Follow us for Latest Update

गायत्री की त्रिविधि साधना ।।

गायत्री के तीन रूप हैं।

 ह्रीं,श्रीं,क्रीं - सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा - सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी यह तीनों ही रूप अपने अपने स्थान पर एक समान उपयोगी हैं। एक ही मनुष्य समय-समय पर विविध प्रकार के पार्ट अदा करता है। पिता के सामने पुत्र जैसा, गुरु के सामने शिष्य जैसा, पत्नी के सामने पति जैसा, सन्तान के सामने पिता जैसा, नौकरों के सामने मालिक जैसा, ईश्वर के सामने भक्त जैसा, दुष्टों के साथ में कसाई जैसा आचरण करता है। इतने घोर अन्तर भरे हुए अभिनय करने पर भी उसकी मूल स्थिति में न तो भिन्नता होती है और न अन्तर आता है। इसी प्रकार आद्यशक्ति गायत्री भी विविध प्रयोजनों के लिए विविध रूपों में प्रकट होती है।

एक ही नारी को विविध प्रयोजन वाले व्यक्ति विविध रूपों से देखते हैं। पिता उसे वात्सल्य की प्रतिमा समझ कर उस पर अपना दुलार ढुलकाता है और उससे वैसी ही इच्छा तथा आशा रखता है जैसी कि एक पुत्री से रखनी चाहिए। उसी नारी का पति उसे भिन्न दृष्टि से देखता है, उसे रति सी सुन्दरी काम-क्रीड़ा की पुतली तथा अर्धांगिनी, जीवन संगिनी समझता है, उसके समझ इन्हीं भावनाओं से संमिश्रित व्यवहार करता है और इन भावनाओं के अनुरूप ही पत्नी का आचरण, प्रत्युत्तर प्राप्त होने की आशा करता है। अब उसी नारी के पुत्र का नम्बर आता है, वह शिशु उसे स्नेहमयी, दयामयी, परोपकार की मूर्ति, सुरगौ सी मनोरथ दायिनी अन्नपूर्णा समझता है, वैसा ही उससे व्यवहार करता है वैसी ही माँगें पेश करता है और वैसे ही फल प्राप्त करता है।

एक ही नारी के प्रति रखे जाने वाले इन तीन दृष्टि कोणों की तुलना कीजिए, यह तीनों ही एक दूसरे से बिल्कुल नहीं मिलते, तीनों में जमीन-आसमान का अन्तर है, पुत्र जिस रूप में उस नारी को देखता है उस दृष्टिकोण से पति देखना कदापि पसन्द न करेगा और जो पति की दृष्टि है वह पिता के लिए सर्वथा अग्राह्य है। इतना अन्तर होते हुए भी एक ही नारी विविध अवसरों पर विविध पात्रों के सामने, इन जमीन आसमान जैसे अन्तरों वाले दृष्टिकोणों का अभिनय करती है। इतनी भिन्नताएं धारण करने पर भी उसका मूल स्वरूप एकरस ही रहता है।

गायत्री माता के तीन स्वरूपों का रहस्य भी यही है। वे हंसारूढ़ सरस्वती का सतोगुणी रूप धारण करके ज्ञान और विवेक की मधुर वीणा, भक्त के हृदयाकाश में झंकृत करती हैं। वे रजोगुणी रूप धारण करके गजवाहिनी लक्ष्मी बनती हैं और भक्त के अभाव को समृद्धियों की सम्पदा से पूरा कर देती हैं। वे तमोगुणी रूप में सिंहारुढ़ दुर्गा बनकर आती हैं और शत्रुओं के मस्तक का अपने खड्ग से छेदन करती हुई, उनके रक्त से खप्पर भरती हैं, मुण्डों की माला गले में डालती हैं। हमें विविध अवसरों पर विविध प्रयोजनों के लिए आद्यशक्ति के इन तीनों ही रूपों की आवश्यकता पड़ती है।

आत्मोन्नति के लिए- ज्ञान, विवेक, भक्ति, परमार्थ का लाभ करना प्रधान उद्देश्य हो तो भगवती के सतोगुणी रूप की उपासना करनी चाहिए। किसी साँसारिक आवश्यकता की पूर्ति के लिए, धन वैभव, पद, स्वास्थ्य, यश तथा अभीष्ट परिस्थिति प्राप्त करने के लिए गायत्री का रजोगुणी रूप उपासनीय है। किन्हीं अनिष्टों का विदारण, आपत्तियों, विघ्नों संकटों भीतरी और बाहरी शत्रुओं का विनाश करने के लिए तमोगुण स्वरूपा शक्ति उपासना की जाती है।

‘तमोगुण’ शब्द साधारणतः क्रोध के निन्दास्पद अर्थ में प्रयोग किया जाता है, पर यह अर्थ बहुत ही सीमित, संकीर्ण और अधूरा है। तमोगुण का अर्थ यहाँ ‘विरोध’ अधिक उपयुक्त होगा। अनुपयुक्त स्थिति को हटाने के लिए जो विरोध उत्पन्न होता है उसके साथ संहारक क्रिया जुड़ी हुई होती है। पर संहारक क्रिया भी उतनी ही आवश्यक होती है, जितनी कि रचनात्मक। रोग कीटाणुओं को मारने के लिए औषधि ली जाती है, यज्ञ द्वारा आकाश स्थिति हानिकारक कीटाणुओं का संहार किया जाता है। शरीर, वस्त्र, गृह, पात्र आदि की शुद्धि करने में अशुद्धि का नाश होता है, मन में छिपे हुए काम क्रोध, लोभ, मोह आदि को मार डालने, इन्द्रियों को पछाड़ने, मन को काबू में करने की संहारक क्रियाएं योगी जनों के लिए भी आवश्यक समझी जाती हैं। भगवान राम, कृष्ण, परशुराम, नृसिंह आदि अधिकाँश अवतारों ने संहारिणी नीति को भी प्रधान रूप से चरितार्थ किया है। इसलिए संहारिणी या विरोधमयी, तमोगुण शक्ति की वृद्धि को बुरा नहीं कहा जा सकता वरन् अनेक अवसरों पर तो वह अत्यन्त आवश्यक होती है। तमोगुण का-विरोध तत्व का- बढ़ना कोई बुरी बात नहीं है, बुराई तो तब है जब उसका दुरुपयोग किया जाता है।

कोई कार्य किसी प्रयोजन के लिए ही किया जाता है। गायत्री से हमारे तीन प्रयोजन सिद्ध हो सकते हैं। उसके जिस रूप की हम उपासना करते हैं वही तत्व हमारे अन्दर बढ़ता है, इस वृद्धि के फलस्वरूप साधक को ऐसे ज्ञात और अज्ञात प्रत्यक्ष और परोक्ष अवसर प्राप्त होते हैं जिनका सदुपयोग करने से अभीष्ट उद्देश्य की प्राप्ति होती है।

भूगर्भ विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि पृथ्वी में अनेक धातुओं के परमाणु बिखरे होते हैं, इन सब परमाणुओं में एक चुम्बकत्व होता है जिनके द्वारा वह परमाणु अपनी जाति के दूसरे परमाणुओं को अपनी ओर खींचता है या उनकी ओर खिंचता है। इस आधार पर एक जाति के परमाणु दूर दूर से खिंचते हुए एक स्थान पर जमा होते जाते हैं और कालान्तर में बड़ी-बड़ी खानें बन जाती हैं। खानों की खोज करने वाले विज्ञान वेत्ता अपने अणुवीक्षण यंत्रों से पृथ्वी की विभिन्न सतहों पर यह निरीक्षण करते हैं कि किस जाति के परमाणु, किस गति से, किस दिशा में, चल रहे हैं वे उसी आधार पर अपना अनुसंधान जारी रखते हैं और अन्त में बड़ी-बड़ी खानों का पता लगा लेते हैं। हमारे भीतर भी यही परमाणुओं के चुम्बकत्व का सिद्धान्त काम करता है।

जिस प्रकार की साधना हम करते हैं उसी प्रकार का चुम्बकत्व हमारे जड़ और चैतन्य परमाणुओं में बढ़ता है फलस्वरूप संसार में से उसी प्रकार के तत्व खिंचकर हमारे पास जमा होते हैं और थोड़े ही दिनों में उसी प्रकार की एक बड़ी खान हमारे पास जमा हो जाती है। इस खान को स्थूल दृष्टि वाले लोग साधना की सिद्धि कहकर पुकारते हैं। जिस प्रकार की आन्तरिक शक्तियाँ हमारे अन्दर बढ़ती हैं उस प्रकार की बाह्य सफलताएं पग-पग पर मिलना बिल्कुल स्वाभाविक है। इस स्वाभाविकता को ही लोग मंत्र बल की अद्भुत शक्ति समझते हैं। देखने में यह अद्भुत सा भले ही लगे पर वस्तुतः इसमें असाधारण कोई बात नहीं है, यह वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसके आधार पर सूक्ष्म सिद्धान्तों द्वारा स्थूल लाभ प्राप्त किया जाता है। विज्ञान का आधार ही सूक्ष्म तत्वों से स्थूल लाभ प्राप्त करना है, आध्यात्म विज्ञान भी उस चिर सनातन आधार पर ही अवलंबित है।

प्रयोजन के अनुरूप ही साधन भी जुटाने पड़ते हैं। लड़ाई के लिए युद्ध सामग्री जमा करनी पड़ती है और व्यापार के लिए उस तरह का सामान इकट्ठा करना होता है। भोजन बनाने वाला रसोई संबंधी वस्तुएं लाकर अपने पास रखता है और चित्रकार को अपनी आवश्यक चीज जमा करनी होती हैं। व्यायाम करने की और दफ्तर जाने की पोशाक में अन्तर रहता है। जिस प्रकार की साधना करनी होती है उसी के अनुरूप उन्हीं तत्वों वाली, उन्हीं प्राणों वाली, उन्हीं गुणों वाली सामग्री उपयोग में लानी होती है। सबसे प्रथम यह देखना चाहिए कि हमारी साधना किस उद्देश्य के लिए है, सत, रज, तम में से किस तत्व की वृद्धि के लिए है। जिस प्रकार की साधना हो उसी प्रकार की साधना सामग्री व्यवहृत करनी चाहिए। नीचे इस संबंध में एक विवरण दिया जाता है :-

सतोगुण-
माला-तुलसी। आसन-कुश। पुष्प-श्वेत। पात्र-ताँबा। वस्त्र-सूत (खादी) मुख-पूर्व को। दीपक में घृत-गौ घृत। तिलक-चन्दन। हवन में समिधा, पीपल, बड़, गूलर। हवन सामग्री-श्वेत चंदन अगर छोटी इलाइची, लौंग, शंखपुष्पी ब्राह्मी, शतावरी, खस, शीतलचीनी, आँवला, इन्द्र जौ, वंशलोचन, जावित्री, गिलोय, वच, नेत्रवाला, मुलहठी, कमल केसर, बड़ की जटाएं, नारियल, बादाम, दाख, जौ, मिश्री।

रजोगुण-
माला-चन्दन। आसन सूत। पुष्प-पीले। पात्र-काँसा। वस्त्र-रेशम। मुख उत्तर को। दीपक में घृत-भैंस का घृत। तिलक-रोली। समिधा-आम, ढाक, शीसम। हवन सामग्री-देवदारु, बड़ी इलायची, केसर, छार छबीला, पुनर्नवा, जीवन्ती, कचूर, तालीस पत्र, रास्ना, नागर मौथा उनाव, तालमखानी, मोनरस, सोंफ, चित्रक, दालचीनी, पन्नाख, छुहारा, किसमिस, चावल, खाँड़।

तमोगुण-
माला-रुद्राक्ष। आसन-ऊन। पुष्प-हलके या गहरे लाल। पात्र-लौह। वस्त्र-ऊन। मुख-पश्चिम को। दीपक में घृत-बकरी का। तिलक-भस्म का। समिधा-बेल, छोंकर, करीख। सामग्री-रक्त चंदन, तगर, असंगध, जायफल, कमलगट्ठा, नागकेसर, पीपल, बड़ी, कुटकी, चिरायता, अपामार्ग, कागड़ासिंगी, पोहकर मूल, कुलंजन, मूसली स्याह, मेंथी के बीज, काकजंघा, भारंगी, अकरकरा, पिस्ता, अखरोट, चिरौंजी, तिल, उड़द, गुड़।

गुणों के अनुसार साधना सामग्री उपयोग करने से साधक में उन्हीं गुणों की अभिवृद्धि होती है तद्नुसार सफलता का मार्ग अधिक सुगम हो जाता है।

सूतक ओर पातक ।।

हमारे ऊपर आ रहे कष्टो का एक कारण सूतक के नियमो का पालन नहीं करना-

सूतक का सम्बन्ध “जन्म एवं मृत्यु के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है ! जन्म के अवसर पर जो ""नाल काटा"" जाता है और जन्म होने की प्रक्रिया में अन्य प्रकार की जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप “सूतक”माना जाता है !

जन्म के बाद नवजात की पीढ़ियों को हुई अशुचिता

3 पीढ़ी तक – 10 दिन

4 पीढ़ी तक – 10 दिन

5 पीढ़ी तक – 6 दिन

ध्यान दें :- एक रसोई में भोजन करने वालों के पीढ़ी नहीं गिनी जाती … वहाँ पूरा 10 दिन का सूतक माना है !

प्रसूति (नवजात की माँ)

प्रसूति (नवजात की माँ) को 45 दिन का सूतक रहता है प्रसूति स्थान 1 माह तक अशुद्ध है ! इसीलिए कई लोग जब भी अस्पताल से घर आते हैं तो स्नान करते हैं !

अपनी पुत्री :-

      पीहर में जनै तो हमे 3 दिन का, ससुराल में जन्म दे तो उन्हें 10 दिन का सूतक रहता है ! और हमे कोई सूतक नहीं रहता है !

नौकर-चाकर :-

      अपने घर में जन्म दे तो 1 दिन का, बाहर दे तो हमे कोई सूतक नहीं !

पालतू पशुओं का :-

    घर के पालतू गाय, भैंस, घोड़ी, बकरी इत्यादि को घर में बच्चा होने पर हमे 1 दिन का सूतक रहता है ! किन्तु घर से दूर-बाहर जन्म होने पर कोई सूतक नहीं रहता ! बच्चा देने वाली गाय, भैंस और बकरी का दूध, क्रमशः 15 दिन, 10 दिन और 8 दिन तक “अभक्ष्य/अशुद्ध” रहता है !

पातक

    पातक का सम्बन्ध “मरण के” निम्मित से हुई अशुद्धि से है ! मरण के अवसर पर ""दाह-संस्कार"" में इत्यादि में जो हिंसा होती है, उसमे लगने वाले दोष/पाप के प्रायश्चित स्वरुप “पातक” माना जाता है !

मरण के बाद हुई अशुचिता :-

3 पीढ़ी तक – 12 दिन

4 पीढ़ी तक – 10 दिन

5 पीढ़ी तक – 6 दिन

ध्यान दें :-. जिस दिन दाह-संस्कार किया जाता है, उस दिन से पातक के दिनों की गणना होती है, न कि मृत्यु के दिन से ! यदि घर का कोई सदस्य बाहर/विदेश में है, तो जिस दिन उसे सूचना मिलती है, उस दिन से शेष दिनों तक उसके पातक लगता है ! अगर 12 दिन बाद सूचना मिले तो स्नान-मात्र करने से शुद्धि हो जाती है !

गर्भपात

       किसी स्त्री के यदि गर्भपात हुआ हो तो, जितने माह का गर्भ पतित हुआ, उतने ही दिन का पातक मानना चाहिए घर का कोई सदस्य तपस्वी साधु सन्यासी बन गया हो तो, उस साधु सन्त को , उसे घर में होने वाले जन्म-मरण का सूतक-पातक नहीं लगता है ! किन्तु स्वयं उसका ही मरण हो जाने पर उसके घर वालों को 1 दिन का पातक लगता है !

विशेष

       किसी अन्य की शवयात्रा में जाने वाले को 1 दिन का, मुर्दा छूने वाले को 3 दिन और मुर्दे को कन्धा देने वाले को 8 दिन की अशुद्धि जाननी चाहिए !

आत्मघात

      घर में कोई आत्मघात करले तो 6 महीने का पातक मानना चाहिए ! यदि कोई स्त्री अपने पति के मोह/निर्मोह से आग लगाकर जल मरे, बालक पढाई में फेल होकर या कोई अपने ऊपर दोष देकर आत्महत्या कर मरता है तो इनका पातक बारह पक्ष याने 6 महीने का होता है !

उसके अलावा भी कहा है कि जिसके घर में इस प्रकार अपघात होता है, वहाँ छह महीने तक कोई बुद्धिमान मनुष्य भोजन अथवा जल भी ग्रहण नहीं करता है ! वह मंदिर नहीं जाता और ना ही उस घर का द्रव्य मंदिर जी में चढ़ाया जाता है ! जहां आत्महत्या हुई है, उस घर का पानी भी ६ माह तक नहीं पीना चाहिए। अनाचारी स्त्री-पुरुष के हर समय ही पातक रहता है

ध्यान से पढ़िए :-

सूतक-पातक की अवधि में देव-शास्त्र-गुरु का पूजन, प्रक्षाल, आहार आदि धार्मिक क्रियाएं वर्जित होती हैं ! इन दिनों में मंदिर के उपकरणों को स्पर्श करने का भी निषेध है ! यहाँ तक की गुल्लक में रुपया डालने का भी निषेध बताया है ! दान पेटी मे दान भी नहीं देना चाहिए। देव-दर्शन, प्रदिक्षणा, जो पहले से याद हैं वो विनती/स्तुति बोलना, भाव-पूजा करना, हाथ की अँगुलियों पर जाप देना शास्त्र सम्मत है !

कहीं कहीं लोग सूतक-पातक के दिनों में मंदिरजी ना जाकर इसकी समाप्ति के बाद मंदिरजी से गंधोदक लाकर शुद्धि के लिए घर-दुकान में छिड़कते हैं, ऐसा करके नियम से घोनघोर पाप का बंध करते हैं !

मानो या न मानो, यह सत्य है, नहीं मानने पर दुःख, कष्ट, तकलीफ, होगी इन्हे समझना इसलिए ज़रूरी है, ताकि अब आगे घर-परिवार में हुए जन्म-मरण के अवसरों पर अनजाने से भी कहीं दोष का उपार्जन न हो।

गुरु क्या है ?

गुरूर्चिन्त्यं रूपं अहेतुं प्रमेयं ध्यानं विचिन्त्यं परमेव पाद्यं । 
ग्राहां सतां पूर्ण मदैव तुल्यं निर्वेद रूप मपरं गुरूवै सहेतुम्।।

         हमारा जीवन क्या है ? यह एक महत्वपूर्ण ऋषि चिंतन है, एक महत्वपूर्ण कथन है। यदि जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, जीवन का कोई चिंतन नहीं है तो फिर जीवन किसलिए? किसे हम जीवन कहें? क्या सांस लेने की क्रिया को हम जीवन कह सकते हैं ? क्या जिंदा रहने की कल्पना को हम जीवन कह सकते हैं? क्या संतान उत्पन्न करने की भावना को हम जीवन कह सकते हैं? क्या दो चार मकान, गाड़ी, बंगला और धन दौलत जमा करने का नाम ही जीवन है ? यह सब तो जीवन के एकमात्र लक्ष्य नहीं हैं, इन लक्ष्यों के माध्यम से तो जीवन का निर्माण नहीं हो सकता और जब जीवन का मूल्य और महत्व ही ज्ञात नहीं है, जीवन का अर्थ और जीवन का मकसद ही हमें पता नहीं है तो फिर हम वैसे ही पशु हैं जो डोलते रहते हैं एक अज्ञात नकेल डाले हुए, उनको स्वयं ज्ञात नहीं होता कि वे किस तरफ जा रहे हैं, उनकी मंजिल क्या है? उनकी मंजिल कहाँ समाप्त होगी ? 

      जिस रास्ते के प्रारम्भ का पता नहीं है, जिस रास्ते के अंत पता नहीं है, उस रास्ते पर चलना तो अंधे की तरह से चलना होता है। जिसका सूत्र हमारे हाथ में नहीं है, जिसका चिंतन और ज्ञात हमारे हाथ में नहीं है तो हम किन शब्दों से उसे जीवन कह सकते हैं। क्या हमने अपने जीवन के मकसद को समझा है ? क्या हमने कभी निर्णय लिया है कि जीवन के किस भाग पर हम खड़े हैं? हमने तो कभी सोचा ही नहीं, हमने तो बस भोग-विलास को ही जीवन मान लिया, हमने तो श्वास लेने की क्रिया को ही जीवन मान लिया, हमने तो जिंदा रहने की कल्पना को ही जीवन मान लिया है, कपड़े पहनना और कपड़े छोड़ देना, भोजन करना, पानी पीना, टी.वी सिनेमा देखना, घूमना-फिरना, मौज मस्ती करना इत्यादि तो जीवन के न्यूनतम आयाम है।

     जीवन तो किसी और ताने बाने से बुना होता है, जीवन तो वह है कि जिसका सूत्र हमारे हाथ में होता हो, जीवन तो वह है जिसका कि मर्म हमें ज्ञात हो । हम जिंदा तो हैं, सामाजिक और वैज्ञानिक परिभाषा में हम जीवित हैं मगर शास्त्रीय पद्धति में हम मृत हैं क्योंकि विज्ञान तो कहता है कि जिसमें चेतना नहीं है, जिसमें इस बात का होश नहीं है कि मैं क्या हूँ ? कहाँ जा रहा हूँ? कहाँ पहुँचना है? वह मृत है। मैं सबसे पहले आप को यह समझाना चाहूँगा कि अगर तुम जीवन को नहीं समझ पाये तो रोज सैकड़ों समस्याएं आयेंगी क्योंकि आप के जीवन का सूत्र आप के हाथों में ही नहीं है, हमने चाँदी के चंद टुकड़ों को जमा करना ही जीवन मान लिया है, दो चार मकान बनाने को ही जीवन मान लिया है।
 
        चाहे आप निर्धनता में जियें या वैभवता में जियें जब तक जीवन के मूल चिंतन को नहीं समझेंगे तब तक भटकते रहेंगे। कौन तुम्हें बताएगा कि तुम्हारे जीवन का मकसद क्या है? कौन बताएगा कि कैसे जीवन जियें ? क्या आपाधापी में भागते रहने को जीवन कहते हैं? क्या हड़बड़ाहट में चलते रहने को जीवन कहते हैं? क्या हर समय तनाव में रहने को जीवन कहते हैं ? यह तो मजबूरी का जीवन है, यह जीवन तो कफन ओढ़कर श्मशान में सोने की क्रिया है, इस तरह के जीवन में कुछ पाना सम्भव ही नहीं। सिर्फ खोना ही खोना है और जो तुम प्राप्त कर रहे हो गाड़ी, बंगला, धन-दौलत, पुत्र-पुत्रियाँ, चाँदी के टुकड़े इत्यादि यह सब मृत्यु के बाद पीछे छूट जायेंगे एवं इनमें से कोई भी तुम्हारे साथ नहीं जायेगा। किसी की भी यात्रा तुम्हारे साथ नहीं है और जो तुम्हारे साथ नहीं है वह तुम्हारा सहयोगी भी नहीं है। मैं यह नहीं कहना चाह रहा हूँ कि तुम्हारे पास गाड़ी बंगला, रूपया पैसा न हो यह सब जरूरी हैं जीवन में लक्ष्मी प्राप्त करना जरूरी है, परिवार में पत्नी, पुत्र, पुत्रियाँ, यश, प्रसिद्धि होना जरूरी है पर जब तक जीवन का सूत्र तुम्हारे हाथों में नहीं रहेगा तुम्हें पूर्णता के साथ कुछ भी प्राप्त नहीं होगा क्योंकि तुम जो जीवन जी रहे हो वह टुकड़ों-टुकड़ों में जी रहे हो इसलिए किसी भी चीज की प्राप्ती तुम्हें टुकड़ों-टुकड़ों में होती , पूर्णता के साथ नहीं होती है।. 

         आज आपसे बड़ी बड़ी बातें नहीं कर रहा हूँ क्योंकि अगर भवन की नींव कमजोर होगी तो उस पर आलीशान भवन नहीं बन सकता है। जीवन में जब जीवन जीने की कला आ जाती है तब असम्भव शब्द हमारे शब्द कोश में नहीं रहता चाहे वह जीवन भौतिकता का हो चाहे आध्यात्मिकता का हो। एक सद्गुरु ही तुम्हें यह अध्याय पढ़ा सकता है। जब तक मनुष्यता नहीं आयेगी तब तक देवत्व नहीं आ सकता है, देवी कृपा प्राप्त नहीं हो सकती। जिन्होंने अपने जीवन में झूठ, छल-कपट और असत्य का आचरण किया उनका बुढ़ापा अत्यंत दुःखदायी अवस्था में व्यतीत हुआ, रोगों से जर्जर, अभावों से पीड़ित, अतृप्त रहते हैं। ऐसे लोगों को समाज भी दुत्कारता है,जिसने जीवन भर छल कपट किया हो,लोगों को धोखा दिया हो ऐसा जीवन भी क्याजीवन है ? जो तुम्हारे मरने के बाद किसी के मन में रुलाई न फूटे, ऐसा जीवन किस काम आयेगा? क्या प्रयोजन है ऐसे जीवन का? यह तो पत्थरों के ढेर को उठाने कि एक क्रिया है। कपट के पत्थर,झूठ के पत्थर,व्याभिचार, दुःख,तकलीफ, जर्जरता रूपी इन पत्थरों के ढेर को उठाने से, भगवा कपड़े पहनने से, दाढ़ी मूंछ बढ़ा लेने से कोई सद्गुरु नहीं बन जाता, सद्गुरु तो वह होता है जिसके पास ज्ञान हो चाहे वह गुरु के रूप में स्त्री हो या पुरुष कोई भी हो सकता है क्योंकि बिना ज्ञान के गुरुत्व नहीं आ सकता और जब तक प्रेम न हो तब तक शांति नहीं आ सकती, नर से नारायण बनने की क्रिया नहीं आ सकती।

      जिस तरह से आप जीवन जी रहे हैं, समाज में जिस तरह से आप आगे बढ़ रहे हैं, जिस प्रकार हजारों लाखों लोग जीवन जी रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं, निरंतर मृत्यु के पास जा रहे हैं इस जीवन और मृत्यु के बीच एक क्षण रुककर आपको सोचना होगा। क्या मैं जो जीवन जी रहा हूँ यह मेरी नियति है ? क्या मैं अपने जीवन से खुश हूँ? क्या यह जीवन जीने की सही पद्धति है? यह तो एक बाध्य होने वाला व्यर्थ का जीवन हैं, इस प्रकार के जीवन में प्राणस्थ चेतना नहीं, कोई रस नहीं, जीवन का कोई लक्ष्य नहीं है, कहाँ पहुँचना है पता नहीं है, किस तरह से हुंचना है, ऐसा कोई चिंतन नहीं है। अभी तुम्हारा जीवन तुम्हारे हाथों में नहीं है, जीवन के सूत्र तुम्हारे हाथों में नहीं है। यह जीवन समय, काल और मृत्यु के हाथ में है एवं यह जैसा हमें गतिशील करते हैं हम वैसे ही गतिशील बने रहते हैं। सुख दुःख, लाभ-हानि से अपने जीवन को बुनते रहते हैं, हमारे जीवन पर हमारा कोई अधिकार नहीं है, हमारा उस पर कोई नियंत्रण नहीं है, न ही हमारे जीवन का सूत्र हमारे हाथ में है और न ही हमें इसका ज्ञान है। 

        अपने जीवन के रहस्यों को किस प्रकार बुना जाय? कौन सा चिंतन किया जाये ? जिसके द्वारा जीवन को अद्वितीय, सम्पूर्ण एवं युगप्रधान बनाया जा सके। जो पगडंडी पूर्णता की ओर जाती है उस कार्य को करने के लिए दो बातों की आवश्यकता हैं। पहली बात तो यह है कि जीवन को पूर्णता प्रदान की जा सकती है। तो केवल साधनात्मक शैली के माध्यम से, यह बात मैं पूरे भरोसे के साथ कह रहा.हूँ और मैं वही कहता, बोलता और लिखता हूँ जिसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने अपने जीवन में किया है। धर्म के क्षेत्र में हैं तो हमें सर्वोच्च सिद्धियाँ प्राप्त करनी पड़ेंगी। फिर हम अपने क्षेत्र में नंबर एक बने रहें, यदि हम व्यापारी हैं तो अपने क्षेत्र के अद्वितीय धनपति बनें, यदि हम विद्वान, विशेषज्ञ हैं तो उसमें भी हम अद्वितीय हों, यदि हम साधनात्मक जीवन जी रहे हैं तो उसमें असीम शांति को प्राप्त करें, ब्रह्म को प्राप्त करें, आनंद को प्राप्त करें और अध्यात्म की पूर्णता को प्राप्त करें पर किसी भी क्षेत्र में सर्वोच्चता कैसे प्राप्त की जा सकती है?

            मात्र प्रयत्न करने से कुछ नहीं होता है, प्रत्येक व्यापारी प्रयत्न करता ही है पर धनपति नहीं होता, मेहनत तो वह बहुत करता है पर वह कुबेर पति नहीं बन पाता है यद्यपि उसके प्रयासों में कोई कमी नहीं रहती। मात्र परिश्रम करने से सम्पूर्णता, सर्वोच्चता और अद्वितीयता प्राप्त नहीं हो सकती, मात्र दो चार ग्रंथ लिखने से या दस-बीस मालाएं धारण करने से कोई सर्वश्रेष्ठ गुरु नहीं हो सकता, वह परमहंस नहीं हो सकता है, वह पूर्ण आध्यात्मिक व्यक्तित्व नहीं हो सकता, इस सर्वोच्चता को अपने हाथ में लेने के लिए एक और तथ्य है जिसे बहुत कम लोग ही जानते हैं और वह है साधना, साधना, साधना और सिर्फ साधना।

               साधना का तात्पर्य जीवन को सम्पूर्णता के साथ एक लक्ष्य की और अग्रसर करना अपने मन को अपने प्राणों को अपनी देह को, अपने व्यक्तित्व को इन सबको मिलाकर जिसका निर्माण होता है वह व्यक्ति स्त्री-पुरुष चाहे कोई भी हो उसे साधक कहा जाता है। क्योंकि साधनाओं के माध्यम से ही सिद्धियों को प्राप्त किया जाता है और जब तक आप अपनी प्राण चेतना के साथ ऊपर नहीं उठते साधक नहीं बन सकते और साधक बनने के लिए पहली शर्त यह है आपका मानस आपका व्यक्तित्व और आपके विचार टुकड़ों टुकड़ों में न हों, सब कुछ समग्र हो ओर आप तेजी के साथ अपने लक्ष्य की और बढ़ने के लिए आतुर हो। जब आप अपने जीवन की प्राणस्थ चेतना आपके जीवन का आधार एक ही लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने के लिए लग जाता है तब मंजिल स्वयं आपके सामने आकर खड़ी हो जाती है। सफलता, सिद्धियाँ ऐसे व्यक्ति को जय मालाएं पहनाने को आतुर हो जाती है पर आपको छोटी-छोटी बाधाओं से विचलित नहीं होना है फिर मार्ग में अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कितनी भी बाधाएं आ जाए वह व्यक्ति विचलित नहीं होता है, उसका एक मात्र लक्ष्य सफलता हासिल करना और पूर्णता हासिल करना होना चाहिए। जब आपमें ऐसी स्थिति आ जायेगी तब आप स्थितप्रज्ञ जायेंगे। ऐसे व्यक्ति ही जीवन में अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं जिसे प्राप्त करने के लिए लाखों करोड़ों लोग प्रयत्नशील रहते हैं।

         मनुष्य को पूर्णता प्राप्त करने के लिए देवी कृपा की आवश्यकता रहती है पर यह कृपा रोने, गिड़गिड़ाने, हाथ जोड़ने, पैर पड़ने से प्राप्त नहीं हो सकती, ऐसा तो कायर लोग करते हैं। जो सिर्फ लाचारी भरा जीवन जीते हैं वह सिर्फ गिड़गिड़ाना जानते हैं, हाथ जोड़कर भीख मांगने से देवी कृपा प्राप्त नहीं हो सकती इसके लिए जरूरी है कि हम पुरुष बने फिर पुरुषोत्तम बनें आपके अंदर एक तूफान हो, संकल्प शक्ति हो, इच्छा शक्ति हो और फौलाद की तरह विचार होना चाहिए, जीवन में एक चेलेंज होना चाहिए या तो मैं देवी कृपा प्राप्त करके रहूंगा या अपने शरीर को समाप्त कर दूंगा। मन में ऐसा भाव हो, ऐसा ही साधक सिद्धियाँ प्राप्त करता है, साधना में सफलता प्राप्त करता है, वह देवताओं को भी मजबूर कर देता है कि वह सिद्धियाँ प्रदान करें और सब कुछ प्रदान करें।

         जीवन की सर्वोच्चता तक पहुँचने के लिए ऐसा ही साधक जीवन में सम्पूर्णता को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। इस ब्रह्माण्ड में शिष्य शब्द अपने आप में सम्पूर्णता लिए हुए शब्द है जिसका हृदय जागृत हो, जो प्रेममय हो और जिसे गुरु के साथ प्राणों से प्राण जोड़ने की क्रिया आती हो । वह गुरु के शरीर का ही अंग होता है गुरु से अलग.नहीं होता है।

        चौबीस घण्टे शरीर के पास रहने वाला अंगर वह प्राणों से नहीं जुड़ा तो वह शिष्य नहीं बन सकता। शिष्य तो राजहंस बनने की एक क्रिया है। शिष्य के बारे में विस्तार से फिर कभी लिखूंगा। अगर परम गुरु कृपा होती है तो गुरु के पूर्ण जीवन में अच्छे दो चार शिष्य आते हैं, जिन्हें अंगुलियों पर गिना जा सकता है बाकी सभी साधक होते हैं, फोलोअर्स होते हैं, उनमें से कुछ जिज्ञासु होते हैं कुछ आलोचक भी होते हैं खैर इस विषय में बाद में लिखूंगा।

         "सिद्धियाँ कैसे प्राप्त की जायें ? देवी कृपा कैसे प्राप्त की जायें ? किन प्रयत्नों से किन सूत्रों से। इसके लिए आवश्यक है कि आपके जीवन में कोई पथ प्रदर्शक हो, कोई मार्गदर्शक हो, जो इस रास्ते पर चल चुका हो या चल चुकी हो, जिसने जीवन में पूर्ण गुरु कृपा प्राप्त की हो एवं देवी कृपा प्राप्त की हो, देवी देवताओं से साक्षात्कार किया हो निरंतर गुरु से मार्गदर्शन मिला हो और साक्षात्कार हुआ हो। वह मार्ग है श्रृद्धा, प्रेम और पूर्ण समर्पण का। इसमें सबसे पहली बात तो यह है कि समर्पण और प्रेम तो सभी करते हैं, न्यौछावर तो बहुत कम करते हैं। वह बहुत किस्मत वाले होते हैं। उनके भाग्य से सम्पूर्ण ब्रह्माण्डीय शक्ति ईष्यां करने लगती है, जिन्हें पूर्ण गुरु कृपा प्राप्त हुई हो। यह सब कुछ प्राप्त हो सकता है साधनाओं में सफलता, सिद्धियाँ सम्पूर्णता का मार्ग गुरु कृपा और देवी कृपा के माध्यम से पर आज कल सही गुरु कौन है ? इसकी पहचान कैसे करें ? गुरु को पहचानने की सरल एक ही क्रिया है। केवल जिनके पास बैठने मात्र से अपूर्व शांति का अनुभव हो, मन में असीम आनंद का अनुभव हो,जिनके पास बैठने से ऐसा लगे कि इनके बिना यह जीवन व्यर्थ है, जीवन का कोई मतलब नहीं है। जब ऐसे भाव आये तभी दीक्षा लेनी चाहिए।

         आप सब देवी कृपा या साधना प्राप्त करना चाहते हो, आप सब जो प्रयत्न करते हो वह सब तो ऊपरी सतह के हैं। सिद्धि तो गहराई में डुबकी लगाने से प्राप्त होती हैं जो लोग गहराई में डुबकी लगाने को तैयार रहते हैं, जो चैलेंज का भाव लेकर जीते हैं, जीवन को एक चैलेंज मान लेते हैं वही लोग गहराई में जाकर हीरे-मोती ले आते हैं।

          तांत्रिक ग्रंथों, वेदों में दो टुक शब्दों में स्पष्ट लिखा-
नारी त्रैलोक्य जननी, नारी त्रैलोक्य रूपिणी ।
नारी त्रिभुवन धारा, नारी देह स्वरूपिणी ॥
शंकरोपनिषद में भगवान शंकर ने स्वयं कहा है नारी के समान न सुख है, न गति है, न भाग्य हैं, न राज है, न तीर्थ है और न भोग है, न जय है, न मंत्र है, न धन है। वही संसार में पूजनीय देवता है क्योंकि वह पार्वती का रूप है, नारी शक्ति हैं, नारी ही एकमात्र पूर्णत्व है परन्तु जहाँ नारी कोमल है वही दूसरी और प्रचण्ड भी है, वह उग्र स्वरूपा महाकाली भी है, छिन्नमस्ता और बगलामुखी भी है, वही नारीत्व त्रिपुरसुन्दरी भी हैं जिनकी आज्ञा के बिना इस ब्रह्माण्ड का और तीनों लोकों का एक भी पत्ता नहीं हिल सकता है। तीनों लोकों में उन्हीं की सत्ता चलती हैं, उनके सामने ब्रह्मा विष्णु को भी नारी बनकर जाना पड़ता है दूसरी और नारी एक माँ भी है, नारी के अंदर एक सम्पूर्ण सिमट कर उनके शरीर में पल सकता है। बुद्ध, महावीर, कृष्ण, राम, निखिलेश्वरानंद, रामकृष्ण परमहंस उत्पन्न कर संसार में भेज सकती हैं। जीवन की इस चेतना को प्राप्त करने के लिए पुरुष को भी अपने अंदर इन गुणों का विकास करना पड़ेगा। जो लोग इस छोर तक पहुँचना चाहते हैं, जो महात्रिपुर सुन्दरी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, जीवन में पूर्णता प्राप्त करना चाहते हैं, जिसको गुरुत्व कहा गया है, ईश्वरत्व कहा गया है जिसे ब्रह्मत्व कहा गया है, 
        जिसे अपने आप में सम्पूर्ण कहा गया है। उस सम्पूर्णता को प्राप्त करने के लिए अपने अंदर इस भाव को पैदा करना होगा, जो स्त्रीत्व का भाव है। मेरे कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि नारी के माध्यम से ही गुरु या ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है अपितु मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि ईश्वर या गुरु तक पहुँचने के लिए जिन गुणों की आवश्यकता होती है उसे नारी से सीखा जा सकता है। गुरु को या ईश्वर को अपने हृदय में समाहित करने के लिए जो भाव और चिंतन चाहिए वह भाव है श्रृद्धा, प्रेम, समर्पण और त्याग का। जो लोग स्त्रीत्व को नहीं समझ पायेंगे उस भाव को, उस चेतना को, उस सृजन को अपने अंदर समाहित भी नहीं कर पायेंगे। यदि सृजन की क्रिया नहीं है तो जीवन समाप्त, जीवन का अर्थ है निरंतर गतिशील होने की क्रिया है। नारीत्व ही पूर्णत्व है। जो रूखे हैं, संन्यासी हैं, जंगलों में भटकते रहते हैं, वह अपने आप में अक्खड़ हो जाते हैं। जिनमें लोच नहीं है, जिनके अंदर श्रृद्धा, प्रेम, विश्वास और स्नेह इत्यादि का विकास नहीं हुआ है तो जीवन में भटकाव होता है और.भटकाव गुरुत्व नहीं दे सकता, ईश्वर प्राप्ती का संदेश नहीं दे सकता क्योंकि कठोर बनकर कभी भी ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता है, आँख मूंदकर, पालथी मारकर प्रभु का दर्शन नहीं किया जा सकता। उस दिव्य दर्शन को करने के लिए मन में एक कोमल बिन्दु की भावना होना चाहिए क्योंकि हृदय का विस्फोटन नारी बनकर ही किया जा सकता है।

ॐ घृणिः सूर्य आदित्योम् ।।

इस अनंत ब्रह्माण्ड में हमारी आकाश गंगा का माप क्या है? आकाश गंगा की सीमाऐं वहीं तक हैं जहाँ तक हमारे आदि देव सूर्य का प्रकाश विद्यमान है। वे ही सम्पूर्ण जगत को दर्शनीय बना रहे हैं। दर्शन ही सूर्य है। जिसे हम देख सकें वहीं दृश्य है। मस्तिष्क में उठती विभिन्न विचारधाराऐं, विभिन्न चिंतन इत्यादि सूर्य की विशेष स्थिति का परिचायक है। दृश्य सार्वभौमिक है परन्तु व्यक्ति सार्वभौमिक नहीं है एवं व्यक्ति की सोच भी सार्वभौमिक नहीं है। वह सदैव कुछ निश्चित आयामों में ही सोचता है इसलिए वह ईश्वर नहीं हैं। सार्वभौमिक ब्रह्माण्डीय सोच के मूल में सूर्य हैं। वे ही इस ब्रह्माण्ड के समस्त पिण्डों को एक सूत्र में पिरोये हुए हैं। सभी दृश्य, सभी विचारधाराऐं, सभी तत्वों का उत्सर्जन केन्द्र एकमात्र सूर्य है। वे ही पंजीकृत कर रहे हैं विभिन्न तत्वों की सूक्ष्म आवृत्तियों को उनके द्वारा उत्सर्जित पंचभूतों की विभिन्न आवृत्तियाँ सूर्य के दिव्यतम तेज प्राण द्वारा एक निश्चित योजना के तहत पंजीकृत हो जीव के रूप में क्षणिक काल के लिए इस पृथ्वी पर प्रकट होती हैं। 

      आदि देव का तात्पर्य है वह महाशक्ति जिसने कि अपने अंदर समस्त आदि क्रियाओं को समेट रखा हो।सूर्य का तापमान इतना है कि हम कल्पना भी नहीं कर सकते।उनके क्षेत्र में विकिरण,विखण्डन,नाभिकीय विस्फोट एवं परमाणविक संयोजन की क्रियाऐं अत्यंत ही विराट से विराट स्वरूप में एवं सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थिति में सम्पन्न होती हैं। इन सभी देव दुर्लभ क्रियाओं के मध्य में प्रभु श्रीकृष्ण की पराचेतना ही मूल बिन्दु है। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं गीता में कहा है कि सूर्य में विद्यमान तेज मैं ही हूँ। आप सोचते हैं कि पृथ्वी पर स्वर्ण,रजत,लौह इत्यादि खनिज उत्पन्न होते हैं। यह तर्क पूर्णत: मिथ्या है। पृथ्वी पर कुछ भी उत्पन्न नहीं होता बल्कि सूर्य रश्मियों के द्वारा अति सूक्ष्मतम स्वर्ण, रजत, लोह इत्यादि जैसे खनिज पृथ्वी पर आते हैं हम तो उन्हें केवल सोखते हैं,एकत्रित करते हैं।

       वैज्ञानिकों ने इस सत्य को परखने के लिए विशुद्ध पारे से बनी हुई एक फिल्म प्लेट अमेरिका की उन पहाड़ियों पर स्थापित कर दी जहाँ पर कि सूर्य की किरणें सबसे ज्यादा स्वर्णिम आभा बिखेरती हैं। पारद में यह विशेषता है कि वह स्वर्ण को आकर्षित कर लेता है। उसमें स्वर्ण को आकर्षित करने की चुम्बकीय शक्ति है। दूसरे दिन जब पारे की बनी हुई फिल्म का शोधन किया गया तो वैज्ञानिकों ने विशुद्धतम स्वर्ण की प्राप्ति की। यह है आर्य ऋषियों द्वारा स्थापित पारद कला का प्रमाण हम विशेष रासायनिक घोल से बनी एक फिल्म के ऊपर स्वयं की आकृति कैद कर लेते हैं। यह भी सूर्य की रश्मियाँ सम्पन्न कर देती हैं। जब मनुष्य की आकृति सूर्य रश्मियों के द्वारा हूबहू उतारी जा सकती है तो फिर स्वर्ण को भी शोषित किया जा सकता है पारद विज्ञान के द्वारा अभी वैज्ञानिक सिद्धांतों का संशोधन करना होगा। मैंने अपने जीवन में एक सूर्य साधक के रूप में सूर्य के अनेकों स्वरूप देखे हैं और यह मेरा सौभाग्य है। मकर रेखा के बाद स्थित यूरोपीय देशों में विशेषकर स्वीडन में तो रात्रि को १२ बजे भी सूर्य के दर्शन हो जाते हैं। कुछ पाश्चात्य देशों में तीन घण्टे की रात होती है। कहीं-कहीं तो सम्पूर्ण रात्रि मे मात्र एक घण्टे के लिए ही सूर्यदेव अस्त होते हैं। 

       हर जगह इनके स्वरूप विलक्षण हैं।इन्हीं स्वरूपों के कारण प्रत्येक स्थान पर विशेष प्रकार के जीव एवं मनुष्य विशेष योग्यताओं से युक्त होते हैं। पाश्चात्य देशों में सूर्य के दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। जब वहाँ पर सूर्य उगते हैं तो एक प्रकार से उत्सव का माहौल छा जाता है। हमारे देश में सूर्य की स्थिति अत्यंत ही विलक्षण है। हमारे देश में कई स्थानों से कर्क रेखा गुजरती है इसी कारण अनंत प्रकार की दुर्लभ वनस्पतियाँ, जीव-जंतु इत्यादि यहाँ पर विराजमान है। सूर्य देव की महिमा को समझना है तो फिर उनके अनंत स्वरूपों में पृथ्वी पर प्रकट होने वाली घटनाओं का साक्षी होना पड़ेगा।मनुष्य को अपने जीवन में एक न एक बार सम्पूर्ण पृथ्वी का भ्रमण करना चाहिए जिससे कि वह सूर्य देव की विभिन्न भाव-भंगिमाओं का साक्षी हो सके एवं उनके द्वारा उत्पन्न विभिन्न परिणामों को सम्यक भाव से स्थान विशेष पर निवास करने वाले प्राणियों में दर्शन कर सके।यही दर्शन शास्त्र में निपुणता हासिल करने की कला है।दृश्य ही सीमित हो जायेंगे तो स्वयं आपका दर्शन सीमित हो जायेगा। 

      दृष्टि से ही मनुष्य के अंदर दर्शन की विराटता आती है। दृष्टांत रूपी व्यक्तित्व तभी विकसित होगा जब हमारी दृष्टि ज्यादा से ज्यादा दृश्यों को ग्रहण करेगी। जड़ और चेतन बुद्धि में यही फर्क है। जड़ बुद्धि का मनुष्य एक ही तरह के दृश्यों को देखने का आदी हो गया होता है जबकि चेतन बुद्धि से युक्त मनुष्य निरंतर चलायमान

होता है।प्रत्येक तल पर स्थूलता और सूक्ष्मता दोनों ही भगवान भास्कर के अधीन हैं।इन दोनों के समिश्रण से ही ज्योतिर्विज्ञान का जन्म होता है कालान्तर इसी ज्योतिर्विज्ञान का अपभ्रंश स्वरूप हैं ज्योतिष विद्या ज्योतिर्विज्ञान के मध्य में सूर्य है। यह समस्त ज्योतियों को समझने की कला है। स्थूल ज्योतियाँ आप ग्रह, पिण्डों, नक्षत्रों एवं ताराग्रहों के रूप में देखते हैं परन्तु परा सूक्ष्म ज्योतियों के दर्शन अंतर्चक्षु के द्वारा ही सम्भव हो पाते हैं। जब तक भगवान भास्कर की कृपा नहीं होगी अंतर्चक्षु विकसित नहीं होंगे।यह है चाक्षुषी विद्या यही कारण है कि ज्योतिष को गणित समझने वाले अधिकांशत: भविष्यवक्ताओं की भविष्य वाणियाँ निष्फल हो जाती है।
अंक गणित, सिद्धांत और फार्मूला बाजी मात्र एकांश है ज्योतिष शास्त्र का परन्तु वास्तविक काल दृष्टा वही साधक हो सकता है जो कि परा सूक्ष्म एवं परा सत्य संदेशों की कूट भाषा को भगवान भास्कर की कृपा स्वरूप पढ़ सके।यही एक सफल ज्योतिषी की व्याख्या है। 

      भगवान भास्कर के पराचंतन, परातत्वीय स्वरूप से ही प्राण शक्ति का उत्पादन होता है। जब जब प्राण शक्ति को एक कोने में रखकर ज्योतिषी बनने की कोशिश करोगे निष्फल हो जाओगे। यज्ञ विधान को समझना होगा।मंत्र विद्या एवं तंत्र विद्या की सूक्ष्मता में जाना होगा। यही कुछ ऐसे मार्ग हैं जिनके द्वारा आप भगवान भास्कर के तेज में से मनोवांछित फल की प्राप्ति कर सकते हैं। मनोवांछित फल रस के समान हैं। आपको सूर्य रश्मियों में से रस का शोधन करना होगा। सम्पूर्ण रसों के एकमात्र जनक सूर्य ही हैं। वे ही रस स्वरूप वर्षा जल को अपनी रश्मियों के द्वारा समुद्र में से निकाल लेते हैं और पुन: देव दार वृक्षों से आच्छादित हिम शिखरों पर टपका देते हैं। जिन पर्वतों पर देवदार के वृक्ष होते हैं वहाँ मौसम सदाबहार होता है। इन वृक्षों में प्रतिक्षण सूर्य रश्मियों में से अमृत जल को ग्रहण करने की क्षमता होती है। आज के तथाकथित पढ़े लिखे लोग यज्ञ,अनुष्ठान,पूजा-अर्चना एवं मंत्र इत्यादि को ढोंग मानते हैं इसलिए वे सबसे ज्यादा व्यथित हैं।वास्तव में ये सब विद्याएँ सूक्ष्मतम रूप से इस ब्रह्माण्ड में मौजूद सभी तत्वों की आवृनियों को ग्रहण करने की कला है अब तो वैज्ञानिक भी कहने लगे हैं कि सूर्य किरणों में विटामिन्स हैं,खनिज तत्व हैं,लवण हैं इत्यादि इत्यादि। 

           अन्नमय कोष को जो स्थूल पदार्थ पुष्ट करते हैं उन्हीं स्थूल पदार्थों की परा सूक्ष्मतम आवृत्तियों की शरीर के विभिन्न तलों को आवश्यकता होती है।जर्मन वैज्ञानिकों ने इस पर गूढ़तम खोज की एवं हैनिमन ने इसी विद्या को होम्योपैथी का नाम दिया। चिकित्सा जगत में अद्भुत क्रांति आ गई कठिन से कठिन रोग भी बिना चीर-फाड़ के चमत्कारिक ढंग से ठीक होने लगे। करोड़ों-अरबों जनमानस इसका साक्षी है। ऐसा ही किया एक जर्मन वैज्ञानिक अलबर्ट आइसटाईन ने।उसने भी भारतीय वेद दर्शन का गूढ़ अध्ययन किया एवं अणु बम का निर्माण किया। 

         विशेष ब्रह्माण्डीय एवं खगोलीय स्थितियों पर विशेष अनुष्ठान से चमत्कारिक लाभ मिलते हैं।सूर्य की कुछ विशेष स्थितियाँ सौ वर्षों में एक बार निर्मित होती हैं इन सबका साधक को लाभ उठाना चाहिए।साधक यह लाभ तभी उठा सकता है जब वह सक्षम गुरु के सानिध्य में हो गुरु के प्रति उसकी श्रद्धा से ही साधक विलक्षण शक्ति प्राप्त कर पाता है। संशय असंशय से ग्रसित साधक कहीं का नहीं रहता।समय के नियंता भगवान भास्कर हैं।समय उन्हीं का परिणाम है।वे कितनी गति से घूमते हैं, कितना प्रकाश उत्सर्जित करते हैं,किस प्रकार से ग्रह एवं पिण्ड उनकी परिक्रमा करते हैं बस यही समय के निर्माण का कारण है। समय का उन्हीं में विलोप हो जाता है।पदार्थ समय के अधीन है। स्थूल तल पर समय की परिभाषा कुछ और है तो वहीं सूक्ष्मतम तलों पर समय की परिभाषा सर्वथा भिन्न है।साधनाऐं स्थूल तलों का विषय नहीं हैं अत: इनको सूक्ष्मतम तलों पर होने वाले समय के माप से ही मापना पड़ेगा।विशेष सौर स्थिति में विशेष ब्रह्माण्डीय द्वार खुलते हैं। स्थान विशेष पर विशेष सूर्य द्वारों की मौजूदगी होती है। इन द्वारों से ही मनोवांछित रस को ग्रहण किया जाता है। सभी मंत्र एक विशेष प्रकार की ऊर्जा का उत्पादन करते हैं जिससे कि आध्यात्मिक तल पर मौजूद विशेष शक्ति केन्द्र के द्वार खुलते हैं। मंत्र शक्ति एक तरह से कुंजी है शक्ति स्थलों को खोलने की। प्रत्येक गुरु चाहता है कि उसके शिष्य की रात्रि सुखमय हो। वह चैन की नींद सोये, यह तभी सम्भव है जब उसका शिष्य श्री युक्त हो, रोग मुक्त हो, जीवन सुखमय हो एवं वह शत्रुबाधा और विपत्तियों से मुक्त हो। इन सबसे मुक्ति पाने के रहस्य सूर्य साधना में छिपे हुए हैं। अतः प्रत्येक साधक को अवश्य ही सूर्य उपासना सम्पन्न करनी चाहिए। गुरु भी सूर्य का ही स्वरूप है अपने शिष्यों के लिए।

सम्पुटिक श्रीसूक्त क्या है ?

यह सूक्त तीनसौ गुना फलदेने वाला है क्युकी इस श्रीसूक्त को 
दुर्गासप्तशती के चतुर्थ अध्याय के "दुर्गे स्मृता हरसि" मंत्र के साथ लक्ष्मी जी का मूल सत्ताईस अक्षरों वाला मंत्र 
"ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः" इस मंत्र के साथ श्रीसूक्त के हर एक मन्त्र को सम्पुटित किया गया है इसलिये इस सूक्त की शक्ति तीनसौ गुना बढ़ जाती है | 
इस सूक्त की खासियत यह है की इसमें नाही विनियोग-न्यास-संकल्प आदि करने की जरुरत है यह सिर्फ पाठ करने मात्र से ही फल देने लगता है | अगर आप ज्यादा दरिद्रता से झूझ रहे हो तो प्रतिदिन ९ पाठ करे | पूर्ण श्रद्धा भक्ति युक्त करे | 
अवश्य फल देंगा | 

|| साम्पुटिक श्रीसूक्त पाठ || 

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्ण रजतस्रजां | 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह || 

दारिद्रदुखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसिभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभं ददासि | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं | 
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहं ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसीभीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधिनीं | 
श्रियं देवी मुपह्वये श्रीर्मा देवी जुषतां || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं | 
पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहो पह्वये श्रियं || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियम लोके देवजुष्टामुदारां | 
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ आदित्यवर्णे तपसोधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोथबिल्वः | 
तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायान्त रायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह | 
प्रादुर्भूतो सुराष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु में || 

दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहं | 
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद में गृहात ||. 
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करिषिणिं | 
ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियं ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि | 
पशूनां रूप मन्नस्य मयी श्रीः श्रयतां यशः ||

दरिद्र्यदुःखभयहरिणी का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ कर्दमेन प्रजा भूता मयी संभव कर्दम | 
श्रियं वासय में कुले मातरं पद्ममालिनीं ||

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकारण्य सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस् में गृहे |
नि च देविं मातरं श्रियं वासय में कुले || 

दरिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्दचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ आर्द्रां यः करिणिं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीं | 
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ||
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ आर्द्रां पुष्करिणिं पुष्टिं पिंगलां पद्ममालिनीं | 
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह || 
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीं | 
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योश्वान विन्देयं पुरुषानहं | 

 दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | 
ॐ यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहयादाज्यमन्वहं | 
सूक्तं पञ्चदशर्चं च श्री कामः सततं जपेत || 

दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता | 
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः | 
ॐ दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि | | 
|| श्री महालक्ष्मयार्पणं अस्तु ||