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बेलपत्र की कहानी ।।

     स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया। चुंकि माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं, फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।

बेल वृक्ष का महत्व- 

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।

2. अगर किसी की शवयात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।

3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।

4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है।

5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।

6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।

7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।

8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।

10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।

11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाएं। बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं।


गणेश पूजन ध्यान देने योग्य तथ्य ।।

           सनातन धर्म में देवी देवताओं को भिन्न भिन्न नामों व स्वरूपों के अनुसार पूजा होती है। सभी देवी देवताओं के पूजन में यह बात ध्यान में रखी जाती है कि अमुक देवी देवता को कौन सी वस्तुऐं अधिक प्रिय हैं और पूजन में उन वस्तुओं को आवश्यक रूप से सम्मिलित किया जाता है जैसे देवाधिदेव महादेव की पूजा हो और विल्व पत्र न हो तो पूजन पूर्ण नहीं माना जाता (मानस पूजन को छोड़कर) इसी प्रकार शास्त्रों में यह उल्लेख भी किया गया है कि व्यक्ति विशेष में जिस तत्व की प्रधानता होती है उसे तदनुसार ही अपना ईष्ट बनाना चाहिये यही वैदिक विधान है।

कौन किसकी आराधना करें ?

              अध्यात्म पथ के जिज्ञासुओं को यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं कि मानव शरीर पंच तत्वों "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर" से मिलकर बना है एवं दैवीय शक्तियाँ भी इन्हीं पंच महाभूतों के आधार पर क्रियाशील होती है। ये पाँचों तत्व प्रत्येक मनुष्य में दिव्यमान रहते हैं किन्तु इन पाँचों तत्वों में से प्रत्येक व्यक्ति में किसी न किसी एक तत्व की प्रधानता होती है और उसी तत्व के अनुसार व्यक्ति को अपना ईष्ट बनाना चाहिये। जैसे पृथ्वी तत्व की प्रधानता वालों के लिये भगवान शंकर की जल तत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवान गणपति की, तेजतत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवती दुर्गा की, वायु तत्व की प्रधानता वालों के लिए भगवान सूर्य की और आकाश तत्व की प्रधानता वालों के लिये भगवान विष्णु की उपासना हितकर होती है।

गणपति प्रतिमा त्र्य का निषेध

          प्रायः आम लोग या साधक अज्ञानता के कारण एक ही देवी देवता की अनेकों प्रतिमा में घर में स्थापित कर लेते हैं किन्तु यह शास्त्र सम्मत नहीं है। कहा गया है कि

गृहे लिङ्गद्वयं नार्या गणेश त्रितयं तथा । 
शङ्कद्वयं तथा सूर्यो नार्यो शक्तित्रयं तथा । 
द्वे चक्रे द्वारकायाश्च शालग्राम शिलाद्वयम् । 
तेषां तु पूजने नैव ह्युद्वेगं प्राप्रुयाद गृही ॥

         अर्थात घर में दो शिवलिङ्गों, दो शङ्गो, दो सूर्य प्रतिमाओं, दो शालग्रामों, दो गोमती चक्रों, तीन गणपति प्रतिमाओं और तीन देवी प्रतिमाओं की स्थापना नहीं करनी चाहिये।

प्रतिष्ठा का उचित समय

           किसी भी देवी देवता की प्रतिमा स्थापित करने के बाद उसमें प्राण प्रतिष्ठा का विधान है। शास्त्रों में प्रत्येक देवी देवता की प्रतिष्ठा के लिए अलग-अलग महीने, तिथियां व नक्षत्र उचित माने गये हैं। भगवान गणपति की प्रतिष्ठा के लिए चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ, माघ अथवा फाल्गुन मास का शुक्ल पक्ष शुभ है। प्रतिष्ठा मयूष में स्पष्ट उल्लेख है कि

चैत्रे व फाल्गुने वापि ज्येष्ठे व माधवे तथा ।
माघे व सर्वदेवानां प्रतिष्ठा शुभदा सिते ॥

         इसी प्रकार भौमवार के अतिरिक्त अन्य वार ग्राह्य हैं तथा तिथियों में चतुर्थी, नवमी और चतुर्थी, नवमी और चतुर्दशी वर्जित है तथा प्रतिष्ठा के लिये प्रशस्त्र नक्षत्र अश्विनी, रोहणी, मृगशिरा, पुष्य, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा मूल, पूर्वाषाढ़, उत्तराषाढ़ श्रवण, पूर्ण भाद्रपद, उत्तरा भाद्रपद और रेवती हैं।

प्रतिमा की परिभाषा

             मत्स्य पुराण के अनुसार सामान्य गृहस्थों के घर में साधक के अंगुष्ठ पर्व से लेकर वितस्ति पर्यन्त अर्थात बारह अंगुल परिमाण तक के आकार वाली प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिये। कहा गया है कि -
अंगुष्ठपर्वादारभ्य वितस्ति यावदेव तु । 
गृहेषु प्रतिमा कार्या नाधिका शस्यते बुधैः ॥
इसके अलावा यदि साधक के इष्ट भगवान गणपति हैं तो उनकी स्थापना मध्य में करके ईशान कोण में श्री विष्णु की, अग्नि कोण में भगवान शिव की, नैऋत्य कोण में श्री सूर्य की और वायुकोण में भगवती दुर्गा की स्थापना करनी चाहिए।

आवाहन मंत्र

गणेश जी के आवाहन के लिये निम्रांकित वैदिक मंत्र बहुत लोकप्रिय है

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । 
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः श्रृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ 
गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे । 
नधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम् ॥

आसन - मंत्र

नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् । 
न ऋते त्वत् क्रियते किंचनारे महामर्क मघवञ्चित्रमर्च ॥

        अर्थात हे गणपते ! आप यहाँ आनन्दपूर्वक विराजिये । सभी लोग आपको विद्या- विशारदों में सर्वोत्तम बताते हैं एवं आपकी आराधना बिना कोई कार्य प्रारम्भ नहीं किया जाता। (यजमान के प्रति आचार्य वचन) हे धनी पुरुष ! महान् और पूजनीय गणपति भगवान की चित्र विचित्र अर्थात विभिन्न द्रव्यों द्वारा पूजा करो।

अभिषेक

            ताम्रपात्र रखे हुए पवित्र जल से गणपति भगवान का महाभिषेक करते समय गणेशाथर्वशीर्ष की इक्कीस आवृत्ति करने का विधान है।

दूर्वा

           पाटल (लाल) वर्ण वाली और सुरभित कुसुमावली के साथ-साथ दूर्वाङ्कुर भी गणेश जी को अर्पण किये जाते हैं, किन्तु उनकी पूजा में तुलसीदल का प्रयोग नहीं किया जाता
न तुलस्या गणाधिपम् ।

नीराजन - मंत्र

विद्यारण्यहुताशं विहितानयनाशम् । 
विपदवनीधरकुलिशं विधृताङ्कुशपाशम् ॥ 
विजयार्क ज्वलिताशं विदलितभवपाशम् । 
विनताः स्मो वयमनिशं विद्याविभवेशम् ॥

          अर्थात हम सभी आराधक नित्य निरन्तर उन गणेश जी के सम्मुख विनयावनत हैं, जो समस्त विघ्नरूपी वनों का दहन करने के लिये प्रबल अनल हैं, जो अनीति और अन्याय का तत्काल विनाश कर देते हैं, जो विपत्ति के पर्वतों को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिये वज्रोपम हैं, जिनके एक कर-कमल में अंकुश और दूसरे में पाश विराजमान हैं, जिन्होंने विघ्न विजय रूपी सूर्य के प्रकाश में दसों दिशाऐं प्रकाशित कर दी हैं, जो अपने उपासकों के भव-बन्धन को शिथिल कर देते हैं और जो समस्त विद्याओं के वैभव के अधीश्वर हैं।

प्रणाम पत्र

विवेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय । नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते ॥

          अर्थात हे गणपते ! आप विघ्नों के शासक हैं, अतएव आराधकों को उनके द्वारा उत्पीड़ित नहीं होने देते। आप अपने उपासकों को उनके अभीष्ट वर देकर कृतार्थ कर देते हैं। सारे देवता आपको प्रिय हैं और आप सब देवताओं को प्रिय हैं। आप लम्बोदर हैं, चतुष्षष्टि कलाओं के निधान हैं और जगत् का मंगल करने के लिये सदा तत्पर रहते हैं। आप गजवदन हैं और श्रुत्युक्त यज्ञों को अपने आभूषणों के समान स्वीकार कर लेते हैं। आप पार्वती नन्दन हैं हम आपके चरणों में बारम्बार प्रणाम करते हैं ।

गणेश गायत्री

एकदन्ताय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्ती प्रचोदयात् । 
तत्पुरुषाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि । तन्नोदन्ती प्रचोदयात् ।

          अर्थात हम एकदन्त परमपुरुष गणपति भगवान को जानते हैं, मानते हैं और उन वक्रतुण्डभगवान का हम ध्यान करते हैं। वे हमारे विचारों की सत्कार्य के लिये प्रेरित करें ।

परिक्रमा

बाह्य परिशिष्ट के अनुसार गणेशजी की एक परिक्रमा करनी चाहिये ।
एकां विनायके कुर्यात किन्तु ग्रन्थान्तर के तिस्रः कार्या विनायके ॥

इस वचन के अनुसार तीन परिक्रमाओं का विकल्प भी. आदरणीय है।

गणेश जी के पार्श्वक

         गणपति भगवान को निवेदित किया हुआ नैवेद्य सर्वप्रथम उनके पार्श्वकों (सेवकों) को देना चाहिये । पार्श्वकों के नाम हैं गणेश, गालव, गार्ग्य, मंगल और सुधाकर ये पाँच एवं मतान्तर से गणप, गालव, मुद्रल और सुधाकर ये चार गणेशजी के सेवक हैं।

विभिन्न प्रतीकों द्वारा गणेश पूजन

          सामान्य तौर पर गणेश जी का पूजन हरिद्रा (हल्दी) की मूर्ति से किया जाता है हरिद्रा में मंगलाकर्षिणी शक्ति है तथा वह लक्ष्मी का प्रतीक भी है। नारद पुराण में यद्यपि श्री गणेश जी की स्वर्ण प्रतिमा बनाने का निर्देशन दिया गया है किन्तु उसके अभाव में हरिद्रा की मूर्ति बनाने का विकल्प है। गोमय में लक्ष्मी जी का स्थान होने के कारण लक्ष्मी प्राप्ति के लिए गोमय से गणेश प्रतिमा बनाकर पूजन का विधान है। इसके अलावा शीघ्र श्री गणेश जी की विशेष कृपा प्राप्त करने के लिये श्वेतार्क गणपति के पूजन का विधान है ।
                          शिव शासनत: शिव शासनत:

राम नाम की महिमा ।।

राष्ट्र कवि मैथिलीशरण गुप्त ने 'यशोधरा' में राम के आदर्शमय महान जीवन के विषय में कितना सहज व सरस लिखा है-


राम। तुम्हारा चरित् स्वयं ही काव्य है ।
कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है ॥

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ‘साकेत’ महाकाव्य में राम के चरित्र को ही कवि बनने का मूलाधार बताते हैं। राम तुम्हारा चरित्र स्वयं ही काव्य है। कोई कवि बन जाए सहज संभाव्य है। राम कथा में सत्य से बढ़कर दूसरा कोई अन्य धर्म ही नहीं है। 
 
यह तो हुई ज्ञान की बात । अब जानते हैं राम नाम को जपने वाले लोगों के बारे में । कहते हैं राम से बड़ी राम नाम की महिमा है । जिसने राम नाम लिया, वह तर गया । राष्ट्रकवि मैथिलिशरण गुप्त ने स्वयं स्वीकारा है कि राम नाम लेने से ही वह कवि बन गए । अब जानते हैं अन्य लोगों के बारे में जो राम नाम लेने से तर गए ।

1. वाल्मिकि : जोकि एक डाकू था रामायण लिखकर अमर हो गए

2. तुलसीदास : गरीब व्यक्ति जो रामचरितमानस लिखकर लोगों में प्रसिद्ध हो गए।

3. कम्बन : तमिल लेखक जिन्होंने तमिलभाषा में रामायाण की रचना की व दक्षिण भारत में राम नाम को प्रचलित किया व आज तक जाने जाते हैं।

4. रामानंद सागर : जिन्होंने रामायण के नाम से टी.वी श्रंखला बनाई व प्रसिद्ध हो गए व करोड़ों कमाए ।

5. मुरारी बापु : रामकथा सुनाने वाले जो देश विदेश में करोड़ों का सत्संग चलाते हैं ।

6. भाजपा : जिसके कभी दो सांसद थे आज राम मंदिर के कारण से पूर्ण सत्ता पा चुका है.

और भी कितने ही भाषाओं के कवि व लेखक जो केवल राम नाम का वर्णन करके जीवन चला गए । आज भी ऐसे असंख्य लोग हैं जो राम कथा सुनाकर जीवन यापन कर रहे हैं ।

आम लोगों के लिए भी राम नाम की महिमा अपरंपार है । कोई भी कार्य जीवन में करना हो तो राम का नाम लेकर जुट जाएं । प्रसिद्धि व धन जरूर मिलेगा । राम के साथ जुड़ने से एक आत्मिक बल मिलता है । यूं समझिए यह एक सफलता का मन्त्र है । अगर किसी भी क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं तो मेहनत के साथ राम नाम को भी जोड़ लें, सफलता तुम्हारे कदम चूमेंगी, क्योंकि अब तुम अकेले नहीं रहे ।

तो बोलो जय श्री राम

भगवान राम के प्रसिद्ध नाम ।।

आदिराम - नित्य, स्वयंभू, शाश्वत सनातन अनंतराम, सर्वशक्तिमान परमात्मा जो सभी के सृजनकर्ता, पालनहार है

राम - मनभावन, रमणीय, सुंदर, आनंददायक
प्राणीमात्र के हृदय में 'रमण' (निवास, विहार) करते हैं, वह 'राम' हैं तथा भक्तजन जिनमें 'रमण' (ध्याननिष्ठ) होते हैं, वह 'राम' हैं
रामलला - शिशु रुप राम
रामचंद्र - चंद्र जैसे शीतल एवं मनोहर राम
रामभद्र - मंगलकारी कल्याणमय राम
राघव - रघुवंश के संस्थापक राजा रघु के वंशज, रघुवंशी, रघुनाथ, रघुनंदन
रघुवीर - रघुकुल के सबसे वीर राजा राम
रामेश्वर - राम जिनके ईश्वर है अथवा जो राम के ईश्वर है
कौशल्या नंदन - कौशल्या को आनंद देने वाले, कौशल्या पुत्र, कौशलेय
दशरथी - दशरथ पुत्र, दशरथ नंदन
जानकीवल्लभ - जनकपुत्री सीता के प्रियतम
श्रीपति - लक्ष्मी स्वरूपा सीता के स्वामी जानकीनाथ, सीतापति
मर्यादा पुरुषोत्तम - धर्मनिष्ठ न्याय परायण पुरुषों में सर्वोत्तम 
नारायणावतार - भगवान नारायण के अवतार, विष्णु स्वरूप
जगन्नाथ - जगत के स्वामी, जगतपति
हरि - पाप, ताप को हरने वाले
जनार्दन - जो सभी जीवों का मूल निवास और रक्षक है
कमलनयन - कमल के समान नेत्रों वाले, राजीवलोचन
हनुमान ह्रदयवासी - हनुमान के ह्रदय में वास करने वाले, हनुमानइष्ट, हनुमान आराध्य
शिव आराध्य - शिव निरंतर जिनका स्मरण करते हैं, शिवइष्ट, शिवप्रिय, शिव ह्रदयवासी
दशाननारि - दस शीश वाले रावण का वध करने वाले, रावणारि, दशग्रीव शिरोहर
असुरारि - असुरों का वध करने वाले
जगद्गुरु - अपने आदर्श चरित्र से सम्पूर्ण जगत् को शिक्षा देने वाले
सत्यव्रत - सत्य का दृढ़ता पूर्वक पालन करनेवाले
परेश - परम ईश्वर, सर्वोच्च आत्मा, सर्वोत्कृष्ट शासक
अवधेश - अवध के राजा या स्वामी
अविराज - सूर्य जैसे उज्जवल
सदाजैत्र - सदा विजयी, अजेय
जितामित्र - शत्रुओं को जीतनेवाला
महाभाग - महान सौभाग्यशाली
कोदंड धनुर्धर - कोदंड धनुष को धारण करने वाले
पिनाक खण्डक - सीता स्वयंवर में पिनाक (शिवधनुष) को खंडित करने वाले
मायामानुषचारित्र - अपनी माया का आश्रय लेकर मनुष्यों जैसी लीलाएँ करने वाले
त्रिलोकरक्षक - तीनों लोकों की रक्षा करने वाले
धर्मरक्षक - धर्म की रक्षा करने वाले
सर्वदेवाधिदेव - सम्पूर्ण देवताओं के भी अधिदेवता
सर्वदेवस्तुत - सम्पूर्ण देवता जिनकी स्तुति करते हैं
सर्वयज्ञाधिप - सम्पूर्ण यज्ञों के स्वामी
व्रतफल - सम्पूर्ण व्रतों के प्राप्त होने योग्य फलस्वरूप
शरण्यत्राणतत्पर - शरणागतों की रक्षा में तत्पर
पुराणपुरुषोत्तम - पुराणप्रसिद्ध क्षर-अक्षर पुरुषों से श्रेष्ठ लीलापुरुषोत्तम
सच्चिदानन्दविग्रह - सत्, चित् और आनन्द के स्वरूप का निर्देश कराने वाले
परं ज्योति - परम प्रकाशमय,परम ज्ञानमय
परात्पर पर - इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदि से भी परे परमेश्वर
पुण्यचारित्रकीर्तन - जिनकी लीलाओं का कीर्तन परम पवित्र हैं
सप्ततालप्रभेता - सात ताल वृक्षों को एक ही बाण से बींध डालनेवाले
भवबन्धैकभेषज - संसार बन्धन से मुक्त करने के लिये एकमात्र औषधरूप

नवग्रहों की उपासना ।।

नवग्रहों की साधना
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              सनातन धर्मे में प्राचीन काल से जो अनेकों प्रकार की धारणाऐं या प्रथाएं प्रचलित हैं उनमें नवग्रहों की उपासना भी है। यह केवल रूढ़िमात्र अथवा प्रथा मात्र नहीं है, इसके मूल में हम लोगों के शरीर से नवग्रहों का सम्बन्ध और ज्योतिष की दृष्टि से सुपुष्ट विचार भी है। यह उक्ति प्रायः सर्वत्र प्रसिद्ध है कि 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' अर्थात् जो कुछ एक शरीर में है, वह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है और जो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में है, वह एक शरीर में भी है। वैदिक शास्त्रों के अनुसार यह सृष्टि केव देखा या सुना जाता है वह तो बहुत ही स्थूल है। यंत्रों का तत्वविश्लेषण केवल जड़तत्वों तक ही सीमित है, वह कभी चेतना का साक्षात्कार नहीं कर सकता क्योंकि वे यंत्र स्वयं जड़ हैं।

          प्रत्येक स्थूल वस्तु के एक-एक अधिष्ठातृ देवता हैं, यह बात युक्ति, अनुभव और शास्त्र से सिद्ध है। जैसे स्थूल नेत्रगोलक, जिन्हें हम देखते हैं, नेत्र के अधिभूत रूप हैं। नेत्र  इन्द्रिय अध्यात्म है, जो कि इस स्थूल गोलक के द्वारा देखती है। इस दर्शन क्रिया का सहायक जो सूर्य हैं, वह नेत्र का अधिदैव रूप है। नेत्र इन्द्रिय नेत्रगोलक के द्वारा स्थूल रूप को देखे, यह सूर्य की शक्ति की सहायता लिये बिना असम्भव है। इसलिए नेत्र के अधिष्ठातृ देवता सूर्य हैं। सूर्य के भी तीन रूप हैं। जिस सूर्य को हमलोग देखते हैं, वह सूर्य का स्थूल अथवा अधिभूत रूप है। दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का नाम सूर्य देवता है। उन्हीं का रथ सात घोड़ों का है और अरुण सारथी हैं। शनेश्वर, यमराज आदि उनकी सन्तान हैं और भी देवता के रूप में सूर्य का जितना वर्णन आता है, वह सब इस दृश्यमान सूर्यमण्डल के अभिमानी देवता का ही है।

          सूर्य का अध्यात्म रूप है, समष्टिका नेत्र होना। इन तीन रूपों को ध्यान में रखने से ही शास्त्रों में जो सूर्य का वर्णन हुआ है वह समझ में आ सकता है। यह बात सभी देवताओं के सम्बन्ध में समझ लेनी चाहिये। अब यह बात सिद्धांत रूप से मान ली गयी है कि यह सम्पूर्ण स्थूल जगत् सूक्ष्म जगत् का ही प्रकाशमात्र है। समष्टि के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वही सूर्य के रूप में प्रकट हुई है। जीव के मन में जो दर्शन की इच्छा है, वह नेत्र इन्द्रिय के रूप में प्रकट हुई है। इन दोनों के अभिमानी देवता हैं सूर्य, इसलिए नेत्र इन्द्रिय का सीधा सम्बन्ध सूर्य से है। सूर्य की प्रत्येक स्थिति का प्रभाव इस पृथ्वी पर और इस पर रहने वाले प्राणियों पर पड़ता है। जैसे यह स्थूल शरीर ही जीव नहीं है, उससे भिन्न है, वैसे ही यह दृश्यमान पृथ्वी ही पृथ्वी देवता नहीं है, यह तो पृथ्वी देवता का शरीर है। इन सब स्थूलताओं का निर्माण सूक्ष्म जगत की दृष्टि से ही हुआ है।

     ‌     सूक्ष्म ही स्थूल बना है इसलिए जो लोग सूक्ष्म जगत पर विचार नहीं करते, केवल स्थूल जगत में ही अपनी दृष्टि को आबद्ध रखते हैं, वे ठीक ठाक इसका मर्म नहीं समझ पाते। जैसे पृथ्वी, समुद्र, चन्द्रमण्डल, विद्युत, उष्णता आदि से सूर्य का साक्षात सम्बन्ध है, वैसे ही उन पदार्थों से बने हुए मानव शरीर के साथ भी है। प्रत्येक शरीर की उत्पत्ति के समय, चाहे वह गर्भाधान का हो या भूमिष्ठ होने का हो, सूर्य और इतर ग्रहों का पृथ्वी के साथ जैसा सम्बन्ध होता है और ग्रहचार पद्धति के अनुसार उस प्रदेश में, उस प्रकृति के शरीर पर उनका प्रभाव पड़ता है, वह जीवनभर किसी न किसी रूप में चलता ही रहता है। ग्रहमण्डल की स्थिति,देशविशेष पर उनका विशेष प्रभाव और देहगत उपादानों की विभिन्नता के कारण प्रत्येक शरीर का ग्रहों के साथ भिन्न सम्बन्ध होता है और उसी के अनुसार फल भी होता है।

           प्रत्येक ग्रह के साथ पृथ्वी का और उस पर रहने वाली वस्तुओं का जो महान् आकर्षण विकर्षण चल रहा है, उसके प्रभाव से कोई बच नहीं सकता और जगत के परिवर्तनों में, अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में, सुख दुःख के निमित्तों में यह महान शक्ति भी एक कारण है इस सत्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी से योग सम्पन्न महर्षियों ने अपनी अन्तर्दृष्टि से इस तत्व का साक्षात्कार करके जीवों के हितार्थ इस ज्योतिर्विद्या को प्रकट किया है। संसार में जो घटनाएं घटती हैं उनके अनेकों कारण बतलाये जाते हैं जीव का प्रारब्ध अथवा पुरुषार्थ, समष्टिकर्ता ईश्वर की इच्छा अथवा प्रकृति का नियमित प्रवाह । इन घटनाओं के साथ ग्रहों के आकर्षण - विकर्षण का क्या सम्बन्ध है? उपर्युक्त बलवान कारणों के रहते हुए जगत के कार्यों में वे क्या नवीनता ला सकते हैं? यह प्रश्न उठाने के पहले उन सबके एकत्व का विचार कर लेना चाहिये।

          समष्टिकर्ता की इच्छा ही प्रकृति का प्रवाह है। प्रकृति के सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवाहों के अनुसार ही ग्रहों की निश्चित गति और जीवों का प्रारब्ध है। इन गति और प्रारब्धों के अनुसार ही पुरुषार्थ और फल होते हैं। शरीर की उत्पत्ति प्रारब्ध के अनुसार होती है जिसका जैसा कर्म, उसका वैसा शरीर जिस शरीर में प्रारब्ध के अनुसार जैसी कर्मवासनाऐं रहती हैं, उस जीवन में जैसी घटनाऐं घटनेवाली होती हैं, उसी के अनुसार उस शरीर के जन्म के समय वैसी ही ग्रहस्थिति रहती है। यों भी कह सकते हैं कि वैसी ग्रहस्थिति में ही उसका जन्म होता है अथवा ग्रहों की एक स्थिति में रहने पर भी भिन्न-भिन्न देश और शरीर के भेद से उनका भिन्न-भिन्न प्रभाव पड़ता है इसी से ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि ग्रह किसी नवीन फल का विधान नहीं करते, बल्कि प्रारब्ध के अनुसार घटनेवाली घटना को पहले ही सूचित कर देते हैं ग्रहा वे कर्मसूचकाः । ग्रहों की स्थिति, गति, वक्रता, अतिचार आदि को जाननेवाला ज्योतिषी किसी भी व्यक्ति के जन्म समय को ठीक-ठीक जानकर बतला सकता है कि इसके भविष्य जीवन में कौन कौन सी घटनाएं घटित होने वाली हैं।

       स्थूल कर्मचक्र के अनुसार केवल इतनी ही बात है, गणित की सत्यता को इस रूप में पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने भी स्वीकार कर लिया है। पाश्चात्य देशों में ग्रहों की स्थिति का अध्ययन करके गणित के आधार पर फलित ज्योतिष उसी प्रकार प्रतिष्ठित किया गया है, जैसे कि वैदिक शास्त्रों मे परन्तु यह बात इतने से ही समाप्त नहीं होती, इसके आगे और भी कुछ है। वेदान्ती का देवता- विज्ञान इन स्थूल कार्यकारण परम्परा और सम्बन्धों से और भी ऊपर जाता है। मानस शास्त्र के वेत्ताओं ने एक स्वर से यह बात स्वीकार की है कि शुद्ध, परिपुष्ट एवं बलिष्ठ मन के द्वारा स्थूल जगत में अघटित घटना भी घटित की जा सकती है। यदि हम उन सूक्ष्मताओं के भी अन्तःस्थल में स्थित हो जायें, जो स्थूल घटनाओं की कारण हैं, तो हम न केवल स्थूल जगत में, बल्कि सूक्ष्म जगत में भी परिवर्तन कर सकते हैं। इस मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर यह सिद्ध होता है कि ग्रहों के द्वारा भावी घटनाओं का ज्ञान हो जाने पर मानसिक साधना के द्वारा उन्हें रोका भी जा सकता है।

          प्राचीन ऋषियों, योगियों और सिद्ध पुरुषों के द्वारा ऐसा किया गया है। इससे यह सिद्ध होता है कि मन ऐसी स्थिति में भी जा सकता है, जहाँ से वह घटनाओं का विधान और अवरोध कर सकता है परन्तु सर्वसाधारण पक्ष में यह बात दुःसाध्य है। इसलिए उन्हें ग्रहमण्डलाधिष्ठातृ देवता की शरण लेनी पड़ती है। जिसके शरीर पर सूर्य ग्रह का दुष्प्रभाव पड़ रहा है या पड़ने वाला है, वह यदि सूर्य मण्डल के अभिमानी देवता का आश्रय ले और पूजा-पाठ, आदि के द्वारा यह अनुभव कर सके कि सूर्यदेवता मुझ पर प्रसन्न हैं, मेरा कल्याण कर रहे हैं और मुझे जीवनदान दे रहे हैं, तो बहुत अंश में उसका अरिष्ट शांत हो जायेगा और वह अपने को सूर्यग्रहजन्य पीड़ा से बचा सकेगा ।

           ग्रहशांति की ये दोनों प्रणालियाँ शास्त्रीय हैं पहली का नाम अहंग्रह उपासना और दूसरी का प्रतीक उपासना है। परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि यह सूर्यदेवता केवल उपासना के लिये ही हैं। वास्तव में समस्त देवताओं का अलग-अलग अस्तित्व है और सबके लोक, शक्ति, वाहन, क्रिया आदि अलग-अलग बँटे हुए हैं। जब तक विभिन्न शरीर, वस्तु, लोक और नक्षत्रमण्डल आदि पृथक-पृथक प्रतीत हो रहे हैं, इनके द्वारा पृथ्वीमण्डल प्रभावित हो रहा है, तब तक इनमें रहने वाले देवताओं को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। वर्तमान काल में सम्पूर्ण संसार राष्ट्रविप्लव, पारस्परिक द्रोह, पारिवारिक वैमनस्य, ईर्ष्या-द्वेष, रोग-शोक और उद्वेग अशांति से सर्वथा उपद्रुत हो रहा है। इसके अनेक कारणों में देवताओं की उपेक्षा और उनसे प्राप्त होने वाली सहायता को अस्वीकार कर देना भी है। अन्तर्जगत के नियमानुसार देवताओं को जागतिक पदार्थों के उत्पादन, विनिमय और वितरण का अधिकार प्राप्त है। मनुष्य देवताओं को सन्तुष्ट करें और देवता मनुष्यों को समृद्धि एवं अभिवृद्धि से सम्पन्न करें परन्तु मनुष्यों ने अपनी बुद्धि और पुरुषार्थ का मिथ्या आश्रय लेकर स्वयं ही आत्मवञ्चना कर ली है, जिसका यह सब, जो दुःख दारिद्रय के रूप दिख रहा है, फल है।

          वेदों ने और तदनुयायी शास्त्रों ने एक स्वर से ग्रहशांति की आवश्यकता स्वीकार की है। अर्थवेद में सब देवताओं की पूजा के साथ-साथ ग्रह शांति का भी वर्णन आता है। शन्नो ग्रहाश्चानद्रमसाः शमादिस्याश्च राहुणा इत्यादि प्राचीन आर्यों में इस वैदिक मर्यादा का पूर्ण रूप से पालन होता था, इसी से वे सुखी थे। आज भी जहाँ प्राचीन प्रथाओं का पालन होता है, वहाँ प्रत्येक शांतिक और पौष्टिक कर्मों में पहले नवग्रह की पूजा होती है।

यह ध्यान रखना चाहिये कि इस पूजा का सम्बन्ध उन उन मण्डलों में रहने वाले देवताओं से है। यहाँ संक्षेप से नवग्रहों के ध्यान का उल्लेख कर दिया जाता है। पूजा पद्धति के अनुसार उनका अनुष्ठान करना चाहिये।

सूर्य
         सूर्य ग्रहों का राजा है। ये कश्यप गोत्र के क्षत्रिय एवं कलिङ्ग देश के स्वामी हैं। जपाकुसुम के समान इनका रक्तवर्ण है। दोनों हाथों में कमल लिये हुए हैं, सिन्दूर के समान वस्त्र, आभूषण और माला धारण किये हुए हैं। जगमगाते हुए हीरे, चन्द्रमा और अग्रि को प्रकाशित करने वाला तेज, त्रिलोकी का अन्धकार दूर करने वाला प्रकाश । सात घोड़ों के एक वक्र रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए, प्रकाश के समुद्र भगवान सूर्य का ध्यान करना चाहिए। इनके अधिदेवता शिव हैं और प्रत्यधिदेवता अग्नि । इस प्रकार ध्यान करके मानस पूजा और बाह्य पूजा के अनन्तर मंत्र जप करना चाहिये।

चन्द्रमा
           भगवान चन्द्रमा अत्रिगोत्र हैं। यामुन देश के स्वामी हैं। इनका शरीर अमृतमय है। दो हाथ हैं एक में वर मुद्रा हैं, दूसरे में गदा दूध के समान श्वेत शरीर पर श्वेत वस्त्र, माला और अनुलेपन धारण किये हुए हैं। मोती का हार है। अपनी सुधामयी किरणों से तीनों लोकों को सींच रहे हैं। इस घोड़ों के त्रिचक रथ पर आरूढ़ होकर सुमेरु की प्रदक्षिणा कर रहे हैं। इनके अधिदेवता हैं उमादेवी और प्रत्यधिदेवता जल हैं।

मङ्गल
         मंगल भरद्वाज गोत्र के क्षत्रिय हैं। ये अवन्ति के स्वामी हैं। इनका आकार अग्नि के समान रक्त वर्ण है, इनका वाहन मेष है, रक्तवस्त्र और माला धारण किये हुए हैं। हाथों में शक्ति, वर अभय और गदा धारण किये हुए हैं। इनके अंग-अंग से कान्ति की धारा छलक रही है। मेष के रथ पर सुमेरु की प्रदक्षिणा करते हुए अपने अधिदेवता स्कन्ध और प्रत्यधिदेवता पृथ्वी के साथ सूर्य के अभिमुख जा रहे हैं।

बुध
            बुध अत्रिगोत्र एवं मगध देश के स्वामी हैं। इनके शरीर का वर्ण पीला है। चार हाथों में ढाल, गदा, वर और खड्ग है। पीला वस्त्र धारण किये हुए हैं, बड़ी ही सौम्य मूर्ति है, सिंह पर सवार हैं। इनके अधिदेवता हैं नारायण और प्रत्यधिदेवता हैं विष्णु ।

बृहस्पति
            बृहस्पति अङ्गिरा गोत्र के ब्राह्मण हैं। सिन्धु देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण पीत है, पीताम्बर धारण किये हुए हैं, कमल पर बैठे हैं। चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता ब्रह्मा हैं और प्रत्यधिदेवता इन्द्र ।

शुक्र
         शुक्र भृगु गोत्र के ब्राह्मण हैं। भोजकट देश के अधिपति हैं। कमल पर बैठे हुए हैं। श्वेत वर्ण हैं, चार हाथों में रुद्राक्ष, वरमुद्रा, शिला और दण्ड हैं। श्वेत वस्त्र धारण किये हुए हैं। इनके अधिदेवता इन्द्र हैं और प्रत्यधिदेवता चन्द्रमा हैं।

शनि
        ये कश्यप गोत्र के शूद्र हैं। सौराष्ट्रप्रदेश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण हैं, कृष्ण वस्त्र धारण किये हुए हैं। चार हाथों में बाण, वर, शूल और धनुष हैं। इनका वाहन गीध है। इनके अधिदेवता यमराज और प्रत्यधिदेवता प्रजापति हैं।

राहु
         राहु पैठीनस गोत्र के शूद्र हैं। मलय देश के अधिपति हैं। इनका वर्ण कृष्ण है और वस्त्र भी कृष्ण ही हैं। इनका वाहन सिंह है। चार हाथों में खड्ग, वर, शूल और ढाल लिए हुए हैं। इनके अधिदेवता काल हैं और प्रत्यधिदेवता सर्प हैं।

केतु
        ये जैमिनि गोत्र के शूद्र हैं। कुशद्वीप के अधिपति हैं । इनका वर्ण धुएँका सा है और वैसा ही वस्त्र भी धारण किये हुए हैं। मुख विकृत है, गिद्ध वाहन है। दो हाथों में वरमुद्रा तथा गदा हैं। इनके अधिदेवता हैं चित्रगुप्त तथा प्रत्यधि देवता हैं ब्रह्मा ।

ये सब ग्रह अपनी-अपनी गति से सूर्य ओर बढ़ रहे हैं, सबका मुख सूर्य की ओर हैं। पृथ्वी के साथ सब का सम्बन्ध है। प्रत्येक शांति और पुष्टिकर्म में इनकी आराधना होती है। पृथक-पृथक अरिष्ट के अनुसार भी इनकी पूजा की जाती है। इनमें से किसी एक को प्रसन्न करके उनसे वांछित फल भी प्राप्त किया जा सकता है। जिस ग्रह का जो वर्ण है, उसी रंग की वस्तुऐं प्रायः पूजा में लगायी जाती हैं। मंत्र का जितना जप होता है, उसका दशांश हवन होता है। हवन में भिन्न-भिन्न प्रकार की समिधाऐं काम में लायी जाती हैं। सूर्य के लिये मदार, चन्द्रमा, वृहस्पति के लिये पीपल, शुक्र के लिये गूलर, शनैश्वर के लिये शमी और राहु केतु के लिये दूर्वा का प्रयोग होता है। इस प्रकार पूजा करने से ये ग्रह सन्तुष्ट हो जाते हैं और किसी प्रकार का अनिष्ट न करके सब प्रकार से इष्टसाधन करते हैं। नवग्रह की दोष शांति के लिये रत्न धारण किये जाते हैं सूर्य के लिये माणिक्य, चन्द्रमा के लिये मोती,मंगल के लिये प्रवाल (मूंगा) बुध के लिये मरकतमणि, वृहस्पति के लिये पुष्पराग, शुक्र के लिये हीरा, शनि के लिये नीलकान्तमणि,राहु लिये गोमेद और केतुके लिए वैदूर्यमणि ।

         इनके धारण करने से ग्रहों के दोष की शांति हो जाती है। जो लोग पुराणों की कथा सुनते हैं, इष्टदेव की आराधना करते हैं, भगवान के नाम का जप करते हैं, तीर्थों में स्नान करते हैं, किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते, सबका भला करते हैं, सदाचार की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते, शुद्ध हृदय से अपना जीवन व्यतीत करते हैं, उन पर ग्रहों का प्रभाव नहीं पड़ता उनको पीड़ा न पहुँचाकर वे उन्हें सुखी करते हैं। उस श्लोक का अंतिम चरण यह है
नो कुर्वन्ति कदाचिदेव पुरुषस्यैर्व ग्रहाः पीडनम् ।

                          शिव शासनत: शिव शासनत: