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नवग्रहों की उपासना ।।

नवग्रहों की साधना
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              सनातन धर्मे में प्राचीन काल से जो अनेकों प्रकार की धारणाऐं या प्रथाएं प्रचलित हैं उनमें नवग्रहों की उपासना भी है। यह केवल रूढ़िमात्र अथवा प्रथा मात्र नहीं है, इसके मूल में हम लोगों के शरीर से नवग्रहों का सम्बन्ध और ज्योतिष की दृष्टि से सुपुष्ट विचार भी है। यह उक्ति प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' अर्थात् जो कुछ एक शरीर में है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है, वह एक शरीर में भी है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि केव देखा या सुना जाता है वह तो बहुत ही स्थूल है। यंत्रों का तत्वविश्लेषण केवल जड़तत्वों तक ही सीमित है, वह कभी चेतना का साक्षात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वे यंत्र स्वयं जड़ हैं।

          प्रत्येक स्थूल वस्तु के एक-एक अधिष्ठातृ देवता हैं, यह बात युक्ति, अनुभव और शास्त्र से सिद्ध है। जैसे स्थूल नेत्रगोलक, जिन्हें हम देखते हैं, नेत्र के अधिभूत रूप हैं। नेत्र  इन्द्रिय अध्यात्म है, जो कि इस स्थूल गोलक के द्वारा देखती है। इस दर्शन क्रिया का सहायक जो सूर्य हैं, वह नेत्र का अधिदैव रूप है। नेत्र इन्द्रिय नेत्रगोलक के द्वारा स्थूल रूप को देखे, यह सूर्य की शक्ति की सहायता लिये बिना असम्भव है। इसलिए नेत्र के अधिष्ठातृ देवता सूर्य हैं। सूर्य के भी तीन रूप हैं। जिस सूर्य को हमलोग देखते हैं, वह सूर्य का स्थूल अथवा अधिभूत रूप है। दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का नाम सूर्य देवता है। उन्हीं का रथ सात घोड़ों का है और अरुण सारथी हैं। शनेश्वर, यमराज आदि उनकी सन्तान हैं और भी देवता के रूप में सूर्य का जितना वर्णन आता है, वह सब इस दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का ही है।

          सूर्य का अध्यात्म रूप है, समष्टिका नेत्र होना। इन तीन रूपों को ध्यान में रखने से ही शास्त्रों में जो सूर्य का वर्णन हुआ है वह समझ में आ सकता है। यह बात सभी देवताओं के सम्बन्ध में समझ लेनी चाहिये। अब यह बात सिद्धांत रूप से मान ली गयी है कि यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् सूक्ष्म जगत् का ही प्रकाशमात्र है। समष्टि के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वही सूर्य के रूप में प्रकट हुई है। जीव के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वह नेत्र इन्द्रिय के रूप में प्रकट हुई है। इन दोनों के अभिमानी देवता हैं सूर्य, इसलिए नेत्र इन्द्रिय का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सूर्य की प्रत्येक स्थिति का प्रभाव इस पृथ्वी पर और इस पर रहने वाले प्राणियों पर पड़ता है। जैसे यह स्थूल शरीर ही जीव नहीं है, उससे भिन्न है, वैसे ही यह दृश्यमान पृथ्वी ही पृथ्वी देवता नहीं है, यह तो पृथ्वी देवता का शरीर है। इन सब स्थूलताओं का निर्माण सूक्ष्म जगत की दृष्टि से ही हुआ है।

     ‌     सूक्ष्म ही स्थूल बना है इसलिए जो लोग सूक्ष्म जगत पर विचार नहीं करते, केवल स्थूल जगत में ही अपनी दृष्टि को आबद्ध रखते हैं, वे ठीक ठाक इसका मर्म नहीं समझ पाते। जैसे पृथ्वी, समुद्र, चन्द्रमण्डल, विद्युत, उष्णता आदि से सूर्य का साक्षात सम्बन्ध है, वैसे ही उन पदार्थों से बने हुए मानव शरीर के साथ भी है। प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति के समय, चाहे वह गर्भाधान का हो या भूमिष्ठ होने का हो, सूर्य और इतर ग्रहों का पृथ्वी के साथ जैसा सम्बन्ध होता है और ग्रहचार पद्धति के अनुसार उस प्रदेश में, उस प्रकृति के शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है, वह जीवनभर किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है। ग्रहमण्डल की स्थिति,देशविशेष पर उनका विशेष प्रभाव और देहगत उपादानों की विभिन्नता के कारण प्रत्येक शरीर का ग्रहों के साथ भिन्न सम्बन्ध होता है और उसी के अनुसार फल भी होता है।

           प्रत्येक ग्रह के साथ पृथ्वी का और उस पर रहने वाली वस्तुओं का जो महान् आकर्षण विकर्षण चल रहा है, उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता और जगत के परिवर्तनों में, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में, सुख दुःख के निमित्तों में यह महान शक्ति भी एक कारण है इस सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी से योग सम्पन्न महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से इस तत्व का साक्षात्कार करके जीवों के हितार्थ इस ज्योतिर्विद्या को प्रकट किया है। संसार में जो घटनाएं घटती हैं उनके अनेकों कारण बतलाये जाते हैं जीव का प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ, समष्टिकर्ता ईश्वर की इच्छा अथवा प्रकृति का नियमित प्रवाह । इन घटनाओं के साथ ग्रहों के आकर्षण - विकर्षण का क्या सम्बन्ध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते हुए जगत के कार्यों में वे क्या नवीनता ला सकते हैं? यह प्रश्न उठाने के पहले उन सबके एकत्व का विचार कर लेना चाहिये।

          समष्टिकर्ता की इच्छा ही प्रकृति का प्रवाह है। प्रकृति के सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवाहों के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और जीवों का प्रारब्ध है। इन गति और प्रारब्धों के अनुसार ही पुरुषार्थ और फल होते हैं। शरीर की उत्पत्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है जिसका जैसा कर्म, उसका वैसा शरीर जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्मवासनाऐं रहती हैं, उस जीवन में जैसी घटनाऐं घटनेवाली होती हैं, उसी के अनुसार उस शरीर के जन्म के समय वैसी ही ग्रहस्थिति रहती है। यों भी कह सकते हैं कि वैसी ग्रहस्थिति में ही उसका जन्म होता है अथवा ग्रहों की एक स्थिति में रहने पर भी भिन्न-भिन्न देश और शरीर के भेद से उनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है इसी से ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह किसी नवीन फल का विधान नहीं करते, बल्कि प्रारब्ध के अनुसार घटनेवाली घटना को पहले ही सूचित कर देते हैं ग्रहा वे कर्मसूचकाः । ग्रहों की स्थिति, गति, वक्रता, अतिचार आदि को जाननेवाला ज्योतिषी किसी भी व्यक्ति के जन्म समय को ठीक-ठीक जानकर बतला सकता है कि इसके भविष्य जीवन में कौन कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं।

       स्थूल कर्मचक्र के अनुसार केवल इतनी ही बात है, गणित की सत्यता को इस रूप में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। पाश्चात्य देशों में ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करके गणित के आधार पर फलित ज्योतिष उसी प्रकार प्रतिष्ठित किया गया है, जैसे कि वैदिक शास्त्रों मे परन्तु यह बात इतने से ही समाप्त नहीं होती, इसके आगे और भी कुछ है। वेदान्ती का देवता- विज्ञान इन स्थूल कार्यकारण परम्परा और सम्बन्धों से और भी ऊपर जाता है। मानस शास्त्र के वेत्ताओं ने एक स्वर से यह बात स्वीकार की है कि शुद्ध, परिपुष्ट एवं बलिष्ठ मन के द्वारा स्थूल जगत में अघटित घटना भी घटित की जा सकती है। यदि हम उन सूक्ष्मताओं के भी अन्तःस्थल में स्थित हो जायें, जो स्थूल घटनाओं की कारण हैं, तो हम न केवल स्थूल जगत में, बल्कि सूक्ष्म जगत में भी परिवर्तन कर सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि ग्रहों के द्वारा भावी घटनाओं का ज्ञान हो जाने पर मानसिक साधना के द्वारा उन्हें रोका भी जा सकता है।

          प्राचीन ऋषियों, योगियों और सिद्ध पुरुषों के द्वारा ऐसा किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि मन ऐसी स्थिति में भी जा सकता है, जहाँ से वह घटनाओं का विधान और अवरोध कर सकता है परन्तु सर्वसाधारण पक्ष में यह बात दुःसाध्य है। इसलिए उन्हें ग्रहमण्डलाधिष्ठातृ देवता की शरण लेनी पड़ती है। जिसके शरीर पर सूर्य ग्रह का दुष्प्रभाव पड़ रहा है या पड़ने वाला है, वह यदि सूर्य मण्डल के अभिमानी देवता का आश्रय ले और पूजा-पाठ, आदि के द्वारा यह अनुभव कर सके कि सूर्यदेवता मुझ पर प्रसन्न हैं, मेरा कल्याण कर रहे हैं और मुझे जीवनदान दे रहे हैं, तो बहुत अंश में उसका अरिष्ट शांत हो जायेगा और वह अपने को सूर्यग्रहजन्य पीड़ा से बचा सकेगा ।

           ग्रहशांति की ये दोनों प्रणालियाँ शास्त्रीय हैं पहली का नाम अहंग्रह उपासना और दूसरी का प्रतीक उपासना है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह सूर्यदेवता केवल उपासना के लिये ही हैं। वास्तव में समस्त देवताओं का अलग-अलग अस्तित्व है और सबके लोक, शक्ति, वाहन, क्रिया आदि अलग-अलग बँटे हुए हैं। जब तक विभिन्न शरीर, वस्तु, लोक और नक्षत्रमण्डल आदि पृथक-पृथक प्रतीत हो रहे हैं, इनके द्वारा पृथ्वीमण्डल प्रभावित हो रहा है, तब तक इनमें रहने वाले देवताओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान काल में सम्पूर्ण संसार राष्ट्रविप्लव, पारस्परिक द्रोह, पारिवारिक वैमनस्य, ईर्ष्या-द्वेष, रोग-शोक और उद्वेग अशांति से सर्वथा उपद्रुत हो रहा है। इसके अनेक कारणों में देवताओं की उपेक्षा और उनसे प्राप्त होने वाली सहायता को अस्वीकार कर देना भी है। अन्तर्जगत के नियमानुसार देवताओं को जागतिक पदार्थों के उत्पादन, विनिमय और वितरण का अधिकार प्राप्त है। मनुष्य देवताओं को सन्तुष्ट करें और देवता मनुष्यों को समृद्धि एवं अभिवृद्धि से सम्पन्न करें परन्तु मनुष्यों ने अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ का मिथ्या आश्रय लेकर स्वयं ही आत्मवञ्चना कर ली है, जिसका यह सब, जो दुःख दारिद्रय के रूप दिख रहा है, फल है।

          वेदों ने और तदनुयायी शास्त्रों ने एक स्वर से ग्रहशांति की आवश्यकता स्वीकार की है। अर्थवेद में सब देवताओं की पूजा के साथ-साथ ग्रह शांति का भी वर्णन आता है। शन्नो ग्रहाश्चानद्रमसाः शमादिस्याश्च राहुणा इत्यादि प्राचीन आर्यों में इस वैदिक मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन होता था, इसी से वे सुखी थे। आज भी जहाँ प्राचीन प्रथाओं का पालन होता है, वहाँ प्रत्येक शांतिक और पौष्टिक कर्मों में पहले नवग्रह की पूजा होती है।

यह ध्यान रखना चाहिये कि इस पूजा का सम्बन्ध उन उन मण्डलों में रहने वाले देवताओं से है। यहाँ संक्षेप से नवग्रहों के ध्यान का उल्लेख कर दिया जाता है। पूजा पद्धति के अनुसार उनका अनुष्ठान करना चाहिये।

सूर्य
         सूर्य ग्रहों का राजा है। ये कश्यप गोत्र के क्षत्रिय एवं कलिङ्ग देश के स्वामी हैं। जपाकुसुम के समान इनका रक्तवर्ण है। दोनों हाथों में कमल लिये हुए हैं, सिन्दूर के समान वस्त्र, आभूषण और माला धारण किये हुए हैं। जगमगाते हुए हीरे, चन्द्रमा और अग्रि को प्रकाशित करने वाला तेज, त्रिलोकी का अन्धकार दूर करने वाला प्रकाश । सात घोड़ों के एक वक्र रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए, प्रकाश के समुद्र भगवान सूर्य का ध्यान करना चाहिए। इनके अधिदेवता शिव हैं और प्रत्यधिदेवता अग्नि । इस प्रकार ध्यान करके मानस पूजा और बाह्य पूजा के अनन्तर मंत्र जप करना चाहिये।

चन्द्रमा
           भगवान चन्द्रमा अत्रिगोत्र हैं। यामुन देश के स्वामी हैं। इनका शरीर अमृतमय है। दो हाथ हैं एक में वर मुद्रा हैं, दूसरे में गदा दूध के समान श्वेत शरीर पर श्वेत वस्त्र, माला और अनुलेपन धारण किये हुए हैं। मोती का हार है। अपनी सुधामयी किरणों से तीनों लोकों को सींच रहे हैं। इस घोड़ों के त्रिचक रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। इनके अधिदेवता हैं उमादेवी और प्रत्यधिदेवता जल हैं।

मङ्गल
         मंगल भरद्वाज गोत्र के क्षत्रिय हैं। ये अवन्ति के स्वामी हैं। इनका आकार अग्नि के समान रक्त वर्ण है, इनका वाहन मेष है, रक्तवस्त्र और माला धारण किये हुए हैं। हाथों में शक्ति, वर अभय और गदा धारण किये हुए हैं। इनके अंग-अंग से कान्ति की धारा छलक रही है। मेष के रथ पर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए अपने अधिदेवता स्कन्ध और प्रत्यधिदेवता पृथ्वी के साथ सूर्य के अभिमुख जा रहे हैं।

बुध
            बुध अत्रिगोत्र एवं मगध देश के स्वामी हैं। इनके शरीर का वर्ण पीला है। चार हाथों में ढाल, गदा, वर और खड्ग है। पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं, बड़ी ही सौम्य मूर्ति है, सिंह पर सवार हैं। इनके अधिदेवता हैं नारायण और प्रत्यधिदेवता हैं विष्णु ।

बृहस्पति
            बृहस्पति अङ्गिरा गोत्र के ब्राह्मण हैं। सिन्धु देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण पीत है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, कमल पर बैठे हैं। चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता ब्रह्मा हैं और प्रत्यधिदेवता इन्द्र ।

शुक्र
         शुक्र भृगु गोत्र के ब्राह्मण हैं। भोजकट देश के अधिपति हैं। कमल पर बैठे हुए हैं। श्वेत वर्ण हैं, चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड हैं। श्वेत वस्त्र धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता इन्द्र हैं और प्रत्यधिदेवता चन्द्रमा हैं।

शनि
        ये कश्यप गोत्र के शूद्र हैं। सौराष्ट्रप्रदेश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण हैं, कृष्ण वस्त्र धारण किये हुए हैं। चार हाथों में बाण, वर, शूल और धनुष हैं। इनका वाहन गीध है। इनके अधिदेवता यमराज और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं।

राहु
         राहु पैठीनस गोत्र के शूद्र हैं। मलय देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और वस्त्र भी कृष्ण ही हैं। इनका वाहन सिंह है। चार हाथों में खड्ग, वर, शूल और ढाल लिए हुए हैं। इनके अधिदेवता काल हैं और प्रत्यधिदेवता सर्प हैं।

केतु
        ये जैमिनि गोत्र के शूद्र हैं। कुशद्वीप के अधिपति हैं । इनका वर्ण धुएँका सा है और वैसा ही वस्त्र भी धारण किये हुए हैं। मुख विकृत है, गिद्ध वाहन है। दो हाथों में वरमुद्रा तथा गदा हैं। इनके अधिदेवता हैं चित्रगुप्त तथा प्रत्यधि देवता हैं ब्रह्मा ।

ये सब ग्रह अपनी-अपनी गति से सूर्य ओर बढ़ रहे हैं, सबका मुख सूर्य की ओर हैं। पृथ्वी के साथ सब का सम्बन्ध है। प्रत्येक शांति और पुष्टिकर्म में इनकी आराधना होती है। पृथक-पृथक अरिष्ट के अनुसार भी इनकी पूजा की जाती है। इनमें से किसी एक को प्रसन्न करके उनसे वांछित फल भी प्राप्त किया जा सकता है। जिस ग्रह का जो वर्ण है, उसी रंग की वस्तुऐं प्रायः पूजा में लगायी जाती हैं। मंत्र का जितना जप होता है, उसका दशांश हवन होता है। हवन में भिन्न-भिन्न प्रकार की समिधाऐं काम में लायी जाती हैं। सूर्य के लिये मदार, चन्द्रमा, वृहस्पति के लिये पीपल, शुक्र के लिये गूलर, शनैश्वर के लिये शमी और राहु केतु के लिये दूर्वा का प्रयोग होता है। इस प्रकार पूजा करने से ये ग्रह सन्तुष्ट हो जाते हैं और किसी प्रकार का अनिष्ट न करके सब प्रकार से इष्टसाधन करते हैं। नवग्रह की दोष शांति के लिये रत्न धारण किये जाते हैं सूर्य के लिये माणिक्य, चन्द्रमा के लिये मोती,मंगल के लिये प्रवाल (मूंगा) बुध के लिये मरकतमणि, वृहस्पति के लिये पुष्पराग, शुक्र के लिये हीरा, शनि के लिये नीलकान्तमणि,राहु लिये गोमेद और केतुके लिए वैदूर्यमणि ।

         इनके धारण करने से ग्रहों के दोष की शांति हो जाती है। जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं, इष्टदेव की आराधना करते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं, किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, सबका भला करते हैं, सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, शुद्ध हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ता उनको पीड़ा न पहुँचाकर वे उन्हें सुखी करते हैं। उस श्लोक का अंतिम चरण यह है
नो कुर्वन्ति कदाचिदेव पुरुषस्यैर्व ग्रहाः पीडनम् ।

                          शिव शासनत: शिव शासनत:

घर पर ऐसे मनाएं कान्हा जी का जन्मोत्सव: ।।

भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि पर पूरे हर्षोल्लास के साथ कान्हा के शिशु रूप में अवतरित होने का उत्सव मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न मंदिरों में भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उनके भक्त बहुत धूमधाम से मनाते हैं। लेकिन अगर आप किसी मंदिर में नहीं जा पा रहे हैं, तो घर में भी आप बेहद खूबसूरत तरीके से जन्माष्टमी मना सकते हैं।

आइए इस लेख में जानते हैं कि कैसे घर में सम्पूर्ण विधि-विधान और नए तरीकों के साथ मनाएं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी:

सजाएं मंदिर :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पूजा के लिए आप बाज़ार से फूल व अन्य सजावट का सामान लाकर मंदिर को सजाएं। आप मंदिर के अलावा घर में भी किसी अन्य स्थल को जन्माष्टमी का उत्सव मनाने के लिए सुंदर तरह से सजा सकते हैं।

श्री कृष्ण की बांसुरी :
भगवान को बांसुरी अत्यंत प्रिय है, इसलिए आप चाहें तो उनके जन्मोत्सव पर एक बांसुरी ला सकते हैं, और उसे मोती और सुंदर रंगों से सजाकर पूजन के समय प्रभु को अर्पित कर सकते हैं।

रंगोली बनाएं :
सनातन धर्म में रंगोली का महत्व बहुत है, घर में रंगोली बनाना अत्यंत शुभ माना गया है। तो, आप भी जन्माष्टमी के अवसर पर अपने मंदिर के सामने या घर के बाहर भगवान के स्वागत के लिए एक सुंदर रंगोली अवश्य बनाएं।

भोग-पकवान :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर पर ही प्रभु को भोग लगाने के लिए पंजीरी, पंचामृत, लड्‍डू एवं अन्य पकवान बना सकते हैं। आप इस दिन भगवान को प्रसन्न करने के लिए उनकी पसंदीदा चीज़ों का भोग बनाना न भूलें।

झांकी :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन आप घर में ही झांकी लगाकर इस पर्व को और भी खास बना सकते हैं। इसके लिए आप कृष्ण की बाल लीला से संबंधित या कोई अन्य झांकी भी लगा सकते हैं।

बच्चों को बनाएं श्री राधाकृष्ण :
ऐसा माना जाता है कि बच्चे भगवान का स्वरूप होते हैं। अगर आपके घर में छोटे बच्चे हैं तो आप उन्हें जन्माष्टमी पर राधारानी और श्रीकृष्ण के रूप में तैयार कर सकते हैं। जन्माष्टमी पूर्णतः बाल कृष्ण का उत्सव है, तो बच्चों को श्री राधाकृष्ण के रूप में तैयार करके, इस पर्व की सुंदरता को बढ़ाया जा सकता है।

भजन-कीर्तन :
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दौरान अगर आप माहौल को थोड़ा और भक्तिमय बनाना चाहते हैं, तो घर में सुंदर श्रीकृष्ण भजन भी बजाइये। आप अपने परिवार और पड़ोसियों के साथ मिलकर पूरे उत्साह के साथ भजन-कीर्तन करिए, और इस पर्व का आनंद उठाइये।

श्रीकृष्ण को झूला झुलाएं :
प्रभु के जन्म की पूजा विधि-विधान से करने के पश्चात्, उनको झूला झुलाना बहुत अच्छा माना जाता है। आप अपने पूरे परिवार के साथ बाल-गोपाल को झूला झुलाएं और उनका स्वागत करें।

प्रसाद वितरण :
भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के पश्चात, वहां उपस्थित और आसपास के लोगों के बीच प्रसाद अवश्य बांटें। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कोई भी पूजा तब तक फलीभूत नहीं है, जब तक उसका प्रसाद आपके अतिरिक्त कुछ और लोगों तक न पहुंच जाए।

आप यहां बताए गए तरीकों के साथ घर में अपने परिवार के साथ धूमधाम से जन्माष्टमी का त्योहार मना सकते हैं। हम आशा करते हैं कि यह सुझाव आपके त्योहार को खुशियों से भर देंगे।.....जय श्री कृष्णा 🙏

श्री कृष्ण पूजन ।।


           साधक को चाहिए कि वह स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल में स्वच्छ आसन पर उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करके बैठ जाये। पूजन के लिए आवश्यक समस्त सामग्री यथा- कुंकुम, अक्षत, मौली, जल, पुष्प, दूध, दही, घृत, वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अपने पास रख लें ताकि पूजन के मध्य बार-बार न उठना पड़े। अपने सम्मुख किसी चौकी में भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा स्थापित कर लें। धूप दीप आदि जला लें ताकि वातावरण शुद्ध हो जाये।

पवित्रीकरण

          सर्वप्रथम अपने बायें हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ से अपने ऊपर छिड़कें तथा निम्न मंत्र का उच्चारण करें-

ॐ अपवित्रः पवित्रो व सर्वावस्थां गतोऽपि वा ।
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यंतरः शुचिः ॥

आचमन

         पवित्रीकरण के पश्चात आचमनी में जल लेकर क्रमश: निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये तीन बार जल पियें।

                    ॐ केशवाय नमः ।                                
                    ॐ माधवाय नमः ।
                    ॐ गोविन्दाय नमः ।
आचमन के उपरांत हस्त प्रक्षालन (हाथ धोना) कर लें।

गणपति स्मरण

           निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान गणपति का स्मरण करें साथ ही अन्य देवी देवताओं का भी स्मरण करें -

ॐ श्रीमन् महागणाधिपतये नमः । लक्ष्मी नारायणाभ्यां नमः । उमा महेश्वराभ्यां नमः । शची पुरन्दराभ्यां नमः । मातृ पितृ चरण कमलेभ्यो नमः । इष्ट देवताभ्यो नमः । कुल देवताभ्यो नमः । ग्राम देवताभ्यो नमः । स्थान देवताभ्यो नमः । वास्तु देवताभ्यो नमः । वाणी हिरण्य गर्भभ्यां नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः ।

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्न नाशो विनायकः ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥

संकल्प

        कुंकुम, अक्षत मिश्रित जल दाहिने हाथ में लेकर निन मंत्रोच्चार करते हुये संकल्प लें

ॐ विष्णु विष्णु विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्राह्मणोऽहि द्वितीय परार्धे श्वेत वाराह कल्पे जम्बू द्वीपे भरत खण्डे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते पुण्य क्षेत्रे, कलियुगे कलि प्रथम चरणे अमुक मासे ( महीने का नाम लें) अमुक पक्षे (पक्ष बोलें) अमुक तिथौ (तिथि बोलें ) अमुक वासरे (दिन का नाम लें ) अमुक गोत्रोत्पन्नः ( अपना गोत्र बोलें) अमुक ( नाम बोलें ) शर्माऽहं भगवतो महापुरुषस्य कृष्णस्य विशिष्ट पूजनं अहं करिष्ये ।

उपरोक्त संकल्प मंत्र पूर्ण होने पर जल को भूमि पर छोड़ दें।

दीप पूजन

       दीपक पर कुंकुम अक्षत चढ़ायें, निम्न मंत्र का उच्चारण करें भो दीप देवरूपस्त्वं कर्मसाक्षि हविघ्नकृतः यावत् कर्म समाप्तिः स्यात तावदत्र स्थिरो भव ।
                                                ( ॐ दीपदेवतायै नमः)
कलश पूजन

           अपने सम्मुख भगवान श्रीकृष्ण के आसन की दाहिनी ओर कलश स्थापित करें और क्रमशः निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये चारों दिशाओं में कलश पर कुंकुम से तिलक करें।

पूर्वे ऋग्वेदाय नमः । उत्तरे यजुर्वेदाय नमः । पश्चिमे सामवेदाय नमः । दक्षिणे अर्थवेदाय नमः ।

अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये कलश में जल डालें

गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वती, नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ।

जल डालने के उपरांत "अक्षतानि समर्पयामि " का उच्चारण करते हुये कलश में अक्षत डाल दें तत्पश्चात निम्र मंत्र का उच्चारण करते हुये एक सुपारी अर्पित करें

ॐ या फलिनीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुष्पणी, वृहस्पतिः प्रसूतास्तन्नो मुञ्चन्ति ( गूं ) हसः ।

फिर कलश के ऊपर पंच पल्लव डाल दें तथा उस पर नारियल स्थापित करें (नारियल में मौली बंधी हुयी हो) अब कलश को स्नान कराकर चन्दन, कुंकुम, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि समर्पित करें तत्पश्चात दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करें

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः, मूले तत्र स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणः स्थिता । कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्त द्वीपा वसुन्धरा, ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वणः । अंगैश्च सहिता सर्वे कलशं तु समाश्रितः, अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरस्तथा, आयान्तु यजमानस्थ दुरिक्षय कारकाः । ॐ कलशस्य देवता अपां पतये नमः ।

गुरु पूजन

यद्यपि योगी योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण जगद्गुरु हैं तथापि यदि साधक ने किसी भी गुरु से दीक्षा या गुरु मंत्र लिया है अथवा नहीं भी लिया तो निम्रानुसार मंत्रोच्चार से ब्रह्माण्ड के सभी गुरुओं का पूजन हो जाता है-

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
मूकं करोति वाचालं पंगुं लंघयते गिरिं ।
यत् कृपा तमहं वन्दे परमानन्द माधवम् ॥

             गुरु चित्र पर पुष्प से जल छिड़ककर उसे स्वच्छ वस्त्र से पोंछ दें तत्पश्चात पुष्प, धूप, दीप, अक्षत कुंकुम आदि से गुरु का पूजन करें तथा निम्न मंत्र का मानसिक जप करते हुये अपने गुरु से प्रार्थना करें कि वे पूजन में सूक्ष्म रूप से उपस्थित रहकर पूजन को पूर्णता प्रदान करें-

ॐ परम तत्वाय नारायणाय गुरुभ्यो नमः ।

        दोनों हाथ जोड़कर पूर्ण श्रद्धाभाव से भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें निम्र मंत्र का उच्चारण करें

बर्हापीडं नटवर वपुः कर्णयोः कर्णिकारं, विभवासा कनक कपिशं वैजयंती च मालां ।
रुधान वेणूरधरसुदया पूरयन गोपवृन्दैः, वृन्दारण्यं स्वपदरमणं प्रविशद् गीतकीर्तिः ॥ (ध्यानं समर्पयामि श्रीकृष्णाय नमः)

आसन

दोनों हाथ में पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को आसन दें। निम्र मंत्र का उच्चारण करें

ॐ पुरुष एवेदं (गूं) यद्भूतं यच्च भाव्यम् ।
उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (पुष्पासनं समर्पयामि)

पाद्य

आचमनी में जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में दो बार अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

ॐ एतावानस्य महिमातो ज्यायंश्च पुरुषः ।
पादोऽस्य विश्व भूतानि त्रिपादस्यामृतन्दित् ।।(पाद्यं समर्पयामि)

अर्ध्य
           ताम्र पात्र में जल, कुंकुम, चंदन, अक्षत व पुष्प लेकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें

ताम्रपात्रे स्थितं तोयं गंध पुष्प फलान्वितम् ।
सहिरण्यं ददाम्यर्ध्य गृहाण परमेश्वर ॥ (अर्ध्यं समर्पयामि)

आचमन
                 आचमनी में जल लेकर भगवान को अर्पित करें

सर्व तीर्थ समानीतं सुगन्धिं निर्मलं जलं ।
आचमनार्थं मया दन्तं गृहाण परमेश्वर ॥

स्नान
          पुष्प से जल लेकर भगवान श्रीकृष्ण को स्नान करायें-

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती ।
नर्मदे सिन्धु कावेरी जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु॥
(स्त्रानंसमर्पयामि)

दुग्ध
        भगवान श्री गणेश की प्रतिमा के समक्ष एक पात्र रखकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए पात्र में दुग्ध अर्पित करें

कामधेनु समुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परम् ।
पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थमर्पितम् ॥(दुग्ध स्नानं समर्पयामि)

दधि
          निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चित्र के समक्ष रखे पात्र में दही अर्पित करें

पयसस्तु समुद्भुतं मधुराम्लं शशिप्रभम् ।
दध्यानीतं मयादेव स्नानार्थं प्रतिगृहताम् ॥
(दधि स्नानं समर्पयामि)

घृत
        निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को घी अर्पित करें

नवनीत समुत्पन्नं सर्व संतोषकारकम् ।
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥
(घृत स्नानं समर्पयामि)

मधु
        निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को शहद (मधु) से स्नान करायें

तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु ।
तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ।।
(मधु स्नानं समर्पयामि)

शर्करा स्नान
                   अब भगवान श्रीकृष्ण को शक्कर से स्नान करायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

इक्षुसार समुद्भूता शर्करा पुष्टिकारिका, मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् । (शर्करा स्नानं समर्पयामि)

शुद्धोदक स्नान
                     शर्करा स्नान के पश्चात आचमनी में जल लेकर स्नान हेतु पात्र में अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

कावेरी नर्मदावेणी तुंगभद्रा सरस्वती गंगा च यमुना तोयं मया स्नानार्थमर्पितम् । (शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि)

वस्त्रोपवस्त्र
                भगवान श्रीकृष्ण की प्रतिमा को स्वच्छ वस्त्र से पोंछकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दो वस्त्र अर्पित करें

सर्वभूषादिके सौम्ये लोक लज्जा निवारणे, मयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम् । (वस्त्रोपवस्त्रं समर्पयामि)

तिलक
           निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये चंदन कुंकुम से भगवान श्रीकृष्ण का तिलक करें

श्रीखण्ड चन्दनं दित्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम् ।
विलेपन सुरश्रेष्ठ चन्दनम् प्रतिगृह्यताम् ।

अक्षत
           निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवान श्रीकृष्ण को अक्षत अर्पित करें

अक्षताश्च सुरश्रेष्ठ कुंकुमाक्ता सुशोभिता, मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर । (अक्षतान् समर्पयामि)

पुष्प
         अब हाथ में नाना प्रकार के पुष्प लेकर निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये भगवान को पुष्प अर्पित करें

पद्म शंखज पुष्पादि शत पत्रैविचित्रताम् ।
पुष्पमालां प्रयच्छामि गृहाण परमेश्वरः ॥ (पुष्पं समर्पयामि)

तुलसीदल
                अब तुलसी पत्रों पर चन्दन लगाकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें निम्र मंत्रोच्चार करें

इदं सचन्दनं तुलसीदलं समर्पयामि नमः।

धूप-दीप
                धूप, दीप जलाकर भगवान श्रीकृष्ण को दिखायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

वनस्पति रसोद्भूतः गन्धाढ्य सुमनोहरः ।
आत्रेयः सर्वदेवानां धूपोभ्यं प्रतिगृह्यताम् ।।
(धूपं दीपं दर्शयामि नमः)

नैवेद्य
          अब नाना प्रकार की मिठाइयाँ भोज्य पदार्थ नैवेद्य के रूप में भगवान को अर्पित करें निम्नानुसार मंत्र का उच्चारण करें

ॐ कृष्णाय वासुदेवाय नैवेद्यं निवेदयामि नमः ॥

आचमन
               नैवेद्य समर्पित करने के पश्चात निम्र मंत्रों का उच्चारण करते हुये आचमनी में जल लेकर पाँच बार अर्पित करें।
ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा, ॐ समानाय स्वाहा, ॐ व्यानाय स्वाहा, ॐ उदानाय स्वाहा ।

फल
          विविध प्रकार के फल भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव ।
तेन मे सफलावाप्तिः भवेज्जन्मनि जन्मनि ॥
(फलं समर्पयामि नमः)

तत्पश्चात ताम्बूल (पान का पत्ता) में लौंग इलायची रखकर भगवान को अर्पित करें।

पुष्पांजलि
                दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्रोच्चार करते हुये भगवान को पुष्पांजलि अर्पित करें

नाना सुगन्ध पुष्पाणि यथा कालोद्भवानि च ।
पुष्पांजलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर ॥

नमस्कार
               निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दोनों हाथ जोड़कर भगवान को प्रणाम करें

कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने ।
प्रणत क्लेश नाशाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

मंत्र जाप
              निम्र मंत्र का कम से कम 15 मिनिट तक मानसिक जप करें

                 ॐ कृं कृष्णाय ब्रह्मण्य देवाय नमः ॥

प्रार्थना
            अंत में दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये पूर्ण सौभाग्य, समृद्धि एवं सफलता के लिये भगवान से प्रार्थना करें

नमो ब्रह्मण्य देवाय गोब्राह्मणहिताय च ।
जगद्विताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥

फिर अंत में आरती करें
                         शिव शासनत: शिव शासनत:

समस्त कामनाओं की पूर्ति का अमोघ साधन ।।



                       गणेशाष्टक
                     -----------------
        भगवान गणपति की कृपा प्राप्त करने का यह सबसे उत्तम साधन है। गणेशाष्टक का मात्र तीन दिनों तक निरंतर तीनों संध्याओं के समय पूर्ण श्रद्धा व मनोयोग से फर लेने पर साधक के समस्त कार्य सिद्ध हो जायेंगे इतना ही नहीं यदि साधक आठ दिनों तक इन आठों श्लोकों का एक बार पाठ कर लेता है और चतुर्थी तिथि को आठ बार पाठ करता है तो वह आठों सिद्धियों को अनुभूत करने की स्थिति में आ जाता है।

                जो एक माह तक प्रतिदिन 10-10 बार इस स्तोत्र का पाठ करता है वह कारागृह में निरुद्ध तथा राजा के द्वारा वध दण्ड पाने वाले कैदी को भी छुड़ा सकता है। इसमें संशय नहीं है जो भी साधक पूर्ण भक्तिभाव से गजानन की आराधना करता है और गजानन के इस स्तोत्र का पाठ करता है उसे गणपति की परम भक्ति प्राप्त होती है। इस स्तोत्र के पाठ से विद्यार्थी को विद्या, पुत्र की इच्छा रखने वाले को पुत्र तथा निर्धन को धन प्राप्त होता है साथ ही जिसकी जो भी मनोकामना हो शीघ्र ही पूर्ण हो जाती है।

विधि: साधक प्रातः काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो जायें और स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर लें, तत्पश्चात् पूर्व या उत्तर की तरफ मुख कर लें और गणपति विग्रह या यंत्र (यंत्र के अभाव में सुपारी पर मौली बाँधकर रख लें) की पूजा सिन्दूर, दूर्वा, धूप व दीप से कर के उपरोक्त स्तोत्र का पाठ करें।

सर्वे ऊचुः

यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्च जीवा यतो निगुर्णादप्रमेया गुणास्ते । 
यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

 यतश्चविरासीज्जगत्सर्वमेतत्तथाब्जासनो विश्वगो विश्वगोप्ता । 
तथेन्द्रादयो देवसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

 यतो वह्निभानूद्भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः ।
यतः स्थावरा जङ्गमावृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

यतो दानवाः किंनरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वपदाश्च । 
यतः पक्षिकीटा यतो वीरुधश्च सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

 तो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोर्यतः सम्पदो भक्तसंतोषिकाः स्युः । 
यतो विघ्ननाशो यतः कार्य सिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ 

यतः पुत्रसम्पद्यतो वांछितार्थो यतोऽभक्तविघ्नास्तथानेकरूपाः । 
यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

 यतोऽनन्तशक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः । 
यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ 

यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति यन्ता गृणन्ति । 
परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥

श्रीगणेश उवाच

पुनरुचं गणाधीशः स्तोत्रमेतत्पठेन्नरः । 
त्रिसंध्यं त्रिदिनं तस्य सर्वं कार्यं भविष्यति ॥ 

यो जपेदष्टदिवसं श्लोकाष्टकमिदं शुभम् । 
अष्टवारं चतुर्थ्यां तु सोऽष्टसिद्धीरवाप्नुयात् ॥ 

यः पठेन्मासमात्रं तु दशवारं दिने दिने । 
स मोचयेद्बन्धगतं राजवध्यं न संशयः ॥ 

विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् । 
वांछिताँल्लभते सर्वानेकविंशतिवारतः ॥ 

यो जपेत् परया भक्त्या गजाननपरो नरः । 
एवमुक्त्वा ततो देवश्चन्तर्धानं गतः प्रभुः ॥

     ॥ इति श्री गणेशपुराणे श्री गणेशाष्टकं सम्पूर्णम् ॥

         साधक प्रात:काल उठकर नित्यकर्म से निवृत्त हो जाऐ और स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर ले, तत्पश्चात् पूर्व या उत्तर की तरफ मुख कर लें और गणपति विग्रह या यंत्र (यंत्र के अभाव में सुपारी पर मौली बाँध कर रख लें) की पूजा सिन्दूर, दूर्वा, धूप व दीप से कर के उपरोक्त स्तोत्र का पाठ करें।

                          शिव शासनत: शिव शासनत:

शस्त्र-धारिणीं नमो नमः--

।। ॐ कृष्णकायाम्बिकाय विद्महे पार्वती रूपाय धीमहि तन्नो कालिका प्रचोदयात ।। 

          जीवन महासंग्राम है। आप साधु बन जाओ, जंगल में जाकर पेड़ के नीचे बैठ जाओ, अपने आपको चार-दीवारी में कैद कर लो, जो मर्जी आये वो विधान अपना लो, चाहे जितनी बुद्धि लगा लो, जितना चाहे उतना अपने आपको सुरक्षित कर लो परन्तु महा संग्राम आप तक आ धमकेगा किसी न किसी रूप में और आप बच नहीं सकते। करोड़ों वर्षों सत्य, अहिंसा, दया, सेवा, सात्विकता, प्रेम, सौहाद्र, मैत्री इत्यादि की विचारधाराओं का प्रचार-प्रसार, पुराण, प्रवचन सीख इत्यादि के माध्यम से होता आ रहा है, होता रहेगा और होता आया है अपितु मैं इनका विरोधी नहीं हूँ, मैं किसी का विरोधी नहीं हूँ, विरोध और समर्थन जाने अनजाने में व्यक्ति को महासंग्राम में खींच लाते हैं। विरोध और समर्थन दोनों महासंग्राम के दो हाथ हैं इसलिए मैं शाश्वत सत्य की बात कर रहा हूँ, सनातन धर्म की बात कर रहा हूँ, प्रत्यंगिरा की शरण में जा रहा हूँ अर्थात भागो यहाँ से क्रीं का महाषोढान्यास कर, क्रीं वह महाबीज मंत्र है जिसके हाथ में न जाने कितने अस्त्र-शस्त्र विराजमान हैं पाशुपतास्त्र, आग्नेयास्त्र, त्रिशूलास्त्र, घोरास्त्र, अघोरास्त्र, प्रकाशास्त्र, दिव्यास्त्र से लेकर छुरी, तलवार, डमरु, खड्ग इत्यादि इत्यादि ।

           हे महाप्रत्यंगिरे तू शस्त्र निर्मात्री है, तू शस्त्र बिन्दु है, तू अस्त्र सुसज्जिता है। नमोऽस्तुते नमोऽस्तुते समस्त शस्त्र धारिणी नमोऽस्तुते अतः इस महा षोढान्यास से जातक के अंदर समस्त शस्त्रों का प्रादुर्भाव स्वतः ही हो जाता है, एक महाशस्त्र संस्थान मस्तिष्क में क्रियाशील हो उठता है साथ ही साथ सहस्त्रार के मुख्य बिन्दु में शस्त्र बीज पल्लवित हो उठता है, सारे राडार अपने आप क्रियाशील हो उठते हैं एवं पर-शस्त्र आप तक पहुँचें, शत्रु आप तक पहुँचे इससे पहले ही रास्ते में उसका काम तमाम हो जाता है, उसके षडयंत्र का भांडा-फोड़ हो जाता है, उसके कुत्सित प्रवास जग जाहिर हो जाते हैं। आपके शरीर की समस्त गुप्तचर प्रणालियाँ सक्रिय हो उठती है और प्रत्यंगिरा, उपासना के माध्यम से आपको पहले ही सटीक सूचना प्रदान कर देती और आप बच निकलते हैं। इसके पश्चात् भी अगर शत्रु से आमना सामना हो जाये तो उसको हार निश्चित है। हे परम गोपनीय कालिका तुझे काली कहा जाता है क्योंकि जो कुछ भी उत्पन्न होता है वह काले में से ही उत्पन्न होता है और काले में ही विलीन हो जाता है। सातों रंग काले रंग में से निकलते हैं और पुन: काले रंग में विलीन हो जाते हैं।

         जीवन क्या है? आप किसे जीवन कहते हैं? प्रथम जन्म लेने से पूर्व हम कहाँ थे वह परम गोपनीय है अर्थात काली के काले रंग में छिपा हुआ है, मृत्यु के बाद हम कहाँ जायेंगे? वह भी परम गोपनीय है और यह भी काली के काले रंग में छिपा हुआ है। कहाँ से आये ? कहाँ गये? काली जो जानें। जन्म से मृत्यु तक की इस समयावधि में भी 50 प्रतिशत हम निद्रा के आगोश में रहते हैं अर्थात काली की गोद में लेटे रहते हैं अत: काली हो हमारी माता है, वास्तविक माता इसलिए वह महाप्रत्यंगिरा के रूप में इन जागृत प्रकाशमय समयावधि में हमारी रक्षा करती है। जब चिकित्सक की समझ में कुछ नहीं आता तो वह नींद की दवा दे देता है, जब दर्द बहुत होता है तब नशे का इंजेक्शन लगा दिया जाता है। दर्द निवारक औषधि क्या है ? एक तरह से नींद की औषधि है, जिस स्थान विशेष पर दर्द हो रहा हो उस स्थान विशेष को सुला दो, निद्रित कर दो। जब हम बहुत थक जाते हैं तो सो जाते हैं और पता नहीं कहाँ से पुनः सोम आकर हमें स्फूर्तिवान बना देता है। जब बच्चा रोता है तो माँ उसे सुला देती है क्या करें उसकी तथाकथित माँ ? अतः वह उसे निद्रा-रूपी मां कालिका की शरण में भेज देती है। जो सारे गम भुला दे सारे गिले शिकवे मिटा दे, कुछ पल के लिए चिंताओं से मुक्त कर दे वही प्रत्यंगिरा अर्थात कृत्य और कर्म के दुष्प्रभाव (साइडइफेक्ट्स) को हमारे मस्तिष्क से निकाल दे।

        मनुष्य इस ब्रह्माण्ड में परम ऊर्जा का केन्द्र है, मनुष्य का निर्माण ऊर्जा के एक महत्वपूर्ण स्तोत्र के रूप में किया गया है एवं मनुष्य के अंदर कालिका सोम भरती है अतः वह सबकी नजरों में चढ़ा हुआ है और इसी सोम की प्राप्ति के लिए चाहे सूर्य हों, चाहे चंद्रमा, चाहे भूमि हो, चाहे राहु-केतु, चाहे शनि हों, चाहे गुरु हों, चाहे बुध हों, चाहे बृहस्पति हो, रोग ग्रह, बाल ग्रह, चौर ग्रह, शूद्र ग्रह, हिंसक पशु, मनुष्य, देवता, असुर, गंधर्व, यक्ष इत्यादि इत्यादि सबके सब मनुष्य से ऊर्जा प्राप्त करने में लगे हुए। होते हैं, सबकी निगाहें हम पर लगी हुई है, सब अपने-अपने अस्त्र-शस्त्रों, अपने-अपने विधानों, अपने-अपने प्रपंचों, अपने-अपने तंत्र के द्वारा मनुष्य का शोषण करने पर उतारू हैं। 

उन्हें ऊर्जा चाहिए, उन्हें कालिका की शक्ति चाहिए, उन्हें सोम चाहिए इसलिए मनुष्य नुच रहा है, चुथ रहा है, भाग रहा है, रो रहा है, गिड़गिड़ा रहा है, दुःखी है,भयभीत है, परेशान है। वह अपने ज्ञान से, वह अपने विज्ञान से, वह अपने तथाकथित धर्म और अध्यात्म से करोड़ों वर्षों से प्रयत्नरत है कि वह इस पृथ्वी पर आनंदमय हो जाये, सुखी हो जाये पर ऐसा क्यों नहीं हो रहा? क्योंकि सबको मनुष्य से चाहिए।

           चाहे सूर्य हों, चाहे देवता, चाहे ग्रह, चाहे नक्षत्र इत्यादि येन केन प्रकरेण ये सब ऊर्जा प्राप्त कर लेते हैं और मनुष्य का एक-एक अणु उपयोग कर लिया जाता है, यह अघोरा का नग्न सत्य है। जिसे जीवन में एक न एक दिन सभी मनुष्य समझ लेते हैं। न दो तो कष्ट, न दो तो युद्ध, न दो तो प्रताड़ना इत्यादि-इत्यादि । न दो तो दण्ड अर्थात वे लेकर ही मानते हैं। कर्म। वेद आये, अनेक धर्मो ने अनेकों ग्रंथ निकाले पर उनसे क्या हुआ? मानव कभी सुखी हुआ? वह इस मूलभूत समस्या का निवारण कर पाया? नहीं कदापि नहीं । मृत्यु क्या है? मृत्यु सम्पूर्ण शोषण है, पूरी तरह से उपयोग कर लेने की ब्रह्माण्डीय विधि है। हम एक विशेष ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में आकर फँस गये हैं, हमने शरण ले रखी है अतः इस ब्रह्माण्डीय तंत्र में श्वास लेने की भी हमें बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है एवं इन सबके पीछे महाप्रत्यंगिरा तत्व चिंतन, महाप्रत्यंगिरा महाविद्या के ज्ञान का नितांत अभाव है। जब तक हम इसे नहीं समझेंगे जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन सम्भव नहीं है और भागमभाग में हम एक दिन ऊर्जा-विहीन हो जायेंगे।

           काली का तात्पर्य है कि जो कबाड़ को आत्मसात करे, कबाड़ का भक्षण कर फिर उसमें से कुछ अद्भुत सृजित कर दे वही काली। सबको शक्ति चाहिए, आज आप देखिए हम पुराने यंत्र, पुराने कपड़े, पुरानी कार, पुराना रेडियो इत्यादि- कबाड़ में फेंक देते हैं क्योंकि हमें अब वे ऊर्जा नहीं दे रहे हैं या फिर हमें उनसे और परिष्कृत ऊर्जा प्रदान करने वाले संसाधन और यंत्र मिल गये हैं अतः हम उन्हें कबाड़खाने में फेंक देते हैं ऐसा ही हमारे साथ होता है हमारे मस्तिष्क में बहुत सारा कबाड़ा इकट्ठा हो जाता है और उस कबाड़ का भक्षण करती हैं प्रत्यंगिराएं जो कि महाप्रत्यंगिरा के साथ चलती हैं। हमारे मस्तिष्क में झाड़ लगाती हैं प्रत्यंगिराएं, हमारे मस्तिष्क में पनप रहे अनाधिकृत सूक्ष्म जीवों को अपनी प्रतिरोधक क्षमताओं से मारती हैं प्रत्यंगिराएं। जब साधक कालिकामय होता है तब हौले से उसके सहस्त्रार से सोम का एक बिन्दु टपका देती हैं महाकालिका और काल के सूक्ष्म से भी सूक्ष्म अंश में वह सोम देखते ही देखते उसके रक्त में घुलकर सम्पूर्ण शरीर में क्रियाशील हो उठता है और कालिका का साधक पुनः उठ खड़ा होता है एवं चल पड़ता है कर्म रूपी रणभूमि की तरफ यौद्धाओं के समान छाती ताने और कहता है कि आओ ढूंढो मेरे अंदर मौजूद सोम को । कर्म के द्वारा वह घोर युद्ध करता है सभी से पर कोई उसके अंदर से सोम निकाल नहीं पाता।

        वैज्ञानिक कई शताब्दियों से इस प्रकार को संरचना बनाने में लगे हुए है जो कि परम ठोस हो और पूर्ण गोलाकार हो, मैंने कहा पूर्ण गोलाकार अर्थात एक ऐसा गोला जिसके अंदर मौजूद सभी अणु परमाणु भी सम्पूर्ण गोलाकार हो। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण से बिन्दु बनाने की प्रक्रिया है, महाबिन्दु का निर्माण है, यह भौतिक संसाधनों के माध्यम से महा प्रत्यंगिरा के निर्माण करने की योजना है। आप पृथ्वी को देखिए, वह पूर्ण रूप से गोलाकार नहीं है। उसकी सतह पहाड़ों से, गड्डों से, चट्टानों से, घाटियों से, दरों से पटी पड़ी है अतः आप इसे कैसे पूर्ण गोलाकार कह सकते हैं? यही हाल चंद्रमा, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, सूर्य एवं ब्रह्माण्ड के सभी पिण्डों का है पूर्ण गोलाकार कोई नहीं है, यही श्रीविद्या रहस्यम् है। जब सम्पूर्णता के साथ पूर्ण गोलाकार स्थिति प्राप्त कर ली जायेगी तो वह गोल स्वत: ही घूमने लगेगा, उसे घुमाने के लिए किसी अन्य शक्ति की जरूरत नहीं पड़ेगी और उसके ऊपर जलवायु, प्रकाश, अग्नि, उल्कापिण्ड इत्यादि किसी का कोई असर नहीं पड़ेगा। उस पर कुछ नहीं टिक सकता।

वह किसी की पकड़ में नहीं आयेगा,किसी की दृष्टि में भी वह नहीं पड़ेगा क्योंकि दृष्टि भी फिसल जायेगी, ध्वनि भी उससे टकराकर फिसल जायेगी,मन की तरंगे भी उस गोलाकार से टकराकर फिसल जायेंगी। वह सूक्ष्म भी होगा और विशाल भी, वह अस्तित्ववान भी होगा और अस्तित्व विहीन भी,वह काल से सदा मुक्त होगा, काल भी उस पर प्रभाव नहीं डाल पायेगा, महाकाल भी उस पर प्रभाव नहीं डाल पायेंगे। वह काल के छोटे से छोटे कण को भी मात दे देगा। उस गोले को घुमाने के लिए किसी ईंधन की जरूरत भी नहीं पड़ेगी वह स्वतः ही गति का अविष्कारक होगा, उसकी गति ही कालांतर अन्यों को गति प्रदान करेगी। वह आकाश गंगा के किसी भी गुरुत्वाकर्षण बल के द्वारा आकर्षित नहीं होगा अर्थात सब जगह से फिसल जायेगा, सबको भेदता हुआ सर्वत्र सभी परिस्थितियों में अपने आपको सुरक्षित रख लेगा, वह मार गणों को भी मार डालेगा यही है शिव रहस्यम्, यही है मणिद्वीप रहस्यम् जो सम्मुख होते हुए भी असम्मुख है,जो द्वैत होते हुए भी अद्वैत है। जिस दिन वैज्ञानिक इस सम्पूर्ण गोलाई को प्राप्त कर लेंगे उस दिन जीवन अद्भुत होगा एवं जीवन की प्रचलित मान्यताएं, जीवन में प्रचलित चिंतन, जीवन की प्रचलित सोच, जीवन का प्रचलित विज्ञान क्षण भर में बदल जायेगा और देखते ही देखते क्षण के छोटे से हिस्से में जो कुछ वर्तमान में महिमा मण्डित है वे सबके सब कबाड़ खाने में सुशोभित हो जायेंगे, अनुपयोगी हो जायेंगे। यहीं प्रत्यंगिरा का मुख्य लक्षण है कि वह क्षण भर में उपयोगी को अनुपयोगी बना देती है, महान को धूल-धुसरित कर देती है, मान्यताओं को बदल देती है अर्थात उलट देती है।

              हे कृष्ण जब आपने अर्जुन के समक्ष अपना विराट स्वरूप दिखाया तो अग्र भाग में जो कुछ था वह तो अर्जुन देख गये। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण के पृष्ठभाग में क्या था? अब मैं यह बताता हूँ असंख्य असुरगण, असंख्य दैत्य-गण, असंख्य शिवगण, कालिका, भद्रकालिका, वीरभद्र, विषैले सर्प, एक आँख वाले मनुष्य, दुर्दात, दस्यु, परम हिंसक जीव, भूत-प्रेत, पिशाच-गण, डाकिनी शाकिनी, वेताल, कूष्माण्ड, ब्रह्मराक्षस, महान कुकृत्यकारी, महाविध्वंसक, महाषडयंत्रकारी, विप्लव को साक्षात् मूर्तियां, प्रचण्ड उग्रायें, शिव-योगनियाँ इत्यादि-इत्यादि नाना प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से युक्त एवं ब्रह्मा द्वारा रचित अविकसित, त्याजित, खराब हो गई संरचनाएं प्रभु श्रीकृष्ण अपने पृष्ठ भाग में सजोये हुए हैं। अग्र भाग का दर्शन, दायीं तरफ का दर्शन, बायीं तरफ का दर्शन, निचले तरफ का दर्शन, ऊर्ध्वं भाग का दर्शन कुछ अलग है तो वहीं कृष्ण के विराट स्वरूप में उनके पृष्ठ भाग का दर्शन तो अर्जुन कर ही नहीं सके और उनकी आँखें मुंद गईं। प्रत्येक आकाश गंगा के पीछे ब्लैक मैटर चलता है, काला तत्व चलता है जो जब चाहे तब आकाश गंगा को निगल सकता है।

             अनंत व्यास की आकाश गंगा काले तत्व के सीमित व्यास में पता नहीं कहाँ गुम हो जाती है इसलिए हे प्रत्यंगिरा तेरे काले घने बाल तेरे नितम्बों तक लटक रहे हैं, हे योगनियों तुम्हारी जटायें तुम्हारे चरणों तक लटक रही हैं। हे छिन्नमस्ता, हे धूमा, हे कमला, हे शोडषी, हे त्रिपुर सुन्दरी, हे महाकाली, हे दक्षिणकाली, हे मातंगी, हे वल्गा आप सबके घने केश नितम्बों से भी नीचे पहुँच रहे हैं और आपके पृष्ठ को ढँक रहे हैं क्योंकि पीछे बहुत कुछ ऐसा है जो किसी काम का नहीं है, किसी योग्य नहीं है एवं उसे कालिका भक्षण करती हैं। आज से 500 वर्ष पूर्व पृथ्वी पर यह मान्यता  थी कि यह चपटी है फिर एक प्रत्यंगिरा चली और यह मान्यता उलट गई। कालान्तर तथाकथित ज्ञानियों ने कह दिया कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केन्द्र है और समस्त ग्रह-नक्षत्र उसके इर्द-गिर्द घूम रहे हैं फिर गैलेलियो आ गया उसने एक प्रत्यंगिरा चला दी कि पृथ्वी गोल है और देखते ही देखते पूर्व के ग्रंथ जो कि पृथ्वी को चपटा कहते थे कबाड़ खाने की शोभा बन गये। कुछ दिनों बाद एक और ज्ञान रूपी प्रत्यंगिरा चल गई कि पृथ्वी सूर्य के इर्द-गिर्द चक्कर लगाती है बस फिर क्या था? देखते ही देखते वे ग्रंथ, वे विज्ञान, वे वैज्ञानिक, वह दार्शनिक, वे आध्यात्मिक व्यक्तित्व जो कि यह कह रहे थे कि समस्त ब्रह्माण्ड पृथ्वी के इर्द-गिर्द घूमता है सबके सब कबाड़ खाने की शोभा बन गये अर्थात कालिका एवं उनकी उग्राओं का भोज्य बन गये।

           अब वैज्ञानिक कहने लगे हैं कि पृथ्वी गोल नहीं अपितु नारंगी के समान है, इस विज्ञान रूपी प्रत्यंगिरा ने उन सबको कबाड़खाने में डाल दिया जो कि पृथ्वी को गोल कहते थे फिर वैज्ञानिकों ने कहा कि पृथ्वी अपनी धूरी पर कांपती है जो इसे स्थिर मानते थे वे सबके सब कबाड़ खाने के रास्ते की तरफ चल दिए अर्थात कालिका के मुख का ग्रास बन गये। आगे पता नहीं कौन सी ज्ञान रूपी प्रत्यंगिरा चलेगी जो सब कुछ उलट पलट कर रख देती है।

हे प्रत्यंगिरे तू क्रांति की जननी है न जाने कब कैसी क्रांति जीवन के किस क्षेत्र में तू रच दे।एक मिनट लगता है मनुष्य के अंदर क्रांतिकारी परिवर्तन होने में और वह परम नास्तिक से परम आस्तिक बन जाता है,परम भोगी से परम योगी बन जाता ह है, परम अज्ञानी से परम ज्ञानी बन जाता है जरुरत है सिर्फ पलटने की।

कालीदास को हे कालिके तूने पलट दिया महाकवि बन गया,तुलसी दास को हे प्रत्यंगिरे तूने पलट दिया और वह रामचरित मानस रच बैठे, विवेकानंद को हे प्रत्यंगिरे तूने पलट दिया वह मूर्ख तो राम कृष्ण परमहंस के पास बाबू-गिरी की नौकरी मांगने गया था,गिड़गिड़ा कर रामकृष्ण परमहंस से कह रहा था कि गुरुजी कुछ करो ताकि मुझे किसी सरकारी विभाग में बाबू का पद प्राप्त हो जाये पर हे महाकाली स्वरूपिणी प्रत्यंगिरे तूने विवेकानंद को पलट दिया एवं उसका जो स्वरूप बाबू बनने जा रहा था उसे तू खा गई,उसका तू भक्षण कर गई और देखते ही देखते विवेकानंद का प्राकट्य हो गया। हे प्रत्यंगिरे तू वाल्मीकि रूपी डाकू को खा गई और उसमें से महर्षि वाल्मीकि का उदय हो गया। जब-जब तू चलती है, जिसके जीवन में तू चलती है तो तू कभी निष्फल नहीं होती,तू सम्पूर्ण परिवर्तन कर देती है।राजाराम से भगवान राम, कपि से श्री हनुमान,राजा सिद्धार्थ से बुद्ध,महाराजा से महावीर इत्यादि इत्यादि तू बना ही देती है इसलिए चाणक्य ने अपनी शिखा बांध ली थी जिसके कारण बहेलिए में से चंद्रगुप्त च मौर्य का प्राकट्य हो गया।प्रत्यंगिरा वह शक्ति है जो प्रत्यक्ष करती है,प्रत्यक्षीकरण का नाम ही है प्रत्यंगिरा।हे कालिके जब तेरी कृपा होती है तो तू प्रत्यक्ष कर देती है और अप्रत्यक्ष करने वाले सभी तत्वों का सम्पूर्णता के साथ निवारण कर देती है।महायौद्धा अशोक में से धर्म-सम्राट अशोक का उदय हो गया,जिसका तू प्रत्यक्षीकरण करती है उसकी प्रत्यक्ष रूप से रक्षा भी करती है,उसे प्रत्यक्ष रखती है,कोई उसे अप्रत्यक्ष फिर कभी नहीं कर सकता।

पृष्ठ भाग से अग्र भाग की तरफ की यात्रा है प्रत्यंगिरा साधना। हिमाचल प्रदेश में सिरमोर नामक जगह है जहाँ पर भगवती प्रत्यंगिरा का साक्षात् शक्तिपीठ है भंगायणी देवी के रूप में।यहाँ पर देवी जी की गर्दन पीछे की तरफ है अर्थात गर्दन पीठ की तरफ है यह संसार में एकमात्र प्रत्यंगिरा पीठ है पहले यहाँ पशु बलि चलती थी अब नहीं होती। यहाँ पर पुजारी अक्षत देता है जिसका नाम लेकर अक्षत चला दो 15दिन से 20दिन के अंदरयहाँ से महाप्रत्यंगिरा चल पड़ती हैं और शत्रु शमन निश्चित है। बंधु-बांधव,उसके देवी-देवता,उसकई आध्यात्मिक शक्ति सहित सब कुछ कूट पीसकर रख देती हैं,पलट कर रख देती हैं। हिमाचल के लोग बहुत डरते हैं प्रत्यंगिरा शक्ति पीठ पर जाने से एक बड़ी विचित्र कहानी है इस प्रत्यंगिरा शक्ति पीठ की शिरगुल महाराज महादेव नामक एक सिद्ध पुरुष थे एवं वे तंत्र शक्ति में अत्यंत ही पारंगत थे,उस समय दिल्ली में तुर्कों का शासन था।दिल्ली पहुँचकर इन सिद्ध देव पुरुष ने दिल्ली के दरबार में तंत्र शक्ति का अद्भुत प्रदर्शन किया,उन्हें बड़ा काम का समझकर तुर्की शासन ने चमड़े की जंजीरों से उन्हें बांधकर कारावास में रख दिया।इनके एक मित्र थे गोगा पीर जो कि राजस्थान में निवास करते थे वे भी बहुत सिद्ध पुरुष थे।

कारावास में बंद हिमाचल के उस सिद्ध पुरुष ने कौए के माध्यम से अपनी सहायता हेतु गोगा पीर के पास संदेश भेजा उस समय गोगा पीर भोजन कर रहे थे परन्तु संदेश मिलते ही वे भोजन अधूरा छोड़कर अपने मित्र की सहायता हेतु दिल्ली चले गए गोगा पीर एवं हिमाचल के सिद्ध पुरुष दोनों गुरु भाई थे और गुरु गोरखनाथ की सिद्ध-श्रृंखला में दीक्षित थे।कहाँ ढूंदू मैं अपने मित्र को?दिल्ली में गोगा पीर चिंतित हो रहे थे। उन्होंने तुरंत प्रत्यंगिरा का ध्यान किया तभी अचानक उनकी मुलाकात उस अति रूपवान, अति सौन्दर्यवान 19 वर्षीया स्त्री से हो गई जो कि मुगलों के कारावास में साफ-सफाई एवं झाड़ू लगाने का कार्य करती थी।गोगा पीर ने उससे मदद मांगी,उसने कहा जहाँ तुम्हारा मित्र बंद है। वहाँ मैं तीन बार झाड़ पटक दूंगी और तुम इशारे से समझ जाना कि यहाँ तुम्हारा मित्र बंद है ठीक ऐसा ही हुआ और गोगा पीर अपने मित्र को छुड़ाकर चल पड़े एवं साथ में वह स्त्री भी चल पड़ी।तीनों मुगल सेना से बचते हुए सिरमोर आ गये। एक रात्रि तीनों ने यहाँ पर निवास किया इसके बाद पता नहीं अचानक क्या हुआ अर्थात प्रत्यंगिरा चल पड़ीं और वह स्त्री सिद्ध स्वरूप में आ गई। उसे वरदान प्राप्त हुआ कि जो कोई भी जैसी भी इच्छा लेकर तुम्हारे पास आये उसे पूर्ण कर देना। सही-गलत, नैतिक-अनैतिक इनसे आप परे हो,सब कुछ उलट पुलटकर रख देना।यह अति चैतन्य शक्तिपीठ है एवं यहाँ पर बिल्ली के रूप में भैरवी भगवती के आगे सदा विराजमान रहती हैं।
शिव शासनत: शिव शासनत: