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किसी ने आज पूछा कि मंत्र किसे कहते हैं ??

मननाद् विश्वविज्ञानं त्रांणसंसार बन्धनात्।
त्रायते सतंत चैव तस्मांन्मत्र इतीरित:।।
(जिसका मनन करने से समस्त ब्रह्मान्ड का ज्ञान हो जाता है, साधक सांसारिक बन्धन से छूट जाता है तथा जो रोग-शोक, भय, दु:ख एवं मृत्यु से सदैव रक्षा करता है उसको ही मंत्र कहते हैं।)

मनना प्राणनां चैव मद्रूपस्याव बोधनात्।
त्रायते सर्वभयत: तस्मान्मंत्र इतीरित।।
(जो साधक की सभी भयों से रक्षा करता है तथा जिसका चिन्तन-मनन करने से आत्मतत्व-शिवरूप का बोध हो जाता है उसी को मंत्र कहते हैं।).

दीपदान ।।

       पवनपुत्र हनुमान की आराधना व उनकी कृपा प्राप्ति के यूं तो अनेक साधन हैं किन्तु दीप दान एक ऐसा अमोघ साधन है जिससे प्रसन्न होकर हनुमान जी साधक को मनोवांछित फल अवश्य प्रदान करते हैं। विभिन्न प्रयोजनों के लिए विविध प्रकार से दीपदान का विधान है।

            पुष्प से वासित तैल के द्वारा दिया हुआ दीपक सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला माना गया है। किसी पथिक के आने पर उसकी सेवा के लिये तिल का तैल अर्पण किया जाय तो वह लक्ष्मी प्राप्ति का कारण होता है। सरसों का तेल रोग नाश करने वाला है, ऐसा कर्मकुशल विद्वानों का कथन है। गेहूँ, तिल, उड़द, मूँग और चावल ये पाँच धान्य कहे गये हैं। हनुमानजी के लिये सदा इनके दीप देने चाहिए। पञ्चधान्य का आटा बहुत सुन्दर होता है। वह दीपदान में सदा सम्पूर्ण कामनाओं को देने वाला कहा गया है।

              संधि में तीन प्रकार के आटे का दीप देना उचित है,लक्ष्मी प्राप्ति के लिये कस्तूरी का दीप विहित है, कन्या प्राप्ति के लिये इलायची, लौंग, कपूर और कस्तूरी का दीपक बताया गया है। सोमवार को धान्य लेकर उसे जल में डुबोकर रखें। फिर प्रमाण के अनुसार कुँवारी कन्या के हाथ से उसको पिसाना चाहिये। पीसे हुए धान्य को शुद्ध पात्र में रखकर नदी के जल से उसकी पिण्डी बनानी चाहिये। उसी से शुद्ध एवं एकाग्रचित्त होकर दीपपात्र बनाये। जिस समय दीपक जलाया जाता हो, हनुमत्कवच का पाठ करे। मंगलवार को शुद्ध भूमि पर रखकर दीपदान करे। कूट बीज ग्यारह बताये गये हैं, अत: उतने ही तंतु ग्राह्य है पात्र के लिये कोई नियम नहीं हैं मार्ग में जो दीपक जलाये जाते हैं, उनकी बत्ती में इक्कीस तंतु होने चाहिये। हनुमान जी के दीपदान में लाल सूत ग्राह्य बताया गया है। कूट की जितनी संख्या हो उतना ही पल तेल दीपक में डालना चाहिए। गुरु कार्य में ग्यारह पल से लाभ होता है। नित्यकर्म में पाँच पल तेल आवश्यक बताया गया है। अथवा अपने मन की जैसी रुचि हो उतना ही तेल का मान रखे। नित्य नैमित्तिक कर्मों के अवसर पर हनुमान जी की प्रतिमा के समीप अथवा शिव मंदिर में दीपदान कराना चाहिये।

              देव प्रतिमा के आगे, प्रमोद के अवसर पर, ग्रहों के निमित्त, भूतों के निमित्त, गृहों में और चौराहों पर इन छ: स्थलों में दीप जलाना चाहिये। स्फटिक मय शिवलिङ्ग के समीप, शालग्राम शिला के निकट हनुमान जी के लिये किया हुआ दीपदान नाना प्रकार के भोग और लक्ष्मी की प्राप्ति का हेतु कहा गया है। विघ्न तथा महान् संकटों का नाश करने के लिये गणेश जी के निकट हनुमान जी के उद्देश्य से दीपदान करे। भयंकर विष तथा व्याधि का भय उपस्थित होने पर हनुमद्विग्रह के समीप दीपदान का विधान है। व्याधिनाश के लिये तथा दुष्ट ग्रहों की दृष्टि से रक्षा के लिये चौराहे पर दीप देना चाहिए। बन्धन से छूटने के लिये राजद्वार पर अथवा कारागार के समीप दीप देना उचित है। सम्पूर्ण कार्यों की सिद्धि के लिये पीपल और वट के मूलभाग में दीप देना चाहिये। भय-निवारण और विवाद- शांति के लिये, गृहसंकट और युद्धसंकट की निवृत्ति के लिये और विष, व्याधि तथा ज्वर को उतारने के लिए भूतग्रह का निवारण करने, कृत्या से छुटकारा पाने तथा कटे हुए घाव को जोड़ने के लिए, दुर्गम एवं भारी वन में व्याघ्र हाथी तथा सम्पूर्ण जीवों के आक्रमण से बचने के लिये, सदा के लिये बन्धन से छूटने के लिये, पथिक के आगमन में आने-जाने के मार्ग में तथा राजद्वार पर हनुमान जी के लिये दीपदान आवश्यक बताया गया है। ग्यारह, इक्कीस और पिण्ड तीन प्रकार का मण्डलमान होता है। पाँच, सात अथवा नौ इन्हें लघुमान कहा गया है। दीप-दान के समय दूध, दही, मक्खन अथवा गोबर से हनुमान जी की प्रतिमा बनाने का विधान किया गया है। सिंह के समान पराक्रमी वीरवर हनुमान जी को दक्षिणाभिमुख करके उनके पैर को रोछ पर रखा हुआ दिखाये। उनका मस्तक किरीट से सुशोभित होना चाहिये। सुन्दर वस्त्र, पीठ अथवा दीवार पर हनुमान जी की प्रतिमा अंकित करनी चाहिये। कूटादि में तथा नित्य दीप में द्वादशाक्षर मंत्र का प्रयोग करना चाहिए।

           उपरोक्त विधि से पूर्ण श्रद्धा व विश्वास के साथ जो प्रतिदिन हनुमान जी को दीप देता है तीनों लोकों में उसके लिए कुछ भी असाध्य नहीं है यह ध्रुव सत्य है।
            
                   शिव शासनत: शिव शासनत:

दीपक कई प्रकार के होते हैं....

  चांदी के दीपक, मिट्टी के दीपक, लोहे के दीपक, ताम्बे के दीपक, पीतल की धातु से बने हुए दीपक तथा आटे से बनाए हुए दीपक।

 दीपावली पर मिट्टी के दीपक ही जलाने का महत्व है। मिट्टी के दीपक अधिक शुभ होते हैं। आओ जानते हैं कि कौन-सा दीप किस हेतु जलाया जाता है?
 
1. आटे का दीपक
किसी भी प्रकार की साधना या सिद्धि हेतु आटे का दीपक बनाते हैं और इसे ही पूजा करने के लिए सबसे उत्तम मानते हैं।
 
2. घी का दीपक
आर्थिक तंगी से मुक्ति पाने के लिए रोजाना घर के देवालय में शुद्ध घी का दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी-देवता भी प्रसन्न होते हैं। आश्रम तथा देवालय में अखंड ज्योत जलाने के लिए भी शुद्ध गाय के घी का या तिल के तेल का उपयोग किया जाता है।
 
3. सरसों के तेल का दीपक
शत्रुओं से बचने के लिए भैरवजी के यहां सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। सूर्यदेव को प्रसन्न करने के लिए भी सरसों का दीपक जलाते हैं।
 
4. तिल के तेल का दीपक
शनि ग्रह की आपदा से मुक्ति हेतु तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इससे देवी-देवता भी प्रसन्न होते हैं।

5. महूए के तेल का दीपक
पति की लंबी आयु की मनोकामना को पूर्ण करने के लिए घर के मंदिर में महुए के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

6. अलसी के तेल का दीपक
राहु और केतु ग्रहों की दशा को शांत करने के लिए अलसी के तेल का दीपक जलाना चाहिए।

7. चमेली के तेल से भरा तिकोना दीपक
संकटहरण हनुमानजी की पूजा करने के लिए तथा उनकी कृपा आप पर सदैव बनी रहे, इसके लिए तीन कोनों वाला दीपक जलाना चाहिए।
 
8. तीन बत्तियों वाला घी का दीपक
गणेश भगवान की कृपा पाने के लिए रोजाना तीन बत्तियों वाला घी का दीपक जलाना चाहिए।

9. चार मुख वाला सरसों के तेल का दीपक
भैरव देवता को प्रसन्न करने के लिए चार मुख वाला सरसों के तेल का दीपक जलाना चाहिए। इस उपाय को करने से व्यक्ति के जीवन के सभी कष्ट दूर हो जाते हैं।

10. पांच मुखी दीपक
किसी केस या मुकदमे को जीतने के लिए भगवान के आगे पांच मुखी दीपक जलाना चाहिए। इससे कार्तिकेय भगवान प्रसन्न होते हैं।

11. सात मुखी दीपक
माता लक्ष्मी की कृपा हमेशा घर पर बनी रहे, इसके लिए हमें उनके समक्ष सात मुख वाला दीपक जलाना चाहिए। दीपावली पर यह कार्य अवश्य कीजिए।.

12. आठ या बारह मुख वाला दीपक
शिव भगवान को प्रसन्न करने के लिए घी या सरसों के तेल का आठ या बारह मुख वाला दीपक जलाना चाहिए।

13. सोलह बत्तियों का दीपक
विष्णु भगवान को प्रसन्न करने के लिए इनके समक्ष रोजाना सोलह बत्तियों का दीपक जलाना चाहिए। दशावतार की पूजा हेतु दशमुख वाला दीपक जलाएं।

14. गहरा और गोल दीपक 
ईष्ट सिद्धि के लिए या ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक गहरा और गोल दीपक प्रज्वलित करें।

15. मध्य से ऊपर की ओर उठा हुआ दीपक
शत्रुओं से बचने या किसी भी आपत्ति के निवारण के लिए मध्य से ऊपर की ओर उठे हुए दीपक का प्रयोग जलाने के लिए करना चाहिए.

                                  साभार - मनीष शेखर
                               सिद्धाश्रम साधक परिवार

इन नौ औषधियों में वास है नवदुर्गा का ।।

औषधी: सम्प्रवक्ष्यामि महारक्षा विधायिनी ।
महाकाली तथा चण्डी वाराही चेश्वरी तथा ।।
सुदर्शना तथेन्द्रेणी गात्रास्या रक्षयन्ति तम् ।
बला चातिबला भीरूर्मुसली सहदेव्यपि ।।
जाती च मल्लिका यूथी गारुड़ी भृङ्गराजक:।
चक्ररूपा महौषध्यो धारिताविजयादिदा: ।।अग्निपुराण १२५/४३-४५ 
मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। 

इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां,जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया। चिकित्सा प्रणाली का यह रहस्य वास्तव में ब्रह्माजी ने दिया था जिसे बारे में दुर्गाकवच में संदर्भ मिल जाता है। ये औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली हैं।

 शरीर की रक्षा के लिए कवच समान कार्य करती हैं। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है।

१ प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी) भय को हरने वाली है।

पथया - जो हित करने वाली है।
कायस्थ - जो शरीर को बनाए रखने वाली है।
अमृता - अमृत के समान
हेमवती - हिमालय पर होने वाली।
चेतकी -चित्त को प्रसन्न करने वाली है।
श्रेयसी (यशदाता)- शिवा यानी कल्याण करने वाली।

२ द्वितीय ब्रह्मचारिणी यानि ब्राह्मी - ब्राह्मी, नवदुर्गा का दूसरा रूप ब्रह्मचारिणी है। यह आयु और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली, रूधिर विकारों का नाश करने वालीऔर स्वर को मधुर करने वाली है। 

इसलिए ब्राह्मी को सरस्वती भी कहा जाता है। यह मन एवं मस्तिष्क में शक्ति प्रदान करती है और गैस व मूत्र संबंधी रोगों की प्रमुख दवा है। यह मूत्र द्वारा रक्त विकारों को बाहर निकालने में समर्थ औषधि है। अत: इन रोगों से पीड़ित व्यक्ति को ब्रह्मचारिणी कीआराधना करना चाहिए।

३ तृतीय चंद्रघंटा यानि चन्दुसूर - नवदुर्गा का तीसरा रूप है चंद्रघंटा, इसे चन्दुसूर या चमसूर कहा गया है। यह एक ऐसा पौधा है जो धनिये के समान है। इस पौधे की पत्तियों की सब्जी बनाई जाती है, जो लाभदायक होती है। 

यह औषधि मोटापा दूर करने में लाभप्रद है, इसलिए इसे चर्महन्ती भी कहते हैं। शक्ति को बढ़ाने वाली, हृदय रोग को ठीक करने वाली चंद्रिका औषधि है। अत: इस बीमारी से संबंधित रोगी को चंद्रघंटा की पूजा करना चाहिए।

४ चतुर्थ कुष्माण्डा यानि पेठा - नवदुर्गा का चौथा रूप कुष्माण्डा है। इस औषधि से पेठा मिठाई बनती है, इसलिए इस रूप को पेठा कहते हैं। 

इसे कुम्हड़ा भी कहते हैं जो पुष्टिकारक, वीर्यवर्धक व रक्त के विकार को ठीक कर पेट को साफ करने में सहायक है। मानसिकरूप से कमजोर व्यक्ति के लिए यह अमृत समान है। यह शरीर के समस्त दोषों को दूर कर हृदय रोग को ठीक करता है। कुम्हड़ा रक्त पित्त एवं गैस को दूर करता है। इन बीमारी से पीड़ितव्यक्ति को पेठा का उपयोग के साथ कुष्माण्डादेवी की आराधना करना चाहिए।

५ पंचम स्कंदमाता यानि अलसी - नवदुर्गा का पांचवा रूप स्कंदमाता है जिन्हें पार्वती एवं उमा भी कहते हैं। यह औषधि के रूप में अलसी में विद्यमान हैं। यह वात, पित्त, कफ, रोगों की नाशक औषधि है।

"अलसी नीलपुष्पी पावर्तती स्यादुमा क्षुमा।
अलसी मधुरा तिक्ता स्त्रिग्धापाके कदुर्गरु:।।
उष्णा दृष शुकवातन्धी कफ पित्त विनाशिनी।"
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ने स्कंदमाता की आराधना करना चाहिए।

६ षष्ठम कात्यायनी यानि मोइया - नवदुर्गा का छठा रूप कात्यायनी है। इसे आयुर्वेद में कई नामों से जाना जाता है जैसे अम्बा, अम्बालिका, अम्बिका। इसके अलावा इसे मोइया अर्थात माचिका भी कहते हैं। यह कफ, पित्त, अधिक विकार एवं कंठ के रोग का नाश करती है।
इससे पीड़ित रोगी को इसका सेवन व कात्यायनी की आराधना करनी चाहिए।

७ सप्तम कालरात्रि यानि नागदौन - दुर्गा का सप्तम रूप कालरात्रि है जिसे महायोगिनी, महायोगीश्वरी कहा गया है।

 यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

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@Sanatan

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यह नागदौन औषधि केरूप में जानी जाती है। सभी प्रकार के रोगों की नाशक सर्वत्र विजय दिलाने वाली मन एवं मस्तिष्क के समस्त विकारों को दूर करने वाली औषधि है। इस पौधे को व्यक्ति अपने घर में लगाने पर घर के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। यह सुख देने वाली एवं सभी विषों का नाश करने वाली औषधि है। इस कालरात्रि की आराधना प्रत्येक पीड़ित व्यक्ति को करना चाहिए।

८ अष्टम महागौरी यानि तुलसी - नवदुर्गा का अष्टम रूप महागौरी है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति औषधि के रूप में जानता है क्योंकि इसका औषधि नाम तुलसी है जो प्रत्येक घर में लगाई जाती है। तुलसी सात प्रकार की होती है- सफेद तुलसी, काली तुलसी, मरुता, दवना, कुढेरक, अर्जक और षटपत्र। 
ये सभी प्रकार की तुलसी रक्त को साफ करती है एवं हृदय रोग का नाश करती है।

"तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमंजरी।
अपेतराक्षसी महागौरी शूलघ्नी देवदुन्दुभि: 
तुलसी कटुका तिक्ता हुध उष्णाहाहपित्तकृत् ।
मरुदनिप्रदो हध तीक्षणाष्ण: पित्तलो लघु:।"
इस देवी की आराधना हर सामान्य एवं रोगी व्यक्ति को करना चाहिए।

९ नवम सिद्धिदात्री यानि शतावरी - नवदुर्गा का नवम रूप सिद्धिदात्री है, जिसे नारायणी याशतावरी कहते हैं। शतावरी बुद्धि बल एवं वीर्य के लिए उत्तम औषधि है। यह रक्त विकार एवं वात पित्त शोध नाशक और हृदय को बल देने वाली महाऔषधि है।

 सिद्धिदात्री का जो मनुष्य नियमपूर्वक सेवन करता है। उसके सभी कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सिद्धिदात्री देवी की आराधना करना चाहिए। इस प्रकार प्रत्येक देवी आयुर्वेद की भाषा में मार्कण्डेय पुराण के अनुसार नौ औषधि के रूप में मनुष्य की प्रत्येक बीमारी को ठीक कर रक्त का संचालन उचित एवं साफ कर मनुष्य को स्वस्थ करती है। अत: मनुष्य को इनकी आराधना एवं सेवन करना चाहिए।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।
सर्व मंगलम मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्रयम्ब्के गौरी नारायणी नमो स्तुते।।

                                 साभार बी. डी वशिष्ठ
                               सिद्धाश्रम साधक परिवार
@Sanatan

शिवलिंग में प्राण प्रतिष्ठा करने की विधि ।।

      नीचे पूर्ण प्रामाणिक एवं वेदोक्त प्राण प्रतिष्ठिा की विधि लिखी जा रही है। इस विधि के द्वारा किसी भी बाण शिवलिङ्ग अर्थात नर्मदा से प्राप्त शिवलिङ्ग, स्फटिक शिवलिङ्ग, पारद शिवलिङ्ग या किसी अन्य पदार्थ अथवा शिला से निर्मित शिवलिङ्ग में स्वयं ही प्राण प्रतिष्ठिा कर सकते हैं। मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा करने की क्रिया प्रत्येक सनातनी को आनी चाहिये इस पर उसका जन्म सिद्ध अधिकार है। इस वैदिक रीति का अविष्कार भी भारतवंशियों के पूर्वजों ने ही किया है। 

प्राण प्रतिष्ठा मन्त्र का विनियोग
प्रतिष्ठा से पूर्व जल ग्रहण कर निम्न रूप से विनियोग करें

विनियोग
ॐ अस्य श्री प्राणप्रतिष्ठामन्त्रस्य ब्रह्मविष्णुमहेश्वरा ऋषयः, ऋग्यजुः सामानिच्छन्दांसि क्रियामयवपुः प्राणाख्या देवता आँ बीजं हीं शक्ति क्रौं कीलकं देव (देवी) - प्राणप्रतिष्ठा से विनियोगः ।

इतना कहकर जल भूमि पर छोड़ दें।

प्राण प्रतिष्ठा--

हाथ में पुष्प लेकर उसे शिवलिंग पर स्पर्श कराते हुए नीचे लिखे मंत्र बोले

ॐ ब्रह्मविष्णुरुद्रऋषिभ्यो नमः, शिरसि | ॐ ऋन्यजुः सामच्छन्दोभ्यो नमः, मुखे । ॐ प्राणाख्यदेवतायै नमः,हृदि । ॐ आँ बीजाय नमः गुह्ये । ॐ हीं शक्त्यै नमः, पादयोः । ॐ क्राँ कीलकाय नमः, सर्वाङ्गेषु ।

इस प्रकार न्यास करके पुन:

ॐ आँ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ शँ षँ सँ हँ सः सोऽहं शिवस्य प्राणा इह प्राणा: । ॐ आँ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ श षँ सँ हँ सः सोऽहं शिवस्य जीव इह स्थितः । ॐ ॐ ह्रीं क्रौं यँ रँ लँ वँ शँ बँसँ हँसः सोऽहं शिवस्य शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि वाड्यनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्रघ्राणजिह्वापाणिपादपायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा ।

ऐसा कहकर शिवलिंग पर पुष्प छोड़ें और आवाहन करें

ॐ भूः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि । ॐ भुवः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि । ॐ स्वः पुरुषं साम्बसदाशिवमावाहयामि । ॐ स्वामिन् सर्वजगन्नाथ यावत्पूजावसानकम् । तावत्त्वम्प्रीतिभावेन लिङ्गेऽस्मिन् संनिधिं कुरु ॥

इस तरह प्राण प्रतिष्ठा के पश्चात् स्थापित शिवलिङ्ग को किसी भी पूजा घर या मंदिर में स्थापित कर प्रतिदिन पूजा अर्चना की जा सकती है। प्राण प्रतिष्ठित शिवलिङ्ग की प्रतिदिन पूजा अर्चना भी उतनी ही आवश्यक है जितनी की प्रत्येक मनुष्य को प्रतिदिन भोजन एवं पानी की होती है। भगवान शिव को केवल प्रेम, श्रद्धा, विश्वास और समर्पण की जरूरत होती है।

                           शिव शासनत: शिव शासनत:

"सनातन विद्या से 𝗖𝘆𝗯𝗲𝗿 𝘀𝗲𝗰𝘂𝗿𝗶𝘁𝘆"

जी हाँ, शास्त्रों में एक ऐसी भी विद्या है जिससे आप अपने pin को सुरक्षित और गोपनीय रख सकते हैं, 
उस विद्या का नाम है "कटपयादी सन्ख्या विद्या"

●कटपयादि संख्या 

हम में से बहुत से लोग अपना Password, या ATM PIN भूल जाते हैं इस कारण हम उसे कहीं पर लिख कर रखते हैं पर अगर वो कागज का टुकड़ा किसी के हाथ लग जाए या खो जाए तो परेशानी हो जाती
पर अपने Password या Pin No. को हम लोग “कटपयादि संख्या” से आसानी से याद रख सकते है।
“कटपयादि”( क ट प य आदि) संख्याओं को शब्द या श्लोक के रूप में आसानी से याद रखने की प्राचीन भारतीय पद्धति है

चूँकि भारत में वैज्ञानिक/तकनीकी/खगोलीय ग्रंथ पद्य रूप में लिखे जाते थे, इसलिये संख्याओं को शब्दों के रूप में अभिव्यक्त करने हेतु भारतीय चिन्तकों ने इसका समाधान 'कटपयादि' के रूप में निकाला।

कटपयादि प्रणाली के उपयोग का सबसे पुराना उपलब्ध प्रमाण, 869 AD में “शंकरनारायण” द्वारा लिखित “लघुभास्कर्य” विवरण में मिलता है

तथा “शंकरवर्मन” द्वारा रचित “सद्रत्नमाला” का निम्नलिखित श्लोक इस पद्धति को स्पष्ट करता है -
इसका शास्त्रीय प्रमाण -

नज्ञावचश्च शून्यानि संख्या: कटपयादय:।
मिश्रे तूपान्त्यहल् संख्या न च चिन्त्यो हलस्वर: ॥

[अर्थ: न, ञ तथा अ शून्य को निरूपित करते हैं। (स्वरों का मान शून्य है) शेष नौ अंक क, ट, प और य से आरम्भ होने वाले व्यंजन वर्णों द्वारा निरूपित होते हैं। 
किसी संयुक्त व्यंजन में केवल बाद वाला व्यंजन ही लिया जायेगा। बिना स्वर का व्यंजन छोड़ दिया जायेगा।]

अब चर्चा करते हैं कि आधुनिक काल में इस की उपयोगिता क्या है और कैसे की जाए ? 
कटपयादि – अक्षरों के द्वारा संख्या को बताकर संक्षेपीकरण करने का एक शास्त्रोक्त विधि है, हर संख्या का प्रतिनिधित्व कुछ अक्षर करते हैं जैसे 

1 – क,ट,प,य 
2 – ख,ठ,फ,र 
3 – ग,ड,ब,ल 
4 – घ,ढ,भ,व 
5 – ङ,ण,म,श 
6 – च,त,ष 
7 – छ,थ,स 
8 – ज,द,ह 
9 – झ,ध 
0-ञ,न,अ,आ,इ,ई,उ,ऊ,ऋ,ॠ,लृ,ए,ऐ, ओ,औ 
 【 ऊपर चित्र देखें】 
हमारे आचार्यों ने संस्कृत के अर्थवत् वाक्यों में इन का प्रयोग किया, जैसे गौः = 3, श्रीः = 2 इत्यादि । 

इस के लिए बीच में विद्यमान मात्रा को छोड देते हैं । स्वर अक्षर ( vowel) यदि शब्द के आदि (starting) मे हो तो ग्राह्य ( acceptable) है, अन्यथा अग्राह्य (unacceptable) होता

जैसे समझिए कि मेरा ATM PIN 0278 है- पर कभी कभी संख्या को याद रखते हुए ATM में जाकर हम Confuse हो जातें हैं कि 0728 था कि 0278 ? यह भी अक्सर बहुत लोगों के साथ होता है, ये इन से बचने के उपाय हैं 

जैसे ATM PIN के लिए कोई भी चार अक्षर वाले संस्कृत शब्द को उस के कटपयादि मे परिवर्तन करें ( उस शब्द को सिर्फ अपने ही मन मे रखें, किसी को न बताएं )

उदाहरण के लिए –

इभस्तुत्यः = 0461

गणपतिः = 3516

गजेशानः = 3850

नरसिंहः = 0278

जनार्दनः = 8080

सुध्युपास्यः = 7111

शकुन्तला = 5163

सीतारामः = 7625

इत्यादि ( अपने से किसी भी शब्द को चुन लें )
ऐसे किसी भी शब्द को याद रखें और तत्काल “कटपयादि संख्या” मे परिवर्तन कर के अपना ATM PIN आदि में प्रयोग करें । 

सत्य सनातन धर्म की जय।