Follow us for Latest Update

छठ व्रत कथा ।।

मार्कण्डेय पुराण में इस बात का उल्लेख मिलता है कि सृष्टि की अधिष्ठात्री प्रकृति देवी ने अपने आप को छह भागों में विभाजित किया है और इनके छठे अंश को सर्वश्रेष्ठ मातृ देवी के रूप में जाना जाता है, जो ब्रह्मा की मानस पुत्री और बच्चों की रक्षा करने वाली देवी हैं. कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को इन्हीं देवी की पूजा की जाती है. शिशु के जन्म के छह दिनों के बाद भी इन्हीं देवी की पूजा करके बच्चे के स्वस्थ, सफल और दीर्घ आयु की प्रार्थना की जाती है. पुराणों में इन्हीं देवी का नाम कात्यायनी मिलता है, जिनकी नवरात्र की षष्ठी तिथि को पूजा की जाती है.
  

छठ व्रत की परंपरा सदियों से चली आ रही है. यह परंपरा कैसे शुरू हुई, इस संदर्भ में एक कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है. इसके अनुसार प्रियव्रत नामक एक राजा की कोई संतान नहीं थी संतान प्राप्ति के लिए महर्षि कश्यप ने उन्हे पुत्रयेष्टि यज्ञ करने का परामर्श दिया. यज्ञ के फलस्वरूप महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, किंतु वह शिशु मृत था. इस समाचार से पूरे नगर में शोक व्याप्त हो गया. तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी. आकाश से एक ज्योतिर्मय विमान धरती पर उतरा और उसमें बैठी देवी ने कहा, 'मैं षष्ठी देवी और विश्व के समस्त बालकों की रक्षिका हूं.' इतना कहकर देवी ने शिशु के मृत शरीर का स्पर्श किया, जिससे वह बालक जीवित हो उठा. इसके बाद से ही राजा ने अपने राज्य में यह त्योहार मनाने की घोषणा कर दी. 

दूसरी छठ व्रत कथा 

पौराणिक मान्यता के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी के सूर्यास्त और सप्तमी के सूर्योदय के मध्य वेदमाता गायत्री का जन्म हुआ था. प्रकृति के षष्ठ अंश से उत्पन्न षष्ठी माता बालकों की रक्षा करने वाले विष्णु भगवान द्वारा रची माया हैं. बालक के जन्म के छठे दिन छठी मैया की पूजा-अर्चना की जाती है, जिससे बच्चे के ग्रह-गोचर शांत हो जाएं और जिंदगी मे किसी प्रकार का कष्ट नहीं आए. अत: इस तिथि को षष्ठी देवी का व्रत होने लगा. 

हिन्दुओं के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक छठ वर्ष में दो बार मनाया जाता है- पहली बार चैती छठ और दूसरी बार कार्तिकी छठ। चैती छठ पूजा चैत्र शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है और वहीं कार्तिकी छठ पूजा कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाता है। इस पूजा में छठ माता की अराधना और सूर्य को अर्घ देने का विशेष महत्व है। बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश के अलावा देश के अन्य हिस्सों के साथ इसे नेपाल, मॉरीशस एवं अन्य देशों में भी उत्साह पूर्वक मनाया जाता है। 

छठ चार दिनों तक चलने वाला त्योहार है। इसकी शुरुआत नहाय-खाय से होती है। इस दिन गंगा के पवित्र जल से स्नान कर के खाना बनाया जाता है। इस दिन चने की दाल, लौकी की सब्जी और रोटी का सेवन किया जाता है। नहाय-खाय के बाद खाने में नमक का प्रयोग नहीं किया जाता है। दूसरे दिन को खरना के नाम से जाना जाता है। खरना के दिन व्रत करने वाले लोग प्रसाद बनाते हैं। खरना के प्रसाद में खीर बनाई जाती है। इस खीर में चीनी की जगह गुड़ का प्रयोग किया जाता है। शाम को पूजा के बाद इस प्रसाद को ग्रहण करते हैं। प्रसाद खाने के बाद निर्जला व्रत शुरू होता है। तीसरे दिन नदी किनारे छठ माता की पूजा की जाती है। पूजा के बाद डूबते हुए सूर्य को गाय के दूध और जल से अर्घ दिया जाता है। इसके साथ ही छठ का विशेष प्रसाद ठेकुआ और फल चढ़ाया जाता है। इस त्योहार के आखिरी दिन सूर्य के उगते ही सभी के चेहरे खिल उठते हैं। व्रत करने वाले पुरुष और महिलाओं के द्वारा उगते हुए सूर्य को अर्घ दिया जाता है। सूर्य को अर्घ देने के बाद व्रत करने वाले लोग प्रसाद खा कर अपना व्रत खोलते हैं। इसके बाद सभी लोगों में प्रसाद बांट कर पूजा संपन्न की जाती है। 
                                      साभार

दीपावली पर सम्पन्न किये जाने वाले अन्य पूजन ।।


   भगवती लक्ष्मी की कृपा की आवश्यकता किसे नहीं होती यह बात अलग है कि लक्ष्मी (धन) की प्राप्ति के साधन (श्रोत) अलग-अलग होते हैं। व्यापारी अपने व्यापार या सूद में रुपया देकर लक्ष्मी प्राप्त करते हैं तो लेखक अपनी लेखनी के दम पर ही नई-नई रचनाओं का सृजन कर अपनी जीविका चलाते हैं। दीपावली पर धनाधीश कुबेर का भी पूजन होता है। आपका जो भी व्यवसाय हो और आपकी आय का जो भी श्रोत हो जिसमें आप अपनी आय व्यय का हिसाब | रखते हों जैसे बहीखाता आदि या जिस तराजू से अन्य सामग्री का व्यापार करते हों उसे जल छिड़ककर पवित्र करें अपने सम्मुख आसन पर अपना बहीखाता लेखनी आदि स्थापित करें और स्वयं पवित्र होकर धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से उसका पूजन करें विभिन्न पूजनों के प्रयुक्त मंत्र क्रमश: निम्नानुसार हैं-

बहीखाता पूजन

याकुन्देन्दु तुषारहार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता । 
या वीणा वरदण्डमण्डित करा या श्वेत पद्मासना ।। 
या ब्रह्माच्युत शङ्कर प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता । 
सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेष जाड्यापहा ।।

लेखनी पूजन

लेखनी निर्मितां पूर्वं ब्रह्मणा परमेष्ठिना, लोकानां च हितार्थाय तस्मात्तां पूजयाम्यहम्। 
लेखन्यै ते नमस्तेऽस्तु लाभकर्त्यै नमो नमः ॥ 
पुस्तके चर्चिता देवी सर्वं विद्यान्नदाभव । 
मद्गृहे धनधान्यादि समृद्धिं कुरु सर्वदा ॥ 
कृष्णानने कृष्णजिह्वे चित्रगुप्तकर स्थिते । 
पुष्पांजलि गृहाणत्वं सदैव वरदाभाव ॥

कुबेर प्रार्थना

देविप्रियश्च नाथस्य कोषाध्यक्ष महामते । 
घ्यायेऽहं प्रभुं श्रेष्ठंकुबेरं धनदायकम् ॥ 
क्षमस्व मम दौरात्म्यं कृपासिन्धो सुरप्रियः । 
धनदोऽसि धनं देहि अपराधांश्च नाशय ।। 
महाराज कुबेर त्वं भूयो भूयो नमाम्यहम् । 
दीनोपि च दया यस्य जायतुं वै महाधनः ॥

तुला पूजन

त्वं तुले सर्वदेवानां प्रमाणामिह कीर्तिता। 
अतस्त्वां पूजयिष्यामि धर्मार्थं सुख हेतवे ॥ 
पदार्थ मानसिद्धयर्थे ब्रह्मणा कल्पिता पुरा । 
तुलनामेति कथितां संख्या रूपामुपास्महे ॥

तिजोरी पूजन

धनदाय नमस्तुभ्यं निधि पद्मधिपाय च । 
भवन्तु त्वत्प्रदानं मे धन धान्यादि सम्पदा ॥ 
कुबेराय नमस्तुभ्यं नानाभाण्डार संस्थिता ।
 यत्र लक्ष्मीभवेद्देवि धनं चिह्न नमोऽस्तुते ॥

मानदण्ड पूजन
ब्रह्मदण्डं त्वमेवासि ब्रह्मणा निर्मितं च तत् । 
तस्मात्सव तत्पदे तुभ्यं मानदण्ड नमोऽस्तुते ।। 

अन्योन्य पूजन 
त्वमेव सर्वभूतानां साक्षि भूतं च वस्त्वसि । 
तस्मात् तुभ्यं नमः सद्यो ब्रह्माविष्णु शिवात्मकम् ॥.

श्री कालीका षोडशोपचार पुजन ।।

         षोडशोपचार पूजन का अर्थ है जल, दुग्ध, मधु, दही एवं घृत से स्नान, पुष्प, अक्षत, धूप, दीप नैवेद्य आदि 16 प्रकार से अपने ईष्ट देवी देवता का पूजन भगवती महाकाली का स्वरूप विकराल एवं तेजस्वी है। वे दुष्टों पर अत्यधिक क्रोधित होकर उनका सहार करती हैं तो वहीं अपने भक्तो के प्रति उनमे आपर दया व करुणा भाव है। माँ   
काली के भक्तों का कभी अमंगल हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवती काली की एक हुंकार मात्र से आसुरी शक्तियाँ नष्ट हो जाती हैं। 

पूजन विधि
साधक सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर पवित्र आसन पर बैठे अपने सम्मुख किसी चौकी पर भगवती काली की प्रतिमा या यंत्र स्थापित करें यह ध्यान रहे कि प्रतिमा जिस आसन पर स्थापित हो वह साधक की नाभि से ऊंचा हो अर्थात आसन पर बैठने के बाद साधक का नाभि स्थल जिस ऊंचाई पर हो देवी प्रतिमा उससे ऊंची हो ।पहले पवित्रीकरण, आचमन, गणेश वंदना एवं गुरु वंदना करें उसके बाद मूर्ति स्थापना के बाद दोनों हाथ जोड़कर निम्न श्लोकों का उच्चारण करें। 

ॐ कराल वदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् । 
आद्यं कालिकां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ॥ 
सद्यश्छिन्न शिरः खड्ग वामोर्ध्व कराम्बुजाम् । 
महामेघप्रभां कालिकां तथा चैव दिगम्बराम् ॥कण्ठावसक्तमुण्डाली गलटुधिर चर्चिताम् । कर्णावतंसतानीत शव युग्म भयानकाम् ॥ 
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत पयोधराम् । 
शवानां करसंघाते कृतकांची हसन्मुखीम् ॥ 
सुक्कद्वय गलदक्त धारा विस्फुरिताननाम् । 
घोररावां महारौद्री श्मशानालय वासिनीम् ॥ 
बालार्क मण्डलाकारां लोचन त्रितयान्विताम् । 
दन्नुरां दक्षिण व्यापि मुक्तालबिकचोच्चयाम् ॥ 
शव रूप महादेव हृदयोपरि संस्थिताम् । 
शिवाभिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ॥ 
महाकालेन् च समं विपरीत रतातुराम् । 
सुख प्रसन्न वदनां स्मेराननसरोरुहाम् ॥

अब दोनो हाथों में पुष्प उठाकर निम्न मंत्र का उच्चारण 

ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते । 
यावत्त्वां पूजयिष्यामि तावद्देवि स्थिरा भव ॥

अब पुष्प भगवती प्रतिमा पर अर्पित कर दें फिर दोनो हाथों में पुष्पांजलि लेकर निम्न श्लोकों का उच्चारण करें और अतं मे पुष्पांजलि देवी के दाहिने भाग में डाल दें।

ॐ महाकालं यजेद देव्या दक्षिणे धूम्रवर्णकम् । 
विभ्रतं दण्डखट्वांगी दष्ट्रा भीम मुखं शिवम् ॥ 
व्याघ्र चर्मावृतकटिं तुन्दिलं रक्त वाससम् । 
त्रिनेत्र मूद्धर्वकेशंच मुण्डमाला विभूषिताम् ॥ 
जटाभीषण सच्चन्द्र खण्डं तेजो जवलन्निव ।
ॐ हूँ स्फ्रौं यां रां लां वां क्रौं महाकाल भैरव सर्व विघ्नन्नाशय नाशय ह्रीं श्रीं फट् स्वाहा ।।

अपने हाथों मे छः पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें और पुष्प प्रतिमा पर चढ़ा दें -

स्वागतं ते महामाये चण्डिके सर्वमंगले । 
पूजा गृहाण विविधां सर्वकल्याण कारिणी ॥

अब दाहिने हाथ में एक पुष्प उठाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी प्रतिमा पर डाल दें -

ॐ देवेशि भक्ति सुलभे परिवार समन्विते । 
यावत्वां पूजाविष्यामि तावत्वं सुस्थिरा भव ॥

आसन
हाथ में पाँच पुष्प लेकर आसन के रूप में देवी प्रतिमा के चरणों पर रखें, निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ आसनं भास्वरं तुंगं मागल्यं सर्वमंगले । 
भजस्व जगतां मातः प्रसीद जगदीश्वरी ॥ 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा आसनं समर्पयामि)

पाद्य
आचमनीं अथवा किसी अन्य पात्र मे जल लेकर उसमे दूर्बा, कमल तथा अपराजिता के पुष्प पत्रादि डालकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुऐ भगवती काली को अर्पित करें - 

ॐ गंगादि सलिलाधारं तीर्थ मन्त्राभिमन्त्रिम् । 
दूर यात्रा भ्रम हरं पाद्यं तत्प्रति गृह्यताम ।।** 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा पाद्यं समर्पयामि )

उद्वर्तन
नाना प्रकार के सुगन्धित द्रव्य, इत्रादि, तेल तथा तिल से उद्वर्तन बनाकर निम्न मंत्रोच्चार करते हुये देवी को अर्पित करें 

ॐ तिल तेल समायुक्तं सुगन्धित द्रव्य निर्मितम् । उद्वर्तनमिंदं देवि गृहाण त्वं प्रसीद में ॥ 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा)

अर्ध्य
किसी पात्र में जल लेकर उसमे पुष्प, अक्षत, दूब, तिल, कुशा का अग्रभाग और सफेद सरसों मिलाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते देवी को अर्पित करें 

ॐ तिल तण्डुल संयुक्तं कुश पुष्प समन्वितम् । 
सुगन्धं फल सयुक्तंमर्ध्य देवि गृहाण मे ॥ 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा )

आचमन
अब आचमनी मे जल लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को आचमनी दें। जल में जायफल, लवंग तथा कंकोल का चूर्ण मिला लें तो उत्तम है -

ॐ स्नानादिक विधायापि यतः शुद्धिरवाप्यते । 
इदं आचमनीयं हि कालिके देवि प्रगृहाताम् । 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा आचमनीयं निवेदयामि)

स्नान
किसी पात्र में स्वच्छ जल लेकर उसमें इत्र केशर आदि मिला लें फिर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को स्नान करायें - 

ॐ रखमापः पृथिवी चैव ज्योतिषं वायुरेव च ।
लोक संस्मृति मात्रेण वारिणा स्नापयाम्यहम् ॥ 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि स्वाहा स्नानं निवेदयामि)

मधुपर्क
किसी कांसे के पात्र मे शुद्ध घी, दही एवं मधु (शहद) तीनो को मिलाकर देवी को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ मधुपर्क महादेव ब्रह्माघेः कल्पितं तव । 
मया निवेदितं भक्त्या गृहाण् गिरि पुत्रिके ॥ 
(ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरी स्वाहा मधुपर्क समर्पयामि) 

मधुपर्क अर्पित करने के पश्चात पुनः आचमन करायें । निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ स्नानादिकं पुरः कृत्वा पुनः शुद्धिरवाप्यते । पुनराचमनीयं च कालिके देवि प्रगृह्यताम ।।
 ( पुनराचमनीयं समर्पयामि ) 

चन्दन
 निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को चन्दन अर्पित करें 

ॐ मलयांचल सम्भूतं नाना गंध समन्वितम् । शीतलं बहुलामोदं चन्दनम् गृह्यतामिदम्।।
 (चन्दनम् निवेदयामि )

रक्त चन्दन 
रक्त चन्दन देवी को अत्यन्त प्रिय है अतः निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये रक्त चन्दन अर्पित करें - 

ॐ रक्तानुलेपनम् देवि स्वयं देव्या प्रकाशितम् । 
तद गृहाण महाभागे शुभं देहि नमोऽस्तुते ॥ 
(रक्त चन्दनम् निवेदयामि)

सिन्दूर
 निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को सिन्दूर अर्पित करे
ॐ सिन्दूरं सर्वसाध्वीनां भूषणाय विनिर्मितम् । 
गृहरण वर दे देवि भूषणानि प्रयच्छ में ॥ 
(सिन्दूरम् समर्पयामि ) 

कुंकुम 
 निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को कुंकुम अर्पित करे

ॐ जपापुष्पप्रभं रम्यं नारी भात विभूषणम् । 
भास्वरं कुंकुमं रक्तं देवि दत्तं प्रगृह्म में ॥ 
( कुंकुम् समर्पयामि)

अक्षत
हाँथ मे अक्षत लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें तत्पश्चात् अक्षत देवी को अर्पित कर दें 

ॐ अक्षतं धान्यजं देवि ब्रह्मणा निर्मितं पुरा । 
प्राणंद सर्वभूतानां गृहाण वर दे शुभे ॥
(अक्षतं समर्पयामि)

पुष्प

हाथ मे पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करें फिर पुष्प देवी के चरणों में अर्पित कर दें - 

ॐ चलत्परिमलामोदमत्तालि गण संकुलम् । आनन्दनन्दनोदभूतं कालिकायै कुसुमं नमः ॥ 
( पुष्पं समर्पयामि )

विल्वपत्र
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को बिल्व पत्र अर्पित करें -
ॐ अमृतोदभवं श्रीवृक्षं शंकरस्य सदाप्रियम् । 
पवित्रं ते प्रयच्छामि सर्व कार्यार्थ सिद्धये ॥ 
( विल्वपत्रम् समर्पयामि )

माला
सुगन्धित पुष्पों (यथासम्भव रक्त पुष्प) की माला बनाकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को अर्पित करें - 

ॐ नाना पुष्प विचित्राढ्यां पुष्प मालां सुशोभनाम् । प्रयच्छामि सदा भद्रे गृहाण परमेश्वरि ॥ 
( माल्यम् समर्पयामि )

वस्त्र
देवी को दो वस्त्र अर्पित करना चाहिये। ध्यान रहे कि वस्त्र की लम्बाई चौड़ाई बारह अंगुल से कम कदापि न हो तथा वस्त्र नया हो। क्रमशः निम्न मंत्रो का उच्चारण करते हुये दोनो वस्त्र अर्पित करें 

ॐ तन्तु सन्तानसंयुक्तं कला कौशल कल्पितं । सर्वांगाभरण श्रेष्ठं वसनं परिधीयताम् ।। 
( प्रथम वस्त्रं समर्पयामि) 
ॐ यामाश्रित्य महादेवी जगत्संहारकः सदा । 
तस्यै ते परमेशान्यै कल्पयाम्युत्तरीयकम् ॥ 
(द्वितीय वस्त्रं समर्पयामि) 
धूप 
धूप जला लें तथा उसे कांस्य पात्र में रखकर देवी की नासिका के पास कुछ देर स्थिर रखें तत्पश्चात् नीचे रख दें निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ गुग्गुलं घृत संयुक्तं नाना भक्ष्यैश्च संयुतम् । 
दशांग गृसतां धूपं कालिके देवि नमोऽस्तुते ॥ 
 ( धूपं समर्पयामि ) 

दीप
कपास की बत्ती में कपूर का चूर्ण मिलाकर शुद्ध घी का दीपक जलायें । बत्ती की लम्बाई कम से कम चार अंगुल होनी चाहिये । दीपक हाथ मे लेकर देवी को दिखायें । निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ मार्तण्ड मण्डलान्तस्य चन्द्र बिम्बाग्नि तेजसाम् । निधानं देवि कालिके दीपोऽयं निर्मितस्तव भक्तितः ॥ 
(दीपं दर्शयामि)

इत्र 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये इत्रादि सुगन्धित द्रव्य देवी को अर्पित करें। - 

ॐ परमानन्द सौरभ्यं परिपूर्ण दिगम्बरम् । 
गृहाण सौरभं दिव्यं कृपया जगदम्बिके ।। 
(सुगन्धितं द्रव्यं समर्पयामि )

कपूर दीप 
एक दीपक में कपूर रखकर दीप के भाँति जलाकर देवी के समक्ष घुमायें। बाद में रख दें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें -

 ॐ त्वं चन्द्र सूर्य ज्योतिषिं विद्युदग्न्योस्तथैव च । त्वमेव जगतां ज्योतिदीपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
(कर्पूर दीपं समर्पयामि )

नैवेद्य 
नैवेद्य पात्र मे कम से कम एक व्यक्ति के आहार योग्य नाना प्रकार के पकवान रखकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुऐ देवी को समर्पित कर दें 
ॐ दिव्यान्नरस संयुक्तं नानाभक्ष्यैस्तु संयुतम् । 
चौष्यपेय समायुक्तमन्नं देवि गृहाण मे ॥ 
(नैवेद्यं समर्पयामि )

खीर
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को खीर अर्पित करे

ॐ गव्यसर्पि पयोयुक्तं नाना मधुर मिश्रितम् । 
निवेदितं मया भक्त्या परमान्नं प्रगृहाताम् ॥ 
(पायसम् समर्पयामि )

मोदक
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को मोदक (लड्डू) अर्पित करें 

ॐ मोदकं स्वादु रुचिरं कर्पूरादिभिरन्वितम् । मिश्रनानाविधैर्दव्ये प्रति गृह्माशु भुज्यताम् ॥ 
(मोदकं समर्पयामि)

फल
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवा को विविध फल अर्पित करें 

ॐ फल मूलानि सर्वाणि ग्राम्यांऽरण्यानि यानि च ।
 विधि सुगन्धीनि गृहाण देवि ममाचिरम् ॥** 
( फलमूलानि समर्पयामि)

जल
एक गिलास स्वस्छ जल में केवड़ा, कपूर आदि सुगन्धित चीजें मिलाकर देवी को अर्पित करें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ पानीयं शीतलं स्वच्छं कर्पूरादि सुवासितम् । 
भोजने तृप्तिकृद्यस्मात् कृपया प्रतिगृह्णताम् ॥ 
(पानीयं समर्पयामि) 
अब एक कटोरे में सुवासित जल भरकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को अर्पित करें 

ॐ कर्पूरादीनि द्रव्याणि सुगन्धीनि महेश्वरि । 
गृहाण जगतां नाथे करोद्वर्तन हेतवे । 
(करोद्वर्तनजलं समर्पयामि) 

आचमन 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को आचमनी दें 

ॐ अमोदवस्तु सुरभीकृतमेतदनुत्तमम् । 
गृहाणाचमनीयं त्वं मया भक्त्या निवेदितम् ।।
 (आचमनीयं समर्पयामि) 

ताम्बूल 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को सुगन्धित मीठा पान अर्पित करें 

ॐ पूंगीफलं महाद्दिव्यं नागवल्ली दलैर्युतम् । 
कर्पूरैलास समायुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् ॥
 (ताम्बूलं समर्पयामि ) 

काजल 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को काजल अर्पित करें

ॐ स्निग्धमुष्णं हृद्यतमं दृशां शोभाकरं तव । गृहीत्वा कज्जलं सघो नेत्राण्यंजय कालिके । 
(कज्जलम् समर्पयामि) 

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को सुर्मा (अंजन) अर्पित करें - 

ॐ नेत्रत्रयं महामाये भूषयामल कज्जलैः । 
सुसी दिव्यैर्जगदम्व नमोऽस्तुते ॥ 
(सोवीरांजनम् समर्पयामि )

महावर

निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को महावर अर्पित करें - 

ॐ त्वत्पदाम्भोजनखर घुतिकारि मनोहरम् । अलक्तकमिदं देवि मया दत्तं प्रगृह्यताम् ।। 
( अलक्ततम् समर्पयामि)

चामर 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को चामर अर्पित 

ॐ चामरं चमरी पुच्छं हेमदण्ड समन्वितम् । 
मयार्पितं राजचिह्नं चामरं प्रतिगृह्यताम् ।। 
( चामरं समर्पयामि)

व्यंजन
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को व्यंजन अर्पित करें।

ॐ वर्हिवहं कृताकारं मध्य दण्ड समन्वितम् । गृतां व्यंजनं कालिके देहस्वेदापनुक्तये ॥ 
(व्यजनं समर्पयामि)

घण्टा वाद्यम्
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये घण्टा (वाद्य यंत्र) बजायें और देवी को अर्पित कर दें 

ॐ यथा भीषयसे देत्यान् यथा पूरवसेऽसुरम् । तां घण्टां सम्प्रयच्छामि महिषध्नि प्रसीद में ।। 
( घण्टावाद्यम समर्पयामि)

दक्षिणा 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को द्रव्य दक्षिणा (स्वर्ण, रजत, मुद्रा आदि) अर्पित करें 

ॐ कांचनं रजतोपेतं नानारत्न समन्वितम् । 
दक्षिणार्थं च देवेशि गृहाण त्वं नमोऽस्तुते ॥ 
(दक्षिणाम् समर्पयामि) 

पुष्पांजलि 
दोनों हाथों में पुष्प लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी को पुष्पांजलि अर्पित करें 

ॐ काली काली महाकाली कालिके पाप नाशिनी । काली कराली निष्क्रांते कालिके तवन्नमोऽस्तुते ॥ 
ॐ उत्तिष्ठ देवि चामुण्डे शुभां पूजां प्रगृह्य मे । 
कुरुष्व मम कल्याणमष्टाभि शक्तिभि सह ॥ 
भूत प्रेत पिशाचेभ्यो रक्षोभ्यश्च महेश्वरि ।
देवेभ्यो मानुषेभ्योश्च भवेभ्यो रक्ष मा सदर।।
 सर्वदेवमयी देवीं सर्व रोगभयापहाम् । 
ब्रह्मेश विष्णु नमितां प्रणमामि सदा उमाम् ॥
आयुर्ददातुं मे काली पुत्रानादि सदा शिवा । 
अर्थ कामो महामाया विभवं सर्व मङ्गला ॥ 
ह्रीं श्रीं क्रीं परमेश्वरि पुष्पांजलिम् समर्पयामि ॥

नीराजन 
दीप प्रज्वलित कर दाहिने हाथ में दीप लेकर घण्टा बजाते हुये देवी की आरती करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें 

ॐ कर्पूरवर्ति संयुक्तं वह्निना दीपितंचयत् । 
नीराजनं च देवेशि गृह्यतां जगदम्बिके ।।

क्षमा प्रार्थना
 
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये देवी से क्षमा याचना करें।

ॐ प्रार्थयामि महामाये यत्किचिंत स्खलितं मम् । 
क्षम्यतां तज्जगन्मातः कालिके देवि नमोऽस्तुते ॥ 
ॐ विधिहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं वदर्चितम् । 
पूर्णम्भवतु तत्सर्वं त्वत्प्रसादान्महेश्वरि ॥ 
शक्नुवन्ति न ते पूजां कर्तुं ब्रह्मदयः सुराः । 
अहं किं वा करिष्यामि मृत्युर्धर्मा नरोऽल्पधीः ॥ 
न जानेऽहं स्वरूप ते न शरीरं न वा गुणान् । 
एकामेव ही जानामि भक्ति त्वच्चरणाब्जयोः ॥

               ॥ श्री काली जी की आरती ॥
मंगल की सेवा सुन मेरी देवा, हाथ जोड़ तेरे द्वार खड़े। 
पान सुपारी ध्वजा नारियल, ले ज्वाला तेरी भेंट घरे ॥ 
सुन जगदम्बा ! कर न विलम्बा, सन्तन केभण्डार भरे । संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जे काली कल्याण करे ।। बुद्धिविधा तू जगमाता, मेरा कारज सिद्ध करे । 
चरण कमल का लिया आसरा, शरण तम्हारी आन परे ॥ जब जब भीर पड़ी भक्तन पर, तब तब ऑय सहाय करे । संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जै काली कल्याण करे ।। बार बार तैं सब जग मोह्यो, तरुणी रूप अनूप धरे । 
माता होकर पुत्र खिलावे, कहीं भार्या हो भोग करे ॥ 
संतन सुखदाई सदा सहाई, सन्त खड़े जयकार करे । 
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जे काली कल्याण करे।।
ब्रह्मा विष्णु महेश सहसफन, लिए भेंट तेरे द्वार खड़े । अटल सिंहासन बैठी माता, सिर सोने का छत्र घरे ॥ 
हुए शनिश्चर कुंकुमवरणी, जबलांगुर पर हुकुम करे । 
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जे काली कल्याण करे ॥ 
कुपित होई कर दानव मारे, चण्ड मुण्ड सब चूर करे । खड्ग त्रिशूर, रक्तबीज को भस्म करें ।। 
शुम्भ निशुम्भ पछाड़े माता, महिषासुर को पकड़ दरे । प्रतिपादखुशाली, जै काली कल्याण करे ॥ 
जब तुम दयारूप को धारो पल में संकट दूर करे । आदितवार आदि का राजत, अपने जन का कष्ट हरे ।। सौम्यस्वभाव धरा मेरी माता, जन की अरज कबूल करे ।
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जैकाली कल्याण करे॥ सिंह पीठ पर चढ़ी भवानी, अटल भवन में राज करे। 
दर्शन पावें मंगल गावे, सिद्ध सधु चर भेंट घरे ॥ 
ध्यान धरत ही श्री काली को, चार पदारथ हाथ परे । 
संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जे काली कल्याण करे ॥ ब्रह्मा वेद पढ़ें तेरे द्वारे, शिवशंकर जी ध्यान धरें। 
इन्द्र कृष्ण तेरी करें आरती, चैवर कुबेर डुलाय करे ॥ 
जय जननी जय मातु भवानी, अचल भवन में राज करे। संतन प्रतिपाली सदा खुशाली, जे काली कल्याण करे ।।

उपरोक्तानुसार पूजन समाप्त कर प्रसाद वितरित करें तथा स्वयं भी प्रसाद गृहण करें। अगले दिन पूजन सामग्री को नदी या सरोवर में विसर्जित कर दें।
                           
शिव शासनत: शिव शासनत:


शास्त्रोक्त महालक्ष्मी पूजन ।।

      भगवती महालक्ष्मी समस्त चल और अचल सम्पत्तियों सिद्धियों एवं निधियों की अधिष्ठात्री देवी हैं उनकी कृपा के बिना जीवन में सुख व ऐश्वर्य सम्भव नहीं है। देवों में प्रथम आराध्य विघ्नहर्ता श्री गणेश व महालक्ष्मी का पूजन साधक को सफल तथा समृद्ध बनाता है। भगवती महालक्ष्मी की आराधना का यद्यपि कोई निश्चित दिन या तिथि निश्चित नहीं है किन्तु 'दीपावली' पर की गयी पूजा अर्चना विशेष फलदायी होती है। वैसे तो जीवन में हमें पग-पग पर लक्ष्मी (अर्थ) की आवश्यकता होती है इसलिये यदि व्यापार व्यवसाय में लाभन हो रहा हो तथा किसी प्रकार का आर्थिक संकट हो तो किसी भी शुभ तिथि पर पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ भगवती महालक्ष्मी की आराधना करने से निश्चय ही सफलता मिलती है।

        दरिद्र (निर्धन) व्यक्ति की संसार में कहीं भी प्रतिष्ठा नहीं होती। जिसके घर में लक्ष्मी नहीं होती वह सदैव दुःखी व परेशान रहता है जो कर्ज के बोझ से दबा हुआ है उससे ज्यादा दयनीय और दुःखी व्यक्ति कोई नहीं हो सकता। कुछ लोगों का मानना है कि परिश्रम से लक्ष्मी प्राप्त होती है किन्तु यह धारणा स्वयं में पूर्ण नहीं है। परिश्रम करके कुछ मात्रा में धन तो कमाया जा सकता है किन्तु जीवन में पूर्ण सौभाग्य, सुख और ऐश्वर्य प्राप्त नहीं हो सकता। यदि कोई मनुष्य यह समझता है कि व्यर्थ प्रयत्न और कुचक्र रचने से, छल-कपट व असत्य का सहारा लेने से घर में लक्ष्मी का स्थायित्व हो जायेगा तो यह उसकी भूल है। कुल मिलाकर विभिन्न साधनाओं व प्रयोगों के द्वारा ही घर में लक्ष्मी की स्थापना सम्भव है।

            महालक्ष्मी का पूजन साधक को पूर्ण मनोयोग, श्रद्धा व विश्वास के साथ करना चाहिये। महालक्ष्मी का पूजन रात्रि के समय करना श्रेष्ठ फलदायक है। शास्त्रों के अनुसार स्थिर लग्न (वृषभ या सिंह) में महालक्ष्मी का पूजन करने से स्थिरता, सुख, समृद्धि तथा धन धान्य की प्राप्ति होती है। साधक को चाहिये कि वह पूजन आरम्भ करने से पूर्व पूजन के लिये आवश्यक समस्त सामग्री अक्षत, मौली, कुकुम, गुलाल, लौंग, इलायची, नारियल, सिन्दूर, दीपक, अगरबत्ती, रुई, माचिस, पंचामृत, यज्ञोपवीत, पंचमेवा, जल, कलश, फल, चन्दन, पान, सुपारी, सरसों, कपूर, पीला वस्त्र, कमल के फूल, इत्र, काली मिर्च, दूध तथा महालक्ष्मी के श्रृंगार हेतु आवश्यक सामग्री अपने पास रख लें।

          सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर पूजा स्थल में शुद्ध आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठ जायें। अपने सम्मुख किसी चौकी पर पीला वस्त्र बिछाकर उस पर महालक्ष्मी की मूर्ति या चित्र स्थापित करें । मूर्ति के समीप ही प्राण प्रतिष्ठा युक्त श्री यंत्र व कुबेर यंत्र स्थापित करें। धूप, अगरबत्ती आदि जला दें ताकि वातावरण शुद्ध रहे।

पवित्रीकरण
पंचपात्र में रखा हुआ जल बायें हाथ में लेकर दाहिने हाथ से अपने पर छिड़कें। निम्न मंत्र का उच्चारण करें

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । 
यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं स बाह्माभ्यन्तर शुचिः ।।

आचमन
आचमनी में जल लेकर क्रमश: निम्न मंत्रोच्चार करते हुये तीन बार जल पियें।

ॐ केशवाय नमः 
ॐ माधवाय नमः 
ॐ नारायणाय नमः 
अब हाथ धो लें, फिर हाथ में जल लेकर निम्न संकल्प मंत्र का उच्चारण करें

संकल्प

ॐ विष्णुर्विष्णु र्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य श्री ब्राह्मणोऽन्हि द्वितीय परार्ट्रे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बू दीपे भरतखण्डे आर्यावर्तक देशे अमुक मासे, अमुक तिर्थो, अमुक वासरे, अमुक गोत्रोत्पन्न: अमुक शर्माऽहं (अमुक के स्थान पर क्रमशः माह, तिथि, दिन, गोत्र तथा अपना नाम बोलें) स्थिर लक्ष्मी प्राप्त्यर्थं श्री महालक्ष्मी प्राप्त्यर्थं सर्वारिष्ट निवृत्ति पूर्वक व्यापारे लाभार्थ च महालक्ष्मी पूजनं करिष्ये ।
(अब जल को भूमि पर छोड़ दें )

गणपति पूजन
सर्वप्रथम विघ्नहर्ता श्री गणेश का पूजन करें। शुद्ध घीका दीपक जलाकर अपने दाहिने तरफ स्थापित कर लें अगरबत्ती आदि जला लें तथा बायीं ओर तेल का अखंड दीपक जला लें। यह दीपक रात भर जलना चाहिये । किसी पात्र में गणपति को स्थापित कर पहले शुद्ध जल से फिर पंचामृत से और अंत में गंगाजल से स्नान करायें फिर उन्हें पोंछकर पुनः यथास्थान स्थापित कर दें। ध्यान रहे कि जिस थाली में गणपति को स्थापित करें उसमें कुंकुम से स्वास्तिक बना हुआ हो।
अब 'ॐ गणेशाय नमः' का उच्चारण करते हुये कुंकुम या केसर से गणपति को तिलक करें फिर अक्षत व पुष्प चढ़ायें तथा धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें फिर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये हाथ जोड़कर प्रार्थना करें

गजाननं भूत गणाधिसेवितं कपित्य जम्बूफल चारु भक्षणं । 
उमासुतं शोक विनाशकारकम्, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम् ॥

गुरु पूजन
सामने गुरु चित्र स्थापित कर हाथ जोड़कर प्रार्थना करें

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । 
गुरु: साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ॥

तत्पश्चात् गुरु चित्र को स्नान कराकर उन्हें पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, द्रव्य, दक्षिणा, आदि अर्पित करें। 
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दोनों हाथों में पुष्प लेकर प्रार्थना करें -

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बन्युश्च सखा त्वमेव । त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव ।।

कलश स्थापन

अब अपने दाहिनी ओर कुंकुम से स्वास्तिक बनाकर कलश को जल से भरकर स्वास्तिक के उपर स्थापित कर दें। फिर कलश में गंगाजल डालकर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये सभी तीर्थों का आह्वान करें

गंगे च यमुने चैव गोदावरी सरस्वती । 
नर्मदे सिन्धु कावेर जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु ॥

उक्त मंत्रोच्चार के पश्चात् कलश में अक्षत्, कुंकुम तथा सुपारी डालें फिर 'ॐ वरुणाय नमः' का उच्चारण करते हुये कलश के उपर मौली बाँधें। अब क्रमशः निम्न मंत्रों का उच्चारण करते हुये कलश के चारों ओर एक-एक तिलक लगायें
पूर्वे ऋग्वेदाय नमः । 
दक्षिणे यजुर्वेदाय नमः । 
पश्चिमे सामवेदाय नमः। 
उत्तरे अथर्व वेदाय नमः ॥
कलश के ऊपर पंचपल्लव (आम के पत्ते) डालकर उमर नारियल स्थापित कर दें। निम्न मंत्रोच्चार करें -

प्रसन्नोभव वरदोभव । अनेन पूजनेन । भगवान वरुण देवता प्रियतां न मम ॥

लक्ष्मी ध्यान
दोनों हाथ जोड़कर निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये महालक्ष्मी का ध्यान करें

वन्दे लक्ष्मी पर शिवमयीं शुद्ध जाम्बू नदाभां । 
तेजो रूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्वलाङ्गी ॥ 
बीजापूरं कनक कलशं हेमपदमं दधानाः आद्या शक्तिं सकल जननीं विष्णुवामाङ्कसंस्थाम् ॥
अब यदि श्री यंत्र न हो तो महालक्ष्मी प्रतिमा को शुद्ध जल से स्नान करायें
निम्न मंत्र का उच्चारण करें -

गंगा सरस्वती रेवा पयोष्णि नर्मदा जलैः ।
स्नापितोऽसि मया देवि तथा शांतिं कुरुष्व मे।।

आसन
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये महालक्ष्मी को आसन दें -

ॐ वर्मोऽमि समानानामुद्यतामिव सूर्यः । 
इमन्तमभितिष्ठामि यो मा कश्चाभिदासति ॥
(दिब्यमासनं समर्पयामि)

पाद्य
निम्न मंत्रोच्चार करते हुये पाद्य अर्पित करें

ॐ एतावानस्य महिमातोज्ज्यॉश्च्च पुरुषः ।
पादोस्य व्विश्श्वा भूतानि त्रिपादस्या मृतन्दिवि ॥ 
( पादयोः पाद्यं समर्पयामि )

अर्ध्य
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये महालक्ष्मी को अर्ध्य देवें

ॐ धामन्ते व्विश्श्वम्भुवन मधि शिश्नतमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि । 
अपामनी के समिथे यदआमृतस्त मध्यात्मः मधुमन्तन्तऽअम्मिम् ।। (अर्घ्यं समर्पयामि )

दुग्ध स्नान
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये भगवती महालक्ष्मी को दूध से स्नान करायें -

कामधेनु समुत्पन्नं सर्वेषां जीवनं परम् । पावनं यज्ञहेतुश्च पयः स्नानार्थिमर्पितम् ।।
 (दुग्धं स्नानं समर्पयामि)

दधि स्नान
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये दहीं से स्नान करायें

पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशि प्रथम ।।
 दध्यानीतं मया देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ।।** 
( दधि स्नानं समर्पयामि )

घृत स्नान
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये महालक्ष्मी को शुद्ध घी से स्नान करायें

नवनीत समुत्पन्नं सर्वसंतोष कारकम् । 
घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम ।।
 (घृत स्नानं समर्पयामि)

मधु स्नान
अब निम्न मंत्र का उच्चरण करते हुये मधु (शहद ) से स्नान करायें

तरुपुष्प समुद्भूतं सुस्वाद मधुरं मधु ।
तेज: पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृहताम ।।

शर्करा स्नान
निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये शर्करा से स्नान करायें - इक्षुसार समुदभूता शर्करा पुष्टिकारिका ।
 मलापहारिका दिव्या स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम् ॥ 
(शर्करा स्नानं समर्पयामि )

पंचामृत स्नान
अब निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुये महालक्ष्मी को पंचामृत से स्नान करायें

पयोदधि घृतं चैव मधु च शर्करायुतम् । 
पंचामृत मयानीतं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम।।
 (पंचामृत स्नानं समर्पयामि)

उपरोक्त विविध द्रव्यों से स्नान कराने के पश्चात् शुद्ध जल से स्नान करायें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

मंदाकिन्यातु यद्वारि सर्वपाप हरं शुभम् । 
तदिदं कल्पितं देवि स्नानार्थं प्रतिगृह्णताम ।। 
(शुद्धोदक स्नानं, समर्पयामि )

वस्त्र
महालक्ष्मी को वस्त्राभूषण अर्पित करें

सर्व भूषादिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे । 
मयापसादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम् ।। 
( वस्त्रं समर्पयामि)

चन्दन
अब महालक्ष्मी को गंध चन्दन आदि अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें

श्रीखण्ड चन्दनं दिव्यं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । 
विलेपनं सुरश्रेष्ट चन्दन प्रतिगृह्यताम् ।। 
(गन्धं समर्पयामि )

अक्षत
निम्न मंत्र का उच्चारण करते महालक्ष्मी को अक्षत अर्पित करें -

अक्षतांश्च मया देवि कुंकुमाक्ता सुशोभिताः । 
मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वरि ॥

पुष्प
निम्न मंत्रोच्चार करते हुये महालक्ष्मी को विविधि पुष्पअर्पित करें -

 माल्यादीनि सुगन्धीनि माल्यादीनि वै प्रभो ।
 मयानीतानि पुष्पाणि गृहाण परमेश्वरि ॥ 
(पुष्पाणि समर्पयामि )

नैवेद्य
निम्न मंत्र का उच्चारण करते महालक्ष्मी को प्रसाद अर्पित करें

शर्कराघृत संयुक्तं मधुरं स्वादु चोत्तमम् । 
उपहार समायुक्तं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम् ।। 
(नैवेद्यं निवेदयामि )

अब ताम्बूल पुंगीफल आदि अर्पित करें तथा अंत में दक्षिणा द्रव्य अर्पित करें निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

न्यूनातिरिक्त पूजायां सम्पूर्ण फल हेतवे । 
दक्षिणां कांचनी देवि स्थापमामि तवाग्रतः ॥

क्षमा प्रार्थना

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् । 
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ॥ 
मंत्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि । 
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु में ॥ 
मत्समः पातकी नास्ति पापघ्नी त्वत्समा न हि । 
एवं ज्ञात्वा महादेवि यथायोग्यं तथा कुरु ॥

                           शिव शासनत: शिव शासनत:

लक्ष्मी पंजर स्तोत्र ।।

       तंत्र शक्ति से युक्त गुरु के क्या भाव होने चाहिए? पूर्ण शिवमय गुरु कहेगा भाड़ में गया भाग्य, एक कोने में रख दो कर्म का सिद्धांत और सीधे-सीधे लक्ष्मी प्राप्ति का अनुसंधान शुरू करो। शिष्य जब आया है और रोना रो रहा है तो सीधी सी बात है भाग्यवान होता तो करोड़पति के घर में पैदा होता। कर्म अच्छे होते तो पैसे- पैसे के लिए मोहताज नहीं होता सब तरफ से कर्म अभागा है तभी तो गुरु के पास आया है। अत: गुरु सीधे तंत्र बल का प्रयोग करेगा अपनी तप शक्ति से शिष्य को लक्ष्मी प्राप्ति के योग्य बनायेगा यही गुरु की सक्षमता का प्रतीक है भाग्य, शास्त्र, धर्म की बातें, कर्मफल इत्यादि से ऊपर गुरु है। लक्ष्मी पंजर स्तोत्र तांत्रोक्त विधान है जब कर्म, भाग्य, ग्रह नक्षत्र परिवार इत्यादि निष्फल हो जायें तब इसका प्रयोग कर लक्ष्मी को प्राप्त कर ही लिया जाता है।

विनियोग
ॐ अस्य श्रीलक्ष्मी पञ्जर महामंत्रस्य ब्रह्मा ऋषिः पंक्तिश्छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, श्रियै इति कीलकं मम सर्वाभीष्ट सिद्धूयर्थे लक्ष्मी पञ्जर स्तोत्र जपे विनियोगः ।

करन्यास
ॐ श्रीं ह्रीं विष्णुवल्लभायै अंगुष्ठाभ्यां नमः । 
ॐ श्रीं ह्रीं जगज्जनन्यै तर्जनीभ्यां नमः । 
ॐ श्रीं सिद्धिसेवितायै मध्यमाभ्यां नमः । 
ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिदात्र्यै अनामिकाभ्यां नमः । 
ॐ श्रीं ह्रीं वाञ्छित पूरिकायै कनिष्ठिकाभ्यां नमः । 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं श्रियै नमः स्वाहेति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।

षडंगन्यास
ॐ श्रीं ह्रीं विष्णुवल्लभायै हृदयाय नमः । 
ॐ श्रीं ह्रीं जगज्जनन्यै शिरसे स्वाहा । 
ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिसेवितायै शिखायै । 
ॐ श्रीं ह्रीं सिद्धिदात्र्यै कवचाय हुम् । 
ॐ श्रीं ह्रीं वाञ्छितपूरिकायै नेत्राभ्यां वौषट् । 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं श्रियै नमः स्वाहेत्यस्त्राय फट् ।

ध्यान
ॐ वन्दे लक्ष्मीं परिशिवमयीं शुद्धजांबूनदाभो। 
तेजोरूपां कनकवसनां सर्वभूषोज्ज्वलांगीम् ॥ 
बीजापुरं कनक कलशः हेमपद्मं दधानामाद्यौं । 
शक्तिं भुक्तिं सकलजननीं विष्णुवामांग संस्थाम् ॥ 
शरणं त्वां प्रपन्नोऽस्मि महालक्ष्मि हरिप्रिये। 
प्रसादं कुरु देवेशि मयि दुष्टेऽपराधिनिः॥ 
कोटिकन्दर्प लावण्यां सौन्दर्यैक स्वरूपताम्। 
सर्वमंगल मांगल्यां श्रीरामां शरणं व्रजे॥

लक्ष्मी माला मंत्र

ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो विष्णुवल्लभायै महामायायै कं खं गं घं ङं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष धनं धान्यं श्रियं समृद्धि देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो जगज्जनन्यै वात्सल्यनिधये चं छं जं झं ञं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष श्रियं प्रतिष्ठा वाक्सिद्धि मे देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सिद्धिसेवितायै सकलाभीष्ट दान दीक्षितायै टं ठं डं ढं णं नमस्ते नमस्ते मा पाहि पाहि रक्ष रक्ष सर्वतोऽभयं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमः सिद्धिदात्र्यै महा अचिन्त्यशक्तिकायै तं थं दं धं नं नमस्ते नमस्ते मां पाहि रक्ष रक्ष मे सर्वाभीष्ट सिद्धिं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं नमो वाञ्छितपूरिकायै सर्वसिद्धि मूलभूतायै पं फं बं भं मं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे मनोवांछितां सर्वार्थभूतां सिद्धि देहि देहि श्रीं श्रियै स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं कमले कमलालये। मह्यम् प्रसीद प्रसीद महालक्ष्मि तुभ्यं नमो नमस्ते जगद्वितायै यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं नमस्ते नमस्ते मां पाहि पाहि रक्ष रक्ष मे वश्याकर्षण मोहनस्तंभनोच्चाटनताडनाचिन्त्यशक्तिवैभवं देहि देहि श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं | धात्र्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं । बीजरूपायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं विष्णुवल्लभायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सिद्धयै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं बुद्ध्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं धृत्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं मत्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं कान्त्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं शांत्यै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं सर्वतोभद्राय रूपायै नमः स्वाहा । ॐ श्रीं ह्रीं ऐं क्लीं श्रीं श्रियै नमः स्वाहा । ॐ नमो भगवति ब्रह्मादि वेदमांतर्वेदोद्भवे वेदगर्भे सर्वशक्तिशिरोमणे श्रीं हरिवल्लभे ममाभीष्टं पूरय पूरय मां सिद्धिभाजनं कुरु कुरु अमृतं कुरु कुरु अभयं कुरु कुरु सर्व कार्येषु ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल मे सुत शक्तिं दीपयदीपय ममाहितान् नाशय नाजाय असाध्य कार्यं साधय साधय ह्रीं ह्रीं ह्रीं ग्लौं ग्लौं श्रीं श्रिये नमः स्वाहा। 
(इति लक्ष्मीमाला मंत्रः 108 जपं कुर्यात् ॥ )
                             शिव शासनत शिव शासनत