सनातन धर्म में कोई भी मंगल कार्य श्री गणेश जी की आराधना से ही आरम्भ होता है कार्य में सफलता की कामना से आरम्भ में ही श्री गणेश के द्वादश नामों का संकीर्तन किया जाता है। विध्याध्यन आरम्भ करते समय, विवाह के समय, नगर अथवा नवनिर्मित भवन में प्रवेश करते समय, यात्रा आदि में कहीं बाहर जाते समय संग्राम के अवसर पर अथवा किसी भी प्रकार की विपत्ति आने पर यदि साधक श्री गणेश जी के बारह नामों का स्मरण करता है उसके उद्देश्य और मार्ग में किसी प्रकार का विघ्न नहीं आता।
श्री गणेश जी के ये बारह नाम हैं- सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भाल चन्द्र और गजानन। इन नामों को श्लोक के रूप में इस तरह वर्णित किया गया है-
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुः गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥
सामान्य रूप से इन बारह नामों का अर्थ इस प्रकार है-- सुमुख अर्थात सुन्दर मुख वाले, एकदन्त अर्थात एक दांत वाले, कपिल यानी कपिल वर्ण के, गजकर्ण अर्थात हाथी जैसे कान वाले, लम्बोदर अर्थात लम्बे पेट वाले, विकट यानी भयंकर, विनायक अर्थात वशिष्ट नायकोचित गुण सम्पन्न, धूम्रकेतु यानी धुँये के रंग की पताका वाले गणाध्यक्ष अर्थात गणों के अध्यक्ष, भालचन्द्र अर्थात मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करने वाले और गजानन अर्थात हाथी के समान मुख वाले ।
सुमुख :- आम लोगों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि हाथी की सूंड, छोटी-छोटी आँखे और सूप जैसे लम्बे कान वाले को सुमुख कैसे कहा जा सकता है वैसे जो चमड़े की सुन्दरता को ही महत्व देते हैं उनका ऐसा सोचना ठीक भी है किन्तु यदि गहराई से विचार किया जाय तो शारीरिक सुन्दरता से परे गुणो की महत्ता सर्वोपरि है। सनातन आर्य संस्कृति ने सदैव गुणों को ही अधिक महत्व दिया है। आध्यात्मिक दृष्टि से छोटी आँखें गम्भीरता की, लम्बी नाक बुद्धिमता की और दीर्घ कर्ण बहुलता के सूचक हैं। सामुद्रिक शास्त्र भी इसकी पुष्टि करता है। इस प्रकार सुमुख नाम श्री गणेश के गुणों के सुरूप ही है।
एकदन्त :- श्री गणेश का दूसरा नाम एकदन्त है। श्री गणेश का एकदन्त होना इस बात का ज्ञान कराता है कि जीवन में सफल वही होता है जिसका लक्ष्य एक हो। दो वस्तुऐं हमेशा द्वैत की परिचायक होती हैं गणपति का एक दाँत टूटा तो वे अद्वैत के प्रतीक बन गये। यह एकदन्त का तात्विक पक्ष था जिसे जानकर यह जिज्ञासा जागृत होती है कि हाथी के समान मुख वाले श्री गणेश के दो दाँत थे तो एक दाँत टूटा कैसे ? इस सम्बन्ध में एक पौराणिक प्रसंग हैं
एक बार भगवती पार्वती और शिव विहार कर रहे थे तो उन्होंने श्री गणेश को यह कहकर द्वार पर पहरे में खड़ा कर दिया कि किसी को भी भीतर न आने दें तभी सहसा परशुराम वहाँ आये और भीतर जाने के लिये हठ करने लगे। बात इतनी अधिक बढ़ गयी कि परशुराम को प्रहार करना पड़ा फलस्वरूप श्री गणेश का दाँत टूट गया। परशुराम ने जब अपने तीव्र धार वाले कुठार से श्री गणेश की भुजा पर प्रहार किया तो वह कुठार फिसलकर गणेश जी के दाँत पर में गिरा और प्रचण्ड ध्वनि के साथ श्री गणेश का दाँत टूटकर गिर गया। वह दाँत जब परशुराम को नष्ट करने के लिये चला तो शिवगणों ने उसे रोक लिया। उस समय दाँत की वक्रगति देखकर पृथ्वी कांप उठी, पशु चिग्घाड़ने लगे सर्वत्र भय व्याप्त हो गया देवगण भी हाहाकार करने लगे। अंत में भगदन्त श्री गणेश जी की देवताओं ने स्तुति की इस प्रकार उनका नाम एकदन्त पड़ा।
कपिल :- श्री गणेश के तीसरे नाम कपिल का यदि आकारान्त बना दिया जाय तो इसका रूप बनेगा 'कपिला' जिसका शाब्दिक अर्थ है गाय इससे स्पष्ट है कि गौ धूसर वर्ण की होती हुयी भी दूध, दही, घृत आदि पोषक पदार्थ तथा गोमय व गोमूत्र आदि रोग निवारक पदार्थ प्रदान कर मानव का हित साधन करती है उसी प्रकार कपिलवर्ण के श्री गणेश भी बुद्धि रूपी दधि, ज्ञानरूपी घृत तथा समुज्वल भावरूपी दुग्ध द्वारा मानव को पुष्ट बनाते हैं अथवा उसके बौद्धिक पक्ष को पुष्ट बनाने वाले पदार्थ प्रदान करते हैं और अमंगल नाश, विघ्नहरण और दिव्य पदार्थ प्रदान कर उसके त्रिविध तापों का शमन करते हैं।
गजकर्ण:- आर्य संस्कृति में श्री गणेश को बुद्धि का अधिष्ठात्र देवता माना गया है श्री गणेश के लम्बे कान सब कुछ सुनने की क्षमता रखते हैं। शास्त्र हमें यह शिक्षा देते हैं कि सुननी सबकी बात चाहिये किन्तु कोई भी कार्य ऊँचे लोगों से विचार विमर्श के पश्चात् ही करना चाहिए यही सीख देने के लिये श्री गणेश जी ने हाथी के समान लम्बे कान धारण किये हैं। श्री गणेश के लम्बे कानों में यह रहस्य भी छिपा हुआ है कि छुद्र अर्थात छोटे कानों वाला व्यक्ति सदैव व्यर्थ की बातों को सुनकर अपना ही अहित करने लगता है। श्री गणेश के लम्बे कान यह शिक्षा भी देते हैं कि व्यक्ति को अपने कान ओछे न रखकर इतने विस्तृत बना लेने चाहिए कि उनमें सहस्त्रों निंदकों की सभी अच्छी बुरी बातें इस प्रकार समा जाँय कि वे फिर कभी जिह्वाग्र पर आने का प्रयास न करें।
लम्बोदर :- लम्बा उदर समस्त भली बुरी बातों को उदरस्थ करने की प्रेरणा देता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर द्वारा बनाये हुये डमरू की ध्वनि से श्री गणेश ने सम्पूर्ण वेदों को ग्रहण किया, माता पार्वती के चरणद्वय में झंकृत होने वाले नूपुरों से संगीत सीखा, प्रतिदिन ताण्डव नृत्य देखने और उसके अभ्यास के बल से नृत्य सीखा और इस तरह से प्राप्त विभिन्न ज्ञानों को आत्मसात करने के कारण उनका उदर लम्बायमान हो कोष रूप में परिणित हुआ ।
विकट - इसके अनन्तर श्री गणेश का छठा नाम समाने आता है और वह है विकट । विकट का अर्थ होता है भयंकर श्री गणेश का धड़ (कण्ठ से पैर तक का भाग) है नर का और ऊर्ध्वांग अर्थात मुख है- हाथी का । अतः ऐसा विकट प्राणी विकट होगा ही यह निर्विवाद है। श्री गणेश के नाम के रूप में इसका भाव यह है कि श्री गणेश अपने नाम को सार्थक बनाते हुए सभी प्रकार के विघ्नों की निवृत्ति के लिये विघ्नों के मार्ग में विकट बनकर उपस्थित रहते हैं क्योंकि वे जानते हैं 'शठे शाठ्य समाचरेत्' अर्थात बुरे और दुष्ट व्यक्तियों को सौम्यता से नहीं, अपितु तद्वत् बनकर ही दबाया जा सकता है। अतः यह नाम भी सार्थक ही है। गणपत्यथर्वशीर्ष के नवम मंत्र में श्री गणेश के लिये लिखा है विघ्ननाशिने शिवसुताय वरदमूर्तये नमः । इसका भाव हैं हम विघ्नों को नष्ट करने वाले, शिव के पुत्र, वरप्रदायी मूर्ति रूप में प्रकटित श्री गणेश को नमस्कार करते हैं। सुप्रसिद्ध भाष्यकार श्रीसायणाचार्य ने विघ्ननाशिने का भाष्य इस प्रकार प्रस्तुत किया है विवनाशिने कालात्मक भयहारिणे, अमृतात्मकपदप्रदत्वात् अर्थात श्री गणेश कालात्मक भय को हरण करने वाले हैं क्योंकि वे अमृतात्मक पद के प्रदाता हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इन्द्र ने निज भाग शून्य यज्ञ के विध्वंस के लिये जब कालका आह्वान किया तब वह विनासुर के रूप में प्रकटित हो, अभिनन्दन राजा को मारकर सत्कर्मों का लोप करने लगा तब महर्षियों ने ब्रह्माजी की प्रेरणा से श्री गणेश की स्तुति कर उनके द्वारा विनासुर का उपद्रव दूर करवाया। उसी समय से गणेश पूजन स्मरणादिविरहित कार्य में विघ्न का प्रादुर्भाव अवश्य होता है। यह मान्यता स्वीकार कर कार्यारम्भ में श्री गणेश पूजन अनिवार्य प्रतिपादित किया गया है । विन भी सामान्य नहीं है। यह कालस्वरूप होने से भगवत् स्वरूप, अतएव अतीव महिमान्वित है। इसके स्वरूप का निदर्शन इस प्रकार प्राप्त होता है विशेषेण जागत्सामर्थ्यं हन्तीति विघ्नः ब्रह्मादिक की भी जगत्सर्जनादि सामर्थ्य का हरण करने वाले तत्व को विघ्न कहते हैं। इस पर यदि किसी का शासन चलता है तो श्री गणेश का ही अतः गणेश का विनेश नाम न केवल सार्थक, अपितु उनकी लोकोत्तर महिमा का भी व्यापक है।
विनायक :- गणेश की इस नामावली का अष्टम नाम है विनायक । इसका अर्थ है विशिष्ट नायक या विशिष्ट स्वामी । कतिपय विद्वानों ने वि उपसर्ग को विघ्न का लघुस्वरूप स्वीकार कर विनायक का अर्थ विघ्नों का नायक भी स्वीकार किया है यह अर्थ पूर्णत: श्री गणेश पर चरितार्थ होता है क्योंकि ब्रह्मादि देवता अपने-अपने कार्य में विघ्र पराभूत होने के कारण स्वेच्छाचारी नहीं हो सकते, परन्तु श्री गणेश के अनुग्रह से ही विघ्नरहित होकर कार्य सम्पादन में समर्थ होते हैं और यही कारण है कि पुण्याहवाचन के अवसर पर भगवन्तौ विघ्नविनायकौं प्रीयेताम् कहकर विघ्न और उसके पराभवकर्ता श्री गणेश दोनों का स्मरण किया जाता है इससे वि विघ्न, नायक स्वामी विनायक शब्द की सार्थकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार यदि इस शब्द विनायक का अर्थ विशिष्ट नायक लिया जाय तो भी वह अन्वर्थक ही सिद्ध होता है क्योंकि श्रुति में श्री गणेश को ज्येष्ठराज शब्द द्वारा सम्बोधित कर उनके महत्व का प्रतिपादन किया गया है।
धूम्रकेतु- श्री गणेश जी का नवम नाम है धूम्रकेतु । धूम्रकेतु का सामान्य अर्थ है अग्नि और शब्दार्थ हैं धूऐं के ध्वजवाला ।श्री गणेश के संदर्भ में इसके दो भाव प्रकट होते हैं। 1.संकल्प - विकल्पात्मक धूम धूसर अस्पष्ट कल्पनाओं को साकार बनानेवाले तथा उन्हें मूर्तरूप दे ध्वजवत् नभमण्डल में फहराने वाले होने के कारण गणेश का धूम्रकेतु नाम अन्वर्थक है। 2.इसी प्रकार अग्नि के समान मानव की आध्यात्मिक अथवा आधिभौतिक प्रगति के मार्ग में आने वाले विघ्नों को भस्मसात् कर मानव को चरमोत्कर्ष की दिशा में उन्मुख बनाने की क्षमता से परिपूर्ण होने के कारण भी श्री गणेश का धूम्रकेतु नाम सार्थक ही प्रतीत होता है।
गणाध्यक्ष :- श्री गणेश का दशम नाम है। इसके दो अर्थ 1. संख्या में परिगणित हो सकने योग्य सभी पदार्थों के स्वामी तथा 2.प्रमथादि गणों के स्वामी विचार करने पर उक्त दोनों ही नाम अन्वर्थक जान पड़ते हैं। विश्व के परिगणनीय जितने भी पदार्थ हैं- श्री गणेश उन सबके स्वामी हैं। जैसा कि निम्न श्लोक से स्पष्ट है कि श्री गणेश देवता, नर, असुर,और नाग इन चारों के संस्थापक एवं चतुर्वर्ग (धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष) तथा चतुर्वेदादि के भी स्थापक हैं।
स्वर्गेषु देवताश्चायं पृथ्व्यां नरांस्तथाऽतले ।
आसुरान्नागमुख्यांश्च स्थापयिष्यति बालकः ॥
तत्वानि चालयन् विप्रास्तस्मान्नाम्ना चतुर्भुजः ।
चतुर्णां विविधानां च स्थापकोऽयं प्रकीर्तितः ॥
गणों के स्वामी तो श्री गणेश हैं ही। इस पद पर वे स्वयं भगवान शंकर द्वारा प्रतिष्ठित किये गये या गणों द्वारा, इस सम्बन्ध में दोनों ही प्रकार के विवरण प्राप्त होते हैं। गणपति सम्भव के अनुसार जब भगवान् शंकर ने गज का मस्तक जोड़कर श्री गणेश को पुनर्जीवित कर दिया, तब सभी शिवगण समवेत होकर नाचते हुए अपने ऊपर उनको वरीयता देने लगे तथा गणपति कहकर सम्बोधन करते हुए उनकी जय-जयकार मनाने लगे।
भालचन्द :- श्री गणेश का ग्यारहवाँ नाम है- भालचन्द्र । इसका भाव है जिसके मस्तक (भाल) पर चन्द्र हो । भगवान शंकर के मस्तक में विराजमान चन्द्रमा का ही यह संक्षिप्त संस्करण है। चन्द्र की उत्पत्ति विराट के मन से मानी जाती है और उस चन्द्र तत्व से सब प्राणियों के मन अनुप्राणित माने जाते हैं। अतः श्री गणेश के संदर्भ में इसका भाव यही है कि वे भाल पर चन्द्र को धारण कर उसकी शीतल निर्मल कान्ति से विश्व के सभी प्राणियों को आप्यायित किया करते हैं। इसके साथ ही भालचन्द्र से यह भी विदित होता है कि व्यक्ति का मस्तक जितना शांत होगा उतनी ही कुशलता के साथ वह अपना दायित्व निभा सकेगा। श्री गणेश गणपति अर्थात् प्रत्येक गणनीय वस्तु के पति हैं, अतः अपने मस्तिष्क को सुशान्त बनाये रखने के प्रयास में सफलता पाकर, तत्परक नाम धारण कर सफलता कामियों के लिये एक समुज्जवल मार्ग प्रशस्त किया है और बताया है कि यदि वे अपने मस्तक में चन्द्र की सी शीतलता लेकर कार्यरत होंगे तो सफलता निश्चय ही उनके पग चूमेगी।
गजानन :- इस द्वादश नामावली का अंतिम नाम है गजानन । अर्थात हाथी के मुखवाला। गणेश के कण्ठ से ऊपर का भाग हाथी का है, इस तथ्य से सभी सुपरिचित हैं। नराकृति अर्धाङ्ग के साथ हाथी के मस्तक का मेल एक जीवित आश्चर्य ही कहा जा सकता है । परन्तु जब गजानन के सभी अवयवों पर दृष्टिपात कर हम एक निष्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब आश्चर्यचकित हो जाना पड़ता है। मुख भाग में निम्न अवयव विशेषतः परिगणित होते हैं जिह्वा, दन्त, नासिका, कान और आँख जिह्वा सब विघ्नों की जड़ है। यह बहिर्मुखी होने के कारण परदोषगणन में विशेष रुचि लेती है परन्तु यदि मन जिह्वा के नुकीले भाग को दूसरों की ओर से हटाकर अपनी ओर कर ले,अर्थात् अपने दोषों का परिगणन करने लगे तो अनेकानेक झंझटों से मुक्त हो जाय। प्रकृति ने अन्य सभी प्राणियों के विपरीत हाथी की जिह्वा को दन्तमूल की ओर से कण्ठ की ओर लपलपाती हुई लगाया है अतः यह निर्विघ्नता विनायक विशेषता गणेश में विद्यमान रहकर उन्हें विघ्न विनायक का अन्वर्थक आश्रय बनाती है।
दन्त के सम्बन्ध में यह कहावत प्रसिद्ध ही है कि हाथी के दाँत खाने के और तथा दिखाने के और होते हैं। गणेश के दाँत भी इस बात के परिचायक हैं कि बुद्धिमान् व्यक्ति को ऊपरी दिखावा आन्तरिक भावों से सर्वथा भिन्न रखना चाहिये विशेषतः उस स्थिति में जब कि उसका सामना किसी सबल से हो परन्तु यह नीति केवल महाभारत के शब्दों में मायाचारों मायया बाधितव्यः के अनुसार एक सीमा तक ही आचरणीय है, सर्वथा एवं सवंदा अनुकरणीय नहीं इसलिए हाथी का मुख होते हुए भी दिखावे का दाँत केवल एक ही गणेश के साथ सम्पृक्त कर उन्हें एकदन्त पद से व्यवहृत किया जाता है।
शिव शासनत: शिव शासनत:
Follow us for Latest Update
भगवान गणपति के द्वादश नाम के रहस्य ।।
दिगिभेन्द्रपदट्टम् ।।
अध्यात्म मानवीय बुद्धि से नहीं समझा जा सकता, दोनों भुर्वो के बीच में भूमध्य होता है एवं यहीं पर जब ध्यान करते हैं तब आज्ञा चक्र विकसित होता है। आज्ञा चक्र के भेदन के पश्चात् ही तीसरा नेत्र विकसित होता है, आध्यात्मिक ग्रंथि क्रियाशील होती है और तब जाकर अध्यात्म का क ख ग समझ में आता है। अगस्त्य मुनि ने अपने शिष्य से कहा अगर तुम्हें दक्षिणा देने की इतनी पड़ी है तो जाओ राघवेन्द्र सरकार के मुझे दर्शन करा दो। अगस्त्य मुनि का वह शिष्य प्रभु श्रीराम एवं लक्ष्मण को ले आश्रम पर आ गया, उसने अगस्त्य मुनि से कहा श्रीराम एवं लक्ष्मण आश्रम के दरवाजे पर आपसे मिलने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, अगस्त्य मुनि दौड़ पड़े। जैसे ही श्रीराम चंद्र एवं लक्ष्मण जी ने अगत्स्य मुनि को देखा वे उनके चरणों में साक्षात् दण्डवत हो गये, अगत्स्य मुनि की आँखों से आँसू बह निकले भगवान स्वयं चलकर अगत्स्य मुनि के आश्रम पर आये थे एवं अगत्स्य मुनि मनुष्य देह में इसलिए रुके हुए थे।
अवतार का कोई नियम नहीं होता, प्रभु श्रीराम सब नियम धर्म से परे हैं। कब किसके चरणों में झुक जायें ? कब किसे गले लगा ले, कब क्या दे दें उनकी मर्जी । वशिष्ठ एवं विश्वामित्र कुल गुरु बन गये, राजगुरु बन गये केवल इसलिए कि अवतार के रूप में स्वयं भगवान आ रहे हैं फिर कैसी मर्यादा ? जो सेवा मिल जाये, जो चाकरी मिल जाये वही मंजूर है। वशिष्ठ ब्रह्मपुत्र हैं शुरू में वे आना कानी कर रहे थे पंडिताई हेतु परन्तु जब मालूम चला कि स्वयं भगवान आ रहे हैं तो पंडिताई भी मंजूर कर ली दिव्य रथ सजा हुआ था, यक्ष गंधर्व गान कर रहे थे, ब्रह्मलोक के पार्षद महर्षि शरभंग को ब्रह्म लोक ले जाने के लिए उनके दरवाजे पर खड़े हुए थे परन्तु जेसे ही शरभंग को पता लगा कि श्रीराम एवं श्री लक्ष्मण स्वयं उनके आश्रम आ रहे हैं उन्होंने ब्रह्मलोक का दिव्य रथ वापस कर दिया, अपनी सारी ब्रह्मोपासना तिरोहित कर दी जब भगवान स्वयं आ रहे हैं तब फिर क्या जरुरत पड़ी है ? ब्रह्मलोक जाने की। भरत को खड़ाऊ दे दी बोले राज्य करो। लात मारकर सत्ता ठुकरा दी, अयोध्या वासियों को गंगा नदी के किनारे सोते में छोड़कर चले गये, बालि को मार गिराया, समुद्र से कह दिया रास्ता दे नहीं तो तेरी सत्ता नष्ट, सुग्रीव को राजा बना दिया सत्ता उसमें प्रतिष्ठित कर दी, भीलनी शबरी को ऋषितुल्य बना दिया, विभीषण का राज्याभिषेक कर दिया, उसे लंकेश घोषित कर दिया, अपनी समस्त भूमि उठाकर ब्राह्मणों को दान कर दी और ब्राह्मणों ने अमानत के तौर पर वह भूमि श्रीराम को दे दी राज्य हेतु, अश्वमेघ का घोड़ा दौड़ा दिया "रोक सके तो रोक, " कौन रोक पाया ?
सम्पूर्ण पृथ्वी पर 11,000 वर्षों तक एक छत्र राज्य किया। सबकी सत्ता को अपने हस्तगत कर लेना, सबकी सत्ता को अपने अनुरूप चलाना ही राम राज्य है। वायु से कह दिया जब तक राम राज्य है मंद-मंद ही रहना नहीं तो तेरी सत्ता नष्ट, तू सत्ता विहीन, इन्द्र से कह दिया कभी उत्पात मत करना न अल्प वृष्टि करना न अति वृष्टि करना, औकात में रहना नहीं तो तेरी सत्ता छिन जायेगी। कुबेर से कह दिया, पर्वतों से कह दिया, नदियों से कह दिया, भूमि से कह दिया, वृक्षों से कह दिया, यक्षों से कह दिया कि अपनी छोटी-छोटी सत्ताएं मर्यादा में रखना, उत्पात मत करना, प्रपंच मत करना, मदमस्त मत होना, पगलाना मत नहीं तो समूलता के साथ नष्ट कर दिए जाओगे, अस्तित्वविहीन कर दिए जाओगे इसलिए राम राज्य में नदियाँ निर्मल थीं, अकाल मृत्यु नहीं थी अगर किसी की इच्छा मृत्यु की नहीं है तो उसकी मृत्यु नहीं होती थी। पिता के सामने पुत्र नहीं मरता था, विधवाएं नहीं थीं, पशु खूब दूध देते थे, फसलें लहराती थीं, वृक्ष सदैव फल फूल से लदे रहते थे, दुर्जनता नहीं थीं, ताले नहीं थे, बंधन नहीं थे, नपुंसकता नहीं थी, संतानहीनता नहीं थी क्योंकि राज राजेश्वर स्वयं पृथ्वी पर विद्यमान थे।
सूर्य से कह दिया केवल स्निग्ध किरणें ही वायुमण्डल पर अवतरित करो, चंद्रमा से कह दिया हमेशा अमृत ही छिड़को, क्रूर ग्रहों से कह दिया कि किसी की भी जन्मकुण्डली में उल्टा सीधा मत बैठना, अपनी मर्यादा में रहना, राजा बनने का स्वांग मत करना, जैसा मैं कहूं वैसा करना, मेरे अनुकूल रहना, मेरे लिए परेशानी का कारण मत बनना, अपनी तुच्छ सत्ता पर मत इतराना अन्यथा सत्ता छीन ली जायेगी और सबने एक स्वर में भय के मारे, मर्यादा के मारे कि कहीं सत्ता छिन न जाये इस कारणवश राम राज्य में दुर्लभ समायोजन बनाये रखा। जिससे जो चाहा वो काम ले लिया, जिसमें चाही उसमें सत्ता स्थापित कर दी, जिसे चाहा उसे पुजवाया, जिसे चाहा उसे धूल में मिला दिया। सीता जी के लिए युद्ध किया और स्वयं सीता जी का त्याग कर दिया, हनुमान को गले लगाया।
राम नाम की सत्ता बता दी, पत्थर तैर गये, वानर राक्षसों से ज्यादा वीर हो गये, भालुओं ने राक्षसों को पीट डाला। जैसे ही श्री हनुमान माता सीता का पता लगाकर लौटे परब्रह्म परमेश्वर श्रीराम ने उनकी तारीफ करना शुरु कर दी तो श्री हनुमान रोने लगे, चरणों को पकड़ लिया बोले यह सिर्फ आपकी सत्ता है, आपके द्वारा प्रतिरोपित शक्ति है मैं कुछ नहीं हूँ, श्री हनुमान सत्ता के रहस्य को समझ गये थे ।
अनंत कोटि ब्रह्माण्ड के राजा श्री राघवेन्द्र सरकार को लोग मर्यादा पुरुषोत्तम कहते हैं परन्तु मैं कहता हूँ वे दूसरों को मर्यादित रखते हैं उन्हें मर्यादित रहने की जरुरत नहीं है। विभीषण कहने लगा मैं रावण का दाह संस्कार नहीं करूंगा इसने मुझे लात मारकर लंका से निकाला है श्रीराम बोले हे विभीषण इसका दाह संस्कार करो पूर्ण विधान के साथ मेरी आँखों के सामने क्या तुम खुद नहीं देख रहे हो कि इसकी मृत्यु के उपरांत इसके शरीर से प्राण निकलकर मेरे चरणों में विलीन हो गये, मृत्यु के अंतिम क्षण में इसने हे राम ही कहा, मुझे नमस्कार किया अत: मैंने इसे इसकी सत्ता दी । हनुमान तो रावण के शरीर को विदीर्ण कर समस्त लंका में घुमाना चाह रहे थे परन्तु श्रीराम ने उसे एक राजा के समान मृत्यु के पश्चात् भी सम्मान दिया, उसकी अंत्येष्ठि लंकेश की भांति ही की गई। सम्पूर्ण रामायण में एक ही संदेश जाता है कि सत्ता के पीछे मत भागो, सत्ता के गुलाम मत बनो, सत्ता के लिए स्वयं की सत्ता मत खोओ अपितु जो सत्ता प्रदान कर रहा है, सत्ता जिसके हस्तगत है उसे पकड़ो।
श्रीराम के सोलह पार्षद है, ये उनके नित्य पार्षद हैं। नित्य पार्षद का तात्पर्य है जिनकी सत्ता नित्य बनी रहती है, जो कभी सत्ता से च्युत नहीं होते। विभीषण आज भी लंकेश है, जाम्बवान आज भी राजा हैं, हनुमान आज भी राजा हैं। तंत्र का क्षेत्र बड़ा विचित्र है लंका में एक परम तांत्रोक्त नवग्रह मंदिर था जिसमें कि रावण ने अपनी तंत्र शक्ति से नवग्रहों का आह्वान कर सर्वप्रथम उन्हें बुलाया, उन्हें स्थापित किया और फिर उन्हें कैद कर लिया, उनकी सत्ता उनसे छीन ली। वास्तव में लंका में अनेकों तांत्रोक्त मंदिर थे जिनमें असंख्य देव शक्तियाँ, यक्ष शक्तियाँ, गंधर्व शक्तियाँ, देवियाँ रावण के द्वारा आह्वान करके बुला लीं गई और कालान्तर कैद कर ली गईं, उनके बाहर निकलने के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया गया, उनकी सत्ता छीन ली गई। ब्रह्मा की ब्रह्म शक्ति तक रावण ने कैद कर ली थी, यह सब कैसे हुआ ? रावण ने तो आद्या को भी ले जाना चाहा था परन्तु गणेश जी के कारण नहीं ले जा पाया।
वास्तव में अध्यात्म में भी विनिमय प्रणाली लागू है लोग कहते हैं हमारा काम नहीं हुआ, हमें फल नहीं मिला इत्यादि इत्यादि । अध्यात्म में भी आध्यात्मिक लखपति, करोड़पति, अरबपति, असंख्य पति होते हैं जो जितना आध्यात्मिक रूप से धनवान होगा वह उतनी ही दुर्लभतम श्रेष्ठतम आध्यात्मिक प्राप्ति करने में सक्षम होगा। मंत्र जप, अनुष्ठान, तपस्या, साधना, पूजन, योग, ध्यान इत्यादि नाना प्रकार की आध्यात्मिक गतिविधियों से अध्यात्म का सकल उत्पादन होता है और इस प्रकार जातक के पास आध्यात्मिक राशि का संचय होता है। आध्यात्मिक राशि भी भौतिक राशि के समान स्थांतरित होती है। चतुर जातक आध्यात्मिक विनिमय करता है वह चाहे तो दर्शन कर सकता है, ऐश्वर्य प्राप्त कर सकता है, दिव्य लोक में स्थान प्राप्त कर सकता है, देवी देवताओं एवं अन्य परा शक्तियों को अपने हस्तगत भी कर सकता है।
शिव अल्कापुरी के नजदीक निवास करते हैं, अल्कापुरी का शासक कुबेर है एवं कुबेर रावण का सौतेला भाई है। रावण ने अपनी आध्यात्मिक राशि से ब्रह्मा से वरदान खरीद लिए, अमरता प्राप्त की। वह अमर तो हो ही गया जब तक श्रीराम का नाम लिया जायेगा रावण का नाम भी लिया जायेगा। आध्यात्मिक राशि पूर्ण चैतन्य एवं प्रजनन की क्षमता से युक्त है अर्थात बड़ी तेजी से फलती-फूलती है। रावण कौन ? रावण वह जिसने कुबेर को मार भगाया एवं ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण आध्यात्मिक राशि पर एक छत्र अधिकार जमा लिया। कुबेर तो हिमालय की श्रृंखलाओं में छिप गये सब कुछ छोड़कर। रावण ऋषि-मुनियों को क्यों सताता था ? क्यों यज्ञ नहीं होने देता था ? क्यों उन्हें अनुष्ठान नहीं करने देता था ? सीधी सी बात है कहीं कोई और आध्यात्मिक राशि का संचय न कर ले, उससे ज्यादा आध्यात्मिक रूप से अमीर न हो जाये इसलिए वह यह सब करता था। अगर आप चेक काटोगे और आपके बैंक खाते में पैसा नहीं होगा तो चेक निरस्त हो जायेगा ठीक इसी प्रकार लोग ईश्वर से प्रार्थना करते हैं, हाथ जोड़ते हैं, मनोकामनाएं मांगते हैं इत्यादि इत्यादि । मनोकामना एक तरह से चैक पर लिखी हुई राशि है जो कि
आपके बैंक खाते में आध्यात्मिक राशि कम होने से पूर्ण नहीं हो पाती। इस व्यवस्था के चलते एक भारी असंतुलन हो गया रावण खुद तो यज्ञ करता, प्रकाण्ड शिव भक्त था, प्रकाण्ड कर्मकाण्डी था, वह दिन प्रतिदिन नित नये आध्यात्मिक अनुष्ठानों का अविष्कार करता, दसों महाविद्याएं सिद्ध कर रखी थी उसने परन्तु किसी अन्य को नहीं करने देता। इस प्रकार वह तीनों लोकों का एकमात्र शासक बन गया, जैसे ही प्रभु श्रीराम माता कौशल्या के गर्भ से प्रकट हुए उन्होंने अपना मुस्कुराता हुआ स्वरूप दिखाया, माता कौशल्या बोल उठीं रोइये प्रभु, रूदन कीजिए क्योंकि आप रावण के द्वारा शासित भूमि पर आ गये हैं।
रावण का तात्पर्य है जो दूसरों को रुलाता हो, केवल रूदन का उत्पादन कराता हो अतः प्रभु श्रीराम रोये अनेकों बार रोये । वनवास जाते समय, अयोध्या वासियों से बिछड़ते समय रोये, सीता के लिए रोये, हनुमान के गले लगकर रोये, पिता की मृत्यु पर रोये, भरत के गले लगकर रोये, लक्ष्मण को शक्ति लगने पर रोये, जटायु की मृत्यु पर रोये बस यहीं रावण मार खा गया। राज राजेश्वर श्रीराम के एक-एक आँसू, राज राजेश्वरी श्री सीता के एक-एक आँसू की कीमत चुकाते चुकाते वह अपनी समस्त आध्यात्मिक राशि खो बैठा, कंगाल हो गया और मारा गया। लंका से सीता सर्वप्रथम मुक्त नहीं हुईं, सीता तो उग्रचण्डी बन अंत तक लंका में बैठी रहीं राम वियोग तो बहाना था, पहले सिंहिका मुक्त हुई, फिर नागमाता कद्रू मुक्त हुईं, फिर अनेकों देवियाँ मुक्त हुई, शनिदेव मुक्त हुए, सूर्य देव मुक्त हुए, नवग्रह मुक्त हुए, यक्ष, किन्नर मुक्त हुए । हनुमान जी ने एक-एक करके रावण के सभी तांत्रोक्त मंदिर जला डाले, यज्ञस्थान नष्ट कर दिए, सब यंत्रों का उत्कीलन कर दिया तब जाकर अंत में राज राजेश्वरी सीता ने लंका से प्रस्थान किया।
कुंभकरण का एक पुत्र हुआ था मूल नक्षत्र में जिसे कुंभकरण ने मूल नक्षत्र में उत्पन्न होने के कारण वन में छुड़वा दिया था एवं उसका नाम पड़ा मूलकासुर। रावण एवं मेघनाथ की मृत्यु के कारण वह अत्यंत ही व्यथित था उसने पुनः लंका पर कब्जा कर लिया विभीषण को मार भगाया, वह ब्राह्मणों से बोल रहा था चण्डी सीता के कारण मेरे कुल का नाश हुआ। ब्राह्मण ने कहा जा वही चण्डी तेरा सर्वनाश करेगी, राम उससे नहीं जीत पा रहे थे वे कल्प वृक्ष के नीचे विश्राम करने लगे तभी पुष्पक विमान से श्रीसीता आ गईं और उनके शरीर से एक दिव्य तामसी शक्ति निकली जिसने देखते ही देखते मूलकासुर का वध कर दिया परन्तु काली रूपा वह शक्ति नियंत्रित ही नहीं हो रही थी सम्पूर्ण रूप से अमर्यादित होती जा रही थीं अतः राम को उठना पड़ा और कुछ ही क्षणों में उनका स्पर्श पा वह महाकाली स्वरूपा शक्ति मर्यादित हो गई, पुनः शांत हो गई।
ओंकार साधना ।।
उपासना विधि
हृत्युण्डरीकं विरजं विशोकं विशदं परम् ।
अष्टपत्रं केशराढ्यं कर्णिकोपरि शोभितम् ॥
आधारशक्तिमारभ्य त्रितत्त्वान्तमयं पदम् ।
विचिन्त्य मध्यतस्तस्य दहरं व्योम भावयेत् ॥
ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन् मां त्वया सह । चिन्तयेन्मध्यतस्तस्य नित्यमुद्युक्तमानसः ॥
अर्थात उपासक स्वच्छ, शोकरहित, उज्ज्वल, अष्टदल कमल के समान मकरन्दयुक्त, कर्णिका से शोभायमान हृदय कमल के मध्य में आधार-शक्ति से आरम्भ करके त्रितत्त्वमय उत्तम पद का ध्यान करके दहरव्योम की भावना करे। ॐ इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण कर तुम्हारे साथ मेरा दहराकाश के बीच में सदा उत्कण्ठा से चिन्तन करें।
उपासना का फल
एवंविधोपासकस्य मल्लोकगतिमेव च ।
मत्तो विज्ञानमासाद्य मत्सायुज्यफलं प्रिये ॥
अर्थात हे प्रिये । इस प्रकार उपासना करने वाले को मेरे लोक की गति प्राप्त होती है और मुझसे ज्ञान प्राप्त कर वह मेरे ही सायुज्य को प्राप्त हो जाता है।
जप-विधि
ॐ अस्य श्रीप्रणवमन्त्रस्य ब्रह्मा ऋषिः, गायत्री छन्दः, परमात्मा सदाशिवो देवता, अं बीजम्, उं शक्तिः, मं कीलकम्, मम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।
अङ्गन्यास
शिरसि, ब्रह्मणे ऋषये नमः । मुखे, गायत्रीच्छन्दसे नमः । हृदि, परमात्मने देवतायै नमः । गुह्ये, अं बीजाय नमः । पादयोः, उं शक्तये नमः । नाभौ, मं कीलकाय नमः । सर्वाङ्गे, मम मोक्षार्थे जपे विनियोगः ।
करन्यास
अं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । उं तर्जनीभ्यां नमः । मं मध्यमाभ्यां नमः । अं अनामिकाभ्यां नमः । उं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । मं करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
हृदयादिन्यास
ॐ ब्रह्मणे हृदयाय नमः । उं विष्णवे शिरसे स्वाहा। मं रुद्राय शिखायै वषट्।अं ब्रह्मणे कवचाय हुम् । उं विष्णवे नेत्रत्रयाय वौषट । मं रुद्राय अस्त्राय फट् ।
ध्यान
ॐ कारं निगमैकवेद्यमनिशं वेदान्ततत्त्वास्पदं चोत्पत्तिस्थितिनाशहेतुममल विश्वस्य विश्वात्मकम्। विश्वत्राणपरायणं श्रुतिशतैः सम्प्रोच्यमानं प्रभुं सत्यं ज्ञानमनन्तमूर्तिममलं शुद्धात्मकं तं भजे ॥
नमस्कार
ॐकारं विन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः । कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः ॥
प्रणव-जप का फल
महर्षि पतञ्जलि ने कहा है
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्चं ।
अर्थात् प्रणव के जप से आत्मस्वरूप की प्राप्ति तथा सारे विघ्नों का नाश होता है।
भगवान् शंकर ब्रह्मा-विष्णु से कहते हैं-
तत्तन्मन्त्रेण तत्सिद्धिः सर्वसिद्धिरितो भवेत्।
अनेन मन्त्रकन्देन भोगो मोक्षश्च सिध्यति ।
सकला मन्त्रराजानः साक्षाद् भोगप्रदाः शुभाः ।।
अर्थात् उस उस मन्त्र से वह वह सिद्धि होती है, किंतु प्रणव मंत्र से सब सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं। यह सकल मन्त्रों का मूल है और भोग मोक्ष दोनों का देने वाला है।
वेदादौ च प्रयोज्यं स्याद्वन्दने संध्ययोरपि । नवकोटिजपाञ्जप्त्वा संशुद्धः पुरुषो भवेत् ॥
पुनश्च नवकोट्या तु पृथिवीजयमाप्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्यातु ह्यपां जयमवाप्नुयात् ॥
पुनश्च नवकोट्यातु जेजसां जयमवाप्नुयात्।
पुनश्च नवकोट्यां तु "वायोर्जयमवाप्नुयात्
आकाशजयमाप्नोति नवकोटिजपेन वै ।
गन्धादीनां क्रमेणैव नवकोटिजपेन वै ।।
अहंकारस्य च पुनर्नवकोटिजपेने वै ।
सहस्रमन्त्रजप्तेन नित्यं शुद्धो भवेत् पुमान् ।।
ततः परं स्वसिद्धयर्थं जपो भवति हि द्विजाः । एवमष्टोत्तरशतकोटिजप्तेन वै पुनः ।।
प्रणवेन प्रबुद्धस्तु शुद्धयोगमवाप्नुयात् ।
शुद्धयोगेन संयुक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ।।
अर्थात् वेद के आदि में तथा दोनों काल के संध्या-वन्दन में भी ॐकार का प्रयोग करना चाहिये। नौ करोड़ जप करने से पुरुष शुद्ध हो जाता है। फिर नौ करोड़ जप करने से पृथिवी तत्त्व का जय होता है । इसी प्रकार नौ-नौ करोड़ से क्रमश: जल, अग्नि, वायु एवं आकाश तत्त्व का जय होता है । पश्चात् नौ-नौ करोड़ से क्रमशः पञ्चतन्मात्राओं तथा अहंकार - तत्त्व का जय होता है। नित्य सहस्र मन्त्र जपने से पुरुष शुद्ध रहता है, फिर इससे अधिक जप आत्मज्ञान की सिद्धि के लिये होता है। इस प्रकार 108 करोड़ जप करने से पुरुष प्रबुद्ध होकर शुद्ध योग को प्राप्त होता है और शुद्ध योग से निःसन्देह जीवन्मुक्त हो जाता है। प्रणव रूप शिव का सदा जप और ध्यान करने वाला महायोगी समाधि में स्थित होकर शिवरूप हो जाता है।.
॥ शिव एव न संशयः ॥
द्वादशज्योतिर्लिंग पूजन ।।
श्री प्रत्यंगिरायै नमो नम: ।।
ऐसे साधक का जीवन घड़ी की सुइयों से निर्धारित नहीं होता। वर्ष, महीने, दिन, मुहूर्त इत्यादि महाप्रत्यंगिरा के साधक के लिए कोई मायने नहीं रखते क्योंकि इन सबका अधिनायक महाकाल तो स्वयं हे प्रत्यंगिरे तेरे चरणों में पड़ा हुआ है भला वह तेरी आज्ञा कैसे टाल सकता है ? ब्रह्माण्ड की सबसे अति विकसित युद्ध मशीन अर्थात समग्र शस्त्र प्रणाली के रूप में तू अपने साधक के अंदर और बाहर क्रियाशील हो उठती है। "ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रीं ह्रूं ह्रूं...... हूं हूं स्वाहा" इस मंत्र का तात्पर्य है कि अगर मेरे जातक की तरफ नजर उठाकर देखी, उससे छेड़खानी की, उससे खेलने की कोशिश की, उसे परेशान करने की कोशिश की, उससे कुछ मांगने या छीनने की कोशिश की तो शव बना दिए जाओगे, मुर्दे में परिवर्तित कर दिए जाओगे और तुम्हारा स्थान होगा महाश्मशान जहाँ मेरी समस्त प्रत्यंगिरा स्वरूपिणीं काली-नित्याएं, महायोगिनियाँ तुम्हारा उसी प्रकार भक्षण करेंगी, तुम्हारा उसी प्रकार मर्दन करेंगी जिस प्रकार श्री दुर्गा सप्तशती में वर्णित युद्ध में असुरों का हुआ था।
हे महाप्रत्यंगिरा तू महायुद्ध की नायिका है, तेरे अंदर से ही समस्त प्रकार के युद्धों का जन्म होता है, तू शस्त्र-बिन्दु है। इस ब्रह्माण्ड में जितने भी स्थूल, जैविक, सूक्ष्म, आणविक, परमाणविक, दैवीय, परादैवीय, मंत्रात्मक, तंत्रात्मक, संकलात्मक इत्यादि-इत्यादि शस्त्र हैं अस्त्र हैं वे सब तुझी में से उत्पन्न होते हैं। हे प्रत्यंगिरे तू परम काट है, तू दिव्य तोड़ है, तू परम औषधि है तू परा निदान है। संसार में ऐसा कोई रोग नहीं, ऐसा कोई शत्रु नहीं, ऐसा कोई वाक्य नहीं, ऐसा कोई मुण्ड नहीं, ऐसा कोई षडयंत्र नहीं, ऐसा कोई मारकेश नहीं, ऐसा कोई शास्त्र नहीं, ऐसा कोई मंत्र नहीं, ऐसा कोई विज्ञान नहीं इत्यादि इत्यादि जिसकी काट, जिसका तोड़ तेरे पास मौजूद न हो एवं यही श्री दुर्गा-सप्तशती में वर्णित युद्ध में तूने स्पष्ट रूप से दिखाया है। तू शिवास्त्र की भी काट रखती है उसे भी क्षण भर में बेकार कर सकती है यही तेरे अट्ठाहास और हूँ हूँ के नाद का रहस्य है।
हमारी पृथ्वी पर जीवन की सर्वांग रक्षा मनुष्य का मूलभूत अधिकार है। प्रत्येक देश का संविधान एक तरह से प्रत्यंगिरा विद्या का ही अनुसरण करता है। प्रत्येक देश के चिकित्सक, राजनीतिज्ञ, बुद्धिजीवी, आध्यात्मिक व्यक्तित्व, प्रत्यंगिरा के मूलभूत के सिद्धांत पर चलते हैं अर्थात जीवन की रक्षा होनी चाहिए। जो जीवन में विघ्न डालते हैं, जीवन को मृत्यु के मुख में ले जाते हैं, जीवन को कष्टमय बनाते हैं, जीवन को कमजोर करते हैं वे दण्ड के पात्र हैं और यही रहस्य हैं तेरे खड्ग धारण करने का। मनुष्य एवं जीव जंतुओं को कर्म करने का नैसर्गिक अधिकार प्राप्त है, कर्म के इस नैसर्गिक अधिकार का ज्यादातर मनुष्य दुरुपयोग ही करते हैं। जाने- अनजाने में या आदत -वश कर्म करने के अधिकार का सामूहिक तौर पर, व्यक्तिगत तौर पर, गुप्त रूप से, मानसिक रूप से, आध्यात्मिक रूप से मुझे तो सिर्फ हिंसात्मक रूप में उपयोग ही दिखाई पड़ता है। कौन कहता है कि पृथ्वी सभ्य हो गई है ? पृथ्वी सुसंस्कृत हो गई है ? पृथ्वी पर हिंसा की मात्रा कम हो गई है ? यह सब पूरी तरह से बकवास हैं। भले ही स्थूल रूप में आज बड़े-बड़े हिंसक प्राणी न दिखाई देते हों पर हिंसा ने रूप बदल लिया है, चोला बदल लिया है वह और पैनी, सूक्ष्म एवं न पकड़ में आने वाली हो गई है। कौन सभ्य ? सूट बूट पहना आदमी, पढ़ा-लिखा आदमी, बुद्धिमान आदमी, पैसे वाला आदमी, राजनेता, अभिनेता, ऊंचे औहदे पर बैठा अफसर, आम मनुष्य, व्यापारी इत्यादि- इत्यादि। क्या परिभाषा है सभ्य होने की, सुसंस्कृत होने की, इन सबके कर्मों में घोर हिंसा छिपी हुई है। इन सबके कर्म अत्यधिक पीड़ादायक, मानव रक्त से सने हुए, परम शोषक एवं चरम हिंसा लिए हुए हैं।
जब तक कर्म का अधिकार हम नहीं समझेंगे कृत्य जो कि कर्म से उत्पन्न होता है वह हिंसा से मुक्त नहीं होगा। वहीं सभ्य, सुसंस्कृत एवं शालीन कहलाने योग्य हैं जो प्रत्येक कर्म को हिंसा विहीन कर लें परन्तु यह सैद्धांतिक बात है अतः अति परिष्कृत, परा-आध्यात्मिक युद्ध मशीन जो कि स्वतः जीवित जागृत हो, पूर्णांग हो, सहस्वांग हो, अनताग हो, जिसमें से कि अपने आप प्रतिरोध की क्षमता, निरोध की क्षमता, शत्रु को पहुंचने की क्षमता, उसे निष्क्रिय करने की क्षमता, उसके कृत्यों को काटने की क्षमता हो ऐसी परा आध्यात्मिक सम्पूर्ण आयुध प्रणाली नितांत आवश्यक है और यह प्राप्त होती है महाप्रत्यंगिरा अराधना से। अगर आप ज्योतिषी है तो आपको कुण्डली में देखना चाहिए कि सामने की विष कन्या तो नहीं बैठी हुई है? इसको जन्म कुण्डली में विष कन्या योग तो नहीं है। सामने बैठता जातक कहीं कृत्या-पुरूष तो नहीं है, कहाँ इसकी कुण्डली में महाषडयंत्र कारी योग तो नहीं है, क्षदम् योग तो नहीं है। यह तो हुई पैथालॉजी रिपोर्ट फिर आपको चाहिए विष कन्या के विष का तोड़, पुरुष के क्षदम् योग का तोड़ ढूंढना चाहिए। ऐसा टीका जो विष कन्या के विष को निष्प्रभावी बना दे, क्षदम् पुरुष योग को तोड़-फोड़ कर रख दे तभी आप जीवन में सफल हो सकते हैं अन्यथा विष कन्या का योग लिए हुए कोई स्त्री, आपको पत्री, आपकी पत्नी, आपकी प्रेमिका, आपकी सहयोगी, आपकी मित्र इत्यादि-इत्यादि बनकर आयेगी और अपनी विष ग्रंथि से आपका काम तमाम कर देगी। पूतना कृष्ण को विषाक्त दुग्ध पिलाने आयी थी पर खुद ही स्वर्ग सिधार गई। सूर्पणखा विषकन्या थी लक्ष्मण ने उसे पहचान लिया, वह सीता का भक्षण करना चाह रही थी। श्रीविद्या का तात्पर्य है जीवन की तीन अवस्थाएं जागृत, सुषुप्त एवं स्वप्न की स्थिति में सौन्दर्य का दर्शन, परम सौन्दर्य का दर्शन। जागृत अवस्था भी सौन्दर्यवान हो, जागृत अवस्था स्थूल कर्म की अवस्था होती है। सुषुप्त अवस्था में स्थूल कर्म शून्य होते हैं ऐसी अवस्था में भी आप सौन्दर्य के दर्शन कर सकें और आपके स्वप्न भी सौन्दर्य से परिपूर्ण हों। सुन्दर सपने देखो, सुन्दर चिंतन करो, कालिका के सौन्दर्य को निहारो यही श्रीविद्या है। नमो सुन्दरिम्-नमो सुन्दरिम् श्री सुन्दरिम् नमो नमः ।
शिव शासनत: शिव शासनत:
