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श्री यंत्र और मानव शरीर ।।

           आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जो कुछ भी श्री यंत्र में वर्णित है वही मानव शरीर में उपस्थित है, इस बात को मैं दावे के साथ कह सकता हूँ क्योकि श्रीयंत्र में जिस शक्ति का वर्णन नहीं वह शक्ति मानव शरीर तो क्या ब्रह्माण्ड में भी उपस्थित नहीं है। भिन्न-भिन्न पुस्तकों में वर्णित उक्त शक्तियाँ श्री यंत्र में वर्णित शक्तियों की ही शाखाएं है। यह बीज यंत्र है। ब्रह्मांड की संरचना का बीज यंत्र है यह। इसमें शिव से लेकर शक्ति और उनके विभिन्न स्वरूप, उनकी त्रिगुणात्मक लीलाँए, चर्तुभुजी आयाम, वृत्ताकार गति, कमल दल स्वरूप कलाएं, स्तम्भ स्वरूप सिद्धियाँ, भिन्न भिन्न प्राकृतिक शक्तियों का दिव्यनाद, शिव के डमरू का ब्रम्हाण्डीय स्पंदन, शिव की तेजस्विता, माँ त्रिपुर सुंदरी की लीला से निराकार शिव का साकार रूप लेना, अप्सराओं का नर्तन, दिगपालों का क्रोध, माताओं का वात्सल्य, तामस गुणों का सत और रज के साथ मिश्रण, सिद्धियो कि औघड़ लीलायें सभी कुछ पंच भूतो के पंच इन्द्रिय आयाम अर्थात गंध, रंग, स्पर्श, ध्वनि इत्यादि के साथ श्री यंत्र में समाहित हैं। 

              जिस प्रकार माता और पिता का मिलन एवं परम आनन्दित सम्भोग शिशु को गर्भस्थ करता है यही क्रिया श्री यंत्र के प्रथम चरण अर्थात रक्त बिंदु स्वरूप सर्वानंद मयी कोष को प्रगट करती है। द्वितीय चक्र योनि त्रिकोण है एवं इसकी स्वामिनी देवी कामेश्वरी के नाम से जानी जाती है अर्थात जो अपने अंदर शिवत्व को प्रतिष्ठित कर सके। इसीलिए इस चक्र को सर्व सिद्धि चक्र कहा गया है। माता का गर्भ ही वह दिव्य स्थान है जहाँ पर विष्णु से लेकर आदि गुरु शंकराचार्य अवतार स्वरूप में इस पृथ्वी पर जन्म लेने से पूर्व निवास करते हैं इस अदभुत् स्थान पर ही सभी शक्तियों का बीज रूप में रोपण होता है। तीसरा चक्र सर्व रक्षा दायक चक्र कहलाता है अर्थात अब गर्भ में बीज ने स्वरूप लेना प्रारंभ कर दिया हैं एवं एक कोमल स्वरूप को माँ त्रिपुर सुंदरी की मूल शक्ति आठ स्वरूप में विभाजित होकर जीवन की रक्षा शिव स्वरूपी प्रकृति की उद्दण्डता से कर रही है। यहाँ पर देवी त्रिपुर सुंदरी शिशु के लिए सुख, दुख, सत-रज और तम गुणों, ऋतु इत्यादि इत्यादि को वश में रखती हुई जीवन की उचित देखभाल कर रही है। यहाँ पर देवी का स्वरूप हरे आभा मण्डल से आच्छादित है। हरा रंग जीवन का प्रतीक है। 

          नव जीवन का चौथा चक्र दस त्रिगुणात्मक शक्तियों को समाहित किये हुए है। इसे सर्व रोग हर चक्र कहते हैं। यहाँ माँ त्रिपुर सुंदरी सर्वस्व प्रदान करने के लिए तत्पर दिखाई पड़ती है। मानव गर्भ के चौथे महिने में शिशु शक्ति, सौंदर्य, ज्ञान, व्याधिनाशक शक्ति एवं जीवन में फल प्राप्ति की नियति प्राप्त करता है। जब शिशु चौथे महिने में प्रविष्ठ होता है तब माता उसे सर्वस्व प्रदान करने वाली शक्ति बन जाती है। चौथे चक्र में त्रिगुणात्मक शक्ति दस त्रिकोणों में कालिमा लिए हुए प्रगट होती है। त्रिगुणात्मक प्रकृति माँ त्रिपुर सुंदरी की ही द्योतक है। पांचवा चक्र सर्वार्थ साधक चक्र कहलाता है। शिशु जब पांचवे महिने में प्रविष्ठ होता है तब माँ त्रिपुर सुंदरी उसे प्राणवान बना देती है। प्राणो को प्रबलता माँ त्रिपुर सुंदरी अपने दस स्वरूपों से प्रदान करती है। मनुष्य के प्राण लम्बे समय तक शक्तिशाली तभी तक बने रह सकते है जब तक जीवन में सौभाग्य, सिद्धि, सम्पत्ति, प्रियता, मंगल, कार्यकुशलता, दुखविमोचन विघ्ननाश, मृत्यु तुल्य कष्ट एवं सुंदरता रूपी दस गुणों से परिपूर्ण है। अर्थात उसके जीवन में दस गुणों का अद्भुत समायोजन हो। जीवन में मृत्यु ऊपर वर्णित तत्वों के अभाव में शीघ्र गामी होती है। इसीलिए इस चक्र में देवी श्री यंत्र में दस लाल त्रिकोण में प्रकट होती है। 

             श्रीयंत्र में छठवाँ चक्र गर्भ में उपस्थित किसी भी जैविक संरचना एवं ब्रम्हह्मण्डीय संरचना के शरीर के विकास को दर्शाता है। पहले मस्तिष्क का विकास होता है फिर शरीर का मस्तिष्क का विकास अति सूक्ष्म है एवं शरीर का विकास मस्तिष्क पर अंधारित होता है। शरीर के विकास के लिए अन्य ऊर्जाओं के अलावा मस्तिष्क से भी ऊर्जा प्रदान होती है। एक बार मस्तिष्क क्रियाशील हुआ तो फिर शरीर और मस्तिष्क के बीच आवागमन बनाने के लिए शक्तियों को विशेष पथों कि आवश्यकता पड़ती है यह पथ नाड़ियों के रूप में आप समझ सकते हैं। इन्ही नाड़ियों को विकसित करने के लिए माँ त्रिपुर सुंदरी श्री यंत्र में नीले रंग की आभा लिए हुए चौदह गुणों में प्रकट होती है। इन्हीं चौदह नाड़ियों के द्वारा शरीर में आकर्षण,सम्मोहन, स्तम्भन, स्पंदन, उन्माद इत्यादि इत्यादि प्रवाहित होते है।

 शिशु को गर्भस्थ हुए जब 6 महिने हो जाते हैं तब तंत्रिका तंत्र का विकास प्रारम्भ होता है यही तंत्रिका तंत्र उसे ब्रम्हाण्ड में उपस्थित प्रत्येक शक्ति चाहे वह किसी भी स्वरूप में क्यों न हो से उसे परिचित कराते हैं। इन्हीं नाड़ियों के द्वारा अन्य अंगो और प्रत्यंगो का विकास संभव हो पाता है। 

            सातवा चक्र अपने अंदर आठ दलों का कमल लिए हुए है। गर्भस्थ शिशु जब सात महिने का हो जाता है तब उसके अंदर वचनशक्ति, चलन तंत्र आदान तंत्र, संकेत शक्ति, आनंद की अनुभूति, त्याग की प्रवृति एवं बुद्धि का विकास प्रारम्भ हो जाता है। बुद्धि का विकास ही मनुष्य को बोलने, सोचने, निर्णय लेने, क्रिया करने एवं प्रतिक्रिया करने इत्यादि इत्यादि गतिविधियों से परिचित कराता है। एक प्रकार से श्री यंत्र के स्वयं कवचित एवं लक्षित होने की प्रक्रिया सातवें चक्र से प्रारंभ होती है। जिस प्रकार गर्भस्थ शिशु में स्वयं की रक्षा के तत्व सातवें महिने से विकसित होने लगते है। अब माँ त्रिपुर सुंदरी का कार्य काफी हद तक सरल हो जाता है। बुद्धि रूपी चेतना के द्वारा शिशु गर्भस्थ होते हुए भी मातृशक्ति को पहचानने लगता है दोनों ओर से एक अद्भुत बंधन का निर्माण हो जाता है। बुद्धि का विकास ही इसलिए होता है की जीव अपनी रक्षा स्वयं कर सकें। इस पृथ्वी पर मनुष्य सर्वशक्तिमान इसलिए हुआ कि वह समस्त योनियों में सबसे ज्यादा बुद्धिमान प्राणी है। 

         आंठवा चक्र सोलह दलों के कमल से युक्त है अर्थात यहां माँ त्रिपुर सुंदरी बुद्धि के साथ-साथ मन, अहंकार, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध, चित्त, धैर्य, स्मृति, नाम, वार्धक्य, सूक्ष्म शरीर, जीवन, स्थूल शरीर इत्यादि सोलह शक्तियों में प्रकट होकर शिशु को सर्वगुण सम्पन्न बना रही है जीवन में पूर्णता के लिए इन 16 शक्तियों का पूर्ण रूप से उदित होना अत्याधिक आवश्यक है आप इसे 16 कला के रूप में भी समझ सकते हैं। भगवान श्री कृष्ण 16 कलाओं में दक्ष थे। एक या दो कलाऐं आधे-अधूरे स्वरूप का द्योतक होती हैं। युग पुरुष बनना है तो ऐसा कामाकर्षण भी चाहिए जिससे की गोपियाँ सुध खो बैठें। इतनी कुशाग्र बुद्धि चाहिए कि निःशस्त्र होते हुए भी महाभारत का संचालन कर सकें। स्वयं में इतना र्कषण होना चाहिए कि अहम् ब्रम्हास्मि बोल सकें।शब्दो में इतनी जीवन्तता हो कि गीता रूपी ज्ञान भी झर सकें, स्पर्श इतना मधुर हो कि गायों के थन से स्वयं ही दुग्ध बहने लगे। रूप ऐसा मधुर हो कि सूरदास भी आंखे न होने की स्थिति में वर्णन कर सकें। वाणी इतनी रसीली हो कि शत्रु भी निस्तेज हो जाए। गंध के स्थान पर शरीर से अष्ट गंध बहे, चित्त का आकर्षण ऐसा हो कि अनंत जन साधारण भक्तिभाव में डूबा रहे। धैर्य भी इतना पुरुषत्व लिए हो कि निन्यानवें पाप तक शांत बने रहें। एक जन्मों की ही नहीं सामने वाले को देखकर अनेक जन्मों की स्मृति भी पटल पर उपस्थित हो जाए। कुल मिला-जुलाकर एक अमृतमय मनुष्य का निर्माण हो, अमृत कोषों की संरचना हो। ऐसी इच्छा श्री यंत्र के आठवें चक्र में माँ त्रिपुर सुंदरी के अंदर से निकलती हुई दिखाई पड़ती है।

            श्री यंत्र का नवाँ चक्र श्री यंत्र का नवाँ चक्र भूपूर से बना और इसके चार विभाग हैं पहला विभाग आठवें चक्र में स्थित षोडसदल कमल जो कि सोलह कलाओं के प्रतिनिधि हैं उनको घेरे हुए हैं। तडाग सदृश स्थल एवं इसके पश्चात् भूपुर चार भागों में चतुर्मुखी आकृति लिए हुए दिखाई पड़ता है। भूपुर अर्थात वृत संरचना जो कि शक्ति के विभिन्न स्वरूपों के साथ आंतरिक चक्रों को सुरक्षित रखती है। जिस प्रकार हमारे मस्तिष्क की खोपड़ी सभी मस्तिष्क कोशिकाओं के संयोजन को अपने अंदर सुरक्षित रखते हुए संपूर्ण जीवन उनकी रक्षा करती हैं। नवां चक्र रक्षा चक्र भी कहा जा सकता है। रक्षा के समस्त आयाम इस चक्र में विराजमान हैं। जिस प्रकार शरीर की रक्षा के लिए त्वचा, अस्थि, नख, पारिवारिक संबंध, विभिन्न कार्य में दक्षता, मस्तिष्क की सूचना देने की प्रणाली इत्यादि होती है। उसी प्रकार जब शिशु गर्भ में नौवें महिने में कदम रखता है तब माता उसके अंदर उन्माद, संशोभन, आकर्षण, वेशधारण, खेचरी, बीज उत्पन्न करने की शक्ति इत्यादि विकसित करती है। यही शक्तियाँ उसे संपूर्ण जीवन प्रदान करती है। गर्भ में पल रहे शिशु के लिए माँ के आठ स्वरूप जिसमें की वह जन्म देने वाली ब्राम्ही, ममता लुटाने वाली कौमारी, पालन करने वाली वेष्णवी, कृपा प्रदान करने वाली महेश्वरी, ऐश्वर्य प्रदान करने वाली ऐन्द्री, ज्ञान देने वाली बाराही, अति में रक्षा करने वाली चामुण्डा, मृदुता प्रदान करने वाली काली, महालक्ष्मी स्वरूप में शिशु को आधार प्रदान करती है।

             नौवें मास में बालक के अंदर सिद्धियों का विकास भी होता है। सिद्धियाँ अर्थात कर्म की वह विशेषताएँ जिसके द्वारा बालक अपने जीवन में स्वयं की पहचान व उपयोगिता प्राप्त करता है। ब्रम्हाण्ड में उपस्थित दस दिगपाल आवृत्ति रूप में नौवें महिने में ही गर्भस्थ शिशु के आसपास व्यवस्थित होते हैं। दिगपाल अर्थात वह व्यवस्था जो अदृश्य एवं अति सूक्ष्म शक्तियों से मानव शरीर को कवचित करती हैं। जब मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होता तब सर्वप्रथम दिगपाल रूपी यही संरचना विसर्जित होती है। इसके रहते शक्ति कवच इतना मजबूत होता है कि यमराज मृत्यु प्रदान ही नहीं कर सकते। यमराज सर्वप्रथम दिगपालों को ही प्रस्थान का आदेश देते हैं। संसार में उपस्थित प्रत्येक जैविक संरचना, जड़ संरचना श्री यंत्र के माध्यम से ही विकसित होती है। पृथ्वी का अपना विकास भी इसी यंत्र माध्यम से संपन्न हुआ है और तो और हमारी आकाश गंगा भी इसी यंत्र के माध्यम से दृष्टिगोचर हुई है। हम यंत्र के जिस स्वरूप को ताम्रपत्र पर देखते है वह तो मात्र अनुकृति है परनु यंत्र वास्तविक स्वरूप में एक अदृश्य या अद्वैत शक्ति संरचना का विषय है। 

         तत्व ज्ञानी इसे आंतरिक चक्षुओं से महसूस करते हैं। आदि गुरू शंकराचार्यजी ने इस संरचना को सृष्टिक्रम में पूजने की पद्धति का प्रचार प्रसार किया। सृष्टिक्रम अर्थात ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार श्री यंत्र की संपूर्ण संरचना बिन्दू से प्रारंभ होकर नौ चक्रों में निर्मित होती है। वही व्यक्ति जीवन में समग्रता प्राप्त करता है। जिसमें विकास की प्रक्रिया श्री यंत्र की भांति क्रमानुसार पूर्ण विकसित होती है। प्रत्येक चक्र और उसमें स्थित शक्ति केन्द्र पूरी तरह क्रियाशील होते है। अन्यथा जीवन आधा-अधूरा ही रह जाता है महालक्ष्मी से साक्षात्कार वही कर सकता है जो कि श्री यंत्र के क्रमानुसार ही स्वय का आत्मविकसित करता है। माँ त्रिपुर सुंदरी के संपूर्ण स्वरूपों को श्री यत्र रूपी संरचना के द्वारा ही आत्मसात किया जा सकता है।
                                   
शिव शासनत: शिव शासनत:

पितृदोष निवारण प्रयोग ।।

      जीवन में पितृ ऋण के कारण बाधाऐं उत्पन्न होती ही हैं यथासम्भव पितृ ऋण की पूर्ति आध्यात्मिक कर्मों के माध्यम से कर देनी चाहिए। हम जो भी आध्यात्मिक कर्म करते हैं उसका एक भाग पितरो को समर्पित रहता है। जिसके परिणाम स्वरूप पितृ लोक में उन्हें सुदर्शनता व श्रेष्ठता प्राप्त होती है। भारतीय सनातन परम्परा में सभी देवी देवताओं के साथ पूर्वजों के प्रति भी श्रद्धाभाव अर्पित करने का प्रावधान है। निश्चय ही पितरों के प्रति किए जाने वाले श्राद्ध से जहाँ हम उनकी मुक्ति के लिए प्रयत्न करते हैं वहीं इस क्रिया के परिणाम स्वरूप साधक अपने पूर्वजों के आशीर्वाद को भी प्राप्त कर लेता है। 
           आत्माएं सूक्ष्मता व त्रिवर्गात्मकता से युक्त होने के कारण बाधाओं को कम करने में सक्षम भी होती हैं और आत्म बल से वंशज को अतिरिक्त बल भी प्रदान करती हैं। इसी कारण आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से अमावस्या तक के दिवस इसी कार्य के लिए निर्धारित किए गए हैं। यथासम्भव पितृ दोष से मुक्ति के लिए निम्र प्रक्रियाओं को नवमी व अमावस्या को करना श्रेष्ठ है। वैसे श्राद्ध कृष्ण पक्ष (आश्विन मास) के दिवसों के अतिरिक्त आश्विन पूर्णिमा को भी किया जा सकता है। 

       प्रातः काल स्नान कर लें और भोजन बना लें। भोजन को सामने रखकर व ब्राह्मण को सम्मान पूर्वक बैठाकर जल से संकल्प करें।

ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद् भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणः द्वितीये परार्धे श्वेतावाराह कल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतित मे कलियुगे कलिप्रथम चरणे भारत वर्षे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावर्तेक देशे श्रीमन्न पविक्रमशः यातीतसंवत्सरे संवत द्विसहस्त्राधिक तमे वर्षे अमुक नामसंवत्सरे अमुक ऋतौ अमुक मासे अमुक पक्षे अमुक वासरे अमुक तिथौ एव ग्रह गुण विशेषण विशिष्टायां शुभपुण्य तिथौ ममाऽमनः श्रुति स्मृतिपुराणोक्त फल प्राप्य ( दक्षिण की ओर मुख करके) अमुक गोत्राणां अमुकानां तथा च अमुक गोत्राणामस्मन्मातामह प्रमातामहवृद्धप्रमातामहानां सपत्नीकानां वसुरूद्रादित्य स्वरूपाणां, जन्मजन्मान्तरे क्षुधातृषादिदोष परिहारार्थं पितृलोके अक्षयसुख स्वलोके सद्गति प्राप्त्यर्थे तदिद निमित यथान्संख्यं ब्राह्मणान् श्राद्ध भोजने नाहं तर्पयिष्ये ।

‌ इसके बाद भगवान विष्णु की थाली बनावे और उसमें कुछ भी भोजन पकाया हो वह रखें तथा तुलसी जल चढ़ावें तत्पश्चात धेनु मुद्रा प्रदर्शित करते हुए निम्न मंत्र से भगवान विष्णु को भोग लगायें

ॐ नाभ्याऽअसीदन्तरिक्ष: (गूँ) शीर्ष्णेद्यो: सपवर्तते पदभ्याम्भूमिर्दिदशः श्रीत्रोत्थालोकां अकल्पयन |

श्राद्ध में यह नियम है कि पाँच स्थानों पर थोड़ा-थोड़ा भोजन रखें जिसे पंच ग्रास कहा जाता है और निम्न मंत्र बोलते हुए प्रत्येक पर जल चढ़ायें।
                   गौ ग्रास समर्पयामि। 
                   श्वान ग्रास समर्पयामि।
                   कागग्रास समर्पयामि।
                   कीटग्रास समर्पयामि।
                   अतिथिग्रास समर्पयामि।
इसके बाद थोड़ा सा भोजन ब्राह्मण के बायीं और रख कर सर्प ग्रास मित्र मंत्र से दे दें। 
                  नागवली सर्पेभ्यो नमः
        ॐ नमोऽस्तु सर्पेस्यो ये के च पृथिवीमनु ।
        ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्य: सर्पेभ्यो नमः ॥

इसके बाद अग्नि को पकी हुई सामग्री और घृत का भोग निम्म्र मंत्र से दें।

ॐ चत्वारिश्रङ्गगत्रयो अस्य पादाद्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य त्रिधा बद्धो वृषभो शेखीति महोदेवो मर्त्या आविवेश ।

          इसके बाद हाथ में जल लेकर संकल्प भर निम्न मंत्र को पढ़ते हुए छोड़े यहाँ पर अमुक शब्द के स्थान पर अपने उस पूर्वज का नाम लें जिसके प्रति श्राद्ध व्यक्त किया गया है।

इहाद्य संकल्पिततिथौ (पंचांग में देखकर तिथि ज्ञात कर लें और उच्चारण करें) मम् अमूकशर्मन पितॄणां तप्त्यर्थं ब्राह्मणाः । अद्य कृतसंकल्पसिद्धिरस्तु ( जल छोड़ें)
इसके बाद ब्राह्मार्पण कार्य सम्पन्न करें अर्थात हाथ में जल लेकर मंत्र पढ़ता हुआ 'ब्राह्मर्पण'कहे।


ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्महविर्ब्रह्मग्नौ ब्रह्माणा हुतम् ब्रह्मैव तेन गन्तध्यं ब्रह्मकमसर्माधिना । 
ॐ तत् ब्रह्मर्पणमस्तु, जल छोड़े और नमस्कार करके कहें ब्रह्मणों आरोगो ।

      शास्त्रों की मर्यादा के अनुसार यह कार्य सम्पन्न होने के बाद ब्राह्मणों को चाहिए कि वे निम्र क्रिया सम्पन्न करें अर्थात ब्राह्मण भोजन प्रारम्भ करने से पूर्व निम्न मंत्र से चोटी की गांठ खोल दें (श्राद्ध भोजन करते समय चोटी खोल देनी चाहिए या फिर शिखा पर स्पर्श करें । )

ब्रह्मापशस्ह स्त्राणि रुद्रशूलशतानि च । 
विष्णु चक्रसहस्त्राणि शिखामुक्ति करोभ्यहम् ।
फिर तीन ग्रास भूमि पर रखें और निम्न मंत्र का उच्चारण करे 
                 ॐ भूपतये नमः स्वाहा । 
                 ॐ भूवनपतये नमः स्वाहा । 
                 ॐ भूतानांपतये नमः स्वाहा ।
तत्पश्चात हाथ में जल लेकर भोजन की थाली के चारों और निम्न मंत्र पढ़ते हुए जल प्रदक्षिणा करें।

अन्नं ब्रह्म रसो विष्णुर्भोक्ता देवो महेश्वरः एवं ध्यात्वा द्विजो भुक्ते खाँडन्नदोषैर्ने लिप्यते अन्तभरति भूतेषु गुहायां विश्वतों   
मुखः त्वं ब्रह्म त्वं यज्ञस्त्वं वषट कारस्त्वमोडकारस्त्वं विष्णौः परम पदम् ।।

तत्पश्चात निम्न प्रत्येक मंत्र के साथ पाँच छोटे-छोटे ग्रास अपने मुँह में डाले।
                   ॐ प्राणाय स्वाहा ।
                   ॐ अपानाय स्वाहा । 
                   ॐ व्यानाय स्वाहा ।  
                   ॐ समानाय स्वाहा । 
                   ॐ उदानाय स्वाहा ।

        फिर बायें हाथ से आँखों में जल स्पर्श करें। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया के बाद पूर्ण रूप से लाभ प्राप्त और दोष निवारण के लिए निम्र मंत्र की तीन माला जप करें जिससे सम्पूर्ण वर्ष भर आप तरोताजा और दोषमुक्त रहकर प्रत्येक 
कार्य में सफलता प्राप्त करें।

ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं सर्व दोष पापान् निवृत्तय धियो योनः प्रचोदयात् ।

       इसके पश्चात् आप भोजन करें और मृतक व्यक्ति को श्रद्धांजलि व्यक्त करें कि उसकी आत्मा को शांति प्राप्त हो और उसकी मुक्ति हो और वह आपको जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए आशीर्वाद प्रदान करे और श्रेष्ठ कार्यों में आपकी सहायता करें। इस प्रकार श्राद्ध कार्य सम्पन्न होता है यद्यपि धीरे-धीरे हम यह सारी विधियाँ भूलते जा रहे हैं परन्तु शास्त्र मर्यादा को खो देना उचित नहीं है शास्त्र मर्यादा का पालन करना प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य है।
 
        आप इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को सम्पन्न अवश्य करें और पूर्वजों के प्रति श्रद्धा अर्पित कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें ताकि कार्यों में आ रही बाधा समाप्त हो सके।

।। अथ पितृस्तोत्र ।।

अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ।।१।।

हिन्दी अर्थ:-

जो सबके द्वारा पूजित, अमूर्त, अत्यन्त तेजस्वी, ध्यानी तथा दिव्यदृष्टि सम्पन्न हैं, उन पितरों को मैं सदा नमस्कार करता हूँ ।

इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ।।२।।

हिन्दी अर्थ:-

जो इन्द्र आदि देवताओं, दक्ष, मारीच, सप्तर्षियों तथा दूसरों के भी नेता हैं, कामना की पूर्ति करने वाले उन पितरो को मैं प्रणाम करता हूँ ।

मन्वादीनां च नेतार: सूर्याचन्दमसोस्तथा ।
तान् नमस्यामहं सर्वान् पितृनप्युदधावपि ।।३।।

हिन्दी अर्थ:-

जो मनु आदि राजर्षियों, मुनिश्वरों तथा सूर्य और चन्द्रमा के भी नायक हैं, उन समस्त पितरों को मैं जल और समुद्र में भी नमस्कार करता हूँ ।

नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा ।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।।४।।

हिन्दी अर्थ:-

नक्षत्रों, ग्रहों, वायु, अग्नि, आकाश और द्युलोक तथा पृथ्वी के भी जो नेता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ।

देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येहं कृताञ्जलि: ।।५।।

हिन्दी अर्थ:-

जो देवर्षियों के जन्मदाता, समस्त लोकों द्वारा वन्दित तथा सदा अक्षय फल के दाता हैं, उन पितरों को मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ।

प्रजापते: कश्पाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ।।६।।

हिन्दी अर्थ:-

प्रजापति, कश्यप, सोम, वरूण तथा योगेश्वरों के रूप में स्थित पितरों को सदा हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ ।

नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ।।७।।

हिन्दी अर्थ:-

सातों लोकों में स्थित सात पितृगणों को नमस्कार है। मैं योगदृष्टिसम्पन स्वयम्भू ब्रह्माजी को प्रणाम करता हूँ ।

सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ।।८।।

हिन्दी अर्थ:-

चन्द्रमा के आधार पर प्रतिष्ठित तथा योगमूर्तिधारी पितृगणों को मैं प्रणाम करता हूँ। साथ ही सम्पूर्ण जगत् के पिता सोम को नमस्कार करता हूँ ।

अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्रीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ।।९।।

हिन्दी अर्थ:-

अग्निस्वरूप अन्य पितरों को मैं प्रणाम करता हूँ, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् अग्नि और सोममय है ।

ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्रिमूर्तय: ।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ।।
तेभ्योखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतामनस: ।
नमो नमो नमस्तेस्तु प्रसीदन्तु स्वधाभुज ।।१०।।

हिन्दी अर्थ:-

जो पितर तेज में स्थित हैं, जो ये चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि के रूप में दृष्टिगोचर होते हैं तथा जो जगत्स्वरूप एवं ब्रह्मस्वरूप हैं, उन सम्पूर्ण योगी पितरो को मैं एकाग्रचित्त होकर प्रणाम करता हूँ । उन्हें बारम्बार नमस्कार है। वे स्वधाभोजी पितर मुझपर प्रसन्न हों ।

           ।। इति पितृ स्त्रोत समाप्त ।।

इस उद्धरण का क्या अर्थ है "ढोल गंवार शूद्र पशु नारी सकल ताड़ना के अधिकारी"?

• Answer:

लेखक जब कोई कृति रचता है तो उसमे विभिन्न अच्छे-बुरे चरित्र होते है। इन चरित्रों की मनोदशा में अंतर से ही कथा में टकराव और रोचकता आती है। यदि टकराव नहीं होगा तो कथा नहीं कही जा सकती। और लेखक अपनी कृति के माध्यम से जब कोई सन्देश देना चाहता है तो या तो अमुक उद्भोदन नायक के माध्यम से होगा, या फिर लेखक इसे सूत्रधार के रूप में स्वयं कहेगा।

उदाहरण के लिए मदर इण्डिया में नायक सुनील दत्त नहीं है बल्कि नरगिस है। अत: जब बिरजू गाँव की बेटी को जबरन उठाकर ले जाने का प्रयास करता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि लेखक यह संदेश देना चाहता है कि किसी की बहन-बेटी को जबरन उठाकर ले जाना चाहिए !!

इसी तरह से जब रावण कहता है कि -- "यदि आपको कोई स्त्री भा जाए तो उसे छल-बल या कैसे भी अपने अधिकार में ले लेना चाहिए। यही वीर पुरुष की नीति है" तो यह सन्देश रामचरित मानस के लेखक की तरफ से नहीं है। यह रावण की मानसिकता है। और रावण कथा का नायक नहीं है।

बिधिहूँ न नारी ह्रदय गति जानी ।
सकल कपट अघ अवगुण खानी ।। ( भरत उवाच, अयोध्या काण्ड )
अर्थात - स्त्री के ह्रदय की गति ब्रह्मा जी भी नहीं जान सके। स्त्री सब छल-पाप और दोषों की खान है।

नारी सुभाऊ सत्य कब कहही ।
अवगुण आठ सदा उर रहहि ।। ( रावण उवाच, लंका काण्ड )
अर्थात - नारी का स्वभाव ही ऐसा है कि वह सत्य भासण नहीं करती। उसके ह्रदय में आठों अवगुण का वास होता है।

जो लोग भरत और रावण को नायक मानते हैं वे ही ऊपर दिए गए कथन पर विश्वास करेंगे। स्पष्ट है कि भरत और रावण द्वारा किया गया यह बकवाद अनुकरणीय नहीं है। क्योंकि भरत और रावण तुलसीदास जी की रामचरित मानस के नायक नहीं हैं। न ही ये मर्यादित है, और न ही तुलसी दास जी ने इन चरित्रों के माध्यम से कोई सन्देश देने के लिए रामचरित मानस की रचना की है।

इसी तरह ढोल गवांर …. के अधिकारी , कथन भी कथानायक श्री राम या सूत्रधार के रूप में लेखक तुलसीदास जी द्वारा नहीं कहा गया है। यह कथन समुद्र नामक चरित्र ने कहा है। और समुद्र खुद ही कहता है कि मुझे बुद्धि नहीं है, भले बुरे का ज्ञान नहीं है, इसीलिए मुझसे यह त्रुटी हुयी। तो किसी कथा में एक बेवकूफ या कमजोर चरित्र जो भी कहे न तो वह विचारणीय होता है न ही लेखक का हेतु होता है। यदि लेखक इस वक्तव्य को सही मानता था, और स्थापित करना चाहता था तो वह यह सन्देश कथा के नायक के माध्यम से देगा।


मेरा बिंदु यह है कि, रामचरित मानस में श्री राम क्या कहते हैं वह अनुकरणीय हो सकता है, या तुलसीदास जी क्या कहते हैं इसकी भी टीका की जा सकती है। किन्तु एक दोयम दर्जे का चरित्र समुद्र क्या कहता है, इस पर विचार करना खुराफात है। और सबसे बड़ी बेवकूफी यह है कि समुद्र के कथन को रामचरित मानस या तुलसीदास जी का प्रतिनिधि मान लिया जाए।

दरअसल इस चौपाई को विवादास्पद बनाने के पीछे लक्ष्य राजनैतिक थे। अलगाव बढ़ाने के लिए इसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया और पाठको के एक वर्ग ने इसे जस का तस लपक लिया। और फिर उन्होंने इसे जस्टिफाई करने के लिए तरह तरह की व्याख्याएँ देनी शुरू की, जिसकी कोई जरूरत न थी। जहाँ तक मेरी बात है, मुझे इस चौपाई की सही व्याख्या करने में इंटरेस्ट नहीं है। क्योंकि समुद्र कथा का नायक नहीं। शोषक बाण से वो डिस्टर्ब हो गया था। और डिस्टर्ब आदमी जिस भी तरह से पेश आये अवहेलना करने योग्य है। शेष, जिसे जो अर्थ सूट करता है, वह वैसा अर्थ ले सकता है।

( मैं धर्म ग्रंथो आदि के ऐसे मामलों पर टिप्पणी नहीं करता हूँ। किन्तु इसमें पॉलिटिकल टच होने के कारण मैंने इस प्रकरण पर अपनी प्रतिक्रिया दी है। वस्तुत: यह टिप्पणी तुलसीदास के डिफेन्स में नहीं है। सिर्फ इस चौपाई के राजनैतिक कोण पर मेरा प्रतिभाव है। )


शनि रहस्यम् ।।

       दुनिया को रुलाने वाला, दारुण विलाप कराने वाला, नाकों चने चबवाने वाला, दर-दर की ठोकरें खिलवाने वाला, हर जगह तिरस्कार एवं विडम्बना उत्पन्न करवाने वाला शनि आज फूट फूट कर रो रहा था, चिल्ला-चिल्ला कर विलाप कर रहा था। उसकी आँखों से अश्रु धारा रुक ही नहीं रही थी, लोगों के सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदलने वाला शनि आज अपने कुभाग्य पर रो रहा था, स्वयं को कोस रहा था। आज उसका तिरस्कार हो रहा था, आज उसे भगा दिया गया था। ऐसा कब हुआ ? कब शनि को भी साढ़ी साती लग गई ? कब शनि का भाग्य भी दुर्भाग्य में परिवर्तित हो गया था वह समय था प्रभु श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का। 

      नंद ग्राम में आज प्रभु श्रीकृष्ण के जन्म लेने के अवसर पर हर्ष और उल्लास चारों तरफ छाया हुआ था, जैसे ही ब्रह्माण्ड में प्रभु श्रीकृष्ण के इस धरा पर उत्पन्न होने की घोषणा हुई समस्त देवगण, नक्षत्र, योगेन्द्र, ऋषि-मुनि, सिद्ध, अप्सरा, देवियाँ इत्यादि अपने-अपने लोकों से सूक्ष्मातीत रूप धर पृथ्वी की ओर गमन कर उठे । चाहे कैसी भी योनि मिले, स्त्री का रूप मिले या पुरुष का रूप, गौ का रूप मिले या असुर का रूप, नदी बनना पड़े, पुष्प बनना पड़े, लतायें बनना पड़े पर सबको प्रभु श्रीकृष्ण का सानिध्य चाहिये था, प्रभु श्रीकृष्ण की दिव्यता और अलौकिकता चाहिए थी। कौन दुर्भाग्यशाली ऐसा दिव्य और दुर्लभ अवसर खोना चाहेगा। जिनके दर्शनों के लिए सभी जप, तप और धर्म में संलग्न रहते हैं फिर भी जिनके दर्शन स्वप्न में भी दुर्लभ हैं वे आज स्वयं शरीर धारण करने जा रहे हैं, साक्षात् चर्म चक्षुओं से दिखाई पड़ने जा रहे हैं, जिन्हें अब स्पर्श किया जा सकता है जिनसे अब संवाद किया जा सकता है, जिनके साथ अब कर्म सम्पन्न किए जा सकते हैं तो ऐसी सर्व सुलभ स्थिति को कौन अपने हाथों से निकलने देना चाहेगा। 

           बड़े-बड़े योगी, सिद्ध, साधक इत्यादि गोप और गोपियाँ बन गये। देवता प्रभु श्रीकृष्ण की गौ बन गईं, अप्सराएं पुष्प और लताओं में परिवर्तित हो गईं। गंधर्व, किन्नर, यक्ष इत्यादि यमुना के जल में जलचर बनकर निवास करने लगे। गौ लोक से शापित दिव्य आत्माएं कृष्ण के हाथों मुक्ति पाने हेतु असुर बनकर उनके समक्ष आकर खड़े हो गये, कोई भी पीछे नहीं हटा । अतः शनि के तो इष्ट ही प्रभु श्रीकृष्ण हैं, प्रभु श्रीकृष्ण के ध्यान में शनि सदैव खोये रहते हैं, इतने ध्यान मग्न हो गये थे कि जब उनकी पत्नी रजोनिवृत्त हुईं तो पति सानिध्य प्राप्त करने हेतु शनि के समक्ष उपस्थित हुईं। शनि प्रभु श्रीकृष्ण के ध्यान में इतना खोये हुए थे कि दृष्टि ऊपर उठी ही नहीं, पत्नी को देख ही नहीं पाये आखिरकार वह इंतजार करते-करते थक गई और कुपित हो शाप दे बैठीं कि तुम्हारी दृष्टि सदैव नीची रहेगी अगर कभी दृष्टि उठाई तो सामने वाला भस्म हो जायेगा ।

         स्त्री शाप शनि को लग गया, जिसकी दृष्टि से सभी बचते हैं उसे आज उसकी स्त्री की ही दृष्टि लग गई । वह स्त्री कोप के कारण नपुंसक हो गया, वह स्त्री के कारण अभिशप्त हो गया। शनि ने भी बहुत कुछ झेला है, हाँ शनि बनने की भी अपनी एक प्रक्रिया है अपना एक रूदन है, अपनी तरह का एक विशेष एकाकीपन है। दर्दों से भरा हुआ है शनि का जीवन, आघातों से छलनी है शनि का सीना, मार खा खा कर जगह-जगह से टूटा फूटा है शनि, बस जीवित है यही काफी है। परिवार से तिरस्कृत है शनि फिर भी देव हैं, फिर भी सुपूज्य हैं क्योंकि उसका गुरु है शिव और गुरुमांता हैं काली एवं इष्ट हैं प्रभु श्रीकृष्ण । जो शनि देता है पहले उसे शनि ने झेला है, उसने अपनी माँ को अपने सौतेले भाइयों से पिटते देखा है, यम ने लात उठा ली थी छाया को मारने के लिए। छाया शनि की माता हैं। सूर्य ने छाया को दण्ड दिया, शनि ने अपनी माता को पिता के हाथों दण्डित होते देखा। 

        सूर्य की प्रथम पत्नी संज्ञा हैं जो कि विश्वकर्मा की पुत्री हैं, संज्ञा से यम और यमुना की उत्पत्ति हुई परन्तु संज्ञा सूर्य का तेज न झेल सकी अतः अपनी बहिन छाया को सूर्य के पास छोड़ पुनः पिता के घर चली गईं। छाया ने भी क्षदम रूप धारण कर रखा था वे हूबहू संज्ञा लगती थीं, सूर्य पहचान ही नहीं पाये । छाया से शनि, तप्ति एवं विष्टि का जन्म हुआ, शनि ने भी पारिवारिक कलह देखी। शनि ने भी परिवार के अजीब रिश्ते देखे, एक पिता और दो माताएं, सौतेले भाई बहिन, विश्वासघात, छल, प्रपंच, धोखा इत्यादि यही सब कुछ सूर्य के परिवार में हुआ और यही सब शनि प्रदान करते हैं जीवों को शनि की महादशा में। परम तेजस्वी पिता और तेजस्वी पुत्र में कभी नहीं पटती अतः सूर्य और शनि में कभी नहीं पटी। सूर्य और शनि में युद्ध भी हुआ, अनजाने में उत्पन्न हुई संतान बनकर रह गये शनि परन्तु इसमें शनि का क्या कसूर? जो कुछ किया वह तो संज्ञा और छाया ने किया, क्रोध में आकर सूर्य ने शनि को श्राप दे दिया,

उन्हें क्रूर दृष्टि वाला बना दिया। उन्हें अपने से दूरस्थ हो जाने का श्राप दे दिया। 

        शनि सूर्य का अंतिम सिरा हैं जहाँ पर सूर्य की किरणें विराम करती हैं वहीं ब्रह्माण्ड में शनि का उदय होता है। सूर्य ने शनि को अपने से इतना दूर कर दिया कि आज भी सूर्य की किरणें शनि ग्रह पर वक्र ही पहुँचती हैं, जहाँ शनि हैं वहाँ से सूर्य की किरणें पुनः वापस लौटने लगती हैं। इस ब्रह्माण्ड में सबसे कम सौर ऊर्जा शनि ग्रह को ही प्राप्त होती है। अन्य ग्रहों को तो प्रचुरता के साथ पुष्टिकारी सौर किरणें सीधे मिलती हैं परन्तु शनि को तो सूर्य वक्र दृष्टि से देखते हैं एवं उन पर सौर रश्मियाँ तिरछी प्रवाहित करते हैं। देवगणों में (जिसने सबसे ज्यादा झेला है, जो सबसे ज्यादा तिरस्कृत हुआ है वह हैं शनि । लोग तो 19 वर्ष की शनि की महादशा में टूट जाते हैं, शनि के साढ़े साती लगने पर चरमरा जाते हैं,शनि की ढैया में खटिया पकड़ निस्तेज हो जाते हैं परन्तु शनि तो अपने जीवन काल से लेकर आज तक पिता का कोप झेल रहे हैं, परिवार का तिरस्कार झेल रहे हैं, सौर मण्डल के अनेक ग्रह उन्हें निरंतर शत्रु भाव से देखते रहते हैं फिर भी वे अस्तित्ववान बने हुए हैं। यही उनकी महानता है।

         माँ यशोदा मुस्कुरा मुस्कुरा कर बाल गोपाल कृष्ण के श्रीमुख का दर्शन सभी को करा रही थीं, ऋषि-मुनि, विद्वान, सभी कृष्ण की एक झलक देख परमावस्था को प्राप्त कर रहे थे तभी किसी ने कहा कि बाहर दरवाजे पर शनि देव भी आये हैं कृष्ण की एक झलक हैं देखने हेतु, मां यशोदा क्रोधित हो गईं तुरंत बालक श्रीकृष्ण के माथे पर बड़ा सा काजल का टीका लगा दिया और गले में बजर बट्टू की माला पहना दी कि कहीं बालक श्रीकृष्ण को शनि की नजर न लग जाये एवं तुरंत बाहर आयीं और बोलीं हे शनि देव आप यहाँ से प्रस्थान कीजिए बाल गोपाल अभी सो रहे हैं उनके दर्शन सम्भव नहीं हैं परन्तु शनि समझ गये अपने दुर्भाग्य को, उनका हृदय अपने इष्ट के दर्शन न कर पाने के कारण फटा जा रहा था, वहीं पर दहाड़ मार-मार कर विलाप करने लगे। भक्त का दारूण विलाप इतना प्रचण्ड था कि भगवान आखिरकार द्रवित हो ही गये और उनके सामने उपस्थित हो बोले तुम्हारी तपस्या सफल हुई, शनि मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूँ जी भरकर देख लो और शनि यमुना के जल में प्रभु श्रीकृष्ण की अप्रितम् छवि निहारने लगे फिर भी नजरें ऊपर नहीं की कि कहीं भक्त की नजर भगवान को न लग जाये, मात्र यमुना के जल में ही कृष्ण दर्शन करते रहे। 

        भक्त और भगवान के इस पवित्र मिलन में यमुना भी शामिल हो गई क्योंकि यमुना शनि की ही बहिन हैं। भगवान को आज सच्चा भक्त मिल गया वे बोल उठे हे शनि तुम यही स्थित हो जाओ यमुना किनारे शिला बनकर एवं तुम्हारे सानिध्य में ही मैं रासलीला करूंगा, तुमसे ही टिककर मैं खड़ा होऊंगा, मेरे साथ साथ अनेकों दिव्य आत्माएं गोपियां बनकर तुम्हारे सामने शरद पूर्णिमा की रात्रि में ब्रह्माण्ड का सबसे दिव्य महोत्सव रासलीला सम्पन्न करेंगे। सभी ग्रहों में मात्र तुम्हें ही मेरा सानिध्य सबसे ज्यादा प्राप्त होगा, तुम्हारे ऊपर ही बैठकर मैं वंशी की धुन छेडूंगा, तुम्हारे ही सानिध्य में मैं राधा का मान मर्दन भी करूंगा और ऐसा ही हुआ। वृन्दावन में आज भी उस स्थान पर दिव्य शनि शिला विराजमान है यमुना के किनारे जहाँ पर भगवान ने लीला की थी। 

         संज्ञा के विरह में व्याकुल सूर्य अपने ससुर विश्वकर्मा के पास पहुँचे, वे तंग आ चुके थे अपने तेज से एवं पुनः संज्ञा को प्राप्त करना चाह रहे थे। उन्होंने विश्वकर्मा से अनुरोध किया कि वे उनके तेज को कम कर दें। विश्वकर्मा ने सूर्य को खराद कर उन्हें सम तेजस्वी बना दिया और इस प्रकार वे पुनः संज्ञा को प्राप्त कर सके। इस बार सूर्य और संज्ञा ने अश्व रूप धारण कर अश्विनी कुमारों की उत्पत्ति की जो देव वैद्य कहलाये। शनि को समझना है तो सौर परिवार को समझना पड़ेगा, सूर्य पत्नियों को समझना पड़ेगा, सूर्य को समझना पड़ेगा। यह ब्रह्माण्ड कुछ भी नहीं बस सौर परिवार की एक चलती फिरती कहानी है जिसमें शनि भी हैं, यम भी हैं, यमुना भी हैं, ताप्ति भी हैं, संज्ञा भी हैं, छाया भी हैं। हैं तो यह सब एक ही, उत्पन्न तो यह सब सूर्य से ही हुए हैं एवं इनके अंदर भी सूर्य की ऊर्जा ही प्रवाहित है, सबके सब अपने पिता की ही परिक्रमा कर रहे हैं अपने-अपने परिवार के साथ वृहस्पति और शनि इस सौर परिवार के दो विशालकाय ग्रह हैं। 

          शनि आकृति में वृहस्पति से बस कुछ ही छोटे हैं, ये दोनों ग्रह गैसों के विशाल पिण्ड हैं परन्तु शनि के साथ एक विहंगमता है वे इस नक्षत्र मण्डल के सबसे हल्के ग्रह हैं, उनका घनत्व सबसे कम है। पृथ्वी शनि की अपेक्षा में ज्यादा भारी है परन्तु वह शनि की अपेक्षा आठ सौ गुना ज्यादा छोटी है। 

शनि को भक्षण का बड़ा शौक है, प्रारम्भ का सूर्य इतना तेजस्वी था कि उससे अनेकों छोटे-छोटे ग्रह, उल्कायें, अविक्सित पिण्ड, आधे-अधूरे ग्रह इत्यादि निर्मित हो गये थे परन्तु शनि एक एक कर छोटे-छोटे ग्रहों को खाने लगे अपने ही भाइयों का भक्षण करने लगे और विशाल रूप लेते गये। जो भी उल्का पिण्ड मिलता, जो भी नवजात ग्रह मिलता उसे शनि लील लेते, अपने आपमें समाहित कर लेते। सूर्य ने समझाया परन्तु शनि नहीं मानें आखिरकार सूर्य ने शिव को मदद के लिए पुकारा, शिव ने भी शनि को चेतावनी दी परन्तु शनि उद्दण्डता कर बैठे, अभिमान ग्रस्त हो बैठे एवं शिव पर दृष्टि डाल दी शिव लोक पर शनि की दृष्टि ने ही दक्ष यज्ञ विध्वंश काण्ड को निर्मित किया। 

         दक्ष शिव निंदा कर बैठे पार्वती योगाग्नि में भस्म हो गईं। दक्ष का मर्दन हुआ, कितनी गर्दनें कीं दक्ष यज्ञ में कितने ऋषि मुनि अंग भंग हुए दक्ष यज्ञ में विष्णु को भी पराजित होना पड़ा, ब्रह्मा को भी अपमानित होना पड़ा। इन्द्रादि देवता भी वीरभद्र और काली के हाथ प्रताड़ित हुए। शनि की तिरछी दृष्टि में छिन्नमस्ता चलती हैं सब कुछ छिन छिन कर देती हैं। मस्तक धड़ से छिन्न हो जाते हैं, लहु की धाराएं फूट पड़ती हैं। शिव समझ गये थे कि यह शनि का अतिक्रमण है शिव लोक पर क्रोध में आकर शिव ने अपने त्रिनेत्रों से शनि की तरफ देखा, देखते ही देखते वह धूसर हो गया, काला पड़ गया, श्याम रंग में परिवर्तित हो गया। आज भी शनि की महादशा जातक को काला, मलीन कर देती है। क्रोधवश शिव ने त्रिशूल उठा शनि पर प्रहार कर दिया, शिव ने सूर्य को भी त्रिशूल से मारा है। सूर्य भी मूर्च्छित हो गये थे वह तो कश्यप के कहने पर शिव ने सूर्य को पुनः प्राण प्रतिष्ठित कर दिया था। आज शिव ने शनि की उद्दण्डता हेतु उस पर त्रिशूल से प्रहार किया था प्रहार ने शनि को तिरछा कर दिया, तबसे लेकर आज तक शनि सबसे ज्यादा तिर्यक ग्रह हैं, तिरछा अपनी धूरी पर घूमता है। 

        सूर्य में पितृत्व फूट पड़ा वे शिव से याचना करने लगे शनि के जीवन हेतु। शनि भी शिव की शक्ति को समझ गया और वचन दे उठा कि वह शिव भक्तों को कभी परेशान नहीं करेगा एवं वह शिव भक्तों के लिए सदैव कल्याणकारी रहेगा। वह शिव लोक में फिर कभी प्रविष्ट होने की कुचेष्टा नहीं करेगा तब जाकर शिव ने शनि को माफ किया और उसे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया। शनि भी अब शिव की कृपा प्राप्त कर शिव गण बन बैठे एवं उनका भी रुद्राभिषेक होने लगा, उनके समक्ष भी जन मानस लघु रुद्रीय, अति रुद्रीय पाठ करने लगे। वे भी शिवांश बन बैठे और शिव के संहार कर्मों में उनकी आज्ञानुसार सहायता प्रदान करने लगे। 

       शनि के पुत्र हैं मंदी, खर, सुप्त, कुन्द, वृद्ध, क्षय, विकृत, चौर्य इत्यादि-इत्यादि । ये शनि से भी ज्यादा प्रचण्ड क्रूर एवं तीक्ष्ण हैं। मंदी आ गई व्यापार में, बुद्धि में मंदी आ गई तो मंद बुद्धि बन बैठे, हृदय की धड़कन मंद हो गई तो खाट पकड़ ली, पाचन संस्थान मंद हो गया तो शरीर निस्तेज हो गया। सूर्य के एक पुत्र हैं वृद्ध जो सभी को वृद्धावस्था प्रदान करते हैं। कौन चाहता है कि व्यापार मंद हो, काम शक्ति मंद हो पर शनि पुत्र मंदी जातक के कर्मानुसार कुछ भी मंद कर सकते हैं। वृद्ध, वृद्धि को रोक देते हैं एवं तीस वर्ष की उम्र में ही बूढ़ा कर देते हैं। शनि के एक पुत्र हैं चौर्य, जो चोर दृष्टि प्रदान करते हैं एवं जातक को चोरी करने हेतु प्रेरित करते हैं। कृष्ण भी माखन चुराने लगे थे। शनि पुत्र खर जहाँ बैठ जायें वहाँ शिशुपाल, दुर्योधन जैसे लम्पट कर्म करने वाले, अनाप-शनाप प्रलाप करने वाले उत्पन्न हो जाते हैं। खर बुद्धि वाले ही भगवान को गाली बकते हैं, गुरु को गाली बकते हैं, धर्म की निंदा करते हैं और पतोन्मुखी होते हैं। 

          आज तक किसी को नहीं मालूम कि शनि के कितने उपग्रह हैं? यही ज्योतिषियों के लिए, अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए, खोजियों के लिए आज भी रहस्य बना हुआ है। गैलेलियो ने सर्वप्रथम शनि को दूरबीन से देखा तो वह चकरा गया। प्रतिदिन उसे शनि के इर्द-गिर्द भिन्न-भिन्न प्रकार के चंद्रमा दिखाई देते, कभी कोई लुप्त हो जाता तो कभी कोई उदित हो जाता। अचानक एक दिन गैलेलियो ने शनि के एक विशेष चंद्रमा को देखा आप जानते है शनि का एक विशेष चंद्रमा इस नक्षत्र मण्डल का सबसे चमकीला उपग्रह है, पृथ्वी के चंद्रमा से कई करोड़ गुना ज्यादा प्रकाशवान हैं, वह पूर्ण रूप से हिम का बना हुआ है। उसकी सतह इतनी स्वच्छ है कि पृथ्वी पर बना उच्च से उच्च कोटि का श्रेष्ठतम दर्पण भी उसके आगे फीका है। जिस दिन गैलेलियो ने इसके दर्शन किए दूसरे ही दिन राज आज्ञा के कारण गैलेलियो की दोनों आँखें फोड़ दी गईं, उन्हें भारी कीमत चुकानी पड़ी अपने जीवन में इस उपग्रह के दर्शन हेतु।

        शनि अपने उपग्रहों को खा भी जाता है और पुनः उगल भी देता है। यही एकमात्र ग्रह है जो उपग्रहों को उगलता और निगलता रहता है एवं यही सब कुछ शनि की छाया में आये जातक के साथ भी होता है सृष्टि के प्रारम्भ में उद्दण्ड आकाश ने पृथ्वी के साथ गमन किया और अनेकों पुत्र रूपी ग्रह मण्डलों नक्षत्रों को निरंतर उत्पन्न करते गया। कुछ एक को छोड़ अव्यवहारिक आकाश रूपी पिता ने अन्य ग्रह रूपी पुत्रों को अनाथ छोड़ दिया, उन्हें कक्षा प्रदान नहीं की, उन्हें लय प्रदान नहीं की, उन्हें प्रकाश प्रदान नहीं किया, उन्हें सम्मान प्रदान नहीं किया। कहीं न कहीं पितृ धर्म की अवहेलना हुई। आदि सूर्य ने और तो और इन सबका भक्षण शुरु कर दिया। माता से यह देखा नहीं गया उन्होंने अपने तिरस्कृत पुत्रों को पिता से बदला लेने के लिए कहा, शनि ने ही सिर्फ माता की आज्ञा मानी और हँसिये से आकाश रूपी पिता के अंगों को काट लिया परन्तु पिता ने श्राप दे दिया कि तेरी मृत्यु भी तेरे द्वारा उत्पन्न संतानों से ही होगी। 

        शनि का विवाह रिया देवी के साथ सम्पन्न हुआ। रिया से उत्पन्न पुत्रों को शनि अपनी मृत्यु भय के कारण भक्षण करते जाते परन्तु एक पुत्र को रिया देवी ने बचा लिया और उसके स्थान पर लाल वस्त्र से एक ढका हुआ एक काला पत्थर रख दिया। शनि उसे पुत्र समझकर भक्षण कर गये और इस प्रकार शनि का एक पुत्र बच गया। जिसने कालान्तर शनि को वमन कराकर अपने सभी भाइयों को पुनः शनि के मुख से आजाद करा लिया। शाहजहाँ पर साढ़े साती लगी तो औरंगजेब ने उसे कैद कर लिया। दारा -शिकोह पर साढ़े साती लगी तो औरंगजेब ने उसे षडयंत्र पूर्वक मार डाला। पिता को मारकर पुत्र गद्दी पर बैठते हैं, पिता और पुत्र में संघर्ष होता है। कंस भी देवकी की संतानों को एक- एक करके मार रहा था वासुदेव पर साढ़े साती लगी हुई थी परन्तु जब कंस पर साढ़े साती लगी तो कृष्ण पैदा हो गये। साढ़े साती उलट भी जाती है, यही शनि महात्म्य है। 

        नीली आभा लिये हुआ शनि ग्रह सौ जन्मों तक भी जातक को कर्म बंधनों से मुक्त नहीं होने देता। शनि कर्म के सिद्धांत पर क्रियाशील होते हैं एवं जैसे ही जातक को शनि की महादशा प्रारम्भ होती है उसके सौ जन्म के बचे हुए गुप्त कर्म, पाप कर्म, अभिशप्त कर्म, शापित कर्म एक-एक करके फूटने लगते हैं और जातक इन कर्मों के फलों को भोगते हुए पुनः नित्य, शुद्ध और बुद्ध के रूप में परिवर्तित होता है। शनि देव का पद परम न्यायधीश का पद है। शनि का तो उवाच ही है कि लोग मुझे बुरा कहते हैं परन्तु अपने बुरे कर्मों को नहीं देखते। वे तो इस कर्म आधारित जग में कर्मों की परिभाषा ही प्रमाणित करते हैं। जो किया है वह भोगना पड़ेगा, उसका प्रायश्चित करना ही होगा पुनः शुद्ध कर्मों की ओर अग्रसर होना ही होगा। कर्म फल से कोई नहीं बच पायेगा, कर्म के सिद्धांत की मर्यादा का सबको पालन करना पड़ेगा अन्यथा पंचभूतीय शरीर नहीं मिलेगा। पंचभूतीय शरीर अधिकांशतः कर्म सिद्धांतों का पालन करने हेतु ही मिलता है केवल पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ भोग सम्पन्न होता है। अन्य योनियों में, अन्य ग्रहों पर यह सम्भव नहीं है।
                          शिव शासनत: शिव शासनत:

किसे कहते हैं आभामंडल ,औरा, प्रभामंडल, प्राणशक्ति या विद्युत शक्ति ।।

औरा का लेटीन भाषा मे अर्थ बनता है "सदैव बहने वाली हवा"। औरा इसी अर्थ के मुताबिक यह सदैव गतिशील भी होती है। विभिन्न देशो मे इसे विभिन्न नामो से जाना जाता है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रचलित नाम औरा, प्रभामंडल, या ऊर्जामंडल है।

प्राणियों का शरीर दो प्रकार का होता है 
1. स्थूल शरीर 
2. शूक्ष्म शरीर

स्थूल शरीर जन्म के बाद जो शरीर सामने दिखाई देता है, वह स्थूल शरीर होता है, इसी स्थूल शरीर का नाम दिया जाता है, इसी के द्वारा संसारी कार्य किये जाते है, इसी शरीर को संसारी दुखों से गुजरना पडता है और जो भी दुख होते हैं | भौतिक शरीर के अतिरिक्त प्रकाषमय और ऊर्जावान एक शरीर और होता है जिसे सूक्ष्म शरीर अथवा आभामण्डल { औरा }कहते हैं। हमारे शरीर के चारों तरफ जो ऊर्जा का क्षेत्र है वही सूक्ष्म शरीर है। सूक्ष्म शरीर ने हमारे स्थूल शरीर को घेर रहा है। इसे जीवनी शक्ति या प्राण शक्ति भी कहते हैं इसका कार्य सारे शरीर में एवं सूक्ष्म नाडियों में वायु प्रवाह को नियंत्रित करना तथा सूक्ष्म ऊर्जा प्रदान कर शरीर को क्रि्रयाशील रखना है प्राण के निकल जाने पर शरीर मृत हो जाता है एवं प्राण के कमजोर होने पर शरीर कमजोर होता जाता है तथा बीमारियों से लडने की शक्ति समाप्त होने लगती है।
 अपने इष्ट देव की मूर्ति या पोस्टर सभी मनुष्य अपने घर या कार्यस्थल पर अवश्य रखते हैं। इन मूर्ति या पोस्टर में जो भी देव हैं उनके मस्तिष्क के बराबर पीछे की ओर सप्तरंगीय ऊर्जा तरंगे निष्कासित होती रहती है व एक गोलीय चक्र सा प्रतिबिंब रहता है वही उनका आभामण्डल या औरा चक्र होता है। यह आभामण्डल जीव मात्र- मनुष्य, जीव-जंतु, पशुओ, पेड़-पौधे, पदार्थों के इर्द-गिर्द एक प्रकाश पुंज रहता है। प्रत्येक मनुष्य का अपना एक आभामण्डल या औरा होता है। जिसके कारण से ही दूसरे अन्य मनुष्य उससे प्रभावित होते हैं। यह आभा मनुष्य के संपूर्ण शरीर से सतरंगी किरणों के रूप में अंडाकार रूप में उत्सर्जित होती रहती है। 
हमारे शास्त्रों में वर्णित जो तथ्य हैं जैसे तुलसी की पूजा, पीपल की पूजा, ब़ड का महत्व, सफेद आक़डे का महत्व, गाय को पूजनीय बताना, आखे, नमक का महत्व आदि कई बातें सहज किवदन्तियां या कथानक की बातें नहीं हैं, ये सब वैज्ञानिक सत्य पर आधारित हैं। इन सबकी ऑरा ऊर्जा इतनी अधिक है कि ये सभी हमें सुरक्षा प्रदान करते हैं। शारीरिक और मानसिक तौर पर हमें स्वस्थ रख सकते हैं। इनके सान्निध्य में आभा मण्डल का विकास होता है। वृक्षों में शास्त्रोक्त जिनका महत्व दर्शाया गया है जैसे ब़ड इसकी ऑरा एनर्जी 10.1 मीटर है, कदम्ब पे़ड की 8.4 मीटर है, तुलसी की 6.11 मीटर, नीम की 5.5 मी., आंवला की 4.3 मी., आम की 3.5 मी. पीपल की 3.5 मी., फूलों में ओलिएन्डर 7.2 मी., कमल 6.8 मी., गुलाब 5.7 मी., मेरीगोल्ड 4.7 मी., लिलि 4.1 मी. एवं आश्चर्यजनक तौर पर सफेद आक़डे के फूल (जो शिव भगवान को चढ़ाए जाते हैं) की ऑरा 15 मी., गाय के घी की 14 मी., गोबर की 6 मी., पंचकर्म की 8.9 मी., गाय के दूध की 13 मी., गाय दही की 6.9 मी., गाय की पूजनीयता स्पष्ट है। इसी तरह पूजन सामग्री में नारियल का महत्व इसकी ऑरा एनर्जी 10.5 मी. होने से है। अक्षत चावल 4.9 मी., कपूर 4.8 मी., क्रिस्टल नमक 4.8 मी., सफेद कोला 8.6 मी., कुमकुम 8 मी., अगरबत्ती सुगंध के अनुसार 5-15 मी.। जिनका महत्व हमारे दैनिक जीवन में है उन सबका ऑरा एनर्जी अधिक होने की वजह से उन्हें धर्मशास्त्रों में उल्लेखित किया है।

आभा मंडल { औरा } का बीमारियो से सम्बन्ध 
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वास्तव मे यह प्राणी के शरीर से निकलने वाली प्रज्वलित शक्ति किरणे है जिसकी ऊर्जा हर व्यक्ति में रहती है। इस प्रभामंडल का संचालन हमारे शरीर के 7 चक्र करते है, और ये चक्र हमारी मानसिक शारीरिक, भावनात्मक इत्यादि कई कडियो से जुडकर औरा के रूप मे हमारे वर्तमान वक्त के दर्पण को तैयार करते है। जिसे देखकर और उसमे जरूरत के अनुसार बदलाव लाकर हम आने वाली, या तत्कालिक समस्याओ से निजात पा सकते हैं।                 

इसको संचालित करने वाले चक्र हैं
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1. मूलादार चक्र -- इसका रंग लाल है और इसका सम्बन्ध हमारी शारीरिक अवस्था से होता है, इस चक्र के ऊर्जा तत्व मे असंतुलन , रीढ की हड्डी मे दर्द होना, रक्त और कोशिकाओ पर तथा शारीरिक प्रक्रियाओ पर गहरा असर डालता है। 

2.स्वधिष्ठान चक्र -- इसला रंग नारंगी है और इसका सीधा संबन्ध प्रजनन अंगो से है, इस चक्र के ऊर्जा असंतुलन के कारण इंसान के आचरण, व्यवहार पर असर पडता है।

3.मणिपुर चक्र -- इसका रंग पीला है और यह बुद्धि और शक्ति का निर्धारण करता है, इस चक्र मे असंतुलन के कारण व्यक्ति अवसाद मे चला जाता है, दिमागी स्थिरता नही रह जाती।

4. अनाहत चक्र -- इसका रंग हरा है और इसका संबन्ध हमारी प्रभामंडल की शक्तिशाली नलिकाओ से है, इसके असंतुलित होने के कारण, इसान का भाग्य साथ नही देता, पैसो की कमी रहती है, दमा, यक्ष्मा और फेफडे से समबन्धित बिमारीयों से सामना करना पड सकता है।

5. विशुद्ध चक्र -- इसका रंग हल्का नीला है और इसका सम्बन्ध गले से और वाणी से होता है, इसमे असंतुलन के कारण वाणी मे ओज नही रह पाता, आवाज ठीक नही होती,टांसिल जैसी बीमारियो से सामना करना पडता है।

6. आज्ञा चक्र -- गहरा नीले रंग का ये चक्र दोनो भौ के बीच मे तिलक लगाने की जगह स्थित है, इसका अपना सीधा सम्बन्ध दिमाग से है, इस चक्र को सात्विक ऊर्जा का पट भी मानते है, मेरा ये मानना है कि अगर परेशानियाँ बहुत ज्यादा हो तो सीधे आज्ञा चक्र पर ऊर्जा देने से सभी चक्रो को संतुलन मे लाया जा सकता है।

7. सहस्रार चक्र -- सफेद रंग से सौ दलो मे सजा ये चक्र सभी चक्रो का राजा है, कुडलनी शक्ति जागरण मे इस चक्र की अहम भूमिका है, आम जिन्दगी मे यह चक्र कभी भी किसी मे सम्पूर्ण संतुलन मे मैने नही देखा है, वैसे ये पढने मे आया है कि, जिस व्यक्ति मे यह चक्र संतुलित हो वो सम्पूर्ण शक्तियों का मालिक होता है।
प्रभामंडल को ऊर्जामान करके उपस्थित सभी विकारो को दूर किया जा सकता है। इन्सान की व्यक्तिगत अच्छाइयों, कर्मो से आभा मण्डल विकसित होता है। सद्पुरूषों, महापुरुषों , विशेषज्ञों के आभा मण्डल 30 से 50 मीटर तक पाये गये हैं।

आभा मंडल की कमी के कारण
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हमारे जीवन में भौतिक सुख-सुविधा के साधनों में- मोबाईल, इलेक्ट्रिक एवं इलेक्ट्रोनिक्स साधन है ये एक मैग्नेटिक ऊर्जा का निर्माण कर विकिरण पैदा करते हैं। मोबाईल, फ्रीज, एसी, टी.वी., कंप्यूटर आदि अन्य सभी से नेगेटिव ऊर्जा निकलती है जो हमें नुकसान पहुंचाती रहती है। यह सत्य है कि आभामण्डल, स्प्रिट एनर्जी आध्यात्मिक ऊर्जा व नकारात्मक ऊर्जा से यह तीसरी मैग्नेटिक ऊर्जा का प्रभाव मन्द गति होने की वजह से हमें प्रतीत नहीं होता है। धीरे-धीरे इस ऊर्जा का प्रभाव हमारे

शरीर व मन-मस्तिष्क पर होता रहता है।इनके अलावा भी घर, आफिस, दुकान, फैक्ट्री में भी नकारात्मक ऊर्जा का एक कारण वास्तु दोष भी है। यदि भवन, आफिस, व्यवसाय स्थल वास्तु के नियमों में नहीं है तो उससे भी नेगेटिव ऊर्जाओं का प्रभाव बना रहता है।काम, क्रोध, मोह, लोभ, मद, अहंकार छः मनुष्य के शत्रु हैं। व्यक्ति द्वारा इन छः कर्मों में संलग्न होने से आभामण्डल क्षीण या कम होता जाता है। हम निरंतर एक दूसरे को भला बुरा कहते रहते है। एक दूसरे को डाँटते-फटकारते रहते है। निरंतर अपने नकारात्‍मक भाव व विचार क्रोध-आक्रोश भय चिंता,विवशता आदि-आदि दूसरों को संप्रेषित करते रहते है। आभामण्डल की ऊर्जा तरंगं टूट जाती है तथा आभामण्डल के कमजोर होते ही व्यक्ति में सोचने-समझने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है। एक साधारण इंसान का औरा या आभामण्डल 2 से 3 फीट तक माना जाता है। आभामण्डल का आवरण इस माप से नीचे जाने पर व्यक्ति मानसिक व भौतिक रूप से विकृत हो जाता है या टूटने लगता है। इस स्थिति में उसका आत्म बल भी कम हो जाता है। व्यक्ति की यह स्थिति जीवन में कष्ट या दुःख वाली कहलाती है। मृत व्यक्ति का औरा 0.5 या 0.6 रह जाता है।

आभा मण्डल सीधा अपने कर्मो से जु़डा रहता है। काम-क्रोध, मोह-माया, झूठ आदि जो मानव स्वभाव की प्रकृति के विपरीत हैं, उनमें संलग्न होने से आभा मण्डल क्षीण हो जाता है। एक साधारण स्वस्थ इंसान जिसका आभा मण्डल 2.8 से 3 मीटर तक माना जाता है, इससे भी नीचे जाने लगता है तब मानसिक एवं भौतिक तौर पर बीमार होकर मृत्यु की तरफ बढ़ता रहता है। तब मृत्यु पर ऑरा 0.9 मीटर जो मिट्टी या पंचभूत की अवस्था में पहुंच जाता है। आभा मण्डल के विकास के लिए हम धार्मिक स्थानों पर नियमित पूजा-पाठ, मन्त्रोच्चार, सत्संग आदि से सकारात्मक होते जाते हैं एवं जीवन में गुणात्मक परिवर्तन आने लगता है। वहीं गलत साहित्य, आधुनिक तथाकथित नाच-गाने, फास्टफूड, कल्चर से negative वातावरण, negative विचार,विपरीत आहार से सब सीधे आपका आभा मण्डल का ह्रास करते हैं इसलिए यह घटता-बढ़ता रहता है। अगर आप अपना आभा मण्डल विकसित करते हैं तो सही समय पर सही निर्णय लेकर सही सलाहकार ढूंढ लेंगे एवं सही राय से आप सही दिशा में कार्य करेंगे।
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