ध्यान केन्द्रित करो, नाभि से श्वास लो, मणिपुर चक्र को जगाओ । 

       मणि कौन ? मणि है शिव, मणि है महाकाल और उनका पुर है उज्जयिनी उज्जयिनी अर्थात जहाँ सूर्य छाया उत्पन्न नहीं करता, जहाँ सूर्य छाया विहीन है। जहाँ सूर्य की किरणें इस पृथ्वी पर सबसे न्यूनतम मात्रा में छाया को प्रादुर्भावित करतो हैं अर्थात सिर के ठीक ऊपर सूर्य उज्जयिनी भूमध्य रेखा पर स्थित है। समस्त पृथ्वी पर सूर्य केवल 21 मार्च से लेकर चार माह तक उज्जयिनी में ही सिर के ऊपर होता है। सूर्य काल का प्रवर्तक है। सूर्य काल का निर्माण करता है दिन, रात, मास, वर्ष, ऋतु इत्यादि सूर्य आधारित हैं परन्तु सूर्य भी काल के अधीन है वह महाकाल नहीं है वह भी छाया को पत्नी समझ बैठा और शनि को जन्म दे बैठा। छाया छदम् रुपिणी है, वास्तव में छाया ने सूर्य पत्नी संज्ञा का छदम् रूप धर सूर्य को छला था। छले तो सूर्य भी गये और अपनी प्रथम पत्नी संज्ञा से उत्पन्न यम को श्राप दे बैठे परन्तु शिव ने यम को लंगड़ा होने से बचा लिया। दुःखी यम, माता-पिता के द्वारा प्रताड़ित यम दक्षिण की ओर भाग गये। दक्षिण को अपना निवास स्थान बनाया भक्ष्य-भक्ष्य की इस संस्कृति में जीव निष्कासित होता है, प्रताड़ित होता है, पीड़ित होता है तो वह दक्षिण की तरफ भागता है।

         दुनिया के नियम बड़े अजीब हैं, दुनिया के नियम काल के अधीन हैं। अतः काल के अधीन नियमों के कारण काल ग्रसित व्यक्ति अन्याय करते हैं, असत्य को सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं। जो अभक्ष्य हैं वह सदैव निष्कासित होते हैं, जो अमहत्वपूर्ण हो जाते हैं उन्हें दक्षिण की तरफ भागना ही पड़ता है, एकांतवासी होना ही पड़ता है। राम के कुछ पूर्वज दक्षिण की तरफ भाग गये थे क्योंकि उन्हें अनार्य घोषित कर दिया गया था। रावण के पूर्वज भी वेदज्ञ थे पर काल के अनुसार दक्षिण की तरफ गमन करना पड़ा क्योंकि निष्कासित कर दिए गये थे, अमहत्वपूर्ण हो गये थे, हार गये थे, श्री विहीन हो गये थे। मृत्यु होती है तो जीव की आत्मा को दक्षिण दिशा से ही यमराज के दूत आकर ले जाते हैं अर्थात मोक्ष नहीं हुआ। जीव ने काल को नहीं समझा इसलिए काल ग्रसित हुआ अतः पुनः आना पड़ेगा, पुनः काल के सामने खड़ा होना पड़ेगा, पुनः चित्रगुप्त को कर्मों का हिसाब किताब देना होगा।

             इस प्रकार तो काल अत्यंत ही बलवान हो गया ठीक है काल बलवान है परन्तु एक स्थान ऐसा भी है जहाँ काल नतमस्तक है जहाँ काल का प्रभाव शून्य है, जहाँ काल भी शरणागत है। और वह है महाकाल अर्थात उज्जयिनी । एक तरफ महाकाल का महाश्मशान धू-धू करके जल रहा था तो दूसरी तरफ महाकाल के मंदिर में मृदंग बज रहे थे और बीच में शिप्रा इठला रही थी तभी नाव पर सवार आदि शंकर शिप्रा की मध्य धारा में आ पहुँचे अचानक दौड़ते हुए नाव के किनारे पर खड़े हो गये, दोनों हाथ ऊपर थे और भावातीत ध्यानावस्था लग गई। शिष्य दौड़े, नाविक दौड़ा कि कहीं उफनती हुई शिप्रा में आदि शंकर गिर न पड़ें परन्तु वे अश्रु पूर्ण नेत्रों से चिताओं को निहार रहे थे, देखते-देखते कितना समय बीत गया उन्हें इसका भान ही नहीं रहा। मैंने पहले कहा कि महाकाल के सानिध्य में अगर काल का भास हो जाये तो फिर महाकाल का क्या महत्व ? 

               अचानक शंकर की समाधि सम्पूर्ण हुई, शिष्यों ने पूछा आप क्या निहार रहे थे हमें तो सिर्फ चिताओं की लपटें ही दिखाई दे रही थीं, ऐसा कौन सा दिव्य दृश्य था जिसे देख आप भाव विभोर हो उठे। आदि शंकर ने कहा काल आवरण डालता है एवं उसके निर्मित आवरण जीव को दिव्यता का अनुभव नहीं होने देते अन्यथा जीव क्षण भर में मुक्त हो जायेगा। मैंने आवरणों को भेद लिया है, मैंने काल को समझ लिया है, इसलिए मैं देख रहा था कि परम करुणामूर्ति शिव हाथ में त्रिशूल लिए हुए महाकाल के इस दिव्य श्मशान में प्रत्येक चिता के ऊपर सुसज्जित जीव के कर्ण में तारक मंत्र "ॐ" फूंककर उसे मुक्ति प्रदान कर रहे हैं और महाकाली चिता के ऊपर स्थित हो जीव के पिण्ड शरीर के कर्म बंधनों को बड़े यत्न के साथ एक-एक करके खोल रही हैं एवं ब्रह्माण्डीय सुषुम्ना नाड़ी के द्वारा जीव का सूक्ष्म शरीर काल को भेदते हुए शिव लोक की तरफ प्रस्थान कर रहा है। गौर वर्णीय शिव और महाकाली के इस दिव्य करुणामय कर्म को ही मैं भावातीत ध्यान अवस्था में देख परम आनंदित हो रहा था।

             जिस प्रकार शरीर में सुषुम्ना नाड़ी स्थित होती है उसी प्रकार ब्रह्माण्ड की सुषुम्ना नाड़ी उज्जयिनी के ठीक ऊपर स्थित है और इसी मार्ग का अनुसरण कर जीव काल चक्र से मुक्त हो जाता है। महाकाल के सानिध्य में मृत्यु, महाकाल का दर्शन, महाकाल का स्पर्श इसलिए दुर्लभ है। संसार की समस्त शक्तियां जोर लगा देती हैं कि जीव दक्षिणामूर्ति गुरु की शरण में न पहुँच सके, जीव महाकाल का सानिध्य न प्राप्त कर सके अन्यथा वह अजेय हो जायेगा वह कालजयी हो जायेगा फिर वह दिन रात, वर्ष, अवस्था, ॠतु इत्यादि से प्रभावित नहीं होगा, फिर उस पर ग्रहों के योग कार्य नहीं करेंगे। फिर किस बात की शनि की महादशा, फिर कैसी साढ़े साती, फिर मंगल की अंतर्दशा कुछ नहीं करेगी, फिर राहु और केतु पीड़ित नहीं करेंगे। तब मनुष्य शुक्र की उच्च दशा, मारकेश, मंगल की नीच अवस्था, शूद्र ग्रहों की कुदृष्टि से मुक्त हो जायेगा एवं उस पर किसी का वश नहीं चलेगा। वह महान हो जायेगा, उसका महत्व बढ़ जायेगा, वह "मह" को ग्रहण कर लेगा यही है महाकाल रहस्यम्। 

             12 ज्योतिर्लिङ्गों में 5 को अति महत्वपूर्ण बताया गया एवं इन 5 में से फिर 3 और भी ज्यादा महत्वपूर्ण कहे गये और उनमें से एक हैं महाकाल ब्रह्माण्ड का यह एकमात्र तांत्रोक्त ज्योतिर्लिङ्ग है। यहाँ शिव दक्षिण की तरफ मुख किए हुए हैं। गर्भ गृह का द्वार ही दक्षिण की तरफ है सूर्य पूर्व से उगकर पश्चिम में अस्त होता है दक्षिण को सबसे कम प्रकाश प्रदान करता है अतः शिव दक्षिणामुखी हो गये। वे उन्हें प्रकाश प्रदान करते हैं, वे उन्हें कृपा प्रदान करते हैं जिनका कोई नहीं होता। अत्यंत ही दयालु शिव रूप हैं महाकालेश्वर ।

      एक सच्ची घटना है, एक स्त्री थी जिसकी बहिन उज्जैन में निवास करती थी और वह मुम्बई में उसकी बड़ी इच्छा थी कि वह देह त्यागे तो महाकाल के सानिध्य में परन्तु वृद्धावस्था के कारण, अर्थ की कमी के कारण वह आ नहीं पा रही थी। अंत समय में उसे घोर द्वंद हुआ, उसकी अंतिम श्वासें महाकाल के दर्शन हेतु अटक रही थीं तभी उसने प्राण त्याग दिए। कुछ दिनों पश्चात् महाकाल की आरती हो रही थी और उसकी बहिन ने देखा कि भीड़ में उसकी मृत बहिन खड़ी है, वह अचम्भित हो गई परन्तु उसने महसूस किया कि अन्य लोग उसकी उपस्थिति नहीं समझ पा रहे हैं क्योंकि सबके सब काल के अधीन हैं। आरती के पश्चात् उसने अपनी बहिन से पूछा कि तुम्हारी तो मृत्यु हो गई थी फिर तुम यहाँ कैसे ? उसकी मृत बहिन बोली मैं विदेह अवस्था में हूँ जीवन के अंतिम क्षण में मैंने अत्यंत ही उद्विग्न हो दक्षिणामूर्ति को याद किया था और वे स्वयं लेने चले आये इसी कारणवश आज महाकाल के प्रागंण में खड़ी हुई हूँ एवं कल सदा के लिए मुक्त हो जाऊंगी। 

         महाकाल की यात्रा अपने आपमें दुर्लभ है अगर कोई व्यक्ति महाकाल की यात्रा के समय काल कवलित होता है तो स्वयं महाकाल चलकर उसके पास आ जाते हैं, यही इस ज्योतिर्लिङ्ग की सबसे बड़ी विशेषता है। यही दीक्षा का महत्व है। महाकाल में शिव का नित्य आगमन है यहाँ पर शिव सोते नहीं है, यहाँ पर शिव विश्राम नहीं करते, यही एकमात्र ज्योतिर्लिङ्ग है जिसे कापालिकों ने अपनी पद्धति से पूजा जिसका रक्ताभिषेक भी हुआ है, जिसके सानिध्य में काला मुखों ने तपस्या की है, जिसे अघोरियों ने अपनी मनमर्जी से सजाया है, जिसे नाथों ने अपने हाथों से श्रंगारित किया है और वेदज्ञों ने वेद मंत्रों से गुंजित किया है। चिता भस्म लेपन, भस्म आरती यह पूर्णतः तांत्रोक्त प्रक्रिया है जो कि नित्य महाकाल के प्रांगण में ही सम्पन्न होती है अन्य कहीं और नहीं। पूर्व जन्मकृत पापों एवं काल के अधीन समस्त क्रियाओं का अघोर दाह भस्म आरती दर्शन के पश्चात् ही होता है। यह काल से मुक्ति का परिचायक है।

            बैकुण्ठ चतुर्दशी को जब शिव की चल यात्रा निकलती है तो वह द्वारिका धीश के मंदिर तक भी पहुँचती है और द्वारिका-धीश अर्थात विष्णु को भी भस्म चढ़ती है, बिल्व पत्र अर्पित होता है और शिव को तुलसी अर्पित होती है विष्णु भी भस्म से श्रंगारित हो जाते हैं उज्जैन में यह सब अति दुर्लभ आध्यात्मिक प्रक्रियायें हैं, जिनका अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। भांग से श्रंगार, मक्खन से श्रंगार, मेवे से श्रंगार केवल महाकाल का ही होता है। श्रंगार की यह प्रक्रिया अनंत फलदायी है इसके महत्व को क्या वर्णित करें? जीवन में कभी ऐसा सुखद महाक्षण आये तो स्वयं अनुभूत करे महाकाल के प्रांगण में खड़े होकर।

  महाकाल तो स्वयंभू बनने का मूल स्थान है, इस सृष्टि ने मह प्राप्त नहीं किया ? तो फिर क्या प्राप्त किया। मह ही पहचान है जीव की जब तक मह नहीं मिलेगा जीव का भटकाव खत्म नहीं होता। महत्व तो सभी चाहते हैं, महत्वपूर्ण तो सभी होना चाहते हैं। तप, साधना, उपासना, युद्ध, विद्या, पद इत्यादि ये सब क्या हैं? सिद्धियाँ क्या हैं? इन सबका एकमात्र ध्येय है मह तत्व की प्राप्ति अर्थात महत्वपूर्ण होना उपयोगी होना उपयोगी होने की इसी दौड़ में महत्वपूर्ण बनने की इसी चेष्टा में अन्याय होते हैं, पाप होते हैं, शोषण होता है, प्रदूषण फैलता है, हिंसा भी होती है, कोई कुचल जाता है जाने अनजाने में कदमों के नीचे मह तत्व प्राप्त करना आसान नहीं है इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। मह ही श्री विद्या है। सृष्टि क्रम से भी श्री विद्या का पूजन है और संहार क्रम से भी श्री विद्या का पूजन है। अतः असुर लक्ष्मी, अलक्ष्मी भी संहार क्रम के द्वारा आ ही जाती हैं। महत्वपूर्ण बनने, महा बनने की होड़ में बोझ सिर पर आ ही जाता है, कदम बोझिल हो ही जाते हैं। अतः बंधन जकड़ लेते हैं तब पाँव महाकाल की तरफ दौड़ते हैं। जीव महाकाल स्थित महाश्मशान की तरफ भाग उठता है अघोर दाह हेतु, यहीं शिव अलक्ष्मी का दाह करते हैं, असुर लक्ष्मी का भी दाह करते हैं। यही ब्रह्माण्ड में एकमात्र जगह है जहाँ पर जीव असुर लक्ष्मी को भस्म कर सकता है क्योंकि असुर लक्ष्मी के भस्म होने के पश्चात् ही उसकी भस्म को शिव यहीं पर ग्रहण करते हैं अतः भस्म से विभूषित महाकाल को स्पर्श करते ही समस्त जन्मों में किये गये पाप आधे हो जाते हैं। शरीर में मौजूद अलक्ष्मी भस्म हो जाती हैं। नीचे महाकाल ऊपर श्रीयंत्र, यही है गर्भ गृह की शोभा साथ बैठे हैं। गणेश, पार्वती और कार्तिकेय महाकाल के गर्भ गृह में स्थित शिवलिङ्ग इस प्रकार से निर्मित हैं कि कोई उनकी सम्पूर्ण परिक्रमा नहीं लगा सकता। महाकाल की परिक्रमा लगाने की किसमें ताकत ? योनि के एक छोर से दूसरे छोर तक जाओ और पुनः उल्टे पैर लौटकर आ जाओ। यही है महाकाल के दर्शन की विधि।

शिव शासनत: शिव शासनत:

श्रीकृष्ण मनोहारिणी ।।

          निकल पड़ा गोलोक से एक नील आभा लिए हुए दिव्य पुंज, चल पड़ीं श्रीराधा पृथ्वी मण्डल में अवतरित होने हेतु इस नील आभा युक्त दिव्य पुंज को चारों तरफ से आवृत्त की हुई छोटी-छोटी नीली रश्मियाँ भी उतर पड़ीं वज्र मण्डल के गोप ग्रामों में यह कैसा आश्चर्य? यह कैसी आभा ? समस्त ऋषि मुनि कह उठे। कौन अवतरित हो रहा है पृथ्वी पर इस हेतु सब उत्सुक हो उठे, देखते ही देखते गोप भण्डल के अनेकों घरों में कुछ-कुछ क्षणों के अंतराल के पश्चात दिव्य बालिकाएं उत्पन्न होने लगीं। लगातार एक वर्ष तक वज्र मण्डल के सभी गोपों के यहाँ केवल दिव्य बालिकाएं ही उत्पन्न होती रहीं, एक भी बालक उत्पन्न नहीं हुआ। 

        प्रसूति गृह अचानक दिव्य आभा से भर उठता, सब मूर्च्छित हो जाते और जैसे ही होश आता नन्हीं सी बालिका माता के बगल में खेलती हुई मिलती एक वर्ष तक लगातार इसी प्रकार अयोनिज शिशुओं के रूप में बालिकाएं उत्पन्न होती रहीं गोप मण्डल में सबकी सब नीली आभा लिए हुए अति सुन्दर, जैसे ही बालिकाओं का जन्म होता झुण्ड के झुण्ड मयूर प्रसूति गृह पर आ बैठते और मयूर पिच्छ गिराने लगते, सभी बालिकाएं मयूर पिच्छ के ऊपर ही शयन करतीं, उन्हीं से खेलती, उन्हें ही हाथ में पकड़तीं। वृषभानु गोप के यहाँ श्रीराधिका का अवतार होते ही करभाजन, श्रृंगी, शाण्डिल्य, गर्ग एवं दुर्वासा मुनि आ पहुँचे । वृषभानु गोप बेचारा क्या जाने ? अतः वे कह उठे हे ऋषियों आप के तो दर्शन भी दुर्लभ हैं, आपके दर्शन हेतु तो जातक पता नहीं कहाँ-कहाँ भटकता है पर आप पाँचों स्वयं चलकर मेरे घर आये, क्या मुझसे कोई अपराध हो गया है ? 

       परम क्रोधित दुर्वासा फूट-फूट कर रोने लगे, दूसरों को श्राप देने वाले, आँखों से सदा क्रोध की ज्वाला बरसाने वाले दुर्वासा को फूट-फूट कर रोता देख वृषभानु गोप घबरा गये करभाजन ऋषि प्रसिद्ध हस्तरेखा विशेषज्ञ थे एवं बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट भी अपनी हस्तरेखा उन्हें दिखाने हेतु कतारबद्ध थे आज वही करभाजन ऋषि भूमि पर बैठे हुए श्रीराधिका के कर कमलों को देखने हेतु इतने उत्सुक और आतुर हुए जा रहे थे कि प्रसूति गृह की अपवित्रता को भी भूल बैठे थे। हे वृषभानु दया करके एक बार मुझे इस बालिका का हाथ दिखा दो वे विनती कर रहे थे। वृषभानु दया करके बालिका के प्रकट होने का समय बताओ श्रृंगी ऋषि बोल उठे, मुझे अतिशीघ्र इसकी जन्मकुण्डली बनानी है मुझ पर दया करो, उपभानु, जन्मकुण्डली विशेषज्ञ श्रृंगी ऋषि बोल उठे। लक्षणविज्ञान में निपुण शाण्डिल्य ऋषि बालिका के सम्पूर्ण अंगों का निरीक्षण करने हेतु लालायित हो रहे थे, दास पर दया करो वृषभानु शाण्डिल्य बोल उठे।

           जिन गर्ग मुनि को बालक के जात कर्म संस्कार हेतु बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट आदरपूर्वक बुलाते थे वे आज स्वयं नवजात श्रीराधिका के जन्म संस्कार हेतु वृषभानु गोप के दरवाजे पर सेवकों की भांति खड़े थे। वे सब समझ रहे थे पंचम् पुरुषार्थ स्वरूपा का सामर्थ्य एवं एक साथ आल्हाद कर उठे देखो गर्ग इस बालिका के गुरु पर्वत पर तो चक्र बना हुआ है अर्थात यह साक्षात् चक्रकणायिका है पृथ्वी के समस्त शूलों को हर लेगी, शिव को भी निर्विध कर देगी। देखो शाण्डिल्य देखो करभाजन कह उठे इस बालिका के गुरु पर्वत के अंत से लेकर शनि पर्वत तक कितनी सुन्दर चन्द्राकार रेखा बन रही है इसे कहते हैं कृष्ण रेखा. विशुद्ध प्रेम की रेखा। मैंने आज तक किसी शिशु के हाथ में ऐसी रेखा नहीं देखी। यही कृष्ण की शक्ति है, यही उनकी अर्धांगिनी है, यही श्रीकृष्ण मनोहारिणी है। देखो दुर्वासा देखो शनि पर्वत के नीचे कैसी विचित्र रेखा, इसे कहते हैं महाकाल रेखा यह कालों से भी परे है, काल भी इनके आगे नतमस्तक होगा। इनकी मस्तिष्क रेखा तो चन्द्र पर्वत को भी पार कर गई है अतः यह समस्त पृथ्वी मण्डल में प्रेम का संचार करेंगी जिधर से निकल जायेंगी सब इनके वशीभूत हो पीछे चल पड़ेंगे, जिधर दृष्टि उठायेगीं वहाँ हिंसा भाग खड़ी होगी, इनकी दृष्टि में हिंसक पशु भी आ गया तो वह भी हिंसा से परे हो जायेगा। 

           इतनी गहरी हृदय रेखा और वह भी सम्पूर्ण हथेली पर बनी हुई अतः यह पूर्ण हृदया हैं। गुरु पर्वत से प्रारम्भ होकर हथेली के अंत तक जाने वाली सीधी हृदय रेखा तो सिर्फ रासेश्वरी के हाथ में ही हो सकती है वर्ना इस पृथ्वी पर तो आधी-अधूरी, घिसी-पिटी, कटी फटी, पतली पतली हृदय रेखा वाले जातक ही देखने को मिलते हैं करभाजन कह उठे “यही हैं राधा-यही हैं राधा" श्रृंगी ऋषि बोले हे गर्ग क्या बांचू मैं इनकी जन्मकुण्डली यह तो स्वयं ही ब्रह्माण्ड की कुण्डलिनी शक्ति है। समस्त ग्रह हाथ जोड़े खड़े हुए हैं, सब इनके पुजारी हैं।

         इनकी जन्मकुण्डली में शनि स्पष्ट कर रहा है कि मैं तो प्रभु श्रीकृष्ण का दास हूँ, वे मेरे इष्ट हैं। प्रभु श्रीकृष्ण की भक्ति मैंने नहीं छोड़ी भले ही मेरी पत्नी ने मुझे श्राप दिया मुझे श्राप मंजूर हैं पर प्रभु श्रीकृष्ण से विमुखता मंजूर नहीं। मैं तो रासेश्वरी का परम भक्त हूँ जो कोई राधा के मार्ग पर चलता है उसकी तो मैं पग-पग पर सहायता करता हूँ तभी तो रासेश्वरी मुझे रास मण्डल में स्थान देती हैं और मैं शिला बनकर अपने प्रभु श्रीकृष्ण के स्पर्श हेतु रास मण्डल में खड़ा रहता हूँ।
 
       राहु बोल उठा मुझे तो देवत्व का दर्जा ही प्रभु श्रीकृष्ण ने दिया है, राक्षस से देवता बनाया है, सुदर्शन चक्र से संस्पर्शित किया है अतः मैं भला क्यों नीच स्थान पर बैठूं? मुझे क्या पड़ी है ? मैं तो गुरु के साथ बैठूंगा। गुरु राहु की युति जातक को परम अध्यात्मवादी एवं दार्शनिक बनाती हैं। राधा तो मेरी इष्ट हैं, इनके हाथ में तो त्रिशूल बना हुआ है ये गुरु स्वरूपिणी हैं, इन्हें भला मैं क्या शूल दूंगा? जब क्रूर ग्रह ही अनुकूल हो गये, भक्ति करने लगे तब भला क्या बांचू इनकी जन्मकुण्डली? श्रृंगी कह उठे ये तो स्वयं परब्रह्म परमेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण रूपी विधाता का भाग्य हैं, सौभाग्य हैं। 

          यही कारण है कि पंचम पुरुषार्थ की उपासना करने वाले अर्थात प्रेम के मार्ग पर चलने वाले, राधा के मार्ग पर चलने वाले जातकों पर हिंसक, क्रूर ग्रह भी क्रियाशील नहीं होते, वे सदैव अनुकूलता ही बरसाते हैं। बड़ी मजे की बात है चल पड़ी मीरा प्रेम पथ पर, राणा क्रोधित हो उठा और उन्हें भूत महल में रहने की आज्ञा दी। भूत महल अभिशत था एवं अतृप्त आत्माओं, प्रेतों, पिशाचों का वह भुवन था। राणा ने सोचा चलो बला टली, भूत महल के वासी मीरा का काम तमाम कर देंगे परन्तु हुआ उल्टा, मीरा ने भूत महल में प्रारम्भ कर दी श्रीराधिकोपासना बस देखते ही देखते भूत महल आबाद हो उठा एवं भूत-प्रेत खुशी से नाचने लगे और कह उठे लो आ गईं राधा। अब हमें मुक्ति मिलेगी, अब हम समस्त अभिशप्तताओं से, पाप कर्मों इत्यादि से सदा के लिए मुक्त हो जायेंगे, हमारे बंधन कट जायेंगे, हम भी उच्च लोकों को प्राप्त होंगे और ऐसा ही हुआ। मीरा ने जैसे ही तानपुरे पर कृष्ण राग का अलाप किया भूत महल देव महल में परिवर्तित हो गया एवं भूत प्रेत देवत्व को प्राप्त हो गये। 

         जिस भूत महल से अट्ठाहास, चीखने चिल्लाने, रोने की आवाजें आती थीं, दुर्गन्ध आती थी, भयावहता झलकती थी वहीं अब अष्टगंध की खुशबू, जूही चंपक के पुष्पों की खुशबू आने लगी, दिव्य प्रकाश फैल उठा, देव शक्तियाँ दर्शन देने लगीं भूत महल को आबाद देख राणा चकरा गया और कह उठा यह क्या? हाँ पृथ्वी या ब्रह्माण्ड जब-जब भूत महल में परिवर्तित होता जाता है, मनुष्य का मस्तिष्क जब-जब भूत ग्रस्त होता जाता है, उसमें से सड़ान्ध आने लगती हैं। तब तब श्री राधिका अवतरित, हो पुनः भूत महल बने भूत ग्रह बने इस लोक को पवित्र करती हैं, प्रेम सुधा की धारा बिखराती हैं। 

       श्रीराधिका गोलोक मण्डल की अधिष्ठात्री हैं एवं वहाँ सिर्फ एक ही ग्रह क्रियाशील है और वह है कृष्ण ग्रह पंचम पुरुषार्थ के मार्ग में चलने वाले जातक पर एकमात्र ग्रह क्रियाशील होता है जिसका नाम है कृष्ण ग्रह कृष्ण की ही अंतर्दशा, कृष्ण की ही महादशा, कृष्ण का ही मार्केश, कृष्ण ग्रह का ही राज योग जब अंगूठे के निचले पोर पर यव बन जाये तो समझ लेना चाहिए कि जातक पंचम् पुरुषार्थ सिद्ध होगा, प्रेम के मार्ग पर चलेगा, श्रीराधिका का गोप बनेगा, सदैव चौदह वर्ष का रहेगा एवं उसे कृष्ण ज्वर लगेगा। वह जब कभी पीड़ित होगा तो कृष्ण ज्वर से ही पीड़ित होगा, उसे कृष्ण की ही नजर लगेगी, उसे कृष्ण का ही ताबीज पहनना होगा, उसे कृष्ण से ही कष्ट होगा, कृष्ण से ही सुख होगा, जीवन में जो कुछ योग भोग-सम्भोग होगा वह कृष्ण ग्रह के माध्यम से होगा कृष्ण के नाम से बदनाम, कृष्ण के नाम से ख्याति, कृष्ण के नाम से ही लांछन उसे लगेगा, जानेंगे उसे तो सिर्फ कृष्ण के नाम से ही यह है श्री राधिका का जन्म कुण्डली विवेचन कृष्ण के रंग में रंगा हुआ, कृष्ण के नाम से ही बदनाम, कृष्ण के नाम से ही विख्यात और कुछ नहीं, जो कुछ होगा सब कृष्णमय होगा।

      चलो हम सब मिलकर अब प्रभु श्रीकृष्ण को ढूंढे वे भी यही कहीं उदित हुए होंगे जब श्री राधिका आ गईं तो कृष्ण भी आये होंगे दुर्वासा, गर्ग, शाण्डिल्य, श्रृंगी, करभाजन ऋषि कह उठे। अब समय नहीं है वेद बांचने का, आँख मूंदकर तपस्या करने का माला जपने का पत्थर पूजने का, योग करने का, धूनि रमाने का अब तो साक्षात् दर्शन का समय आ गया है. अब क्या जरुरत फालतू प्रपंचों की और चल पड़े पाँचों ऋषि कृष्ण को ढूंढने गोप मण्डल में जहाँ राधा वहीं श्रीकृष्ण घोर संघर्ष हुआ महाभारत के युद्ध के पश्चात्, कृष्ण की दस हजार चौंसठ रानियाँ थीं एवं उनसे दस हजार से भी ज्यादा पुत्र उत्पन्न हुए पर क्या हुआ? कृष्ण ने अपने सामने ही सबको नष्ट करवा दिया, कृष्ण कुल में कोई नहीं बचा न पुत्र न पौत्र न प्रपौत्र अन्यथा इस पृथ्वी पर पंचम पुरुषार्थ सदा के लिए स्थापित हो जाता, यह पृथ्वी प्रेममयी हो जाती, दूसरा गोलोक मण्डल बन जाता और तो और श्रीकृष्ण ने श्रीराधिका से भी कोई संतान उत्पत्ति नहीं की, सात्विकता बनाये रखी अन्यथा कृष्णत्व पृथ्वी पर भी पल्लवित हो जाता। 

          गोलोक धाम गमन से पहले लीलाधारी अपने साथ सबको ले गये एवं पृथ्वी मण्डल पर किसी को नहीं छोड़ा, । बस एक झाँकी दिखाई, एक दृश्य दिखाया, वास्तविकता का एहसास कराया और पुनः हे कुल विद्ये, हे राधिके तेरी ही प्रसन्नता हेतु, तेरे ही निर्देशन में कृष्ण सबकुछ समेटकर पुन: तेरे कुलधाम को वापस चले गये । तूने उन्हें कुल से निकलने नहीं दिया, निकलने की कोशिश तो कृष्ण बहुत करते हैं परन्तु तू निकलने नहीं देती। उनकी निकलने की कोशिश, उनकी भागने की कोशिश और पुनः तेरे द्वारा उन्हें. अपने कुल में विद्यमान कर लेने के मध्य में ही भगवत लीला का अविष्कार होता है। कृष्ण का क्या? वह तो जिसे देखो उसका होने लगता है, भक्त के पीछे भागना कृष्ण की आदत है गजब की विद्या है कुल विद्या उसने तुझे डिगाने के लिए दस हजार चौंसठ रानियों से विवाह किया पर फिर भी नहीं निकल सके तू जो निकलने दे उन्हें भक्तों के बर्तन मांजने लगते हैं, दास बन जाते हैं, किसी के पति बन जाते हैं, किसी के पुत्र बन जाते हैं, किसी के भाई बन जाते हैं, किसी के सखा बन जाते हैं, कभी तलवार हाथ में लेकर युद्ध करने लगते हैं, कभी - सुदर्शन चक्र उठा मारने दौड़ते हैं, कभी गौए चराने लगते हैं, कभी कुछ तो कभी कुछ पर तू उन्हें कहीं नहीं उलझने देती।

            हे रासेश्वरी कहीं उन्हें टिकने नहीं देती तू और समेट ही लेती है अपने आलिंगन में । कृष्ण का क्या ? वे तो जिसे देखो उसके गले में बांहें डालने लगते हैं पर अंत में होता कुछ नहीं है, घूम फिरकर तेरे पास लौट आते हैं। गीता सुनाते हैं, मथुरा बसाते हैं, द्वारका बसाते हैं परन्तु किसी भी जगह तू उसे स्थिर नहीं रहने देती है बस क्षण दो क्षण के लिए घूमने फिरने देती है और पुनः उनका अतिक्रमण कर लेती है अपने श्रीराधिका भुवन में और अंत में ले देकर यही होता है श्री राधा के कृष्ण सम्हालती तो कृष्ण को तू ही है। न देवकी सम्हाल पायीं, न यशोदा सम्हाल पायीं, न रुक्मिणी सम्हाल पायीं, न अर्जुन सम्हाल पाये सम्हाला सिर्फ राधा ने यही है कुल विद्या श्रीराधा के कुल में ही कृष्ण पल्लवित हैं, वहीं फल-फूल रहे हैं अन्य कहीं नहीं। वहीं कृष्ण रूपी फल लगा हुआ है, वहीं पंचम पुरुषार्थ है।

       दुशाःसन द्रोपदी का चीर हरण कर रहा था द्रोपदी कह उठी हे द्वारकाधीश हे मथुरेश, हे रुक्मिणी पति मेरी रक्षा करो पर कृष्ण नहीं आये। द्रोपदी पुनः कातर स्वरों में विलाप कर बोली हे जगत गुरु मेरी रक्षा करो फिर भी कृष्ण प्रकट नहीं हुए परन्तु जैसे ही कृष्णा के मुख से निकला हे राधेश्वर कुछ करो, कृष्ण प्रकट हो गये और अम्बर का अम्बार लग गया। कृष्ण ने झुंझलाकर कहा हे कृष्णा किन नामों से पुकार रही थीं मुझे। मैं तो तेरे हृदय में रहता हूँ, हृदय पुकारतीं, मेरी आल्हादिनी शक्ति के नाम से पुकारा तो मैं आ गया अन्यथा नहीं आता। श्रीराधिका को गोलोक मण्डल में मालूम चला कि कृष्ण अपनी द्वितीय पत्नी विरजा के साथ निकुंज लीला कर रहे हैं तो वे क्रोधित हो उठीं। गोलोक में कृष्ण की तीन अधिष्ठात्री शक्तियाँ हैं प्रथम राधिका, द्वितीय विरजा एवं तृतीय भूदेवी। परब्रह्म कृष्ण की लीला । क्रोधित श्रीराधिका जी अपनी असंख्य गोप सखियों के साथ चल पड़ीं विरजा निकुंज की ओर एवं देखा कि दरवाजे पर श्रीदाम पहरा दे रहा है बस क्रोध वश श्री राधिका की गोपियों ने श्रीदाम की बेंतों से पिटाई शुरु कर दी। कोलाहल सुन परब्रह्म परमेश्वर अंतर्ध्यान हो गये और विरजा नदी के रूप में परिवर्तित हो गईं।

श्री राधिका वापस आ गईं एवं कृष्ण को अपने समीप पा बोलीं आपकी प्रेयसी तो नदी बन गई अब आप नद बन जाइये, वहीं जाईये यहाँ क्या रखा है ! श्री राधिका मान ही नहीं रही थीं एवं कृष्ण अपने कुल से बाहर कर रही थीं आखिरकार श्रीदाम बोल उठा हे माता प्रभु परब्रह्म परमेश्वर हैं आप उनसे क्यों रूठती हो? वे आप जैसी अनंत शक्तियाँ बना सकते हैं बस फिर क्या था ? श्री राधिका कुपित हो उठीं और बोली रे मूढ़, राक्षसों के समान बात करता है जा राक्षस कुल में उत्पन्न हो जा और श्रीदाम को कुल से बाहर कर दिया। महाविष्णु क्या हैं? वे तो श्रीराधिका एवं श्रीकृष्ण के प्रथम मिलन के तेज से उत्पन्न प्रथम पिण्ड हैं जिन्हें कि श्री राधिका ने त्याग दिया है और बाद में श्रीकृष्ण ने अपने वरदान से उन्हें विराट महाविष्णु में परिवर्तित किया। पुत्रोत्पत्ति, संतानोत्पत्ति श्री राधिका ने स्वीकार नहीं की जो कुछ हैं सिर्फ कृष्ण हैं। विरजा ने कृष्ण से पुत्र उत्पन्न कर लिए कृष्ण और विरजा के सात पुत्र उत्पन्न हुए एवं एक दिन बड़े पुत्रों ने छोटे पुत्रों को मारना शुरु कर दिया। रोते हुए छोटे पुत्र श्री विरजा के पास आये, विरजा उलझ गईं पुत्रों में और कृष्ण अंतध्यान हो गये कुपित विरजा ने कहा है पुत्रों जाओ तुम सातों समुद्र में परिवर्तित हो जाओ, तुमने मेरा कृष्ण वियोग कराया है, तुम लोगों का भी सदा आपस में वियोग रहेगा और सातों पुत्र सात समुद्र में परिवर्तित हो गये एवं अलग-अलग दिशा में बहने लगे, केवल प्रलयकाल में ही एक हो पाते हैं। विरजा के कुल में श्रीकृष्ण स्थापित नहीं हो पाये, ले देकर श्रीकृष्ण श्री राधा का ही विषय हैं। साधक एक बात अच्छी तरह समझ ले कि परब्रह्म परमेश्वर हैं किस कुल में ? तभी वह उन्हें प्राप्त कर सकता है।
                                 
                      तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा
                           शिव शासनत: शिव शासनत:
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THE FIFTH ELEMENTS

        सूर्य की परम प्रचण्ड ऊर्ध्व किरणें भी जहाँ नहीं पहुँच सकती वहीं पर दिव्य गोलोक मण्डल सुस्थापित है एवं इस दिव्य गोलोक मण्डल का सबसे भव्य एवं परम सुरक्षित स्थान है श्री राधिका भुवन सोलह परम बलशाली गोप द्वारपालों से घिरे हुए इस भुवन में सोलह द्वार हैं एवं प्रत्येक द्वार पर रत्न सिंहासनों पर आरूढ़ लाखों करोड़ों दिव्य गोप" गोपियों द्वारा सेवित द्वारपाल सदा सतर्क रहते हैं एवं यहाँ तक कि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र भी जब प्रथम द्वार पर पहुँचते हैं तब परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण की आज्ञा के बिना द्वारपाल उन्हें श्री राधिका के भुवन में प्रविष्ट ही नहीं होने देते हैं। सर्वप्रथम द्वारपाल परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण से सलाह मशविरा करते हैं उसके पश्चात् ही ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्र श्रीकृष्ण मनोहारिणी के दर्शन हेतु प्रविष्टि पाते हैं। ग्यारहवें द्वार पर परम श्रीकृष्ण भक्त सुदामा क्षेत्रपाल के रूप में सुरक्षा करते हैं। बारहवें द्वार पर श्रीदाम नामक परम कृष्ण भक्त सदा करोड़ों गोपों के साथ चौकस रहते हैं। तेरहवाँ द्वार पार करने के पश्चात् गोपी मण्डल का प्रादुर्भाव होता है। रासेश्वरी राधा के शरीर से उत्पन्न लाखों गोपियाँ श्री राधिका भुवन की सुरक्षा, सेवा, देखभाल इत्यादि में सदा तत्पर रहती हैं एवं इन गोपियों का सौन्दर्य ब्रह्माण्ड की अनेक देवियों को भी मूर्च्छित कर देने वाला होता है और सबकी सब हाथ में बेंत ली हुई होती हैं। अंत में श्री राधिका की तैंतीस परम विश्वसनीय गोप सखियाँ उन्हें आवरण में लिए हुई होती हैं। ये गोप सखियाँ साये के समान श्री राधिका के इर्द-गिर्द विराजमान रहती हैं एवं ये उनकी ही अंशभूता हैं। 

           श्रीराधिका को पूर्ण समर्पित, श्री राधिका के मनोभावों को समझने वाली, श्री राधिका का श्रृंगार करने वाली, श्री राधिका की प्रत्येक आवश्यकता की पूर्ति करने वाली, श्री राधिका का चॅवर डुलाने वाली इन तैंतीस सखियों में भी अष्ट सखियाँ अति विशिष्ट हैं जो कि श्री राधिका के समान समरूप सौन्दर्यमयी हैं। गोलोक मण्डल में पूर्ण समर्पण है एवं स्व सुख की इच्छा नहीं है। श्री राधिका के सुख हेतु, श्री राधिका की प्रसन्नता हेतु ही प्रत्येक गोप एवं गोपियाँ क्रियाशील रहते हैं और श्री राधिका भुवन के मध्य में नीलमणि युक्त रत्न सिंहासन पर नीली आभा बिखेरती हुई श्री राधिका सिंहासनारूढ़ होती हैं। केवल परब्रह्म परमेश्वर श्री कृष्ण ही स्वेच्छा से, स्वतंत्रता से, जब चाहें तब श्री राधिका भुवन में आ जा सकते हैं। ब्रह्माण्ड का सबसे सुरक्षित, सबसे कवचित, सबसे पवित्र स्थान है श्री राधिका भुवन, वास्तविक द्वारिका यही है, वास्तविक दुर्ग यही है। सोलह अभेद द्वारों से युक्त परम ब्रह्माण्डीय द्वारका क्यों परब्रह्म परमेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण ने श्री राधिका भुवन को इतना अभेद बनाया, इतने द्वारों से युक्त किया, इतना दुर्लभ बनाया? वह इसलिए कि अनंत ब्रह्माण्डों का सबसे दुर्लभतम् तत्व अर्थात पंचम पुरुषार्थ अर्थात प्रेम की घनीभूत मूर्ति हैं श्री रासेश्वरी राधिका। 

         धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चार पुरुषार्थ तो ब्रह्माण्ड के सभी ग्रहों को, सभी लोकों को सम्पूर्णता के साथ परब्रह्म परमेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण ने प्रदान किए पर परम गोपनीय पंचम् तत्व (THE FIFTH ELEMENTS ) अर्थात विशुद्ध प्रेम, परम प्रेम अर्थात पंचम् पुरुषार्थ रूपी श्री राधिका को स्वयं अपने लिए रखा किसी और के लिए नहीं। केवल कृष्ण की राधा कृष्ण हेतु राधा यही है पंचम् पुरुषार्थ का रहस्य हाँ यह अब भी गोपनीय है ब्रह्माण्ड का प्रत्येक जीव प्रत्येक ग्रह श्री कृष्ण उपासना इसलिए करता है कि एक बार उसके जीवन में पंचम् पुरुषार्थ आ जाये, वह प्रेममयी हो जाय, चारों वेद भी गोपनीय रूप से पंचम् पुरुषार्थ अर्थात पंचम् वेद की भूरी-भूरी प्रशंसा करते हैं, उसे पाने के लिए सदा लालायित रहते हैं, पंचम् पुरुषार्थ परब्रह्म परमेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण की आत्मा है, यह उनकी गोपनीय शक्ति है। 

        विशुद्ध राधिका सानिध्य ही उन्हें परब्रह्म परमेश्वर के रूप में परिवर्तित करता है, प्रभु श्रीकृष्ण की लीला हैं श्री राधिका कृष्ण ही जिनकी पूजा हैं, कृष्ण ही जिनकी उपासना हैं, कृष्ण ही जिनकी दृष्टि हैं, कृष्ण ही जिनकी श्वास हैं, कृष्ण ही उनका भोजन हैं जो कुछ हैं श्रीकृष्ण ही हैं, कृष्ण के सिवा कुछ नहीं कृष्ण से उदित कृष्ण में ही विलीन जिनकी नियति है। गोलोक में सर्वप्रथम कृष्ण के वामांग से ही श्रीराधिका का उदय हुआ और उदय होते ही श्रीकृष्ण चरण धावन हेतु दौड़ पड़ीं इसलिए श्रीराधा कहलाईं "रा का तात्पर्य है निर्वाण एवं धा का तात्पर्य है दान" जो निर्वाण दान कर सकती हैं वह परम शक्ति हैं श्रीराधिका प्रेम में तो निर्वाण हो ही जाता है, निर्वाण प्रेम के बिना सम्भव ही नहीं है।

        ध्यान रहे मोक्ष, पाँच प्रकार के मोक्ष, मुक्ति, नाना प्रकार की मुक्ति इत्यादि से भी उच्च अवस्था है निर्वाण निर्वाण के बाद ही निर्माण प्रारम्भ होता है। जो निर्वाण की बात करते हैं वे मोक्ष, मुक्ति, सायुज्य, लोक यात्रा इत्यादि के पचड़े में नहीं पड़ते। हे कुल गामिनी, हे कुलीना कृष्ण को तो तूने अपने कुल में स्थापित कर लिया है, कृष्ण तेरे कुल का है। कृष्ण प्राप्ति हेतु लोग नाना प्रकार के प्रपंच करते हैं परन्तु कृष्ण प्राप्त नहीं होते, स्वप्न में भी नहीं आते, दर्शन भी नहीं देते। क्यों देंगे वे दर्शन ? वे तो श्री राधिका भुवन में श्री रासेश्वरी के हृदय मण्डल में कवचित हो विलास कर रहे हैं.. विहार कर रहे हैं अन्य है ही नहीं। श्री रासेश्वरी के भुवन मण्डल को कौन भेद सकता है ? तपस्वियों का ज्ञान भी नहीं, विज्ञानियों का विज्ञान नहीं, सिद्धों की सिद्धियाँ नहीं अतः हे कुल गामिनी रासेश्वरी एक दिन थकहारकर समस्त देवता, त्रिदेव, समस्त देवियाँ, योगी सिद्ध ऋषि इत्यादि अपना सारा तप, अपना सारा ज्ञान, अपनी सारी सिद्धि, अपनी सारी विद्या, अपना सारा चिंतन, अपना सारा विज्ञान इत्यादि तेरे चरणों में सम्पूर्णता के साथ अर्पित कर देते हैं और कहते हैं हे रासेश्वरी हमें गोप बना लो, हमें गोपी बना लो, हमें जगत गुरु परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण की झलक दिखा दो, हमें अपने कुल में शामिल कर लो। 
           लोग रोते हैं, विरह को भोगते हैं, स्तम्भित हो जाते हैं, सब कुछ छोड़ देते हैं, सबसे मुक्त हो जाते हैं, मूच्छित हो जाते हैं महाभाव में आ जाते हैं, किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं, कभी चीखते हैं तो कभी आल्हादित होते हैं, कभी धूलि में लोटते हैं। कब दिन हो जाता है, कब रात ये भी भूल जाते हैं। सारा अहम् बह जाता है, मैं क्या हूँ? यह भी छूट जाता है, तुम कौन हो ? यह भी भूल जाते हैं तब जाकर कर्म बंधन कटते हैं और साधक प्रेम की धारा में बह उठता है, प्रेममय हो जाता है एवं उम्र की सीमा, जन्म की सीमा, जात की सीमा, वर्ग की सीमा, अर्थ की सीमा, काम की सीमा, भोग की सीमा, मोक्ष की सीमा इत्यादि से परे हो जाता है। कुल छूटता है, घर बार छूटता है तब जाकर श्रीराधिका के महाकुल में स्थान मिलता है और साधक गोप बन जाता है, गोपी बन जाता है अनावृत्त हो जाता है।

        जब समस्त सांसारिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक गोपनीयताओं का अंत होता है तब जाकर योगमाया अनावृत्त गोप मण्डल में गोप और गोपी के रूप में साधक को प्रतिष्ठित करती हैं। मस्तिष्क में तो नाना प्रकार के नृत्य हैं कभी बल नृत्य करता है, कभी अहम नृत्य करता है, कभी समाज नृत्य करता है, कभी ज्ञान नृत्य करता है, कभी विज्ञान नृत्य करता है, कभी योग नृत्य करता है परन्तु जब पंचम पुरुषार्थ अर्थात श्री राधिका का विशुद्ध प्रेम मस्तिष्क में प्रवाहमान होता है तो सारे उल्टे सीधे नृत्य भाग खड़े होते हैं, उनके पैर फिसलने लगते हैं, उनकी ताल गड़बड़ा जाती है और मस्तिष्क इन कृत्रिम नृत्यों से, इन क्षणिक नृत्यों से विमुख हो जाता है। हाँ साधक को लगता है कि नृत्य छिन गया, कहीं कुछ हो गया क्योंकि वह आदी होता है इन बेढंगे नृत्यों का, उसने नहीं देखा होता महानृत्य, उसने नहीं देखी होती रसेश्वरी की महानृत्य लीला | वह जिन्हें नृत्य समझता है वह नृत्य नहीं अपितु कठपुतली का खेल है, परतंत्रता है, दूसरों की अंगुलियों पर हाथ पाँव हिलने की प्रक्रिया है, इसमें स्व आनंद नहीं है अपितु दूसरों के आनंद के लिए, दूसरों के सुख के लिए हिलने डुलने की प्रक्रिया है। स्व के लिए नृत्य, स्व के लिए थिरकन तो कुछ अलग ही है जिसने चखा वही जानता है।

        प्रेम से बढ़कर कुछ नहीं है, प्रेम नहीं मिला, पंचम् पुरुषार्थ नहीं मिला श्री राधिका नहीं मिली तो फिर क्या मिला? कृष्ण अर्थात परब्रह्म परमेश्वर अर्थात जगत गुरु से साक्षात्कार सम्भव नहीं है। क्यों इतनी बेचैनी? क्यों इतनी छटपटाहट ? क्यों इतनी विकलता ? क्यों इतनी हृदय में असहनीय पीड़ा होती है? सब कुछ तो है पास में, चारों पुरुषार्थ का अनुसंधान तो कर लिया इस पृथ्वी पर अनेकों राजाओं ने,, अनेकों महानुभावों ने फिर भी कहीं कुछ छूट रहा है इसकी पीड़ा तो महसूस होती है। हे रासेश्वरी तेरा कृष्ण वास्तव में जगत गुरु है, वह कसक बाकी रखता है। कहीं न कहीं कसक रह ही जाती है, कहीं न कहीं कुछ अप्राप्त की कसक बनी ही रहती है और इसी कसक को ढूंढते-ढूंढते, पहचानते पहचानते न जाने कितने जन्म लेने पड़ते हैं पर कसक बनी रहती है।

        क्या है वह कसक ? क्या है वह दुर्लभतम् ? जिसकी खोज है हमें। लोगों ने अथाह ज्ञान अर्जित कर लिया, अनेक विवाह कर लिए, पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक राज्य स्थापित कर लिया, धन का अम्बार लगा दिया यश, ऐश्वर्य, कीर्ति, सिद्धियों इत्यादि से अपनी झोलियाँ भर ली फिर भी भिखमंगे रह गये, भीख मांग उठे हे रसेश्वरी राधिका तेरे चरणों में उड़ेल दिया सबने सब कुछ और मांग ली भिक्षा पंचम् पुरुषार्थ की तपों में महातप, योगों में महायोग, लयों में महालय, ज्ञानों में महाज्ञान, विज्ञान में परा विज्ञान है पंचम पुरुषार्थ अर्थात विशुद्ध प्रेम एवं इसके अभाव में कोई पुरुष पूर्ण नहीं है वह सिर्फ अधूरा है, हाँ आधा अधूरा है। 

        मारो राम, तीर मारो रावण के हृदय में, भेद दो इसका सीना अपने तीक्ष्ण बाणों से कह उठे लक्ष्मण, हनुमान, विभीषण प्रभु श्री राम से हे राम तुम रावण के सिर काट रहे हो, अंग-अंग पर प्रहार कर रहे हो परन्तु हृदय को क्यों नहीं भेदते ? उसके हृदय पर एक भी बाण नहीं मारा, ऐसा क्यों ? हमारी समझ में नहीं आ रहा है। राम मुस्कुरा उठे और बोले वह मेरा ही गोप है श्री राधिकोपासना कर रहा है, हृदय में राधिका रूपी सीता को विराजित किए हुए हैं उसकी उपासना का अपना ढंग है, मुझे उसकी आँखों में सीता के प्रति प्रेम दिखाई पड़ रहा है, अध्यात्म को समझो जब तक सीता उसके हृदय में विराजमान हैं यह राम उसका हृदय नहीं भेद सकता, कैसे चलाऊं बाण उसने तो सीता प्रेम में महा त्याग किया है, पुत्र खोये, पौत्र खोये, राज्य खोया, सेना खोई, ज्ञान खोया, कीर्ति खोई, सब कुछ तो अर्पित कर दिया श्री सीता के चरणों में और अंत में स्वयं के प्राण भी अर्पित करने आ गया। 

        यह पंचम् पुरुषार्थ का साधक है, चारों वेदों को पार कर गया है, यह अमृत्व प्राप्त करेगा, यह महाज्ञानी है। जब तक राम की कीर्ति रहेगी रावण भी याद किया जाता रहेगा। राम ने रावण की नाभि में तीर मारा हृदय में तीर नहीं मारा और रावण पंचम् पुरुषार्थ सिद्ध हो गया, हारते-हारते भी जीत गया पुनः श्री राधिका के गोप मण्डल में द्वारपाल बन गया, यह ..तो गर्ग संहिता भी कहती है, श्रीमद्देवी भागवत भी कहती है, ब्रह्म वैवर्तपुराण भी कहता है बस रावण की श्री राधिकोपासना को देखने के लिए पथराई आँखें छोड़नी पड़ेंगी, वह श्री राधिका के कुल में भी स्थापित में हो गया। वह राधिका रूपी श्री सीता के लिए रोया, हाथ पाँव जोड़े, पीछे-पीछे दौड़ा, जीते जी जाने नहीं दिया श्री सीता को लंका से, मृत्यु के बाद ही श्री राम ले जा सके। श्री सीता से जबरदस्ती नहीं की अपितु उसने पूजा, उसने उपासना की, उसने आराधना की । वह तो उस दिन का इंतजार कर रहा था कि कब पंचम् पुरुषार्थ की घनीभूत मूर्ति श्री सीता जीवित, जागृत, स्पंदित होती हुईं पृथ्वी पर अवतरित हों और वह वास्तविक उपासना कर सके। इसी आस में वह जी रहा था, वह महा तत्वज्ञानी था।

           राम आगे-आगे चलते हैं एवं राधिका स्वरूपिणी श्री सीता बीच में चलती हैं और लक्ष्मण पीछे-पीछे। वनवास के समय वन में ये तीनों एक सीध में गमन करते हैं, लक्ष्मण प्रभु श्रीराम से परम प्रेम करते हैं परन्तु श्री सीता के बीच में आ जाने के कारण वह प्रभु श्री राम के दर्शनों से विमुख हो जाते हैं और उनकी दृष्टि प्रभु श्रीराम पर नहीं पड़ पाती । . वे भाव विह्वल हो जाते हैं, उनका हृदय मथ उठता है, वे तड़फ उठते और जब श्री सीता थोड़ा सा बाजू में होतीं तब जाकर लक्ष्मण नैन भरकर प्रभु श्री राम के दर्शन कर पाते। यही जीवन है आगे-आगे परब्रह्म परमेश्वर बीच में महामाया और पीछे-पीछे जीव ।

           महामाया जब बगल में होती हैं, कृपा करती हैं, आवरण हटाती हैं तब जाकर परब्रह्म परमेश्वर के दर्शन हो पाते हैं। श्री राधिकोपासना से सबको गुजरना ही पड़ता है यही नियति है गोप मण्डल में प्रविष्टि हेतु, हिंसा से परे होने हेतु । आ गया महाभाव प्रभु श्री राम को शुरु हुआ श्री राधिका पूजन, चढ़ गया पंचम् पुरुषार्थ का रंग, हो गये प्रेममयी एवं श्री सीता के विरह में वन-वन घूमने लगे विक्षप्तों की भांति । पेड़ पौधों से बातें करने लगे, हे हवा-हे वायु कहाँ हैं मेरी सीता पता बता मुझे, हे वृक्ष क्या तूने उसे देखा, हे बहते हुए झरने क्या कभी तूने उनके पैरों की आहट सुनी है, नील गगन में उड़ते पंछियों क्या तुम्हें मेरी सीता दिखाई देती है ? मैं तो नहीं थ पर तुम सब तो यही थे, तुम सब तो जड़ हो ना फिर तुमने कैसे नहीं देखा ? मेरी सीता का कोई तो पता बता दे, कहाँ है ? किस हाल में है? कैसी है ? क्या मुझे याद करती है ? 

            लक्ष्मण परेशान हो गये प्रभु श्रीराम के महाभाव को देखकर वे, हनुमान एवं समस्त वानर दल, समस्त पृथ्वी का कण-कण साक्षी है प्रभु श्रीराम के पंचम पुरुषार्थ की उपासना का । मैं कौन हूँ? प्रभु आप श्री राम हैं अयोध्या के राजकुमार लक्ष्मण कह उठे, तुम कौन हो ? राम ने पुनः कहा मैं आपका सेवक हूँ लक्ष्मण कह उठे, हम यहाँ क्या कर रहे हैं? पुनः प्रभु श्रीराम कह उठे, हे प्रभु हम जगत जननी सीता को ढूंढ रहे हैं कौन सीता ? राम कह उठे । श्री लक्ष्मण चकरा गये, वे नहीं सहन कर पाये प्रभु श्रीराम का महाभाव और जोर-जोर से विलाप करने लगे। राम पुनः कह उठे हे लक्ष्मण तुम विलाप क्यों कर रहे हो, क्या करते बेचारे श्रीलक्ष्मण वे भी उनके साथ महाभाव में आ गये। 

          सभी को गुजरना पड़ता है प्रेम की सकरी गलियों में से। रातों की नीदें उड़ जाती हैं, दिन का चैन उड़ जाता है, कण्ठ हकलाने लगता है, हृदय इतना तेज धड़कता है कि न जाने कब फट जाये, बेचैनी इतनी होती है कि पृथ्वी के वायु मण्डल को भी भेदकर निकल जाने की इच्छा होती है, सब कुछ शून्य हो जाता है और साधक मूर्च्छित होकर गिर पड़ता है, आँखों से | इतने आँसू बहते हैं कि लगता है मानो गंगा अंदर ही फूट पड़ी हो । गौरांग प्रभुपाद श्रीराधा-कृष्ण के विग्रह के सामने खड़े होकर सोलह वर्ष तक रोते रहे, अश्रु धारा बहती रही, इतने आँसू गिरे कि सामने पत्थर पर बना हुआ गड्ढा भर गया। दिन भर में जल पीते होंगे एक लोटा और आँसू बहते होंगे 100 लोटों के बराबर । कहाँ से आया इतना जल आँखों में, यह श्रीराधिका ही जाने। श्रीराधिकोपासना, श्रीराधा का मार्ग ब्रह्माण्ड का सबसे कठिन मार्ग है परन्तु इसी मार्ग पर परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण मिलते हैं वंशी बजाते हुए ।

                   तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा                
                      एको ही निखिलम द्वितीयो नाऽस्ति
                          शिव शासनत: शिव शासनत:
                                 💐💐🌹🌹💐💐

श्री गायत्री रहस्यम ।।

      सनातन धर्म के चार प्रमुख आधार हैं जिन्हें हम गंगा, गीता, गौ और गायत्री के नाम से उच्चारित करते हैं। इन चार स्तम्भों पर ही समस्त आर्य संस्कृति टिकी हुई है। शक्तिशाली शरीर अन्य सभ्यताओं में बहुतायत पाये जाते हैं। विश्व की सभी सभ्यताएँ शक्तिशाली शरीरों से सुसज्जित हैं। इस पृथ्वी पर अनेकों वंश एवं अनेकों वर्ण के मनुष्य विराजमान हैं परन्तु उन सबमें आर्य ही सर्वश्रेष्ठ माने गये हैं। आर्य सर्वश्रेष्ठ क्यों हैं? किसी भी सभ्यता या मनुष्यों के वर्ग समूह की श्रेष्ठता उसमें प्रारम्भ से लेकर वर्तमान तक उत्पन्न हुए श्रेष्ठ महापुरुषों के कारण ही निर्मित होती है। आर्य सभ्यता में अनंतकाल से लेकर अब तक एक से एक श्रेष्ठ महामानव, महाअवतार, युगान्तकारी, युग प्रवर्तक, सम्पूर्ण विद्रोही, देवतुल्य एवं देवत्व से युक्त महापुरुषों, ऋषियों, राजाओं, मुनियों, त्यागियों, तत्वज्ञानियों, दर्शन 'शास्त्रियों इत्यादि का प्रादुर्भाव हो चुका है। 

            भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में स्पष्ट रूप से कहा है कि मैं वहीं पर विराजमान होता हूँ जहाँ पर सर्वश्रेष्ठता होती है इसीलिए विष्णु के सम्पूर्ण अवतार आर्य सभ्यता में ही अवतरित हुए हैं। अगर शरीर स्वस्थ है और मस्तिष्क अविकसित तो फिर मनुष्य एक सामान्य पशुता के गुणों से भरपूर जैविक संरचना है जिसका उद्देश्य सम्पूर्ण जीवन बस कुछ प्रारम्भिक क्रियाएँ जैसे कि खाना- पीना, प्रजनन और युद्ध इत्यादि तक सीमित रहती है। सीमितता पशुता का द्योतक है। सिंह एक वन में ही रहता है, वहीं पैदा होता है, वहीं मर जाता है। श्वान एक गली में जन्म लेता है और सम्पूर्ण जीवन गली के चौराहे पर बिताता हुआ वहीं मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। यह सब भयभीत, सीमित एवं आधे अधूरे मस्तिष्क की देन है। आजकल यही तथाकथित विचार मनुष्यों के समाज को भी दूषित कर रहा है। एक छोटा सा घर, एक छोटा सा फ्लैट तीन कमरे का दंड़वा, एक पति पत्नी और दो बच्चे बस सारी दुनिया, सारा जीवन, सारी ऊर्जा १० x१० के कमरे में सिमट कर रह गयी है। स्वार्थी जीवन मनुष्य का पर्याय बन गया है। 

            संयुक्त परिवार, देश, समाज और विश्व को भूलकर बस सबकुछ एक फ्लैट में सिमट गया है। यह जिन्दगी चूहे. के समान है। मूषक ब्रह्माण्ड का सबसे कायर प्राणी है। सबसे अनुत्पादक एवं विध्वंसक प्राणी है। इस तरह की कुप्रवृत्ति पाश्चात्य देशों की कलुषित, कुत्सित एवं पशुतापूर्ण सोच का नतीजा है। मनुष्य को छोटा बनाने की, बौना बनाने की प्रक्रिया है। यह हास का प्रतीक है। आर्य सभ्यता के विपरीत की यह विचारधारा है। आर्यों ने कहा समस्त पृथ्वी हमारी माता है, समस्त पृथ्वी के हम अधिकारी हैं, समस्त ब्रह्माण्ड हमारा है। यह है फैलने की कला नवीनता लिए हुए जीवन जीने की कला। ऊर्जा से लबरेज एक अति स्वस्थ एवं जिज्ञासु व्यक्तियों के समूह का उद्घोष यही कारण है कि कालान्तर आर्य मध्य एशिया, भारत, जर्मनी, लेटिन अमेरिका, भूटान, तिब्बत से लेकर सुदूर अमेरिकी महाद्वीप एवं अफ्रीका के अन्य हिस्सों में पल्लवित हुए, फले-फूले सोच में विस्तृतता, पावों में इतनी ताकत कैसे आर्यों में उत्पन्न हुई? कैसे आर्यों में प्रभु श्रीराम जैसे अवतारी उत्पन्न हुए? जिन्होंने अश्वमेघ यज्ञ के द्वारा सम्पूर्ण पृथ्वी को एक सूत्र में पिरो दिया। 

           आर्यों में ही भगवान विष्णु का वामन अवतार भी हुआ जिन्होंने ढाई में पृथ्वी तो क्या समस्त ब्रह्माण्ड को लांघ दिया। आर्यों में ही त्रिकाल दृष्टा ऋषि, स्वप्र साधक, ज्योतिषी, अंक शास्त्री इत्यादि सभी तो उत्पन्न हुए आर्यों की इस सफलता के पीछे शरीर के साथ-साथ परमात्मा की परम देन मस्तिष्क की भी सबलता थी। आर्यों ने मस्तिष्क का विकास किया। मस्तिष्क की एक-एक क्रिया को भली-भांति समझा, मस्तिष्क की एक-एक कमजोरी को दूर करने के लिए ध्यान, प्राणायाम, तंत्र इत्यादि अनेकों प्राच्य विद्याओं का अविष्कार किया मस्तिष्क और शरीर की लयात्मकता बनाए रखने के लिए योग के गूढ़ सिद्धांतों को खोजा। आर्यों ने खोजा ही नहीं बल्कि इन विद्याओं में चरमता और असीमितता के साथ पारंगतता हासिल की। मस्तिष्क को उन्होंने केवल अंग मात्र नहीं समझा। उन्होंने मस्तिष्क से काम लेना भी सीखा। एक-एक कोशिका के विज्ञान को समझा। ध्यान रहे ज्ञान और विज्ञान अध्यात्म की ही शाखा हैं। ज्ञान और विज्ञान का तात्पर्य अध्यात्म के उस स्तर से है जिसका कि मनुष्य ने पता लगा लिया है परन्तु आर्य नकारात्मक एवं सीमितता की भावना से कभी ग्रसित नहीं हुए। वे समझ गये कि जो कुछ प्राप्त किया है वह तो मात्र अंशात्मक है। ब्रह्माण्ड असीमित है, शक्तियाँ असीमित है, ज्ञान असीमित है अतः खोजें भी असीमित होनी चाहिए।

         आप भी असीमित बनिए। निरंतर आगे बढ़िये आगे बढ़ना ही नवीनता है, स्थान परिवर्तन भी करना पड़ेगा। मनुष्य चूहा नहीं है कि बस बिल में दुबका रहे। समस्त पृथ्वी को निहारिए। सर उठाकर ब्रह्माण्ड में देखिए, यात्राऐं कीजिए, कुछ कर गुजरिए । यही आपके वंशज, आपके पूर्वज महान आर्यों की जीवन शैली है। एक मकान, एक दुकान एवं अंगुलियों पर गिने जाने वाले रक्त सम्बन्धियों के लिए जिओगे तो फिर मृत्यु के समय मुश्किल से 10 लोग भी आपकी शव यात्रा में नहीं होंगे। कुछ ही वर्षों में भुला दिए जाओगे। इसे कहते हैं आधा-अधूरा जीवन, अपरिपक्व मस्तिष्क से युक्त मनुष्य, अतृप्त मृत्यु । अब सवाल उठता है कि आर्यों में इतनी शक्ति आयी कहाँ से, ऐसा कौन सा सूत्र उनके हाथ लग गया जिससे कि वे जीवन के सभी क्षेत्रों में तेजस्वी हो गये। ऐसी भी शक्ति ब्रह्माण्ड में है। युगान्तकारी, परिवर्तनकारी मंत्र भी उपलब्ध हैं। आपको तो बस इसका अनुसंधान करना है एवं इसे अपने अंदर प्रतिष्ठित करना है। इसे अपने अंदर क्रियाशील करना हैं और इस महामंत्र का नाम है चौबीस अक्षरों का गायत्री मंत्र। यह मंत्र उस महाशक्ति से सम्पुटित है जिसके द्वारा भस्तिष्क उध्वगामी होता है, संस्कारित होता है, शक्तिशाली एवं क्रियाशील होता है। 

          यह मंत्र ब्रह्माण्ड की प्रत्येक शक्ति को प्रत्येक रहस्य को मस्तिष्क से संस्पर्शित करा देता है। यही कारण है कि योगी योगेश्वर प्रभु श्रीकृष्ण ने गीता में इशारा किया है कि मंत्रों में मैं गायत्री मंत्र हूँ अर्थात आध्यात्मिक जगत की सर्वश्रेष्ठ स्तुति है गायत्री स्तुति आप सनातन धर्म के किसी भी ग्रंथ को उठाकर देख लीजिए प्रत्येक पूजन में सर्वप्रथम गायत्री मंत्र का जाप अवश्यम्भावी है। प्रत्येक गुरु दीक्षा के समय गुरु मंत्र के साथ गायत्री मंत्र अवश्य देता है। ऐसा इसलिए किया जाता है कि मस्तिष्क के अंदर उस आधारभूत शक्ति का स्थापन किया जा सके जिससे कि मस्तिष्क की उर्वरता पुनः बढ़ सके अनेका क्रिया से खंड खंड भ्रमित एवं सुप्त हो गई चेतना शक्ति, विचार शक्ति एवं तर्क शक्ति पुनः एकीकृत हो सके। नकारात्मकता की प्रवृत्ति से ग्रसित बुद्धि की ग्रंथि पुनः श्राप मुक्त हो सके। नकारात्मकता की शक्ति अनुत्पादक है अर्थात यह स्वयं का भक्षण करने की विनाशक प्रवृत्ति है। 

             पशु स्वयं के बच्चों को खा जाता है। पशुरूपी गुणों से युद्ध मनुष्य अपनी नकारात्मक सोच से स्वयं के मस्तिष्क का गुड़ गोबर कर लेता है। नकारात्मक कारनामों से रावण के समान स्वयं के साथ-साथ सारे कुल, वंश का सर्वनाश कर बैठता है। कहावत है कि - सत्तर पुत्र बहत्तर नाती। उस रावण घर दिया ना बाती॥ अर्थात मस्तिष्क इतना समृद्धशाली, वैभवशाली राक्षस जाति का अंत रावण के कारनामों से हो गया। सीधी सी बात है रावण का मस्तिष्क सात्विक नहीं था। सात्विक कैसे होता वह गायत्री मंत्र का उल्टा मंत्र जपता था। उसका मस्तिष्क तो स्त्री में लिप्त था, उसके मस्तिष्क की खुराक वासना थी। यही सब तो पतन के कारण हैं। सारी समस्याओं के पीछे बीमार सीमित, कुण्ठित एवं सड़े-गले मस्तिष्क दिखाई पड़ते हैं। आज के युग में तो मस्तिष्क इतने सड़ गल गये हैं कि मनुष्य के मस्तिष्क की शक्ति मेंढक जैसे प्राणी के मस्तिष्क से भी कम हो गई है। 

         जब मस्तिष्क विचार ही नहीं पकड़ पा रहे हैं तो फिर अध्यात्म कहाँ से स्थापित होगा। जिस समस्या का समाधानं कुछ सेकेण्ड में स्वयं मस्तिष्क दे सकता है उसी को समझते-समझते मनुष्य को वर्षों लग जाते हैं। कारण सीधा सा है मस्तिष्क के सोचने, कार्य करने, समझने, विचार करने एवं पुनः स्फूर्तिवान होने की रफ्तार घट गई है। रफ्तार क्यों घट गई है? मस्तिष्क क्यों धीमा पड़ गया है? संवेग क्यों आसानी से मस्तिष्क ग्रहण नहीं कर पाता है? सीधा सा कारण है सब कुछ मस्तिष्क के अंदर अवरोधित हो गया है ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार ऊबड़-खाबड़ सड़क पर हिचकोले खाते हुए वाहन चलता है। वैसे ही मस्तिष्क की प्रत्येक क्रिया चल रही है। गायत्री रूपी महाशक्ति को जिस दिन आपने आत्मसात कर लिया उस दिन आप आधी लड़ाई जीत गये। मस्तिष्क को समझना होगा। स्वयं की क्रियाओं का सूक्ष्मताओं के साथ निरीक्षण करना होगा। सीमितता के तथाकथित सामाजिक एवं पारिवारिक सिद्धांत को लात मारनी होगी तब कहीं जाकर ऋषि युक्त मस्तिष्क के आप स्वामी होंगे। स्वामी शब्द को गम्भीरता से लीजिए। आपको स्वामी बनना होगा स्वयं के मस्तिष्क का स्वामी आदेश देता है। स्वामी नियंत्रण करता है। स्वामी दण्ड देता है। स्वामी का मतलब है श्रेष्ठता इसके विपरीत गुलामी और दासता है। कोई किसी का गुलाम नहीं होना चाहता। सर्वप्रथम स्वयं की गुलामी दूर कर लो। स्वयं की दासता को मार भगाओ। ऐसा मस्तिष्क किस काम का जो शाम होते ही शराब मांगे। यह तो निम्न श्रेणी की दासता है। इसे कहते हैं आदी हो जाना।


आज के युग में ऐसे ही मनुष्यों की भरमार है। खुद की गुलामी से तो मुक्त हुए नहीं स्वतंत्रता की बात, विद्रोह की बात करके थोड़ी बहुत अपने आपको सांत्वना दे देते हैं। ऊपर जो कुछ भी कहा गया है यह सब गायत्री मंत्र का मर्म है। हर युग में इसी मर्म को विभिन्न तरीके से व्यक्त किया गया है। प्रत्येक ऋषि मुनि साधक एवं गुरु ने गायत्री मंत्र को धारण किया है। शारीरिक क्रियाओं एवं भौतिक कर्मों के आधार पर कोई मनुष्य पूजनीय नहीं बन सकता उसके लिए अद्वैत आध्यात्मिक क्रियाओं की जरूरत है। शून्य से उत्पत्तिकरण, अदृश्य से सदृश्य करने की क्षमता मस्तिष्क में तभी विकसित होगी जब वह गायत्री शक्ति से संचालित होगा। संचालन अनेकों शक्तियों से हो सकता है परन्तु ध्यान रहे कोयले या तेल से चलने वाला इंजन पृथ्वी के गुरुत्व को नहीं भेद सकता। पृथ्वी को लांघने के लिए अति परिष्कृत अणु रूपी ईंधन की जरूरत होती है । जब पृथ्वी को लांघने के लिए अणु रूपी ईंधन की जरूरत है तो फिर मानसिक एवं अधि भौतिक शरीर की क्रियाशीलता के लिए तो परम सात्विक गायत्री शक्ति ही आत्मसात करनी होगी। 

         आज के युग का एक उदाहरण देता हूँ। गायत्री शक्ति पीठ के संस्थापक गुरुदेव श्रीराम शर्मा जी आचार्य गायत्री के परम उपासक रहे हैं। मथुरा के एक छोटे से कमरे से इस कलियुग में गायत्री की उपासना प्रारम्भ की। गायत्री की अनन्य कृपा से सभी सूक्ष्मआद्य ऋषि शक्तियों ने इतनी कृपा, सहयोग एवं सिद्धियाँ प्रदान की कि देखते ही देखते कुछ वर्षों में ही उन्होंने हजारों की संख्या में अमूल्य ग्रंथ लिख डाले। करोड़ों भटकते हुए लोगों को दीक्षित कर दिया। देखते ही देखते लाखों परिवार संस्कारित एवं शुद्ध हो गये। कितनी ज्यादा सात्विकता मात्र एक ऋषि तुल्य शरीर ने उत्पन्न कर दी, कितना बड़ा कार्य कर दिया। जिस कार्य को पिछले 60-70 वर्षों में इस देश की तथाकथित राजनैतिक, सामाजिक एवं प्रशासनिक संस्थाऐं नहीं कर पायीं वह कार्य मात्र एक ऋषि मस्तिष्क ने सम्पन्न कर दिया। इसे कहते हैं। चमत्कार। इसे कहते हैं सनातन एवं वेदान्ती मस्तिष्क की शक्ति। वेदान्ती एवं सनातन मस्तिष्क अगर वास्तव में जागृत एवं क्रियाशील हो उठे तो फिर युग परिवर्तन निश्चित है। इसे कहते हैं शंकराचार्य का अवतरण मेरे गुरु ( श्री निखिलेश्वरानंद जी महाराज) भी इसी श्रेणी में आते हैं। 

          इस ब्रह्माण्ड का इतिहास अरबों-खरबों वर्ष पुराना है। इन अरबों खरबों वर्ष में न जाने कितने अद्भुत संयोजन ब्रह्माण्ड में उत्पन्न हुए और विलीन हुए। एक से एक विलक्षण एवं विहंगम और विचित्र चित्र ब्रह्माण्ड के पटल पर आकृति लेते रहे हैं परन्तु जैविक मस्तिष्क के रूप में एक अति दुर्लभ संरचना अपने आप में अनोखी है। ब्रह्माण्ड को इस पर विराज है मस्तिष्क का निर्माण अनेकों ब्रह्माण्डीय क्रियाओं का फल है। मस्तिष्क के रूप में जैविक कोशिकाओं का यंत्रमय गठन इतना उन्नत है कि इसकी शक्ति किसी भी ग्रह के धरातल को बदल सकती है। मस्तिष्क से ही तमाम यंत्र प्रादुर्भाव में आये हैं। रेलगाड़ी, राकेट, औषधि शास्त्र इत्यादि अनेकों या सभी प्रकार का ज्ञान मस्तिष्क से ही संस्पर्शित हो आकार ले सका। मस्तिष्क की क्षमता अनंत है। जैविक मस्तिष्क चाहे तो चन्द्रमा की सतह पर जी सकता है, मंगल के धरातल को बदल सकता है। सूर्य की परिक्रमा कर सकता है। यह सब मस्तिष्क भौतिक रूप से भी सम्पन्न कर सकता है तो वहीं मानसिक, आत्मिक एवं परादैहिक प्रक्रिया के द्वारा भी सम्पन्न कर सकता है। 

          ध्यान रहे जैविक मस्तिष्क केवल भौतिक क्रियाओं के लिए ही नहीं है। ऐसा सोचना मूर्खता की निशानी है। कुछ हद तक मस्तिष्क नियंत्रण का केन्द्र हैं इस ब्रह्माण्ड में जो मस्तिष्क आवश्यकता पड़ने पर हाथों को पंखों में ढाल सकता है, जरूरत पड़ने पर फेंफड़ों को पानी में श्वास लेना सिखा सकता है वही मस्तिष्क आने वाले समय में जीवन को अन्य नक्षत्र मण्डलों में भी स्थापित करने में भी सक्षम है। मस्तिष्क की क्षमता एवं प्रतिभा के मूल में है गायत्री छंद की शक्ति एवं गायत्री छंद की शक्ति के मूल में ब्रह्मा के एकोऽहं बहुस्याम होने की स्फूरणा अर्थात एक ब्रह्म शक्ति से अनेकों स्वरूप में ब्रह्म के स्थापित होने की इच्छा। यही तो मूलभूत चिन्तन है मस्तिष्क का मस्तिष्क कभी भी मरना नहीं चाहता है उसके अंदर सबसे प्रबलतम इच्छा अमृत्यु की है, बस इसी प्रबलतम इच्छा के चलते ही मस्तिष्क हमेशा जीवित रहता है, नवीन रूप धरता है, कपड़े के समान एक खोपड़ी से निकलकर दूसरी खोपड़ी में स्थापित होता रहता है। 

जरूरत पड़ने पर नवीन खोपड़ी का भी निर्माण कर लेता है। एक से अनेक होने की प्रारम्भिक एवं मूलभूत आवश्यकता ही मस्तिष्क को सम्प्रेषण शक्ति प्रदान करती है। सम्प्रेषण मस्तिष्क की मूलभूत जरूरत है। मस्तिष्क सम्प्रेषण के लिए भी बाह्येन्द्रियों एवं नाना प्रकार की अंतेन्द्रियों की चुपचाप रहता है।

          मस्तिष्क को सम्प्रेषण चाहिए मस्तिष्क से, मस्तिष्क विहीन वनस्पतियों से एवं अनेकों अदृश्य पराचेतन एवं सूक्ष्म शक्तियों से मस्तिष्क संगठन है यह संगठित करता है सभी शक्तियों को एक साथ अत्यधिक परिष्कृत रूप में संगठन के अंदर संगठन और फिर संगठन यही अनंत संरचना है मस्तिष्क की। न जाने कितने संगठनों का महासंगठन है हमारा मस्तिष्क। अनंतकाल से हम मस्तिष्क को समझने की कोशिश कर रहे हैं जितना समझते हैं कम ही लगता है। न जाने कब कौन सा मस्तिष्क कौन सी विचित्र क्रिया सम्पन्न कर दे। द्वितीय विश्व युद्ध के मूल में एकमात्र हिटलर में का विचित्र मस्तिष्क ही केन्द्र के रूप में उभरा है। विचित्र इसलिए क्योंकि वह मस्तिष्क विशेष है। एक तरफ उसका मस्तिष्क यहूदी स्त्री से प्रेम का सम्प्रेषण कर रहा है तो दूसरी तरफ यही मस्तिष्क समूचे यहूदी समुदाय के विनाश को भी निर्देशित कर रहा है। हिटलर तंत्र विद्या में दक्ष था उसके साथ उस जमाने का मशहूर तांत्रिक हिमलर 24 घण्टे रहता था। ज्योतिषियों का पूरा एक समूह उसे मंत्रणा प्रदान करता था। अनेकों वैज्ञानिक उसके निर्देशानुसार क्रियाशील थे। हिटलर भी आर्य था। द्वितीय विश्व युद्ध तो आर्यों और अनार्यों की लड़ाई थी। हिटलर भी आर्य नस्ल में ही उत्पन्न हुआ है। प्रत्येक हमले से पहले जर्मनी की सेना पूर्ण रूप से तंत्र शास्त्र का सहारा लेती थी। एक एक पल की ब्रह्माण्डीय गणना ज्योतिषी तय करते थे। एक से एक यज्ञ एवं अनुष्ठान सम्पन्न किए जाते थे। 

     कहने का तात्पर्य है कि तंत्र ज्योतिष, अध्यात्म, साधना के अभाव में किसी भी विराट परिवर्तन की अपेक्षा रखना बेकार है क्योंकि महापरिवर्तन में अनिश्चितता होती है। अनिश्चितता अद्वैत का द्योतक है। एक सफल और एक निष्फल मस्तिष्क में यही फर्क है कि सफल मस्तिष्क स्वेच्छा और सबलता से अद्वैत की चुनौती को स्वीकार करता है। यही है वीरता की प्रतीक आर्य मस्तिष्क की निशानी बुद्ध अनिश्चित थे फिर भी वन की तरफ गमन किया बुद्धत्व प्राप्ति हेतु, सत्य को समझने हेतु विवेकानंद की जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी फिर भी अमेरिका में होने वाली धर्म सभा के लिए प्रस्थान किया। लक्ष्य ने इनके कदम चूमे। दूसरी तरफ टमाटर के समान सड़े और पिलपिले मस्तिष्क हैं जो पशु के समान बस हरे-हरे चारागाह को पहचानते हैं। अद्वैत से भागते हैं। ऐसे मस्तिष्क बस लोथड़े बनकर रह जाते हैं। घोड़े की आँख पर हरा चश्मा बाँध दो वह भूसे को भी हरी घास समझकर खाने लगेगा। इन लोगों के लिए गायत्री छंद नहीं है। जो मस्तिष्क सम्प्रेषण नहीं कर सकता वह अर्जुन के समान सर्वश्रेष्ठ शिष्य नहीं बन सकता। अर्जुन ने आँख में आँख डालकर प्रश्न किए, अपने मस्तिष्क के अंदर कहीं गहरे में उठने वाले प्रश्नों और शंकाओं को पूरी तन्मयता के साथ महामानव स्वरूप में उपस्थित परम ब्रह्म रूपी मस्तिष्क के कारक प्रभु श्री कृष्ण के सामने एक-एक करके प्रस्तुत किया। 

       आप भी अपने मस्तिष्क के प्रत्येक तल पर उठने वाले प्रश्नों और जिज्ञासाओं को अपने गुरु के सामने रखो। यही विधान है, मस्तिष्क को पाप मुक्त करने का भय मुक्त करने का, उसे उर्ध्वगामी बनाने का सम्प्रेषण जरूरी है, दीक्षा जरूरी है, दिव्य चक्षुओं की प्राप्ति भी जरूरी है। त्रिनेत्र साधना के साथ साथ अनंत नेत्र साधना भी करनी चाहिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है। सभी के मस्तिष्क में असंख्य नेत्र लगे हुए हैं। आप अदृश्य आँखों से भी देख सकते हैं। मस्तिष्क के पास अदृश्य हाथ भी हैं। मस्तिष्क के पास अदृश्य मुँह भी हैं, मस्तिष्क एक साथ कई प्राणों को अपने अंदर स्थापित कर सकता है। मस्तिष्क अपने वजन को दस गुना .बढ़ा और घटा भी सकता है। यह सब गायत्री क्रिया के अंतर्गत आता है। मस्तिष्क के गायत्री मय होने पर एक से एक परालौकिक कार्य सम्पन्न होने लगते हैं।

विश्वामित्र ब्रह्मऋषि तभी बने जब उन्होंने गायत्री को अनुभूत कर लिया उससे पहले तो वे राजऋषि ही थे। ऋषियों में भी विभिन्न श्रेणियाँ हैं। राजऋषि की सक्रियता सिर्फ भूमि पर है परन्तु जैसे ही राजऋषि से ऊपर उठकर ब्रह्मऋषि की श्रेणी आती है मस्तिष्क एक झटके से पूर्ण परिवर्तित हो जाता है। उसकी शक्ति ब्रह्माण्डीय शक्ति हो जाती है। वह एक ऐसा स्वरूप ग्रहण कर लेता है जो कि इस समस्त ब्रह्माण्ड के प्रत्येक कण को स्वीकार्य होता है। इस प्रकार का मस्तिष्क कामरहित, लोभरहित, मोहरहित एवं श्वास और भोजन रहित होता है। ऐसा मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय शरीर धारण करता है। साधारण जैविक शरीर की सीमाऐं हैं विशेषकर वह पृथ्वी का दास होता है एक क्षण के लिए भी पृथ्वी से अलग होने पर उसका नाश हो जाता है परन्तु ब्रह्माण्डीय स्वरूप ग्रहण करने पर इस ब्रह्माण्ड के प्रत्येक ग्रह पर वह विचर सकता है। इसे कहते हैं सूक्ष्मीकरण । ब्रह्मऋषि ब्रह्मलोक के वासी होते हैं चेतनापुंज होते हैं। राजऋषि एवं अनेकों योगीजन इन्हीं के द्वारा नियंत्रित होते हैं। विश्वामित्र को ब्रह्मऋषि बनने में आधी सदी लग गई। ब्रह्मत्व ही गायत्री शक्ति का कल्प फल है। 
      ब्रह्म को धारण करना ही तो ब्राह्मणत्व है। ब्राह्मणत्व के प्रादुर्भाव से शरीर ब्राह्मण कहलाता है। ब्रह्म पाप रहित है, काम रहित है। निर्लिप्त एवं निर्मल माता गायत्री परम निर्मला हैं। उन्हीं की कोख से निर्मल, निश्चल, नियमित एवं नवीन ब्राह्मणत्व लिए हुए ऋषि पुत्रों का जन्म होता है। इन्हीं पर ब्रह्मऋषियों की असीम कृपा बरसती है। इन्हीं के चरणों में लक्ष्मी नृत्य करती है। इन्हीं से सम्प्रेषित हो जनसमुदाय सात्विकता ग्रहण करता है। ऐसे ही ऋषिपुत्र लीलाधारी होते हैं। इनकी क्रियाओं से सात्विकता ही बरसती है। इतिहास में केवल गायत्री पुत्र ही मंगल मूर्ति के रूप में स्थापित हुए हैं। जो स्वयं पाप विहीन हैं एवं दूसरों को ताप, शाप और पाप विहीन करने की क्षमता रखता हो वही वास्तविक साधक हैं माँ गायत्री के । वही गुरु कहलाता है। गायत्री एवं उसके पुत्रों का एकमात्र लक्ष्य है पाप का नाश। सत्य से सावित्री और सावित्री से गायत्री तक की लम्बी यात्रा ही ब्रह्मऋषि का पथ है। सत्य ही परम ब्रह्म है। इसी पथ का सभी अनुशरण करते हैं चाहे वे आदि गुरु शंकराचार्य जी हों, विश्वामित्र हो या फिर निखिलेश्वरानंद जी महाराज हों।
         
                          शिव शासनत: शिव शासनत:

नेत्र व्याधियों से मुक्ति प्राप्त करने का अमोघ साधन चाक्षुषी विद्या ।।

         यह अत्यन्त गोपनीय व चमत्कारिक मंत्र होते हुये भी शीघ्र फल देने वाला है। इसका पाठ करने मात्र से व्यक्ति को कभी नेत्र सम्बन्धी रोग नहीं होते। आजीवन उसकी आँखों का तेज बना रहता है तथा वह कभी अंधा नहीं होता। 
          वर्तमान सामाजिक परिवेश में जहाँ स्वच्छ प्राणवायु भी मुश्किल से मिल पाती है चारों ओर धूल व धुयें आदि का प्रदूषण है ऐसी दशा में शरीर के सबसे अहम् व नाजुक अंग आँखों की सुरक्षा का खतरा हमेशा बना रहता है इसीलिए सनातन धर्म के पाठकों को यह दुर्लभ-प्रयोग हम दे रहे हैं जिसे सम्पन्न कर वे अपनी आँखों को अदृश्य आध्यात्मिक सुरक्षा कवच दे सकते हैं। 

पाठ विधि 
 स्नानादि नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर पूजा स्थल में स्वच्छ आसन पर बैठे फिर भगवान आदित्य का ध्यान करते हुए निम्नानुसार विनियोग कर चाक्षुषी विद्या का पाठ करें

ॐ अस्याश्चाक्षुषीविद्याया अहिर्बुध्न्य ऋषिः, गायत्री छन्दः, सूर्यो देवता, चक्षुरोगनिवृत्तये जपे विनियोगः ।

चक्षुषीविद्या 

ॐ चक्षुः चक्षुः चक्षुः तेजः स्थिरो भव । मां पाहि पाहि त्वरितं चक्षुरोगान् शमय शमय मम जातरूपं तेजो दर्शय दर्शय यथाहम् अन्धो न स्यां तथा कल्पय कल्पय कल्याणं कुरु कुरु । यानि ममपूर्व जन्मां पार्जितानि चक्षुः प्रतिरोधक दुष्कृ तानि सर्वाणि निर्मूलय निर्मूलय | ॐ नमः चक्षुस्तेजोदात्रे दिव्याय भास्कराय। ॐ नमः करुणाकरायामृताय । ॐ नमः सूर्याय। ॐ नमो भगवते सूर्यायाक्षितेजसे नमः । खेचराय नमः । महते नमः । रजसे नमः । तमसे नमः । असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय। उष्णो भगवाञ्छुचिरूपः । हंसो भगवान् शुचिरप्रतिरूपः । य इमां चक्षुष्मतीविद्यां ब्राह्मणो नित्यमधीते न तस्याक्षिरोगो भवति। न तस्य कुले अन्धो भवति । अष्टौ ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा विद्यासिद्धिर्भवति ॥

अनुभूत प्रयोग

         ऊपर वर्णित चाक्षुषी विद्या के प्रयोग द्वारा अब तक सैंकड़ों लोग नेत्र रोगों से छुटकारा पा चुके हैं यहाँ हम स्वयं द्वारा अनुभूत एक अत्यन्त चमत्कारिक लघु प्रयोग दे रहे हैं जिसे सम्पन्न कर लेने से सभी प्रकार के नेत्र रोग नष्ट हो जाते हैं। नेत्र रोग से पीड़ित व्यक्ति को चाहिए कि वह प्रतिदिन प्रातः काल स्नानादि नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर हल्दी का घोल बनाकर अनार की कलम से कॉसे के पात्र में ऊपर फोटो में वर्णित यंत्र को अंकित करे अब इसी यंत्र पर तांबे की कटोरी में चार बत्तियों का घी का दीपक जलाकर रख दें दीपक की चारों बत्तियां चारों दिशाओं की ओर हों। अब गन्ध, पुष्प आदि विविध उपचारों से यंत्र की पूजा करें फिर पूर्व की ओर मुख करके बैठें और हल्दी की माला से निम्न मंत्र की 6 माला जप करें तत्पश्चात् चक्षुषोपनिषद ( ऊपर वर्णित) के कम से कम 12 पाठ करें पाठ की समाप्ति पर पुनः इसी बीज मंत्र की पांच माला जपें।

                          'ॐ ह्रीं हंसः'

तत्पश्चात् भगवान सूर्य को श्रद्धापूर्वक अर्ध्य देकर प्रणाम करें और मन में यह निश्चय करें कि मेरा नेत्र रोग शीघ्र ही नष्ट हो जायेगा। ऐसा करने से मात्र 21 दिन में ही आश्चर्य जनक परिणाम देखने को मिलेंगे इसमें संदेह नहीं है।