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महाकाल संहिता ।।

             आज आप जो उज्जयिनी देख रहे हैं वह तो वास्तविक उज्जयिनी का एक खण्ड है। वास्तव में उज्जयिनी त्रिकोणात्मक है अर्थात महाकाली का क्षेत्र । वास्तविक उज्जयिनी आज के निमाड़ अंचल तक फैली हुई थी । उज्जयिनी की सीमा रेखा एक तरफ नर्मदा भी तय करती हैं। शिव ने घोर तपस्या की और इस तप के प्रभाव से श्वेत-स्वेद शिव के शरीर से बह निकला और इस प्रकार शिव पुत्री नर्मदा का प्राकट्य हो गया । पुत्र तो गणेश और कार्तिकेय हैं ही, ये घोषित पुत्र हैं परन्तु इनके अलावा मंगल भी शिव पुत्र हैं। शिव जब सति वियोग में दग्ध थे तब उनके पसीने की कुछ बूंदें पृथ्वी ने धारण कर ली और वह स्थान था उज्जयिनी, पृथ्वी और शिव के मिलन से शिव पुत्र मंगल का उदय हुआ। मंगल नाथ भी शिव के समान अति सुन्दर हैं और शिवलिङ्ग रूप में ही उज्जयिनी में विराजमान हैं एवं इन्हें सिन्दूर चढ़ता है। मांगलिक दोषों का निवारण इसी मंदिर में होता है। 

               उज्जयिनी की विशेषता यह है कि सब यहाँ पिण्डी रूप में हैं। काली भी पिण्डी रूप में, महाकाल भी पिण्ड हैं, गणेश भी पिण्ड हैं ग्रह भी पिण्ड हैं, देवी भी पिण्ड हैं, भैरव भी पिण्डी रूप में हैं और पिण्ड स्वरूपों में से आकृतियाँ निकल रही हैं। महाकाल के गर्भ ग्रह में भस्म आरती के पश्चात शिव मुख उकेरा जाता है। महादेव मुखाकृति ग्रहण करते हैं एवं इसी के पश्चात् अन्य पिण्डी रूपी देवताओं और देवियों को भी श्रंगारित किया जाता है। वे भी मुखाकृति ग्रहण करते हैं। यह सृष्टि का प्रजनन केन्द्र है जो कुछ होता है सर्वप्रथम यहाँ होता है और कालान्तर कई कल्पों से विश्व के विभिन्न हिस्सों में वह स्थानांतरित या रोपित होता है। पूजा की कोई पद्धति नहीं है। विशेषकर शिव किसी पूजन पद्धति के अधीन नहीं है ।

            बाणासुर रोज एक प्राकृतिक शिवलिङ्ग नर्मदा में फेंक देता और डुबकी लगाकर उसे निकालता और फिर उसके सामने गाल बजा-बजाकर, नाच-नाच कर उसे तरह तरह से श्रंगारित कर पूजा अर्चना करता । नर्मदा भीषण उफान पर थी फिर भी बाणासुर पहुँच गया, नर्मदा में शिवलिङ्ग को फेंका और उफनती नदी में कूद गया जान की परवाह किए बिना। सारा दिन शिवलिङ्ग ढूंढता रहा पर मिल ही नहीं रहा था, आखिरी बार रात्रि में कूद पड़ा और शिवलिङ्ग निकाल ही लाया। शंकर चटक गये बाणासुर को वरदान दे बैठे। बाणासुर अजेय हो गया एवं कृष्ण भी उसे नहीं मार पाये । कृष्ण ने आखिरकार बाणासुर से पारिवारिक सम्बन्ध बनाये क्योंकि शिव ने उसे महाकाल तत्व दे दिया था, वह महत्वपूर्ण हो गया था, वह महान हो गया था । वरदान शिव देते हैं, औघड़ दानी ही देता है, दक्षिणामूर्ति गुरु ही देता है। कितनी बड़ी बात है यह उद्घोष करना कि जो चाहे वह मांग लो। बाणासुर के वरदान के कारण ही शिव परिवार समेत उसकी नगरी की रक्षा करते थे।

              महाकाल को समझना है तो फिर चटकने के महत्व को समझ लें, आकाश में जब विद्युत चटकती है, कहीं कुछ घर्षण होता है तो ही हैमवती उमा के रूप में शक्ति प्रकट होती हैं। अध्यात्म तो चटके दिमाग वालों का क्षेत्र है। जीवन में महान चटके दिमाग वाले ही बनते हैं। एक कमरे में अपने आपको बंद कर लेना एवं नहाना धोना, खाना-पीना भूल जाना, दुनिया से अपने आपको काट लेना और फिर कुछ अविष्कृत कर लेना, कोई खोज कर लेना बस यही कहानी है सभी वैज्ञानिकों की, अविष्कार कर्ताओं की, लेखकों की,दार्शनिकों की, खोजियों की ये सबके सब चटके होते हैं। चटककर बात करते हैं, समाज से निष्कासित तो होते ही हैं। हिटलर क्या था ? नेपोलियन, आइंस्टाइन, कालिदास, रविन्द्रनाथ, माऊंट ऐवरेस्ट पर चढ़ने वाला, गैलिलियो, रावण इत्यादि से लेकर प्रत्येक आध्यात्मिक या किसी अन्य क्षेत्र में मह तत्व प्राप्त कर लेने वाले, महत्वपूर्ण बन जाने वाले महान व्यक्ति की जीवनी उठाकर देख लें सब आपको चटके मिलेंगे। 

             वर्धमान से महावीर अर्थात मह शब्द प्राप्त किया, कैसे ? क्योंकि उज्जयिनी के श्मशान में बैठकर तप किया। रुद्र से बुद्ध की यात्रा को समझना होगा, बुद्ध के अविष्कार को समझना होगा तभी मह का महत्व समझ में आयेगा रुद्र का तात्पर्य है रूंदन, अंदर कुछ रो रहा है, अंदर कुछ व्यथा चल रही है, अंदर द्वंद है, अंदर कहीं व्याकुलता है। यह सब जीवों की कहानी है। जब यह रुदन असहज कर देगा तो सिद्धार्थ घर से भागेगा, महाकाल की शरण में मह को ढूंढेगा और सीधे उज्जयिनी पहुँचेगा। नहीं तो वहीं बैठकर विलाप करेगा या तो विलाप में दम होगा, रूदन में शक्ति होगी, छाती में तड़फ होगी तो महाकाल खिंचा चला आयेगा, हाथ में त्रिशूल और डमरू लिए हुए भस्म से विभूषित भस्म करने हेतु और इस प्रकार रुद्र बुद्ध में परिवर्तित हो जायेगा हमेशा के लिए। रोता हुआ बालक माता के स्तन से पान कर बुद्ध ही बन जाता है बुद्ध द के समान ही मुस्कुरा और खिलखिला उठता है।

         जैविक माता (बायोलोजीकल मदर) सिर्फ आदि माता की नकल करती है एवं वह कुछ क्षण के लिए रुद्र से बुद्ध में परिवर्तित कर सकती है जीव को परन्तु आदि माता अर्थात महाकाली के स्तनों से जब जीव लिपटकर दुग्धपान करता है उसके आंचल में सिमट जाता है तभी वह बुद्ध बन पाता है, वह नाथ बन पाता है, वह महाअवधूत बनता है, वह सदैव मुस्कुराता है, सदैव प्रसन्न रहता है, सदैव बलिष्ट रहता है। काली का श्रंगार । नागनाथ उज्जयिनी में घूम रहे थे। सिर फिरे तो थे, चटके हुए तो थे लकड़ी के गट्ठे को साँप की रस्सी बनाकर बांधते थे, सांप बेचारा क्या कर लेता चुपचाप रस्सी बन जाता था। नाम ही उनका नागनाथ था जो काम लेना है सांप से लेंगे, अजगर को वृक्ष की डाली पर बांधकर झूला झूलते थे । अचानक महाकाल वन में महाकाली के मंदिर में पहुँच गये। आ गई लहर नागनाथ के मन में, माँ का सौन्दर्य देख पगला उठे, एक सांप पाँव में बांध दिया, दूसरा दूसरे पाँव में, कमर में भी एक सर्प बांध दिया गले में भी सर्प लटका दिया। एक सर्प का मुकुट बनाकर जैसे ही महाकाली के मस्तक पर रखने लगे कालिका प्रसन्न । सर्पों के श्रंगार से युक्त कालिका की विशाल प्रतिमा में कालि का प्राकट्य हो गया । नागनाथ के बाल्य भाव से महाकाली का ममत्व उमड़ पड़ा उसके विशाल उन्नत स्तनों से दुग्ध धारा बह निकली और नागनाथ का सम्पूर्ण शरीर दुग्धमय हो गया, वह सिद्ध हो गये एवं नाथ से नारायण बन गये।कालिका की जंघा पर बैठ गये पुत्र के समान। 

          कुछ लोग न्यास, विनियोग, तांत्रोक्त पूजन, मंत्र जप, ये माला, वो माला, ये यंत्र तो वो यंत्र के चक्कर में पड़े रहते हैं। ठीक है तकनीक होनी चाहिए, विधान होना चाहिए परन्तु सिर्फ विधानों से ही काम नहीं चलेगा। विधानों से ऊपर हैं महाकाली और महाकाल किस ग्रंथ में लिखा है कि सर्पों से कालिका का श्रंगार करो, बाणासुर की पूजा पद्धति, रावण की पूजा पद्धति, दत्तात्रेय की पूजन पद्धति किसी वेद में वर्णित नहीं है। शिव को दक्षिणामूर्ति इसलिए कहा, काली को दक्षिण की महारानी इसलिए कहा कि वे वेद वर्णित पूजन के अधीन नहीं है। उनकी कोई पूजन पद्धति नहीं है इसलिए वे महादेव कहलाते हैं। बड़े-बड़े ज्ञानी धरे रह गये, बड़े-बड़े प्रवचनकर्ता बकवास करते रह गये पर एक अनाड़ी ने महाकाल और महाकाली की प्राप्त कर लिया।

             कोई नहीं समझ सकता इनके खेल को विक्रमादित्य क्या थे? ग्वाले के यहाँ पले थे। थे तो क्षत्रीय पर ग्वालों के यहाँ । भर्तृहरि क्या थे? ये तो कुम्हार के घर पले बड़े थे, गधे पर बैठते थे परन्तु थे सूर्य पुत्र सूर्य उर्वशी नामक अप्सरा पर मोहित हो गये, उर्वशी सूर्य से बचकर भागी परन्तु सूर्य का वीर्य स्खलित हो गया। उस वीर्य के एक हिस्से से भर्तृहरि का जन्म हुआ और पालन पोषण हुआ कुम्हार के घर । भर्तृहरि पशु-पक्षियों की बोली समझते थे विक्रमादित्य को बता दिया कि सियारों के इस वक्त चिल्लाने का मतलब है शत्रु आक्रमण करने वाला है। विक्रमादित्य उनकी इस अद्भुत क्षमता से प्रसन्न हो गये उन्हें अपना मित्र बना लिया। भर्तृहरि का विवाह महाकाल के सानिध्य में पिंगला से हो गया। विक्रमादित्य को पहचान दी महाकाल ने भर्तृहरि को पहचान दी महाकाल ने । पिंगला के प्रेम में भर्तृहरि पागल हो गये बोले अगर मैं मर गया तो तुम क्या करोगी? पिंगला बोली मैं सती हो जाऊंगी। महाकाल ने देखा कि भर्तृहरि भक्ष्य भक्ष्य के मार्ग पर दौड़ रहा है। उन्होंने दत्तात्रेय को आदेश दिया कि शिष्य बनाकर उसका कल्याण करो।

              दत्तात्रेय ने महाकाल वन में माया रच दी। गुरु बनकर बैठ गये। शिकार खेलते-खेलते भर्तृहरि को जोर से प्यास लगी। पानी का भक्षण भर्तृहरि को व्याकुल कर बैठा, प्यासा भर्तृहरि दत्तात्रेय के आश्रम पहुँच गया और पानी मांगने लगा दत्तात्रेय बोले तू दीक्षित है मैं केवल दीक्षितों की ही पानी देता हूँ। तेरा कोई गुरु है भर्तृहरि बोला मैं क्या जानूं गुरु, मुझे प्यास लगी है अतः आप ही मेरे गुरु बन जाओ और पानी पिलाकर जान बचा लो। दत्तात्रेय बोले मैं उन्हीं को दीक्षा देता हूँ जिन्होंने 12 वर्ष का तप किया हो। भर्तृहरि चटक गया बोला दीक्षा दे दो बाद में 12 वर्ष तप कर लूंगा। 12 वर्षों बाद आऊंगा, थोड़ा भांग और कर लेने दो दत्तात्रेय भी अवधूत ठहरे मान गये। भर्तृहरि की दीक्षा हो गई उसे पानी मिल गया। पीने के बाद भर्तृहरि बोला आप अपना नाम तो बताते जाओ। महाअवधूत बोले मैं हूँ दत्तात्रेय, आदि गुरु । खैर भर्तृहरि भूल-भाल गया। शिष्य भूल जाते हैं पर गुरु नहीं भूलता। कालान्तर पिंगला सती हो गई भर्तृहरि ने उसे परखा झूठी खबर भिजवा दी किं भर्तृहरि का महाकाल वन में सिंह ने भक्षण कर लिया है।

हाय पिंगला- हाय पिंगला 12 वर्ष तक श्मशान में बैठकर चिल्लाते रहे बस हो गई 12 वर्ष की तपस्या, दत्तात्रेय पिघल गये। गोरखनाथ को भेजा कि जाओ भर्तृहरि का उद्धार करो, उसे मह तत्व प्रदान करो, उसे महान बनाओ एवं अवनति के पथ से उस मूर्ख को उठाकर उन्नति के पथ पर बढ़ाओ। गोरखनाथ ने एक मटका लिया और श्मशान में ले जाकर भर्तृहरि के सामने फोड़ दिया और चिल्लाने लगे हाथ मटका- हाय मटका भर्तृहरि बोले क्यों चिल्ला रहे हो मूर्खों के समान, क्या टूटा मटका फिर वापस आ जायेगा गोरखनाथ बोले तू क्यों चिल्ला रहा है हाय पिंगला - हाय पिंगला । भर्तृहरि की आँखें खुल गई गोरखनाथ ने एक हजार पिंगला प्रकट कर दी बोले चुन ले इसमें से एक। क्या चाहता है ? पिंगला या पिंगला के निर्माण की विधि। भर्तृहरि चरणों में लोट गये। उन्होंने पिंगलाओं के निर्माण की विधि को ही महत्व दिया और दत्तात्रेय के सानिध्य में संन्यस्थ हुए। 

           सिरफिरों का नायक है महाकाल। उन्हीं के अंदाज में बात करता है महाकाल, उन्हीं के अंदाज में तप करवाता है महाकाल । दक्षिणामूर्ति गुरु तोड़कर रख देता है, शिव प्रहार करता है, गुरु भी प्रहार करता है। छैनी उठाकर पत्थर पर हथोड़े से प्रहार करना ही पड़ता है तभी मूर्ति साकार होती है। जिसे प्रहार करना नहीं आया उसे मूर्ति गढ़ना नहीं आया। गुरु को ही शिष्य मिलते हैं अन्य किसी को नहीं शिष्य तभी मिलेगा जब सम्पूर्ण गुरुत्व विकसित हो जायेगा इससे पहले नहीं। इससे पूर्व तो भक्ष्य भक्ष्य वाले जीव ही मिलेंगे। ये हल कर दो, उस समस्या का निवारण कर दो, नौकरी दिला दो, विवाह करा दो इत्यादि इत्यादि । शिष्य तो दो चार ही होते हैं। जीवन में यात्रा तो करनी ही पड़ती है क्योंकि पाद मिले हुए हैं एक शहर से दूसरे शहर पेट भरने के लिए यात्रा, नौकरी ढूंढने के लिये यात्रा, कोई बीमार पड़ गया तो उसका इलाज करवाने के लिये देश-विदेश की यात्रा, पुलिस थाने की चरण वन्दना, राजा अगर कुपित हो गया तो उसके कोप से बचने के लिए जान बचाने के लिए यात्रा, बेटी का विवाह के लिए दर-दर की ठोकरें खाने वाली यात्रा, कितनी यात्राएं गिनाऊं ? शव यात्रा भी करनी पड़ती है, शव यात्रा में भी सम्मिलित होना पड़ता है और इसी से निर्मित होता है क्लेश, व्यथा । काल-चक्र की यही पहचान है। 

           काल चक्र की गति बड़ी निराली है। कालचक्र की गति से ही जीव को अनेकों प्रकार की दुर्गतियां प्राप्त होती हैं। गति तो चाहिए होगी, गतिमान तो होना होगा क्योंकि आप पादप हैं, आपके पैर लगाकर भेजे गये हैं। स्पष्ट आदेश, सीधी बात इन सब यात्राओं से बचने का एकमात्र उपाय है महाकाल की यात्रा, महाकाल पूजन। गुरु पूर्णिमा पर बायें हाथ से काम करने वाले इस दक्षिणामूर्ति शिव भक्त गुरु की यात्रा और परिक्रमा समझ में आ जाये तो ठीक है नहीं समझ में आये तो अनंत काल तक कष्ट क्लेश रूपी फल प्रदान करने वाली यात्राओं में उलझे रहना। ऊपर वर्णित बेमतलब की यात्राओं से बचने के लिए आदि गुरु शंकराचार्य दक्षिण से निकल पड़े, दक्षिणामूर्ति गुरु की खोज में अर्थात उस गुरु की खोज में जिसने महाकाल तत्व को आत्मसात कर लिया हो। जो कभी न सोता हो, जो पूर्ण चैतन्य हो, जिसके सिर के ऊपर सदैव सूर्य प्रकाशवान हो । रास्ते में बालक शंकराचार्य ने एक लकड़ी उठाई और दण्ड के रूप में धारण कर ली। महाकाल दण्ड धारण करते हैं, दण्ड भी देते हैं, दण्ड देने का तरीका बड़ा निराला है। जीव के लिए दण्ड आवश्यक है, शिष्य के लिए भी दण्ड आवश्यक है पर गुरु या शिव के दण्ड में कल्याण का भाव अवश्यम्भावी है। 

          त्रिपुरासुर का वध होना था समस्त देवता विष्णु सहित महाकाल वन में निवास कर रहे महाकालेश्वर के पास पहुँचे बोले हे दक्षिणामूर्ति त्रिशूल उठाओ और हमारी रक्षा करो। शिव ने ना कह दिया, बोले वे सब मेरे भक्त हैं अगर तुम उनका वध करवाना चाहते हो तो शिवापराध करवाओ तभी पाशुपतास्त्र चलेगा। विष्णु ने माया रच दी और असुर शिव पूजन से विमुख हो गये, शिवापराध हुआ और शिव ने त्रिशूल चलाया। तीनों पर भस्म हो गये उड़ती हुई भस्म से महाकाल आच्छादित हो गये। कोई अपराध करना नहीं चाहता, कोई जीव कत्ल करना नहीं चाहता, कोई जीव दण्डित होना नहीं चाहता परन्तु यह गूढ़ रहस्य है कि अपराध शिव और काली करवाते हैं जान बूझकर जिससे कि दण्ड दे उन्हें पशु बंधनों से मुक्त किया जा सके। गलतियाँ करवाने का, अपराध करवाने का केन्द्र बिन्दु हैं महाकाल ।

         महाकाली और महाकाल जब शतरंज खेलते हैं, चौसर बिछती है तो उस पर मोहरे होते हैं जीव । अट्ठाहस करते हुए महाकाल और महाकाली जीवों की सार में चौंसर सजाते हैं । अघोरेश्वर और अघोरेश्वरी ही चाल चलते हैं और इस सृष्टि के राजा महाराजा, वजीर, हाथी, घोड़े, प्यादे बनते बिगड़ते रहते हैं। यही मैथुनी सृष्टि का रहस्य है, यही शिव और काली का अट्टाहास है।        
महाकाल क्षेत्र में ही शिव और काली क्रिया रत है, आलिंगन बद्ध हैं। जहाँ देखो युगल रूप में दिखाई पड़ जायेंगे। नाचते भैरव, मृदंग बजाते भूतगण, अट्टाहास करती योगिनियाँ, शिव की छाती से वक्ष स्थल टकराती महाकाली, चिंघाड़ते हाथी, गरजते सिंह के - कालजयी आध्यात्मिक दृश्य उज्जयिनी के वातावरण में साधक देख लेता है । भक्ष्य भक्ष्य की संस्कृति रही है । भक्ष्य भक्ष्य से मुक्त होने के लिए अघोरी ने नर मांस मांगा तो वह भी महाकाल ने श्मशान में उपलब्ध करा दिया। उज्जयिनी के इतिहास में जो दृश्य निर्मित हुए हैं वे कहीं नहीं हो सकते। समस्त विश्व के व्यापारी उज्जयिनी की स्वर्ण मयी इमारतें, वेश्याओं के नृत्य, तालाबों में खिले कमल, वेद मंत्रों से गूंजित वातावरण, हवन कुण्डों से उत्सर्जित सुगंधित वायु तो वहीं मांस भक्षण करते अघोरी, रक्तपान करते कापालिक, नृत्य करती हुए नगर वधुएं इत्यादि एक साथ उज्जयिनी में देखने को मिलता था। उज्जयिनी के आसपास का क्षेत्र महाकाल वन से आच्छादित था अरबों ने यहीं पर उद्यान बनाने की कला सीखी, भवनों में उद्यान कैसे लगाये जाते हैं यह समस्त विश्व ने उज्जयिनी से सीखा। 

           सरोवरों के निर्माण की कला सर्वप्रथम उज्जयिनी में प्रारम्भ हुई। डॉ. वाकणकर जो कि पुरातत्व वेत्ता है उन्होंने कहा कि विश्व की सर्वश्रेष्ठ प्रथम सड़क उज्जयिनी में मिली विश्व की सर्वप्रथम जल निकासी व्यवस्था उज्जयिनी में निर्मित हुई । विश्व का आदि मदिरालय उज्जयिनी में विकसित हुआ, कई मंजिला इमारतों का निर्माण उस समय हो चुका था जब ईसा को जन्म लेने में 2000 वर्ष बाकी थे। विश्व की प्राचीनतम नगरी है उज्जयिनी । महाकाल मंदिर 100 गज ऊंचा था एवं इसकी 5 मंजिलें थीं, अब का महाकाल मंदिर तो उसका लघु रूप है। जो कुछ भी विश्व में फैला है वह सर्वप्रथम उज्जयिनी से ही प्रादुर्भावित हुआ है। अनेकों सरोवरों, अनेकों घाट से सुसज्जित था उज्जैन, इसे बाग बगीचों की नगरी कहा जाता था। गोमेध रत्न की खदानें उज्जयिनी के समीप थीं। गोमेध रत्न क्या होता है ? विश्व को उज्जैन ने सिखाया । महाकाल के प्रांगण में बैठकर ही नागार्जुन ने वह षोडशी ढूंढी रानी पद्मावती के रूप में जो कि पारे का मर्दन कर सकती थी अर्थात शिव वीर्य को घोट सकती थी और तभी रस प्राप्त होता है। एवं जिसके स्पर्श से तांबा स्वर्ण में परिवर्तित हो जाता है। महाकाल की स्वर्ण जड़ित प्रतिमा के सामने ही एक ऐसी स्त्री जिसमें पद्मनी नारी के समस्त गुण हो वो ही पारे का मर्दन कर सकती है। 

            खैर तंत्र क्षेत्र का यह गूढ़ रहस्य है इसे ज्यादा उद्गारित नहीं किया जा सकता। नागार्जुन ने महाकाल के प्रांगण में बैठकर कहा था कि सोने के पहाड़ बना दूंगा, स्वर्ण निर्मित कर लूंगा और कर भी लिया था। यह शिव आरक्षित क्षेत्र है यहाँ कभी कोई तथाकथित सामाजिक तंत्र नहीं चला है। उत्तर भारत ने जिन आध्यात्मिक साधकों को निष्कासित किया उन्हें शरण दी उज्जयिनी ने। भूमि के नियम हर समय बदलते रहते । भूमि के नियमों से अध्यात्म नहीं चलता, आध्यात्मिक साधक भूमि के नियमों को नकार देता है इसलिए संन्यस्थ होता है। एक संन्यस्थ का, एक अघोरी का, एक शैव मार्गीय का, एक तंत्रज्ञ का सामाजिक नियमों, व्यवस्था के नियमों, राज्य के नियमों से कोई लेना देना नहीं है। वह शिव संहिता के आचार विहार पर चलता । वह तो ब्रह्माण्डीय नियमों को भी नकार देता है। वह तो ग्रह नक्षत्रों, सूर्य अग्नि, वायु जल इत्यादि तत्वों के नियमों को भी नहीं मानता है इनसे भी परे हो जाता है। वह अपनी जन्म कुण्डली स्वयं निर्मित करता है। प्रेमत्व महाकाल का पारितोषिक है जिस पर महाकाल अति प्रसन्न उसे सदा के लिए प्रेमत्व की प्राप्ति । प्रेमत्व ही जीव को काल से विमुख करता है। प्रेम में डूबा व्यक्ति, आलिंगन बद्ध युगल को काल का भान कहाँ? इसलिए महाकाल में शिव और काली आलिंगन बद्ध हैं, सारी दुनिया से कटे हुए हैं।
                     शिव शासनत: शिव शासनत:


ऋषि का क्या है महत्व- महत्वपूर्ण जानकारी ।।

अंगिरा ऋषि....

 ऋग्वेद के प्रसिद्ध ऋषि अंगिरा ब्रह्मा के पुत्र थे। उनके पुत्र बृहस्पति देवताओं के गुरु थे। ऋग्वेद के अनुसार, ऋषि अंगिरा ने सर्वप्रथम अग्नि उत्पन्न की थी।

विश्वामित्र ऋषि....

गायत्री मंत्र का ज्ञान देने वाले विश्वामित्र वेदमंत्रों के सर्वप्रथम द्रष्टा माने जाते हैं। आयुर्वेदाचार्य सुश्रुत इनके पुत्र थे। 

विश्वामित्र की परंपरा पर चलने वाले ऋषियों ने उनके नाम को धारण किया। यह परंपरा अन्य ऋषियों के साथ भी चलती रही।

वशिष्ठ ऋषि....

ऋग्वेद के मंत्रद्रष्टा और गायत्री मंत्र के महान साधक वशिष्ठ सप्तऋषियों में से एक थे। उनकी पत्नी अरुंधती वैदिक कर्मो में उनकी सहभागी थीं।

कश्यप ऋषि....

 मारीच ऋषि के पुत्र और आर्य नरेश दक्ष की १३ कन्याओं के पुत्र थे। स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, इनसे देव, असुर और नागों की उत्पत्ति हुई।

जमदग्नि ऋषि....

भृगुपुत्र यमदग्नि ने गोवंश की रक्षा पर ऋग्वेद के १६ मंत्रों की रचना की है। केदारखंड के अनुसार, वे आयुर्वेद और चिकित्साशास्त्र के भी विद्वान थे।

अत्रि ऋषि....

 सप्तर्षियों में एक ऋषि अत्रि ऋग्वेद के पांचवें मंडल के अधिकांश सूत्रों के ऋषि थे। वे चंद्रवंश के प्रवर्तक थे। महर्षि अत्रि आयुर्वेद के आचार्य भी थे।

अपाला ऋषि...

अत्रि एवं अनुसुइया के द्वारा अपाला एवं पुनर्वसु का जन्म हुआ। अपाला द्वारा ऋग्वेद के सूक्त की रचना की गई। पुनर्वसु भी आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य हुए।

नर और नारायण ऋषि....

ऋग्वेद के मंत्र द्रष्टा ये ऋषि धर्म और मातामूर्ति देवी के पुत्र थे। नर और नारायण दोनों भागवत धर्म तथा नारायण धर्म के मूल प्रवर्तक थे।

पराशर ऋषि....

ऋषि वशिष्ठ के पुत्र पराशर कहलाए, जो पिता के साथ हिमालय में वेदमंत्रों के द्रष्टा बने। ये महर्षि व्यास के पिता थे।

भारद्वाज ऋषि....

बृहस्पति के पुत्र भारद्वाज ने 'यंत्र सर्वस्व' नामक ग्रंथ की रचना की थी, जिसमें विमानों के निर्माण, प्रयोग एवं संचालन के संबंध में विस्तारपूर्वक वर्णन है। ये आयुर्वेद के ऋषि थे तथा धन्वंतरि इनके शिष्य थे।

आकाश में सात तारों का एक मंडल नजर आता है उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान सात संतों के आधार पर ही रखे गए हैं।

 वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है। 

प्रत्येक मनवंतर में सात सात ऋषि हुए हैं। यहां प्रस्तुत है वैवस्तवत मनु के काल में जन्में सात महान ‍ऋषियों का संक्षिप्त परिचय।

वेदों के रचयिता ऋषि.....

 ऋग्वेद में लगभग एक हजार सूक्त हैं, लगभग दस हजार मन्त्र हैं। चारों वेदों में करीब बीस हजार हैं और इन मन्त्रों के रचयिता कवियों को हम ऋषि कहते हैं। 

बाकी तीन वेदों के मन्त्रों की तरह ऋग्वेद के मन्त्रों की रचना में भी अनेकानेक ऋषियों का योगदान रहा है। 

इनमें भी सात ऋषि ऐसे हैं जिनके कुलों में मन्त्र रचयिता ऋषियों की एक लम्बी परम्परा रही। ये कुल परंपरा ऋग्वेद के सूक्त दस मंडलों में संग्रहित हैं और इनमें दो से सात यानी छह मंडल ऐसे हैं जिन्हें हम परम्परा से वंशमंडल कहते हैं.

 क्योंकि इनमें छह ऋषिकुलों के ऋषियों के मन्त्र इकट्ठा कर दिए गए हैं। 

वेदों का अध्ययन करने पर जिन सात ऋषियों या ऋषि कुल के नामों का पता चलता है वे नाम क्रमश: इस प्रकार है....

१.वशिष्ठ, २.विश्वामित्र, ३.कण्व, ४.भारद्वाज, ५.अत्रि, ६.वामदेव और ७.शौनक। 

पुराणों में सप्त ऋषि के नाम पर भिन्न-भिन्न नामावली मिलती है। विष्णु पुराण अनुसार इस मन्वन्तर के सप्तऋषि इस प्रकार है....

वशिष्ठकाश्यपो यात्रिर्जमदग्निस्सगौत।
विश्वामित्रभारद्वजौ सप्त सप्तर्षयोभवन्।।

 अर्थात् सातवें मन्वन्तर में सप्तऋषि इस प्रकार हैं:- वशिष्ठ, कश्यप, अत्रि, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र और भारद्वाज।

इसके अलावा पुराणों की अन्य नामावली इस प्रकार है:- ये क्रमशः केतु, पुलह, पुलस्त्य, अत्रि, अंगिरा, वशिष्ट तथा मारीचि है।

महाभारत में सप्तर्षियों की दो नामावलियां मिलती हैं। 

एक नामावली में कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ के नाम आते हैं.

दूसरी नामावली में पांच नाम बदल जाते हैं। कश्यप और वशिष्ठ वहीं रहते हैं पर बाकी के बदले मरीचि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु नाम आ जाते हैं।

 कुछ पुराणों में कश्यप और मरीचि को एक माना गया है तो कहीं कश्यप और कण्व को पर्यायवाची माना गया है। यहां प्रस्तुत है वैदिक नामावली अनुसार सप्तऋषियों का परिचय।

१. वशिष्ठ...

राजा दशरथ के कुलगुरु ऋषि वशिष्ठ को कौन नहीं जानता। ये दशरथ के चारों पुत्रों के गुरु थे। वशिष्ठ के कहने पर दशरथ ने अपने चारों पुत्रों को ऋषि विश्वामित्र के साथ आश्रम में राक्षसों का वध करने के लिए भेज दिया था। कामधेनु गाय के लिए वशिष्ठ और विश्वामित्र में युद्ध भी हुआ था। वशिष्ठ ने राजसत्ता पर अंकुश का विचार दिया तो उन्हीं के कुल के मैत्रावरूण वशिष्ठ ने सरस्वती नदी के किनारे सौ सूक्त एक साथ रचकर नया इतिहास बनाया।

२. विश्वामित्र....

 ऋषि होने के पूर्व विश्वामित्र राजा थे और ऋषि वशिष्ठ से कामधेनु गाय को हड़पने के लिए उन्होंने युद्ध किया था, लेकिन वे हार गए।

 इस हार ने ही उन्हें घोर तपस्या के लिए प्रेरित किया। विश्वामित्र की तपस्या और मेनका द्वारा उनकी तपस्या भंग करने की कथा जगत प्रसिद्ध है। 

विश्वामित्र ने अपनी तपस्या के बल पर त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग भेज दिया था। इस तरह ऋषि विश्वामित्र के असंख्य किस्से हैं।

माना जाता है कि हरिद्वार में आज जहां शांतिकुंज हैं उसी स्थान पर विश्वामित्र ने घोर तपस्या करके इंद्र से रुष्ठ होकर एक अलग ही स्वर्ग लोक की रचना कर दी थी। 

विश्वामित्र ने इस देश को ऋचा बनाने की विद्या दी और गायत्री मन्त्र की रचना की जो भारत के हृदय में और जिह्ना पर हजारों सालों से आज तक अनवरत निवास कर रहा है। 

३. कण्व......

 माना जाता है इस देश के सबसे महत्वपूर्ण यज्ञ सोमयज्ञ को कण्वों ने व्यवस्थित किया। कण्व वैदिक काल के ऋषि थे। इन्हीं के आश्रम में हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत की पत्नी शकुंतला एवं उनके पुत्र भरत का पालन-पोषण हुआ था।

४. भारद्वाज....

वैदिक ऋषियों में भारद्वाज-ऋषि का उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। भारद्वाज ऋषि राम के पूर्व हुए थे.

लेकिन एक उल्लेख अनुसार उनकी लंबी आयु का पता चलता है कि वनवास के समय श्रीराम इनके आश्रम में गए थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। 

माना जाता है कि भरद्वाजों में से एक भारद्वाज विदथ ने दुष्यन्त पुत्र भरत का उत्तराधिकारी बन राजकाज करते हुए मन्त्र रचना जारी रखी।

ऋषि भारद्वाज के पुत्रों में १० ऋषि ऋग्वेद के मन्त्रदृष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रदृष्टा मानी गई हैं।

 ॠग्वेद के छठे मण्डल के द्रष्टा भारद्वाज ऋषि हैं। इस मण्डल में भारद्वाज के ७६५ मन्त्र हैं। अथर्ववेद में भी भारद्वाज के २३ मन्त्र मिलते हैं।

 'भारद्वाज-स्मृति' एवं 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे। ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिए विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन मिलता है।

५. अत्रि....

 ऋग्वेद के पंचम मण्डल के द्रष्टा महर्षि अत्रि ब्रह्मा के पुत्र, सोम के पिता और कर्दम प्रजापति व देवहूति की पुत्री अनुसूया के पति थे। 

अत्रि जब बाहर गए थे तब त्रिदेव अनसूया के घर ब्राह्मण के भेष में भिक्षा मांगने लगे और अनुसूया से कहा कि जब आप अपने संपूर्ण वस्त्र उतार देंगी तभी हम भिक्षा स्वीकार करेंगे, तब अनुसूया ने अपने सतित्व के बल पर उक्त तीनों देवों को अबोध बालक बनाकर उन्हें भिक्षा दी। माता अनुसूया ने देवी सीता को पतिव्रत का उपदेश दिया था।

अत्रि ऋषि ने इस देश में कृषि के विकास में पृथु और ऋषभ की तरह योगदान दिया था। अत्रि लोग ही सिन्धु पार करके पारस (आज का ईरान) चले गए थे, जहां उन्होंने यज्ञ का प्रचार किया।

 अत्रियों के कारण ही अग्निपूजकों के धर्म पारसी धर्म का सूत्रपात हुआ। अत्रि ऋषि का आश्रम चित्रकूट में था।

 मान्यता है कि अत्रि-दम्पति की तपस्या और त्रिदेवों की प्रसन्नता के फलस्वरूप विष्णु के अंश से महायोगी दत्तात्रेय, ब्रह्मा के अंश से चन्द्रमा तथा शंकर के अंश से महामुनि दुर्वासा महर्षि अत्रि एवं देवी अनुसूया के पुत्र रूप में जन्मे। ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी।

६. वामदेव....

वामदेव ने इस देश को सामगान (अर्थात् संगीत) दिया। वामदेव ऋग्वेद के चतुर्थ मंडल के सूत्तद्रष्टा, गौतम ऋषि के पुत्र तथा जन्मत्रयी के तत्ववेत्ता माने जाते हैं। 

७. शौनक...

 शौनक ने दस हजार विद्यार्थियों के गुरुकुल को चलाकर कुलपति का विलक्षण सम्मान हासिल किया और किसी भी ऋषि ने ऐसा सम्मान पहली बार हासिल किया। वैदिक आचार्य और ऋषि जो शुनक ऋषि के पुत्र थे। 

फिर से बताएं तो वशिष्ठ, विश्वामित्र, कण्व, भरद्वाज, अत्रि, वामदेव और शौनक- ये हैं वे सात ऋषि जिन्होंने इस देश को इतना कुछ दे डाला कि कृतज्ञ देश ने इन्हें आकाश के तारामंडल में बिठाकर एक ऐसा अमरत्व दे दिया कि सप्तर्षि शब्द सुनते ही हमारी कल्पना आकाश के तारामंडलों पर टिक जाती है।

इसके अलावा मान्यता हैं कि अगस्त्य, कष्यप, अष्टावक्र, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, ऐतरेय, कपिल, जेमिनी, गौतम आदि सभी ऋषि उक्त सात ऋषियों के कुल के होने के कारण इन्हें भी वही दर्जा प्राप्त है।


छठ पूजा भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण पर्व ।।


           भारत त्यौहारों का देश है यहाँ पर सभी धर्मों के विभिन्न प्रकार के त्यौहार और उत्सव मनाये जाते हैं, उन्हीं में से एक छठ पूजा है जो कि हिंदू धर्म के लोगों के लिये बहुत महत्वपूर्ण त्यौहार है। छठ पूजा का त्यौहार दीपावली के बाद आने वाले प्रमुख त्यौहारों में से एक है।

             छठ पूजा के दिन सूर्य भगवान की पूजन सम्पन्न कर उन्हें अर्घ्य दिया जाता है। चार दिवस तक मनाये जाने वाला यह पर्व बड़ा ही कठिन है। इसमें शरीर और मन को पूरी तरह साधना पड़ता है, इसलिये इस पर्व को 'हठयोग' भी माना जाता है।

            छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता है, जिन्हें साक्षी रूप में देखा जा सकता है। छठ पर्व छठ या षष्ठी पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाया जाने वाला एक हिन्दू पर्व है। इस वर्ष 30 अक्टूबर 2022 को यह पर्व मनाया जायेगा। भारत में सूर्योपासना के लिये प्रसिद्ध यह पर्व मूलतः सूर्य षष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' कहा गया है। पारिवारिक सुख-समृद्धि तथा मनोवांछित फल प्राप्ति के लिये यह पर्व मनाया जाता है। सूर्यदेव की पूजा का यह त्योहार मुख्य रूप से पूर्व भारत के बिहार, झारखंड, पूर्व उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्र में मनाया जाता है।

          छठ पूजा के विधि-विधान क्या है? छठ पूजा एक ऐसा पर्व है, जो पूरी तरह से साधक को अपनी इंद्रिय जनित कमजोरियों पर विजय दिलाता है। इससे साधक इसकी कठोरता से जरा भी विचलित हुये बिना पूरे श्रद्धा और समर्पण भाव से इस व्रत को करते है। त्योहार के अनुष्ठान चार दिनों तक मनाये जाते हैं। इनमें पवित्र स्नान उपवास और पीने के पानी (वृत्ता) से दूर रहना, लंबे समय तक पानी में खड़ा होना और प्रसाद (प्रार्थना प्रसाद) और अर्घ्य देना शामिल है। इसमें मुख्य उपासक आमतौर पर महिलाये होती है। हालांकि, बड़ी संख्या में पुरुष भी अभूतपूर्व श्रद्धा के चलते इस उत्सव का पालन करते है।

           यह पर्व चार दिवसीय हैं। भाई दूज के तीसरे दिन से यह आरम्भ होता है। छठ पूजा पूरे विधि-विधान के साथ किया जाता है,व्रति दिन भर अन्न-जल त्याग कर शाम करीब 7 बजे से खीर बनाकर, पूजा करने के उपरान्त प्रसाद ग्रहण करते हैं, जिसे खरना कहते हैं। तीसरे दिन डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य यानी दूध अर्पण करते है। अंतिम दिन उगते हुए सूर्य को अर्घ्य चढ़ाते हैं।पूजा में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। लहसुन, प्याज का सेवन वर्जित होता है। जिन घरों में यह पूजा होती है, वहाँ का संपूर्ण वातावरण बहुत ही भक्तिमय व सात्विक होता है। भक्तिगीत गाये जाते है। अंत में लोगों को पूजा का प्रसाद दिया जाता हैं और व्रत को संपूर्ण माना जाता है।

         छठ का पर्यावरणीय महत्व क्या है? छठ पूजा का महत्व पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी है क्योंकि इसका स्वरूप व मनाने का ढंग पूरी तरह से प्रकृति को समर्पित है। यह है ही प्रकृति की पूजा इसके पूजन के केंद्र में सूर्य हैं और पूजन सामग्री मौसमी फल सब्जियाँ, जो कि प्रकृति का आभार स्वरूप है।

         छठ पूजा की ऐतिहासिक शुरूआत, संस्कार और पुराणिक उल्लेख छठ पर्व छठ षष्ठी का अपभ्रंश है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीवाली के बाद मनाये जाने वाले इस चार दिवसीय व्रत की सबसे कठिन और महत्वपूर्ण रात्रि कार्तिक शुक्ल षष्ठी की होती है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी को मनाये जाने व मान्यता के अनुसार सूर्य भगवान की बहन छठी मइया को समर्पित होने के कारण ही इसका नाम छठ पड़ा। एक कथा के अनुसार प्रथम देवासुर संग्राम में जब असुरों के हाथों देवता हार गये थे, तब देव माता अदिति ने तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी तब प्रसन्न होकर छठी मैया ने उन्हें सर्वगुण संपन्न तेजस्वी पुत्र होने का वरदान दिया था। इसके बाद अदिति के पुत्र त्रिदेव रूपी आदित्य भगवान ने असुरों पर देवताओं को विजय दिलाई। कहते हैं कि उसी समय से देव सेना से षष्ठी देवी के नाम पर हो गया और छठ का चलन भी शुरू हो गया। रामायण में भी उल्लेखित एक मान्यता के अनुसार, लंका विजय के बाद रामराज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास किया और सूर्यदेव की आराधना की। सप्तमी को सूर्योदय के समय पुनः अनुष्ठान कर सूर्यदेव से आशीर्वाद प्राप्त किया था।

          उत्सव का संपूर्ण स्वरूप क्या है? छठ पूजा चार दिवसीय उत्सव है। इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

नहाय खाय पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी 'नहाय-खाय' के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की साफ-सफाई कर उसे पवित्र किया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बना शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते है। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजन के बाद ही भोजन ग्रहण करते हैं।

       लोहंडा और खरना दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को भोजन करते हैं। इसे 'खरना' कहा जाता है। खरना का प्रसाद लेने के लिये आस-पास के सभी लोगों को नियंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुये चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है।

         संध्या अर्घ्य तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ का प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी भी कहते हैं, के अलावा चावल के लड्डू जिसे लडुआ भी कहते है, बनाते हैं। इसके अलावा चढ़ावा के रूप में लाया गया सांचा और फल भी छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है। शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की और चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नियत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है।

         उषा अर्घ्यं चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदियमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं, जहाँ उन्होंने पूर्व संध्या को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। सभी व्रती तथा श्रद्धालु घर वापस आते हैं। व्रती घर वापस आकर पीपल के पेड़, जिसे 'ब्रह्म बाबा' कहते हैं, की पूजा करते हैं। पूजा के पश्चात् व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूर्ण करते हैं, जिसे पारण या परना कहते हैं।

          व्रत छठ उत्सव के केंद्र में छठ व्रत है, जो एक कठिन तपस्या की तरह है। यह छठ व्रत अधिकतर महिलाओं द्वारा किया जाता है, कुछ पुरुष भी यह व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाली महिलाओं को परवैतिन कहा जाता है। चार दिनों के इस व्रत में व्रती को लगातार उपवास करना होता है। भोजन के साथ ही सुखद शैय्या का भी त्याग किया जाता है। पर्व के लिए बनाये गये कमरे में व्रती फर्श पर एक कम्बल या चादर के सहारे ही रात बिताती हैं। इस उत्सव में शामिल होने वाले लोग नए कपड़े पहनते हैं, जिनमें किसी प्रकार की सिलाई नहीं की गई होती है। व्रती को ऐसे कपड़े पहनना अनिवार्य होता है। महिलायें साड़ी और पुरुष धोती पहनकर छठ करते हैं। 'छठ पर्व को शुरू करने के बाद सालो साल तब तक करना होता है, जब तक कि अगली पीढ़ी की कोई विवाहित महिला इसके लिये तैयार न हो जाये। घर में किसी की मृत्यु हो जाने पर यह पर्व नहीं मनाया जाता है।

         छठ पर्व मूलतः सूर्यदेव की आराधना का पर्व है, जिसे हिन्दू धर्म में विशेष स्थान प्राप्त है। हिन्दू धर्म के देवताओं में सूर्यदेव ऐसे देवता हैं, जिन्हें मूर्त रूप में देखा जा सकता है। सूर्य की शक्तियों का मुख्य श्रोत उनकी पत्नी ऊषा और प्रत्यूषा हैं। छठ में सूर्य के साथ-साथ दोनों शक्तियों की संयुक्त आराधना होती है। प्रातः काल में सूर्य की पहली किरण (ऊषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा ) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है।

छठ पूजा के 6 चरण योग में छठ पूजा के प्रक्रम को 6 चरण में बांटा गया है। छठ पूजा शुद्धिकरण 6 चरणों में पूरी होती है। पहला शरीर और आत्मा का निराविषीकरण, ऐसा व्रत अनुशासन और आत्मसंयम से संभव से किया जाता है। अपने शरीर और ध्यान को सूर्य की प्राण ऊर्जा पाने के लिये तैयार करते हैं। दूसरा नदी में आधा शरीर डूब जाने तक खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देना, ऐसा करने से सूर्य से मिलने वाली प्राण ऊर्जा से सुषुम्ना नाड़ी जागृत होती है। तीसरा इस चरण में सूर्य की ऊर्जा आपकी आँखो से पीनियल ग्रंथियों तक पहुँचती है। चौथे चरण में आपके अंदर ग्रंथियां एक्टिवेटेड हो जाती हैं। पांचवे जैसे ही पीनियल ग्रंथि जागृत होती है, आपकी रीढ़ तरंगित होकर आपके अंदर की कुंडिलिनी शक्ति को जागृत करती है और आपकी इंदुइशन, यानी अंतर्दृष्टि को मजबूत करती है। छठे व्रत धारण करने वाला स्वयं ऊर्जा का एक स्रोत बन जाता है और जगत को अपने व्यक्तित्व की सकारात्मक ऊर्जा से पोषित करने लायक बन जाता है। सच्चे मन और श्रद्धा के साथ छठ पूजा व्रत करने वालो की सभी मनोकामनाये पूरी होती है इसलिये अपनी मनोकामनाये पूरी करने के लिए स्त्री और पुरुषों दोनों के द्वारा छठ पूजा व्रत किया जाता हैं।

            हमारी भारतीय संस्कृति में त्योहार कुछ ऐतिहासिक घटनाओं पर आधारित होते हैं और वे हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। हम विभिन्न देवी-देवताओं से प्रार्थना करते हैं और अपनी श्रेष्ठता की कामना करते हैं और प्रत्येक अवसर को मनाते हैं।

ॐ श्री परमात्मने नमः ।।

           जिंदगी भर दौड़ती भागती रहती है यह दुनिया सुख और खुशियाँ पाने के लिए, जीवन की तृष्णा का अर्थ है कि हम अपने जीवन को कल में खोज रहे हैं, भविष्य में खोज रहे हैं पर जीवन अभी में है, आज मे है, इसी क्षण में है। जीवन आज है और आप हो कि अपनी आँखें कल पर लगाये बैठे हो एवं जो आज नहीं देखता वह चूक जाता है। समय का चक्र निरंतर चलता रहता है प्रत्येक क्षण अपने आप में एक अलग सत्ता है, प्रत्येक क्षण अपने आप में अलग व्यक्तित्व है जब तक आप क्षण को महत्व नहीं देते तब तक अपने व्यक्तित्व को नहीं समझ सकते। रावण लंका का राजा था एवं उसके क्रोध से समस्त भूमण्डल थर-थर कांपता था। उसने मंत्र-तंत्र के माध्यम से कुछ ऐसी विशेष सिद्धियाँ प्राप्त कर ली थी कि जिससे वह आकाश गमन कर सकता था, वह वायु, इंद्र आदि का मनचाहे ढंग से उपयोग कर सकता था। रावण ने भी अंत समय में काल के चक्र को मन ही मन प्रणाम करके कहा कि मैं सब कुछ करने में तो समर्थ हो सका पर समय का मूल्य और क्षण का महत्व नहीं जान सका इसलिए आज मैं ऐसी स्थिति को प्राप्त हुआ हूँ।

            रावण का शरीर रणभूमि में मृत्यु की कगार पर पड़ा हुआ था एवं जब राम ने देखा कि युद्ध में विजय के पश्चात् लक्ष्मण में कुछ घमंड आ गया है तो वह लक्ष्मण को समझाते हैं, वह लक्ष्मण से कहते हैं कि देवताओं की कृपा से ही हम इस युद्ध में विजयी हुए हैं परन्तु इसका मतलब यह नहीं कि हम रावण से ज्यादा बलवान और चतुर है अगर सचमुच में देखा जाये तो रावण के समान विद्वान इस पृथ्वी पर कोई हुआ ही नहीं वह मंत्र और तंत्र के क्षेत्र में अद्वितीय था उसने प्रकृति एवं उसके साधनों को अपने वश में कर लिया। सामान्य लोग जिस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते उसने ऐसे-ऐसे असम्भव कार्यों को भी सम्भव करके दिखाया। वह जब चाहे तब अपनी लंका पर जितनी चाहे उतनी वर्षा कराने में समर्थ था, वह पर्वतो का स्थान बदलने में समर्थ था, वायु के वेग को वह अपने सामर्थ्य से रोक सकता था, स्वतंत्र रूप से आकाश में विचरण कर सकता था । इस पृथ्वी पर प्राकृतिक शक्तियों को जिस प्रकार रावण ने नियंत्रित किया था अन्य कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। रावण इस पृथ्वी पर सबसे ज्यादा बलवान, विद्वान और योग्य व्यक्ति था । उसे समय की गणना का पूरा-पूरा ज्ञान था, समय ज्ञान अपने आप में एक बहुत बड़ी अद्भुत विद्या है। तुम रावण के पास जाकर काल ज्ञान की शिक्षा ग्रहण करो लक्ष्मण, राम की आज्ञा पाकर वह अनमने मन से रावण के पास जाते हैं।

            वहाँ पहुँचकर लक्ष्मण ने देखा कि मृत्यु के समय भी रावण के चेहरे पर मुस्कुराहट है । लक्ष्मण गर्व से विजयी भाव लिए रावण से कहते हैं कि मेरे बड़े भाई राम ने मुझे आपके पास भेजा है और मैं आपसे काल ज्ञान की शिक्षा लेने आया हूँ। रावण चुप रहा, न उसने लक्ष्मण को कोई आशीर्वाद दिया न अपने मुँह से कोई शब्द निकाला। रावण के उत्तर का इंतजार करते-करते जब काफी समय बीत गया तब क्रोध से तमतमाते हुए लक्ष्मण वापस अपने शिविर में आ गये एवं आकर राम से बोले आपने तो व्यर्थ में ही मेरा अपमान करा दिया एक हारे हुए व्यक्ति के पास जाने का कोई मतलब नहीं है। मैंने तो अपने क्षत्रिय कुल की मर्यादा भी रखी उसे प्रणाम भी किया पर उसने तो मुझसे एक बात भी नहीं की। राम ने कहा रावण इतना मूर्ख और असभ्य नहीं है अपितु वह ज्ञान के जिस स्तर पर है वहाँ हार-जीत में कोई भेद नहीं है अच्छा तुम यह बताओ जब तुम रावण के पास गये थे तब तुम कहाँ खड़े हुए थे। लक्ष्मण ने कहा में उनके सिरहाने खड़ा था, बस तुमने यही गलती कर दी थी। तुम वहाँ एक शिष्य के रूप में गये थे, तुम उनसे कुछ सीखने गये थे और जब कुछ सीखने ही गये थे तो तुम्हें उनके चरणों के पास खड़े होना चाहिए था क्योंकि शिष्य का स्थान चरणों के पास ही होता है।

          शिष्य चाहे कितना भी महान क्यों न हो जाये उसे अपने गुरु के सामने कभी भी घमंड नहीं करना चाहिए अपितु उसका व्यवहार हमेशा शालीन, नम्र एवं सुयोग्य शिष्य के समान होना चाहिए। तुम एक बार फिर उनके पास जाओ, लक्ष्मण राम की आज्ञा पाकर पुन: रावण के पास पहुँचते हैं। लक्ष्मण वहाँ पहुँचकर इस बार उनके चरणों के पास खड़े होते हैं और रावण से कहते हैं कि मैं दशरथ नंदन लक्ष्मण पूर्ण श्रद्धा के साथ आपके चरणों में नमन करता हूँ। रावण ने तुरंत उसे आशीर्वाद दिया दीर्घायु एवं विजयी होने का प्रसन्न मन से लक्ष्मण ने निवेदन किया मैं श्रीराम की विशेष आज्ञा से आपसे काल - ज्ञान की शिक्षा लेने आया हूँ अतः आप मुझे इस योग्य समझे तो काल ज्ञान प्रदान करने की कृपा करें। रावण ने समय के महत्व को समझाते हुए कहा कि समय का चक्र निरंतर चलता रहता है और जो अपने जीवन में समय के चक्र को पहचान लेता है वह निश्चय ही अपने लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो जाता है एवं उसकी प्रगति को विधाता भी नहीं रोक सकते।

            प्रत्येक क्षण का एक अलग ही महत्व है, प्रत्येक क्षण की अपनी एक अलग ही सत्ता होती है, एक क्षण का दूसरे क्षण से कोई मुकाबला नहीं है, दोनों क्षणों की आपस में कोई तुलना नहीं है। एक क्षण विशेष में किया हुआ कार्य जहाँ पूर्णतः सफल होता है वही दूसरे क्षण विशेष में उसी कार्य में असफलता हाथ लगती है । रावण ने कहा मैं इस बात को अभी यहीं सिद्ध किये देता हूँ। रावण ने अपने आस-पास से सात पत्ते इकट्ठा किए और लक्ष्मण से कहा मैं लोहे की शलाका से एक विशेष क्षण में इन्हें भेदूंगा तब तुम्हें प्रत्येक क्षण की स्वतंत्र सत्ता समझ में आ जायेगी फिर रावण ने शलाका पत्तों पर चुभो दी। उसने देखा कि पहला पत्ता सोने में परिवर्तित हो गया, दूसरा पत्ता चाँदी में तीसरा पत्ता ताँबे में और चौथा लोहे में परिवर्तित हो गया। इस प्रकार छः पत्ते अलग-अलग धातुओं में परिवर्तित हो गए और साँतवा पत्ता सिर्फ पत्ता ही रह गया उसमें कोई परिवर्तन नहीं हुआ, यही क्षणों की पहचान और उसका महत्व है। सातों पत्तों को भेदने बहुत ही कम समय लगा हर क्षण की विशेष सत्ता के कारण पतों में भी विशेष परिवर्तन हुए। एक क्षण दूसरे क्षण से अलग है इसलिए व्यक्ति को क्षणों की पहचान कर लेनी चाहिए और उन्होंने लक्ष्मण को काल ज्ञान की दीक्षा प्रदान करके आशीर्वाद दिया।

           ‌जीवन का गहनतम प्रयोग यह है कि आप समय को पहचानो, उसका मूल्य समझो, समय बहुत ही अनमोल है, जीवन से तृष्णा को दूर करो, जीवन से वासना को दूर करो। जीवन की तृष्णा का अर्थ है कि सभी तृष्णाएं भविष्य में होती हैं। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि जिस क्षण में हम बैठे हैं उस क्षण हम किसी वासना में नहीं डूब सकते अपितु सारी वासनाएं कल के लिए होती हैं। वासना के लिए समय चाहिए, स्थान चाहिए। हम जब भी कुछ चाहते हैं भविष्य के लिए चाहते हैं अगर भविष्य न हो तो इच्छा मर जाती है अगर कोई इच्छा ही न रहे, कोई चाहत ही न रहे तो भविष्य समाप्त हो जाता है अगर चाह छूट जाये तो आदमी वर्तमान में आ जाता है यदि हम वर्तमान में आ जाये तो चाह छूट जाती है जीवन की तृष्णा को हम भविष्य में खोज रहे हैं जबकि जीवन यहाँ है, जीवन तो आप स्वयं ही हो और आप की आँखें कल पर लगी हुई हैं।

              जो बहुमूल्य समय आपके पास आज है वह आपको दिखाई नहीं पड़ता है यही अनमोल क्षण हमसे चूक जाता हैं इसलिए हम सभी दुःखी हैं हमें दुःखी होने की इतनी कलाएं आती हैं कि जिसका कोई हिसाब ही नहीं है क्योंकि हम सब भविष्य में जीते हैं और भविष्य कभी नहीं आता बस हमें वह आता हुआ दिखाई देता है। भविष्य की तृष्णाएं दुःख देती हैं जितनी ज्यादा तृष्णाएं होंगी उतना ज्यादा दुःख होगा। एक बार तरकश से तीर निकल गया तो फिर उसे रोकने का कोई उपाय नहीं है। भिखारियों के समान जो इस जगत में जीयेगा वह दुःखी रहेगा परन्तु जो सम्राटों की तरह अपना जीवन जियेगा वह सदा सुखी रहेगा। किसे कहते हो आप सम्राट - सम्राट । सम्राट वह है जो सुखी है, संतुष्ट है। हम अपने चारों तरफ सुख की तलाश करें कि सुख कहाँ है वह आपके पास ही है बस पहचानने की क्रिया आनी चाहिए, सुख का अपार भण्डार है आपके पास बस आपमें उसे ग्रहण करने की क्षमता होनी चाहिए जब भी आप जो भी कार्य करें पूरी लगन से सुख पूर्वक करें जब आप पानी पियें तो सुख पूर्वक पियें, भोजन करें चाहे वह दाल-रोटी ही क्यों न हो तो सुखपूर्वक करें। राह पर चलो या वृक्ष के नीचे बैठें चाहे आप ध्यान लगा रहे हो तो उसे भी सुखपूर्वक लगाओ।

          आप जो भी काम कर रहे हो सुख से करो। इतना सुख है कि आप समेट भी नहीं पाओगे, इतना सुख है कि आपकी सारी झोलियाँ छोटी पड़ जायेगीं, इतना सुख है कि आपके हृदय में सुख की बाढ़ आ जायेगी और जिस दिन आपके हृदय में सुख की बाढ़ आ जाये आप समझ लेना कि आप स्वयं सम्राट बन गये, आपके चारों तरफ सुख का वातावरण चलने लगेगा, जो भी आपकी छत्र-छाया में बैठेगा वह भी सुखी हो जायेगा, आपके नृत्य से वह भी नृत्य करने लगेगा, आपके चारों तरफ सुख ही सुख का वातावरण चलने लगेगा, आप जिसे छुओगे उसे सुख का स्पर्श होगा, जिसकी तरफ देखोगे वहाँ सुख के फूल खिलने लगेंगे। सुख कोई इच्छा नहीं है वह जीने की एक कला है एवं आप इस कला को सीखे फिर आपके भीतर इतना सुख होगा कि वह बहने लगेगा, अपने आप बटने लगेगा, सुख की तरंगे आपकी अंदर से उठने लगेगीं, सुख के गीत झरने लगेंगे। सुख से जीने का एक अलग ही ढंग है जो वर्तमान में जीते हैं, हर क्षण को जीते हैं, क्षण-क्षण की बात करते हैं वह जीवन को कल पर नहीं थोपते एवं जो कल की बात करते हैं, जो लोग दिन भर ख्याली पुलाव बनाते हैं, जो महत्वाकांक्षा से भरे हैं वह दुःख ही पाते हैं। वह जीते सुखी होने के लिए है पर दुःख ही पाते हैं। मैं यह नहीं कहत कि आप हाथ पर हाथ रख कर बैठ जाओ अपितु अपने व्यापार में, अपने केरियर में जो महत्वाकांक्षा है उन्हीं के अनुसार परिश्रम करे। अत्यधिक महत्वाकांक्षी पागलों के समान श्रम करते हैं, परिश्रम भी करें तो सुख से करें, हँसते मुस्कुराते हुए करें फिर जीवन में हर तरह का पूर्ण भौतिक और पूर्ण आध्यात्मिक सुख मिलता है। जिस ओर भी हम श्रम करते हैं हमें उसका फल तो प्राप्त होता ही है।


             आम का पेड़ लग गया तो आम उगेगा ही पर चौबीस घण्टे फल के उगने के लिए रोते रहोगे तो दुःखी ही रहोगे। जब फल लगेगा तब खा लेना सुखपूर्वक । ईश्वर की कृपा भी उन्हीं को मिलती है जो उस तरफ की यात्रा करते हैं, ईश्वर भी उन्हीं की सहायता करता है जो दूसरों को सहायता देने में कंजूसी नहीं करते हैं। प्रसाद उन्हीं को मिलता है जो श्रम करते हैं, प्रयास करते हैं। मुफ्त में कुछ भी नहीं मिलता फिर परम सुख की खोज मुफ्त में कैसे हो सकती है ? लोग कहते हैं हम सुख से कैसे जियें ? आप जिस क्षण में हो उसका पूरा-पूरा सदुपयोग करें, आपको एक-एक क्षण को जीना आ जायेगा। कैसे ? यह मत पूछिए बस आप जो भी कार्य करें सुख पूर्वक करें, चलो तो सुख से, बैठो तो सुख से, श्वास लो तो सुख से आपकी प्रत्येक क्रिया में सुख का झरना बहने लगेगा, सुख के लिए रुको मत, सुखी होने के लिए उसका इंतजार मत करो, सुख को भविष्य के लिए मत छोड़ो। आप जहाँ भी खड़े हो जैसे भी खड़े हो आप जो कुछ भी कर रहे हो सुख से करो। "बिन मांगे मोती मिले मांगे मिले न भीख"

            हमारे मन में कई जन्मों के संस्कार हैं, कई जन्मों से हमने दुख के सिवा कुछ भी इकट्ठा नहीं किया यही संस्कार बार-बार धक्के मारकर दुःख के आवरण में प्रविष्ट करा देते हैं। दुःखी होने की प्रवृत्ति पाप है यह शायद सुनने में आपको अच्छा न लग रहा होगा क्योंकि जो दुःखी होता है वह दूसरों को दुख देने में अधिक रस लेता है। उसे दुसरों को दुखी करना अच्छा लगता है जबकि दूसरे को दुःखी करना पाप है जो दूसरों को हमेशा दुखी करता है सोचो वह स्वयं कितना दुःखी आदमी है। अंदर से जिसके पास जो होगा वही तो बांटेगा जो स्वयं अपनी आत्मा पर दुःख की काली छाया नहीं पड़ने देता वह महासुख से भर जायेगा । वह सम्राट बन जायेगा। हम दूसरों को क्यों दुःख देना चाहते हैं? क्योंकि हम दुःखी हैं और जब तक हम अपने से ज्यादा दुःखी किसी को नहीं कर लेते हैं उसका दुःख देखकर हम थोड़े सुखी हो जाते हैं। हमारा सुख यही है कि हमने किसी को दुःखी कर दिया। हमने किसी से उसका सबकुछ छीन लिया, हमने उसको नीचा दिखा दिया, हमने उसकी अकड़ ढीली कर दी, हमने उसको भरी सभा में सबके सामने अपमानित कर दिया पर यह सब सुख नहीं है हम अपने चारों तरफ दुःख की लकीरें खींचते रहते हैं।

          एक दुःखी पति अपनी पत्नी को दुःखी करता रहता है, दुःखी बेटा अपने बाप को दुःखी करेगा, पूरे का पूरा समाज दुःख का एक जंजाल बन गया है। जब हम अपने से ज्यादा किसी को दुःखी देख लेते हैं तब हम थोड़ा सुखी हो जाते हैं हम यह सोचते हैं कि यह हमसे ज्यादा दुःखी है। दूसरों को दुःख पहुँचाने में इतना ज्यादा व्यस्त हो जाते हैं कि अपनी सारी चिंताएं ही भूल जाते हैं। स्वयं दुःखी होना और दूसरों को दुःख पहुँचाना पाप है इसलिए अपने अंदर से पाप के बीज को बाहर निकालीये सुख पुण्य है, आनंद पुण्य है जब तक सुखी होते है तो पुण्यात्मा हो जाते है। लोग सोचते हैं हमने दान दे दिया हम पुण्यात्मा हो गये, हमने मंदिर बनवा दिया या हमने कोई गुरुद्वारा या गिरजाघर बनवा दिया, गरीब लोगों को भोजन करवा दिया, धर्मशाला बनवा दी तो तुम पुण्यात्मा बन जाओगे यह जरुरी नहीं। हो सकता है यह सब कार्य आप दूसरों को नीचा दिखाने के लिए या दुःख देने की वृत्ति से कर रहे हो अगर आप अहंकारी हो गये और अहंकार से आपने पड़ोसी को मुफ्त में दस हजार रुपया भी दे दिए तो वह दान नहीं है। जब भी आपको ऐसा लगे कि आपका मन आपको दुःख की वृत्ति में डाल रहा है, आप दुःख की वृत्ति में पड़ रहे हैं तो उस बीज को डालने से पहले ही अपने हृदय से उखाड़ फेंकना, देर मत करना इन जड़ों को भीतर प्रवेश मत करने देना, यहाँ अपने आप में बड़े साहस की जरुरत पड़ती है।

            दुर्बल लोग तो उसे फलने फूलने देते हैं, जड़ को पनपने देते हैं। आप किसी को दुःखी करके देखो आप स्वयं दुःखी हो जाओगे अगर आप किसी को सुखी कर दो तो जाने कितने रूपों में सुख गूंजने लगता है आपकी अंतरात्मा भी इससे अपने को प्रसन्न महसूस करती है। अगर आप किसी के रास्ते का एक कांटा हटा दो तो आपके रास्ते से अनेकों कांटे स्वतः हट जायेंगे, आप किसी के लिए एक फूल रख दो तो आपके लिए फूलों की सेज बन जायेगी। आप जो भी कर रहे हो उसकी गूंज अनंत ब्रह्माण्ड तक जाती है क्योंकि आप अनंत ब्रह्माण्ड के साथ संयुक्त हो अगर आपके अंदर एक छोटा सा विचार भी आया तो वह सारा संसार सुनता है। आपके हृदय के एक-एक भाव की झंकार सारे अस्तित्व पर पड़ती है यह अनंत काल से चला आ रहा है। आपका रूप खो जायेगा, शरीर गिर जायेगा लेकिन आपने जो किया, आपने जो चाहा, आपकी भावनाएं और जो भावना बनाई, जो आपने बोला, जो कहा वह सब इस ब्रह्माण्ड में गूंजता रहेगा। हम यहाँ से खो जायेंगे हमारा बीज फिर कहीं अंकुरित होगा, हमारे सारे कर्म कभी नहीं खोते।

              महावीर एक चींटी भी नहीं मारते थे लोग इस बात का मजाक भी उड़ाते हैं कि हम जैनी थोड़े ही हैं जो चींटी भी न मारे । महावीर की अहिंसा और शंकराचार्य के अद्वैत भाव में कोई अंतर नहीं है। चींटी को न मारना इसका यह अर्थ नहीं है कि चींटी पर दया की जा रही है अहिंसा का मतलब सिर्फ इतना ही है कि अगर आप किसी को चोट पहुँचा रहे हो, किसी को दुःख पहुँचा रहे है, मार रहे है तो आप आत्महत्या करने के समान पाप कर रहे है। जब आप अपने आपको ब्रह्माण्डीय समझोगे आप ब्रह्माण्डीय तो हो पर आप जब यह सब जान जाओगे जब आप यह जान जाओगे कि आप सारे अस्तित्व के साथ हो तो एक अद्वैत भाव जागृत होगा जो कि सत्य है । अहं ब्रह्मास्मि का अर्थ है कि एक चींटी के साथ भी अद्वैत भाव है, समस्त अस्तित्व के साथ अद्वैत भाव मुझमें है और मैं सबमे हूँ।

           हम सोचते हैं कि हम सब एक कैसे हो सकते हैं सागर में छोटी सी एक लहर है तो एक बहुत बड़ी लहर भी है कोई लहर अभी जन्मी है अभी-अभी उठी है, वापस पानी में गिरने वाली लहर अभी उठ रही है। इस ब्रह्माण्ड में सब कुछ लहर बद्ध है हम सब लहरों से ज्यादा कुछ भी नहीं हैं कहीं वृक्षों की लहर है तो कहीं पर पत्थरों की लहर है कहीं पक्षियों की लहर है तो कहीं मनुष्यों की लहर है, यह सभी पराम्बरा की लहरें हैं। यह सब लहरें पराम्बरा से निकली हैं, पीताम्बरा से निकली हैं नाम कुछ भी दे दो, वापस उन्हीं में लौट जाती हैं। मृत्यु सिवाय इसके कुछ भी नहीं है जन्म से पहले भी आप अद्वैत थे मृत्यु के बाद भी अद्वैत हो ही गये। जिसके अंदर जीते जी अद्वैत भाव आ जाता है फिर उसकी मृत्यु नहीं होती। रावण के बिना राम होने का कोई मतलब नहीं है एवं राम के बिना रावण भी अधूरा है। हम सोचते हैं राम और रावण में बड़ी दुश्मनी है पर जब कभी मैं इस विषय में सोचत हूँ यह मेरा विचार है कि इनसे ज्यादा गहन मित्रता कठिन है जिसके बिना अस्तित्व ही समझ में न आये, जो हमारा आधार है फिर तो हमें उसकी परिभाषा ही बदलना पड़ेगी। शत्रु मित्र से भी अधिक निकट हैं। राम की कथा में अगर रावण को निकाल दिया जाये तो इस कथा का रस ही समाप्त हो जायेगा, रावण की मौजूदगी में ही राम की महिमा है, अशुभ रावण शुभ राम की पृष्ठभूमि है।

        आज सारी मनुष्यता को हमने उलझन में डाल दिया है, सभी धर्मों का अध्ययन जरुरी है चुनाव आपका स्वयं का होना चाहिए। आपकी आध्यात्मिक यात्रा का चुनाव आप स्वयं ही करें तो ज्यादा अच्छा होगा, धर्म के प्रति जो बगावत पैदा हो गई है वह सब नहीं होगी। किसी व्यक्ति को जबर्दस्ती अपने मार्ग में जोड़ लेना यह सबसे बड़ा महापाप है। धार्मिक होने के लिए स्वयं का निर्णय चाहिए अन्यथा यह दुनिया धार्मिक नहीं हो सकती। अध्यात्म एक घटना है, भक्ति एक घटना है, प्रेम भी एक घटना है। प्रेम खतरनाक हो सकता है क्योंकि प्रेम बहुत ऊँचाई पर ले जाता है और ऐसे स्वप्न निर्मित कर देता है कि उन स्वप्नों के साथ हमेशा जीना मुश्किल है क्योंकि इतनी ऊंचाई पर सदा जीना अत्यंत मुश्किल हो जाता है, नीचे उतरना ही पड़ता है । अध्यात्म सामाजिक व्यवस्था का अंग नहीं है, अध्यात्म तो आत्म क्रांति है। हर व्यक्ति को अपना गुरु चुनने का पूरा-पूरा अधिकार है। गुरु जबर्दस्ती थोपे नहीं जाते जब बुद्ध, महावीर जीवित थे जब वह अपने शिष्यों को दीक्षित करते थे तब उन शिष्यों का यह स्वयं का चुनाव होता था कि वह बुद्ध हो रहा है या वह महाव हो रहा है, शिष्य का यह अपना निजी चुनाव है, उसका समर्पण है।

          यह प्रतिबद्धता किसी ने जबर्दस्ती नहीं दी उसने खुद ली है और वह अपना पूरा जीवन दाँव पर लगा देते हैं क्योंकि जब आत्मक्रांति होती है वह जबर्दस्ती थोपी हुई नहीं होती है। उसे जो ठीक लगा उसने चुनाव किया और अपना जीवन दाँव पर लगा दिया। थोपे हुए अध्यात्म पर जीवन दाँव पर लग ही नहीं सकता क्योंकि उसमें वह तेजस्विता नहीं होगी। ऐसा व्यक्ति न तो साधक होगा न ही शिष्य होगा वह तो एक प्रकार का बंधुआ मजदूर होगा, युद्ध तो जारी रहेगा लेकिन साक्षी भाव से युद्ध में एक फर्क होगा युद्ध तो आप करोगे लेकिन वह युद्ध धर्म के लिए होगा जहाँ धर्म है वहाँ श्रीकृष्ण खड़े हैं और जहाँ पर श्रीकृष्ण खड़े हैं वहाँ सत्य है और विजय हमेशा सत्य की होती है। प्रेम का स्वरूप अनिवर्चनीय है गूंगे के स्वाद की तरह। प्रेम गुण रहित, कामना रहित प्रतिक्षण बढ़ता रहता है, यह विच्छेद रहित है एवं इसका चरम रूप ही भक्ति है। राम प्रसंग में बहुत सारे प्रेम प्रसंग है इसमें से भरत का राम के प्रति प्रेम अमृत को सजाने वाला समुद्र है। मेरे पास रामकथा की एक कैसेट है जब भी मैं उस कैसेट को सुनत हूँ उससे भरत का राम के प्रति प्रेम सुनकर मेरी आँखें आंसुओं से भर जाती हैं जब तक वह कैसेट चलती रहती है उतने समय तक मेरी आँखों से आंसू बहते ही रहते हैं। जब भरत जी कैकयी की करतूत के कारण श्रीरामधाम की ओर जाते हैं रास्ते में राम के चरण चिन्हों को धरती पर अंकित देखकर उस धूल को अपने मस्तक पर लगाते हैं, अपने हृदय पर लगाते हैं उनका राम के प्रति इतना अपार प्रेम देखकर खग-मृग सतंभर प्राणी सभी प्रेममय हो जाते हैं। प्रकृति भी भरत के प्रेम की सराहना करके फूली नहीं समाती है।

          जब राम वियोग से संतृप्त भरत राम के सम्मुख आते हैं वह राम को प्रणाम करके कहते हैं हे नाथ रक्षा करो। प्रेम तो लक्ष्मण भी राम से बहुत करते थे वह हर समय सुख-दुःख में राम के साथ रहते थे वियोग तो भरत को सहना पड़ा, रोते सिसकते हुए जब वह राम के सम्मुख आते हैं तब लक्ष्मण राम से कहते हैं हे रघुनाथ भरत आपको प्रणाम कर रहे हैं। राम भरत को देखते ही उन्हें अपने हृदय से लगा लेते हैं " भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान" मिलन प्रीति का यह मनमोहक वर्णन कैसे किया जाये। यह परम प्रेम बुद्धि-चित सबको बिसराकर भरत और राम परम प्रेम में पूर्ण स्थिर हो जाते हैं। "परम प्रेम पूरन दोउ भाई मन बुद्धि चित अहमिति बिसराई" भरत और राम का परस्पर स्नेह अगम्य है। भरत जी की श्री रामचंद्रजी के प्रति विशुद्ध प्रेम दिव्य स्वार्थ रहित प्रेम है और वह श्रीराम के हृदय में फलित होकर अपार स्नेह का रूप धारण करता है। विशुद्ध प्रेम में न रजोगुण होता है, न तमोगुण होता है, न सतो गुण होता है। रजो गुण के नियामक ब्रह्मा, 'तमोगुण के नियामक रुद्र और सत गुण के नियामक विष्णु भी उसमें नहीं हैं। विशुद्ध प्रेम को निरुपित नहीं किया जा सकता।

        भरत राम से कहते हैं मेरे यह नयन आपके दर्शन से तृप्त नहीं हुए, भरत का निर्मल प्रेम देख-परखकर राम ने भरत को शक्तिपात किया तभी से भरत ने राम की चरण पादुका को सिंहासन पर रख कर राम राज्य चलाया । राम ने शक्तिपात करते हुए कहा "मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार लोक सुजसु परलोक सुख सुमिरत नामु तुम्हार" भरत तुम्हारा नाम याद करते ही सब पाप मिट जायेंगे, छल-कपट, दम्भ, सब प्रकार के मायाजाल नष्ट हो जायेंगे, समस्त अमंगलों के समूह नष्ट हो जायेंगे। धन, वैभव, यश, सुलभता से प्राप्त होगा और उसे परलोक में भी सुख मिलेगा। रामकथा में मुझे भरत एवं हनुमान जी में मेरा विशेष रस है। जप, तप, व्रत, नियम चाहे जितने भी हों, साधन कितने भी कर लिये जायें प्रेम नहीं है तो सारे प्रयास निष्फल चले जायेंगे। प्रेम से ही भक्ति आती है और भक्ति के लिए विश्वास आवश्यक है। बिना विश्वास के भक्ति नहीं होती और बिना भक्ति के श्रीराम द्रवित नहीं होते। राम के बिना मोक्ष नहीं मिलता। भरत का त्याग महान बुद्धि है, भरत का राम के प्रति प्रेम देखकर भारद्वाज जी कहते हैं भरत तुमने राज्य को स्वीकार नहीं किया यह तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना धर्म है पर श्रीराम से प्रेम एवं सभी लौकिक धर्मों का त्याग करना सबसे श्रेष्ठ है। भरत तुम राम प्रेम के साक्षात अवतार हो तुम्हें राम भक्ति रस सिद्ध नहीं करना है अपितु तुम स्वयं राम भक्ति रस हो ।

          राम भक्ति और राम एक ही रूप हैं। भरत राम से अलग रहते हुए भी उनके चरण कमलों को अपने हृदय में धारण कर उनकी सेवा में सदा संलग्न रहते हैं। प्रभु श्रीराम के चरणों की सेवा में हनुमान जी का स्थान उनके भक्तों में, उनके शिष्यों में सर्वोपरि है। हनुमान जी एक क्षण के लिए भी अपने हृदय से राम को अलग नहीं होने देते। ।। हनुमान सम नहिं बड़भागी नाहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥ किमि बरनऊं हनुमान की काय कांति कमनीय । रोम रोम में रमि रहा नाम नाम रमनीय ॥ हनुमान जी श्रीराम के आदेशानुसार जब सीता जी की खोज में लंका जाते हैं तब मार्ग में उन्हें अनेकों कठिनाइयों का सामना करना पड़ा जैसे समुद्र लांघना, लंका को जलाना, राक्षसों का वध करना, अशोक वाटिका को उजाड़ना।

          हनुमान जी ने कहा यह सब कार्य आपकी शक्ति के सहारे ही किए हैं मैंने अपनी शक्ति के सहारे नहीं किए हैं। जैसे कृष्ण का राधा से प्रेम अलौकिक है, वैसे ही राम का बंधु प्रेम अलौकिक है ऐसा ब्रह्माण्ड में कहीं देखने को नहीं मिलेगा। जब दशरथ ने राम का राज्याभिषेक करने की सोची तब राम ने लक्ष्मण से कहा यह राज्य मेरा नहीं तेरा है तुम मेरे बाह्य प्राण हो, मेरा जीवन और मेरा राज्य तेरे लिए है।

          राम जब वनवास के लिए गये तो पीछे-पीछे लक्ष्मण भी उनके साथ गए, राम के लिए वह अपने माता-पिता और पत्नी तक को राजमहल में छोड़कर राम के साथ वन में गये। राम वियोग लक्ष्मण सहन नहीं कर सकते थे राम बचपन से ही अपने भाइयों से अत्यधिक प्रेम करते थे वह जान बूझकर खेल में हार जाते थे। भरत का प्रेम राम से भी श्रेष्ठ है जब भरत को राज्य मिला और राम वनवास के लिए गये तो उन्होंने राजगद्दी पर राम की पादुका स्थापित की। एक ओर राम वन में तप किया करते थे तो वहीं दूसरी ओर भरत कुटि में तप किया करते थे। राम ने इस जगत में बंधु प्रेम का एक महान आदर्श स्थापित किया है।
                           शिव शासनत: शिव शासनत:

परा पूजा ।।

          आदि गुरु श्री शंकराचार्य जी ने अपने गुरु श्री भगवत्पाद जी को सच्चिदानंद स्वरूप में आत्मसात किया। उन्हीं के सच्चिदानंद स्वरूप को हृदयस्थ कर वे भारतवर्ष पर पुन: वेदान्त को पुनर्जीवित करने में सक्षम हो सके। समाज से तिरष्कृत हो जाने के पश्चात् भी घोर आलोचनाओं और हिंसा के बीच सदैव आनन्दित रहे। उनके आनंदित जीवन के मूल में उनके गुरु का सच्चिदानंद स्वरूप ही है। एक आत्म आनंदित महामानव ही आनंद लहरी, कनकधारा स्त्रोत, धन्याष्टकम, सौन्दर्य लहरी, ललितापंचक्रम, देव्यपराधक्षमापनस्त्रोतम् इत्यादि इत्यादि सैकड़ों दिव्य स्त्रोतों की रचना कर सकता है। 

      आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित प्रत्येक स्त्रोत अपने अंदर सम्पूर्णता लिये हुये है। इन स्त्रोतों का पाठ अत्यंत ही त्वरित परिणाम देने वाला है। इन स्त्रोतों के पाठ में विशेष आडम्बरों की जरूरत नहीं है एक साधक चाहे वह किसी भी स्थान पर बैठा हो अंतर आत्मा से अगर इनका पाठ करता है तो दूसरे ही क्षण समस्त शक्तियाँ उसके सामने नतमस्तक हो जायेंगी। शंकर साहित्य मनुष्यों को भगवान शिव की दुर्लभ भेंट हैं। सनातन धर्म आदि गुरु शंकराचार्य जी के द्वारा रचित स्त्रोतों के अभाव में निश्चित ही अपूर्ण है। साधक चाहे किसी भी पंथ, गुरु और संस्था से जुड़ा हुआ क्यों न हो आखिरकार वह है तो सनातन धर्म की धारा में ही। अतः वर्ग, जाति, सम्प्रदाय, धर्म और संख्या से ऊपर उठकर वास्तविक अध्यात्म को आत्मसात करने के लिये यह स्त्रोत अत्यंत ही हितकारी है । सर्वप्रथम मैं आदि गुरु श्री शंकराचार्य जी द्वारा रचित परापूजा स्त्रोतम् को प्रस्तुत कर रहा हूँ इस स्त्रोत के मूल भाव में गुरु तत्व है। गुरु की स्तुति के लिये यह अत्यंत ही दुर्लभ स्त्रोत है। सुविधा के लिये इसका हिन्दी रूपान्तरण भी प्रस्तुत किया जा रहा है। अपने गुरु का ध्यान करते हुये या फिर उनके चित्र के सामने आप हृदय से इस स्त्रोत का पाठ करते हुये उनका आह्वान कर सकते हैं।


अखण्डे सच्चिदानंदे निर्विकल्पैकरूपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽस्मिन्कथं पूजा विधीयते ॥ 

पूर्णस्यावाहनं कुत्र सर्वाधारस्य चासनम् । 
स्वच्छस्य पाद्यमर्ध्यं च शुद्धस्याचमनं कुतः ।।

 निर्मलस्य कुतः स्नानं वस्त्रं विश्वोदरस्य च । 
अगोत्रस्य त्ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ।।

निर्लेपस्य कुतो गन्ध: पुष्पं निर्वासनस्य च । 
निर्विशेषस्य का भूषा कोऽलङ्कारो निराकृतः ॥ 

निरञ्जनस्य किं धूपैर्दीपैर्वा सर्वसाक्षिण: । 
निजानन्दै कतृप्तस्य नैवेद्यं किं भवेदिह ।। 

विश्वानन्दपितुस्तस्य किं ताम्बुलं प्रकल्प्यते । 
स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसावर्कादिभासकः ॥ 

प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः । 
वेदवाक्यै रवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ।। 

स्वयं प्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः । 
अन्तर्बहिश्च पूर्णस्य कथमुद्रासनं भवेत् ।। 

एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा । 
एकबुद्धया तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमैः ।। 

आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहं, पूजा ते विधिधोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । 
संञ्चार: पदयो: प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो, यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् । 

( इति श्री मच्छङ्कराचार्यकृतं परापूजास्तोत्रं सम्पूर्णम् ।)

अखण्ड, सच्चिदानन्द और निर्विकल्पैकरूप अद्वितीय भाव के स्थिर हो जाने पर किस प्रकार पूजा की जाय ? 

जो पूर्ण है उसका आवाहन कहाँ किया जाय ? 
जो सबका आधार है, उसे आसन किस वस्तु का दें और जो नित्य शुद्ध है, उसको आचमन की क्या अपेक्षा ? 

निर्मल को स्नान कैसा ? सम्पूर्ण विश्व जिस के पेट में है, उसे वस्त्र कैसा और जो वर्ण तथा गोत्र से रहित है, उसके लिये यज्ञोपवीत कैसा ? 

निर्लेप को गन्ध कैसी ? निर्वासनिक को पुष्पों से क्या ? 

निर्विशेष को शोभा की क्या अपेक्षा और निराकार के लिये आभूषण क्या ? निरञ्जन को धूप से क्या ? 

सर्वसाक्षी को दीप कैसा तथा जो निजानन्दरूपी अमृत से तृप्त है, उसे नैवेद्य से क्या ? 

जो स्वयं प्रकाश, चित्स्वरूप, सूर्य-चन्द्रादिका भी अवभासक और विश्व को आनन्दित करने वाला है, उसे ताम्बूल क्या समर्पण किया जाय ? अनन्त की परिक्रमा कैसी ? 

अद्वितीय को नमस्कार कैसा और जो वेदवाक्यों से भी जाना नहीं जा सकता, उसका स्तवन कैसे किया जाय ? 

जो स्वयं प्रकाश और विभु है, उसकी आरंती कैसे की जाय तथा जो बाहर भीतर सब ओर परिपूर्ण है, उसका विसर्जन कैसे हो ? 

ब्रह्मवेत्ताओं को सर्वदा, सब अवस्थाओं में इसी प्रकार एक बुद्धि से भगवान् की परापूजा करनी चाहिये । हे शम्भो ! मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि श्री पार्वती जी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपकी कुटिया है, नाना प्रकार की भोग सामग्री आपका पूजोपचार हैं, निद्रा समाधि। .

                        शिव शासनत: शिव शासनत: