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श्री व्यासपीठाय नमः ।।

      भगवान वेदव्यास ने 18 पुराणों का पुनरुद्धार किया उन्हें वर्गीकृत किया। चारों वेदों को श्रृंखलाबद्ध किया उपनिषदों की रचना की अनेकों दिव्य मंत्र रचे यहां तक की महाभारत की रचना भी उनके श्री कर कमलों के द्वारा हुई। सृष्टि का समस्त ज्ञान उन्होंने अपने एक जीवन में रच कर रख दिया। लोग तो एक शब्द भी नहीं लिख पाते पर उन्होंने दिव्य शिव ज्ञान को मानव समाज के लिए एक जीवन में ही सूचीबद्ध संकलित संरक्षित एवं लिपिबद्ध करके रख दिया।

        जब भगवती त्रिपुर सुंदरी की आज्ञा होती है तभी जातक को शिव के षष्टम अर्थात छठेवें ऊर्ध्व मुख का साक्षात्कार होता है। शिव के 5 मुख के बीच उनका अति गोपनीय ऊर्ध्व की तरफ उठा हुआ षष्ठम मुख्य स्थापित है यही षष्ठम मुख्य समस्त आगम ज्ञान का ग्रहणर्कता है। दिव्य महा कैलाश में शिवजी अर्ध चंद्रासन रूपी आसन पर विराजमान हो दिव्य व्यास गुफा में ज्ञान का संग्रहण करते हैं इस गुफा के बाहर शिवजी अपनी पादुकाई छोड़ जाते हैं और शिव लोक में रहने वाले समस्त जीव जब तक कि शिवजी गुफा से बाहर नहीं आते जाते इन पादुका को ही गुरु मानकर उसी का ही पूजन भजन करते हैं। 

          किसको कितना गुरुत्व को देना है किस के अंदर कितने गुणों का विकास करना है कब तक एक जातक विशेष में गुरुत्व की स्थापना करनी है किस युग में किसे जगत गुरु के रूप में स्थापित करना है कब किसके द्वारा ज्ञान विज्ञान की विशेष श्रृंखला उद्धारित करवानी है किसके हाथों से किस विशेष ग्रंथ काव्य या मंत्र इत्यादि की संरचना करवानी है इन सब का निर्माण दिव्य महा कैलाश में स्थित व्यास पीठ पर बैठकर भगवान शिव निश्चित करते हैं। इस ब्रह्मांड में ज्ञान का कितना गुरुत्व प्रवाहित करना है इन सब निर्णयों का एकाधिकार भगवान शिव के व्यास अवतार को है। दिव्य व्यास गुफा के बाहर जब भगवान शिव व्यास आसन पर परम गुरु के रूप में प्रतिष्ठित होते हैं तब उनके बाएं और भगवती उमा साक्षात सरस्वती रूप में विराजमान होती है एवं गणेश जी दाएं और विराजते हैं और सामने गुरु मंडल के दिव्य गुरु सिद्ध इत्यादि पूर्ण शिष्य भाव में भगवान शिव को निहारते हैं। शिव उवाच ऐसे ही प्रारंभ नहीं हो जाता जब उमा भगवान शिव से प्रश्न करती है तब शिव अपने श्री मुख से ज्ञान की दिव्य धारा प्रवाहित करते हैं और उमा इस समय स्वयं शिव की तरफ मुख करके बैठती है एवं गुरु मंडल और सिद्ध मंडल के साधकों की तरफ से प्रश्न करने का अधिकार केवल उमा को होता है उमा शालीनता के साथ शिव से प्रश्न करती है और शिव प्रसन्नता के साथ उमा की एक-एक शंकाओं का सास्वत निवारण करते हैं। 

           कालांतर शिव के मुख से उच्चारित दिव्य ज्ञान को गुरु मंडल एवं सिद्ध मंडल संकलित करता है सूचीबद्ध करता है और जब जब जरूरत पड़ती है तब तब शिव की आज्ञा से ज्ञान विशेष की आवृत्ति या सृष्टि में योग्यता अनुसार प्रवाहित की जाती है और इस प्रकार ज्ञान गंगा का सृजन होता है।

          ज्ञान गंगा भी आदिशक्ति गंगा के समान उन्मत्त होती है। किसी भी जीव में इतनी शक्ति नहीं कि वह ज्ञान गंगा को आत्मसात कर सके तब भगवान शिव महर्षि व्यास के रूप में किसी ना किसी को उदित करते हैं जो ज्ञान गंगा को अपनी जटाओं में समेट कर उसे सुगमता के साथ पृथ्वी पर प्रवाहित कर सकें पृथ्वी के योग्य उसे अनुकूल कर सके। धर्म का लोप क्यों होता है? दिव्य शिव ज्ञान आज की गंगा के समान प्रदूषित क्यों हो जाता है क्योंकि कुछ असुर प्रवृत्ति के जातक राज्य की कुत्सित भावनाओं से पृथ्वी से चिपके हुए होते हैं जब ब्रह्मा को शिव ने सृष्टि रचना का अधिकार दिया तब उन्होंने स्पष्ट कहा कि रचना कल्याणकारी होनी चाहिए शिवानुरूप होनी चाहिए परंतु दुर्भाग्य से कुछ रचनाएं शिव विरुद्ध हो गई और वे शिव शासन को त्याग कर स्वशासन के मार्ग पर चल बैठी। ऐसी रचनाएं असुर स्थापनाये कहलाई और इस प्रकार असुर धर्म का उदय हुआ।  
                पूजा करने का अधिकार उपासना करने का अधिकार अनुष्ठान करने का अधिकार इत्यादि का निर्णय भी व्यासपीठ से ही तय होता है। व्यासपीठ भगवान शिव की सर्वोच्च पीठ है। मैं किसी भौतिकी या सांसारिक पीठ एवं ट्रस्ट की बात नहीं कर रहा हूं हो सकता है भगवान व्यास के नाम से कोई सांसारिक या भौतिक पीठ रजिस्टर्ड हो अतः उससे हमें कोई लेना देना नहीं है हम तो शिवलोक के दिव्य गुरु मंडल में स्थापित व्यासपीठ की बात कर रहे हैं। लोग कहते हैं हमारा मंत्र जप में मन नहीं लगता अनुष्ठान के समय वे ऊंघते है तीन घंटे की फिल्म देख सकते हैं परंतु एक घंटे भी अनुष्ठान में नहीं बैठ सकते। बहुत से लोगों को पूजा पर विश्वास नहीं होता अनुष्ठान उन्हें अवैज्ञानिक लगते हैं ऐसा क्यों? किसने दिया इन्हें अधिकार। पूजन उपासना मंत्र जप अनुष्ठान गुरु सानिध्य इत्यादि के क्षण दिव्य एवं विहंगम होते हैं और जातक की अति सूक्ष्मातीत कुंडलिनी को जागृत करने का निर्मित होते हैं जब तक शिवकृपा नहीं होगी भगवती त्रिपुर सुंदरी का आशीर्वाद नहीं होगा जातक इन सब में निमग्न नहीं हो सकता और जो निमग्न हो गया फिर वह कहीं और मगन नहीं होगा। 
             भाग्य क्या है? सौभाग्य क्या है? मैं मानता हूं कि वास्तविक भाग्योदय तभी होता है जब जातक आध्यात्म के विशुद्ध पथ पर भगवती त्रिपुर सुंदरी की कृपा से आ जाता है। यह राजपथ है जिस प्रकार मुख्य सड़क पर वाहन चलाना अत्यधिक अनुकूल होता है ठीक उसी प्रकार राजपथ रूपी विशुद्ध अध्यात्म के पथ पर चलना श्रेष्ठतम अनुकूलन है। कब तक चलोगे पगडंडियों पर कच्चे रास्तों पर टेढ़ी-मेढ़ी डगरो पर। बड़ी फिसलन है बड़े खतरे हैं फिसलना मत फिसले तो कीचड़ में सराबोर हो जाओगे।
           जब गुरुत्व शक्तिपात के माध्यम से प्राप्त होता है तभी पांव में इतनी शक्ति आती है कि अंधकार में भी फिसलन से भी ऊबड खाबड़ रास्तों पर भी कदम नहीं डगमगाते। जहां कदम रखते हैं वही कदमों के निशान बन जाते हैं इसलिए गुरु की चरण पादुका पूजी जाती है। व्यास आए इस पृथ्वी पर आज भी हैं इस पृथ्वी पर कुंडलिनी शक्ति धारण किए तेजोमय प्रकाश शरीर में। आज भी उनकी खड़ाऊ रखी हुई है खड़ाऊं पहन कर वे पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण में डग भरते रहे पग भरते रहे पर कहीं पांव फिसले नहीं पांव भटके नहीं कहीं पांँव उलझे नहीं कहीं किसी घररौंदो मैं पहुंच सुस्त होकर टिके नहीं चलते रहे निरंतर गतिमान रहे। शंकराचार्य जी को ब्रह्म सूत्रम पर भाष्य लिखना था उन्होंने बद्रीनाथ की व्यास गुफा में 4 वर्ष तक बैठकर अनेकों दिव्य भाष्यों की संरचना की। 1 दिन काले वर्ण के ब्राह्मण के रूप में भगवान व्यास आ पधारे 4 दिन तक शंकराचार्य जी से शास्त्रार्थ करते रहे उनके लिखे भाष्यो को देखते रहे अंत में प्रसन्न हो बोले हे शंकर तुम शिव के अंशावतार हो शिव के आदेशानुसार ही कार्य कर रहे हो मेरे भाष्य पर इस कलयुग में तुम ही हो जो टीका लिख सकते हो। मैं तुम पर प्रसन्न हु आ जाओ जगत गुरु के रूप में स्थापित होओ यह व्यासपीठ का आदेश है। तुम मेरे प्रशिष्य हो इसलिए विशेष आशीर्वाद गुरु गोविंदपाद मेरे ही शिष्य रहे हैं और उनके शिष्य हुए गुणाचार्य एवं गुरु गौंणाचार्य से तुम दीक्षित हो। 

        आचार्य शंकर की आयु भगवान शिव ने 16 वर्ष निश्चित की थी आयु के अंतिम चरण में थे आचार्य शंकर तत्काल समाधिस्थत हो प्राण त्यागने की तैयारी में लग गए तभी भगवान वेद व्यास ने कहा नहीं शंकर ऐसी चेष्टा मत करो अभी बहुत से कार्य बाकी है अतः मैं तुम्हें 16 वर्ष की आयु और प्रदान करता हूं। 16 वर्ष और रहो पृथ्वी पर एवं अपने कार्य को पूर्ण करो इस प्रकार 16 वर्ष का अतिरिक्त कार्यकाल आचार्य शंकर को वेदव्यास जी ने प्रदान कर दिया। मैं कहना यह चाह रहा हूं कि जब आदि गुरु शंकराचार्य जी को ग्रंथ लेखन की अनुमति जगतगुरु की उपाधि कार्यकाल का बढ़ना इत्यादि भगवान वेदव्यास ने दिया तब एक आम आध्यात्मिक साधक की क्यामजाल? कि बिना व्यासपीठ की आज्ञा के वह कुछ कर सके। अधिकांशत: आध्यात्मिक साधक इसलिए फिसल जाते हैं उलझ जाते हैं भ्रष्ट हो जाते हैं मार्ग भटक जाते हैं क्योंकि सद्गुरु का आदेश उनके साथ नहीं होता इच्छा स्वरूपिणी भगवती त्रिपुर सुंदरी की इच्छा नहीं होती कि वह अध्यात्म के पद पर कुछ कर सके।

श्रीविद्या ।।

।। श्रीविद्यायै विदमहे महाश्रीयै धीमहि तन्न: श्री: प्रचोदयात्।।
            श्रीविद्या मनुष्यों द्वारा निर्मित नहीं है एवं मनुष्यों के द्वारा बनाए नियमों के आधार पर भी नहीं चलती। श्रीविद्या परा-परा देवीय विद्या है जिसका निर्माण स्वयं भगवती त्रिपुर सुंदरी ने किया है एवं यही एकमात्र इसकी प्रदात्रि है। जो श्री विद्या के साधक होते हैं उनके जीवन का निर्धारण मनुष्य संबंधित शक्तियां नहीं करती उनके भाग्य को कोई भी मनुष्य प्रभावित नहीं कर सकता अपितु उनके जीवन के प्रत्येक क्षण का निर्धारण भगवती त्रिपुर सुंदरी स्वयं करती है। प्रत्येक युग एवं प्रत्येक देश में मनुष्यों का एक ऐसा वर्ग होता है जो कि प्राकृतिक आपदाओं राजनीतिक घटनाओं मानवीय मूल्यों के उतार-चढ़ाव नियम युद्ध इत्यादि से सदैव अप्रभावित रहते हुए आनंद में संपूर्ण जीवन को व्यतीत करता है इस वर्ग को कोई अशुभता छू भी नहीं सकती एवं इनकी यथा स्थिति बनी रहती है। यह बिंदु निवासी होते हैं बाकी मनुष्य आंदोलित, क्षोभित, पीड़ित, प्रताड़ित एवं क्षण क्षण में प्रभावित होते हैं। यही वास्तविक कुलीन वर्ग है जिसके अंदर सभी शामिल होना चाहते हैं।
             श्री विद्या अर्थात सभी तथाकथित जनजालो से निकलकर संपूर्ण रूप से एक मानव के रूप में उदित होने की कला है। शरीर के अंदर जो कुछ सुप्त है निद्रित है मूर्छित है अर्धविकसित है बीजत्मक है सूक्ष्मातीत है उसे पूर्ण चैतन्य जागृत करने का विधान है। बाहर से कुछ आयात करने की अपेक्षा अंदर मौजूद विलक्षण रत्नों का खनन श्रीविद्या के माध्यम से होता है। मस्तिष्क को एक ही जीवन में संपूर्णता के साथ समझ लेना मस्तिष्क के प्रत्येक कोने की यात्रा कर लेना मस्तिष्क को सौ प्रतिशत प्रकाशित कर देना ही श्रीविद्योपासना रहस्य है।
        हमारे स्वयं के पास मस्तिष्क है हमारा अपना मस्तिष्क संपूर्ण है उसे क्रियाशील कर लेने पर उसे पूर्ण प्रकाशमय कर लेने पर हमें अन्य मस्तिष्को की आवश्यकता नहीं पड़ेगी। अन्य मस्तिष्को की आवश्यकता सबसे बड़ी विडंबना है अन्य मस्तिष्को की आवश्यकता तभी पड़ती है जब स्वयं के मस्तिष्क को समझने की हम में क्षमता नहीं होती। आपके देश में लोहा नहीं है तो आप दूसरे देश से लोहा आयात करोगे। आयात किसी समस्या का हल नहीं है आयात तभी किया जाता है जब अभाव होता है। आयात में से ही अतिक्रमण, आक्रमण, कब्जा इत्यादि का प्रकाट्य होता है। जितने भी विदेशी आक्रमण हुए वह उन लोगों ने किए जिनके पास अपनी स्वयं की भूमि नहीं थी भूमि विहीन ही दूसरे की भूमि पर कब्जा करता है यही सब नकारात्मक की स्थितियां है। 
        अमेरिका ने 30 साल पहले चंद्रमा पर वायुयान भेजा। खूब पेपर बाजी हुई हो हल्ला हुआ बड़े-बड़े तारीफ के कसीदे पढ़े गए परंतु जब मनुष्य ने प्रथम बार चंद्रमा की भूमि पर कदम रखा तो क्या मिला उसे? धूल, उजाड़, बंजरता। वायु विहिनता जल विहीनता जीवन विहीता अर्थात कुछ भी नहीं मिला उसे। अमेरिका समझ गया कि इतनी मारामारी इतनी ऊर्जा खर्च करके इतने लाखों लोगों का दिमाग खफा कर इतना बड़ा खतरा लेकर हम चंद्रमा पर आए और क्या है? यहां पर कुछ भी नहीं बस उसकी विज्ञान कुंडलिनी जागृत हो गई। उसने फिर आज तक किसी भी मानव युक्त यान को चंद्रमा पर नहीं भेजा वह समझ गया कि कोई फायदा नहीं है इस मारामारी में। चंद्रमा पर खड़े वैज्ञानिकों से जब पूछा गया कि आपको कैसा लग रहा है तो उन्होंने कहा यहां से पृथ्वी बहुत सुंदर लग रही है हमें पृथ्वी की याद आ रही है। हम शीघ्र अति शीघ्र पृथ्वी पर वापस आना चाहते हैं। जीवन कितना कीमती है जीवन कितना आनंदमय है पृथ्वी ही स्वर्ग है पृथ्वी ही समस्त लोगों का केंद्र है यह बात मनुष्य को चंद्रमा पर खड़े होकर समझ में आई उसे समझ में आ गया कि ईश्वर ने उसे पृथ्वी के रूप में जीवन के रूप में अतिश्रेष्ठतम अवस्था प्रदान की है परंतु वह कस्तूरी मृग के समान पृथ्वी के वातावरण में श्वास ना लेकर चंद्रमा पर मशीनों के द्वारा रह रह कर सांस ले रहा है। मानव जीवन की यह सबसे बड़ी कमजोरी है कि वह फालतू में भागता है जबकि भगवती त्रिपुर सुंदरी ने लघु ब्रह्मांड के रूप में उसे शरीर प्रदान कर समस्त ऐश्वर्य उसके करीब ही रख छोड़ा है। पिछले 30 वर्षों में मनुष्य ने ब्रह्मांड के अनेक ग्रहों की खाक छानी पर उसके हाथ सिर्फ राख आई 3000 वर्ष बाद भी राख ही हाथ आएगी जब तक पृथ्वी जीवन युक्त है यहां पर जीवन ग्रहण करके संपूर्णता के साथ आनंद भोग लो समय आने पर स्वयं त्रिपुरा मोक्ष भी प्रदान कर देगी परंतु मोक्ष भी पृथ्वी जितना सुहावना नहीं है अतः उसके लिए तैयार रहें।
                    
 शिव शासनत: शिव शासनत:

महाकाली ।।

              
                   शिव और काली प्रत्येक काल में पूर्ण चैतन्य एवं शाश्वत आदि शक्तियां हैं। आप किसी भी काल में किसी भी समय शिवपूजन या काली पूजन संपन्न करें तो ह्रदय के साथ-साथ रोम रोम से चेतन्यता शुद्धता की तरंगे प्रवाहित होने लगेगी। कैसा भी पतीत साधक हो कितना बड़ा नास्तिक भी क्यों ना हो शिव और काली के मंदिर में वह आध्यात्मिक तरंग अवश्य महसूस कर लेगा। इनके विग्रह देखते ही स्वत: व्यक्ति नम्र हो जाता है अपलक निहारने लगता है संज्ञा शुन्य हो जाता है और कुछ ही क्षणों में कुछ विशेष प्राप्त कर लेता है। 
                ये कभी अनित्य या शुन्य या क्षीण नहीं होते इसलिए शिव और काली का पूजन सबसे आसान बिना किसी प्रपंच के किसी भी समय किसी भी प्रकार किसी भी वस्तु के द्वारा संपन्न किया जा सकता है और काली के पूजन में पूजन प्रपंच कदापि नहीं है जिससे चाहो उसे पूजो जैसे चाहो वैसे उपासना करो जब चाहो तब करो मुहूर्त की भी जरूरत नहीं है। जो काल के शासक काल के निर्माता काल के नियंत्रणकर्ता है वे भला कब से मुहूर्त काल के प्रपंच मे उलझने लगे। भस्म से पूजो अनार के रस से पूछो दुग्ध समर्पित करो दीपक जलाओ या मत जलाओ कोई फर्क नहीं पड़ता। जो समस्त ब्रह्मांड को प्रकाशित कर रहे हैं जिनकी उपासना करके त्रिदेव सब कुछ प्राप्त कर रहे हैं जिनकी कृपा पर सभी देवगण पल रहे हैं उन्हें किसी की क्या जरूरत। किसी चीज की जरूरत नहीं है किसी की जरूरत नहीं है यही इनके परब्रह्म स्वरूप की परिभाषा है। जो चाहिए होगा वह स्वयं निर्मित कर लेंगे। प्रसन्न कुपित इत्यादि तो छोटी मोटी शक्तियां होती रहती हैं महाकाली एवं महाकाल इन सबसे परे हैं। यह दोनों परम परमेश्वर अलख निरंजन से प्रदुर्भावित मूल शरीर है जिनमें से कि नाना प्रकार के अनगिनत शरीर उत्पन्न होते रहते हैं। 
                  मूल कहां है? यही रहस्य है। वैसे परा ब्रह्मांडीय मुल शरीर से निकलकर एक विशुद्ध शरीर पृथ्वी पर सदैव निवास करता है। आज भी हिमालय पर शिव और काली का विशुद्ध शरीर पराब्रह्मांडीय मूल शरीर से उत्सर्जित हो गोपनीय रूप से समस्त सृष्टि का संचालन करता है। उस तक पहुंचना उनकी कृपा पर ही निर्भर है इनकी उपासना का एक महत्व और है कि एक बार आवाज दो और एक उपस्थित। आते हैं कार्य संपन्न कर देते हैं और कब चले जाते हैं पता ही नहीं चलता परंतु आते जरूर हैं। यह हमारी न्यूनता है क्षीणता है कि हम अनुभूत नहीं कर पाते क्योंकि हम प्रपंच में फंसे हुए हैं। प्रपंच से स्वयं को परे रखने वाले महाकाल और महाकाली को प्रपंच के माध्यम से सूचित करने पर कुछ हासिल होने वाला नहीं है। महाकाली 24 घंटे महाकाल के सानिध्य में रहती है अब तक ब्रह्मांड में ना वह क्षण आया है और ना वह क्षण आएगा जब महाकाली महाकाल से क्षण के सुक्ष्मातीत अंश के लिए भी अलग हुई हो यही अर्धनारीश्वर योग है जितने भी शैव उपासक होते हैं वह सब के सब गौरी शंकर रुद्राक्ष धारण करते हैं शंकराचार्य तो गौरी शंकर रुद्राक्षो का कंठा धारण करते थे। कभी आध्यात्मिक प्रवृत्ति आध्यात्मिक चिंतन से विरत ना हो पाए कभी शिव और शक्ति के चरण कमलों से ध्यान ना हट पाय यही महाकाली पूजन का गूढ़ रहस्य है शिव और काली उवाच के मध्य ही 64 तंत्र ग्रंथों की संरचना हुई है। शिव ने कहा और काली ने सुना शिव और काली उवाच ही समस्त रहस्यों की खान है हां बहुत से तंत्र ग्रंथों को कोमलंगी ने आच्छादित कर दिया है बिरले साधक ही उनकी कृपा से इनको प्राप्त कर पाते हैं शिव पर शासन करने वाली शक्ति का नाम है महाकाली।

श्री शिव लिंगाष्टकम ।।

लिंगाष्टकम भगवान भोलेनाथ के लिंगस्वरूप की स्तुति कर भोलेनाथ करने का उत्तम अष्टक है, जो कोई भक्त पूर्ण आस्था तथा श्रृद्धा सहित भोले बाबा के लिंगाष्टकम का पाठ करेगा उसकी सभी मनोकामना तथा इच्छाओं की पूर्ति स्वयं शिव शंकर करते हैं, श्री शिव लिंगाष्टकम अर्थ सहित इस प्रकार है:-

ब्रह्ममुरारि सुरार्चित लिंगम्
निर्मलभासित शोभित लिंगम्।
जन्मज दुःख विनाशक लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥1॥

भावार्थः- जो ब्रह्मा, विष्णु और सभी देवगणों के इष्टदेव हैं, जो परम पवित्र, निर्मल, तथा सभी जीवों की मनोकामना को पूर्ण करने वाले हैं और जो लिंग के रूप में चराचर जगत में स्थापित हुए हैं, जो संसार के संहारक है और जन्म और मृत्यु के दुखो का विनाश करते है ऐसे भगवान आशुतोष को नित्य निरंतर प्रणाम है |

देवमुनि प्रवरार्चित लिंगम्
कामदहन करुणाकर लिंगम्।
रावणदर्प विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥2॥

भावार्थः- भगवान सदाशिव जो मुनियों और देवताओं के परम आराध्य देव हैं, तथा देवो और मुनियों द्वारा पूजे जाते हैं, जो काम (वह कर्म जिसमे विषयासक्ति हो) का विनाश करते हैं, जो दया और करुना के सागर है तथा जिन्होंने लंकापति रावन के अहंकार का विनाश किया था, ऐसे परमपूज्य महादेव के लिंग रूप को मैं कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ |

सर्वसुगन्धि सुलेपित लिंगम्
बुद्धि विवर्धन कारण लिंगम्।
सिद्ध सुरासुर वन्दित लिङ्गम्
 तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥3॥

भावार्थः- लिंगमय स्वरूप जो सभी तरह के सुगन्धित इत्रों से लेपित है, और जो बुद्धि तथा आत्मज्ञान में वृद्धि का कारण है, शिवलिंग जो सिद्ध मुनियों और देवताओं और दानवों सभी के द्वारा पूजा जाता है, ऐसे अविनाशी लिंग स्वरुप को प्रणाम है |

कनक महामणि भूषित लिंगम्
फणिपति वेष्टित शोभित लिंगम् ।
दक्ष सुयज्ञ विनाशन लिंगम्
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥4॥

भावार्थः- लिंगरुपी आशुतोष जो सोने तथा रत्नजडित आभूषणों से सुसज्जित है, जो चारों ओर से सर्पों से घिरे हुए है, तथा जिन्होंने प्रजापति दक्ष (माता सती के पिता) के यज्ञ का विध्वस किया था, ऐसे लिंगस्वरूप श्रीभोलेनाथ को बारम्बार प्रणाम |

कुंकुम चन्दन लेपित लिंगम् 
पंकज हार सुशोभित लिंगम् । 
सञ्चित पाप विनाशन लिंगम्  
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥5॥

भावार्थः- देवों के देव जिनका लिंगस्वरुप कुंकुम और चन्दन से सुलेपित है और कमल के सुंदर हार से शोभायमान है, तथा जो संचित पापकर्म का लेखा-जोखा मिटने में सक्षम है, ऐसे आदि-अन्नत भगवान शिव के लिंगस्वरूप को मैं नमन करता हूँ |

देवगणार्चित सेवित लिंगम्
भावैर्भक्तिभिरेव च लिंगम्। 
दिनकर कोटि प्रभाकर लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥6॥

भावार्थः- जो सभी देवताओं तथा देवगणों द्वारा पूर्ण श्रृद्धा एवं भक्ति भाव से परिपूर्ण तथा पूजित है, जो हजारों सूर्य के समान तेजस्वी है, ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को प्रणाम है |

अष्टदलो परिवेष्टित लिंगम् 
सर्व समुद्भव कारण लिंगम्।
अष्टदरिद्र विनाशित लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिव लिंगम् ॥7॥

भावार्थः- जो पुष्प के आठ दलों (कलियाँ) के मध्य में विराजमान है, जो सृष्टि में सभी घटनाओं (उचित-अनुचित) के रचियता हैं, और जो आठों प्रकार की दरिद्रता का हरण करने वाले ऐसे लिंगस्वरूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ |

सुरगुरु सुरवर पूजित लिंगम् 
सुरवन पुष्प सदार्चित लिंगम्।
परात्परं परमात्मक लिंगम् 
तत् प्रणमामि सदाशिवलिंगम् ॥8॥

भावार्थः- जो देवताओं के गुरुजनों तथा सर्वश्रेष्ठ देवों द्वारा पूजनीय है, और जिनकी पूजा दिव्य-उद्यानों के पुष्पों से कि जाती है, तथा जो परमब्रह्म है जिनका न आदि है और न ही अंत है ऐसे अनंत अविनाशी लिंगस्वरूप भगवान भोलेनाथ को मैं सदैव अपने ह्रदय में स्थित कर प्रणाम करता हूँ |

लिंगाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

भावार्थः- जो कोई भी इस लिंगाष्टकम को शिव या शिवलिंग के समीप श्रृद्धा सहित पाठ करेगा उसको शिवलोक प्राप्त होता है तथा भगवान भोलेनाथ उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते है |

ॐ नमः शिवाय ।।

               सृष्टि शिथिल ना पड़े इसलिए शिव तांडव नृत्य करते हैं जो शिव करते हैं वही सब को करना पड़ता है शिव तांडव करते हैं तो योग माया पार्वती लास नृत्य करती है। तांडव उग्र है एवं लास सौम्य। उग्रता और सौम्यता के मिश्रण से ही सृजन होता है। गणपति ढोल बजाते हैं तो कार्तिकेय पांव में बंधे घुंगरूओं को छमछमाते हैं कार्तिकेय के एक पांव में घुंघरू बांधे हुए हैं। शिव के तांडव पर ब्रह्मा थाप देते हैं नारद वीणा बजाते हैं विष्णु मृदंग संभालते हैं सरस्वती विचित्र वीणा से स्पंदन करती है इंद्र बांसुरी बजाते हैं लक्ष्मी गान प्रारंभ कर देती है कृष्ण शंख से नाद करने लगते हैं राम और अर्जुन धनुष की झंकार करते हैं ग्रह मंडल एवं नक्षत्र प्रकाश उछालने लगते हैं मनुष्य कर्म के लिए हाथों से क्रिया करने लगता है वृक्ष हिलने डुलने लगते हैं सागर लहराने लगते हैं हिम पिघलने लगती है। कहने का तात्पर्य यह है कि शिव के तांडव में ही जीवन का स्पंदन छिपा हुआ है शिव से ही सब सीखते हैं।

               पाणिनी, व्याकरण प्रतियोगिता में हार गया तुरंत शिवशरण हुआ। शिवोपासना संपूर्ण होने पर शिव ने 14 बार डमरू बजाया और व्याकरण के 14 हिस्से प्रादुर्भाव में आ गए। पाणिनी ने इन्हीं 14 हिस्सों से एक-एक कर अद्भुत व्याकरण कोष की रचना की और इस प्रकार मनुष्य को व्याकरण की प्राप्ति हुई। कुछ नया प्राप्त करने के लिए कुछ नया अनुभूत करने के लिए कुछ नया अविष्कृत करने के लिए शिव मनुष्य को माध्यम बना देते हैं। आइंस्टीन ने कहा इस पृथ्वी पर मनुष्य केवल परोपकार के लिए ही भेजा गया है उसने भी कुछ खोजा शिव के माध्यम से शाश्वत बात कही। अध्यात्मिक साधकों को अपने मुख से शाश्वत शैविक शिव शक्ति संपन्न परम सत्य ही उदगारीत करनी चाहिए। निरंतर शिव ध्यान में अपने आप को एकाग्र रखना चाहिए एवं तत्कालिक सामाजिक स्थितियों पर अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं करनी चाहिए। मार्गदर्शन देने वाले पर भीषण जिम्मेदारी होती है क्योंकि लोग उसका अनुसरण करेंगे अतः सोच का शाश्वत होना अत्यधिक आवश्यक है। शिव पूजन से अंतःकरण की शुद्धि होती रहती है। शिव विषों का दमन कर जीव को नित्य शुद्ध और बुध बनाए रखते हैं। महत्व भूमिका है भूमि ही शक्ति है।

              जरा सोचिए कि मिट्टी का अविष्कार कितना विहंगम है वास्तव में अब तक जो भी अविष्कार हम देख रहे हैं उनमें सबसे चमत्कारिक और आश्चर्यजनक अविष्कार मिट्टी का है। एक मिट्टी में से अनार निकलता है तो वही मिट्टी आम भी देती है वही मिट्टी पुनः गेहूं दे देगी वही मिट्टी जो चाहो वह दे देती है और पुनः ऊर्जावान बनी रहती है। मिट्टी का कभी छय नहीं होता कितने अनंत वर्ष बीत गए पर मिट्टी आज भी उगल रही है जीव जो चाहते हैं वह मिट्टी उगल देती है मिट्टी कभी नष्ट नहीं होती है। किसने बनाई मिट्टी? शिव ने बनाई मिट्टी, मिट्टी बना दी वह जीवन को संभाल देगी वह जीवन को पल्लवित कर दे दी वह सब कुछ अपने अंदर लील जाएगी और किसी को कुछ पता नहीं चलेगा। पहले वैज्ञानिक बोलते थे कि पृथ्वी कुछ करोड़ वर्ष पुरानी है अब बोलने लगे हैं कुछ अरब वर्ष पुरानी है वर्तमान में कहते हैं कुछ खरब वर्ष पुरानी है 10 वर्ष बाद कहेंगे कुछ नील वर्ष पुरानी है। पहली बात पृथ्वी पुरानी है ही नहीं पूरातन का मिट्टी से क्या लेना देना? क्योंकि वह तो कालजई है। ना जाने कितनी विकसित सभ्यताएं आई और गई कितने प्रकार के जीव आए और गए कि उन्होंने स्वास ली और गए परंतु मिट्टी जस की तस है शाश्वत है तब भी उगल रही थी आज भी उगल रही है और आगे भी उगलती रहेगी। यही इस विश्व का सबसे बड़ा चमत्कार एवं दर्शनीय पक्ष है। मानव निर्मित नहीं है वह शिव निर्मित है शिवोऽम शिवोऽम मिट्टी के शिवलिंग बनाइए और पार्थिव शिवलिंग पूजन संपन्न कीजिए।

                 लिंग के मूल में ब्रह्मा मध्य में विष्णु ऊपर प्रणवात्मक शंकर हैं। लिंग महेश्वर अर्घा महादेवी है
"मूले ब्रह्मा तथा मध्य विष्णुस्त्रिभुवनेश्वर:।
रुद्रोपरि महादेव: प्रणवाख्य: सदाशिव:।।
लिङ्गवेदी महादेवी लिङ्ग साक्षान्महेश्वर:।
तयो: सम्पूजनान्नि देवी देवच्क्ष पूजीतौ।।"
चेतनरूप लिङ्ग सत्ता और प्रकृति से ही ब्रह्मांड की रचना हुई और उन्हीं के द्वारा वह प्रलय को भी प्राप्त होगा। शुद्ध मोक्ष के लिए भी उसी की आराधना करनी होगी।

      यव्दा प्रणव में आकार शिवलिङ्ग है उकार जल हरि है, मकार शिव शक्ति का सम्मिलित रूप समझ लिया जाता है। शिव ब्रह्मा का स्थुल आकार विराट ब्रह्मांड है ब्रह्मांड के आकार का ही शिवलिंग होता है। निर्गुण ब्रह्म का बोधक होने से यही ब्रह्मांड लिङ्ग है अथवा उकार से पिण्डी और मकार से त्रिगुणात्मक त्रिपुण्ड कहा गया है अथवा निराकार के आकाश रूप आकार ज्योति: स्तंम्भाकार तथा ब्रह्मांडाकार अभी सभी स्वरूपों में शक्ति सहित शिव तत्व का ही निवेश है।
                        
   शिव शासनत: शिव शासनत: