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वास्तु पुरुष का प्रादुर्भाव एवं पूजन विधि-

वास्तु शास्त्र का परिचय एवं वास्तु पुरुष के प्रादुर्भाव के संबंध में जानकारी हमें प्राचीनतम ग्रंथों, वेदों और पुराणों में विस्तार से मिलती है।

‘मत्स्य पुराण’, ‘भविष्य पुराण’ ‘स्कंद पुराण’ गरुड़ पुराण इत्यादि पुराणों का अध्ययन करने पर ज्ञात होता है कि ‘वास्तु’ के प्रादुर्भाव की कथा अत्यंत प्राचीन है।

इस लेख में कि वास्तु पुरूष का प्रादुर्भाव कैसे हुआ, क्यों उनकी पूजा की जानी चाहिए तथा उनकी पूजा की उपयुक्त विधि क्या है?
मत्स्य पुराण के अनुसार मत्स्य रूपधारी भगवान विष्णु ने सर्वप्रथम मनु के समक्ष वास्तु शास्त्र को प्रकट किया था, तदनंतर उनके उसी उपदेश को सूत जी ने अन्य ऋषियों के समक्ष प्रकट किया।

इसके अतिरिक्त ‘भृगु’, वशिष्ठ, विश्वकर्मा, माय, नारद, नग्नजित, भगवान शिव, इंद्र, ब्रह्मा, कुमार, नंदीश्वर, शौनक, गर्ग, वासुदेव, अनिरुद्ध, शुक्र तथा बृहस्पति- ये अठारह वास्तु शास्त्र के उपदेष्टा माने गये हैं।

‘मत्स्य पुराण’ के अनुसार प्राचीन काल में भयंकर अंधकासुर वध के समय विकराल रूपधारी भगवान शंकर के ललाट से पृथ्वी पर उनके स्वेद बिंदु गिरे थे, उससे एक भीषण एवं विकराल मुख वाला प्राणी उत्पन हुआ। वह पृथ्वी पर गिरे हुए अंधकों के रक्त का पान करने लगा, रक्त पान करने पर भी जब वह तृप्त न हुआ, तो वह भगवान शंकर के सम्मुख अत्यंत घोर तपस्या में संलग्न हो गया।

जब वह भूख से व्याकुल हुआ तो पुनः त्रिलोकी का भक्षण करने के लिए उद्यत हुआ। तब उसकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवान शंकर उससे बोले- ‘निष्पाप तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारी जो अभिलाषा है, वह वर मांग लो।’’ तब उस प्राणी ने शिवजी से कहा- देवदेवेश मैं तीनों लोकों को ग्रस लेने के लिए समर्थ होना चाहता हूं।

इस पर त्रिशूल धारी ने कहा-’’ ऐसा ही होगा, फिर तो वह प्राणी शिवजी के वरदान स्वरूप अपने विशाल शरीर से स्वर्ग, संपूर्ण भूमंडल और आकाश को अवरुद्ध करता हुआ पृथ्वी पर आ गिरा।

तब भयभीत हुए देवता और ब्रह्मा, शिव, दैत्यों और राक्षसों द्वारा वह स्तंभित कर दिया गया। उसे वहीं पर औंधे मुंह गिराकर सभी देवता उस पर विराजमान हो गये।

इस प्रकार सभी देवताओं के द्वारा उसपर निवास करने के कारण वह पुरुष ‘वास$तु= ‘वास्तु’ नाम से विख्यात हुआ।

तब उस दबे हुए प्राणी ने देवताओं से निवेदन किया- ‘‘देवगण आप लोग मुझ पर प्रसन्न हों, आप लोगों द्वारा दबाकर मैं निश्चल बना दिया गया हूं, भला इस प्रकार अवरुद्ध कर दिये जाने पर नीचे मुख किये मैं कब तक और किस तरह स्थित रह सकूंगा।

उसके ऐसा निवेदन करने पर ब्रह्मा आदि देवताओं ने कहा- वास्तु के प्रसंग में तथा वैश्वेदेव के अंत में जो बलि दी जायेगी वह तुम्हारा आहार होगा।

आज से वास्तु शांति के लिए जो- यज्ञ होगा वह भी तुम्हारा आहार होगा, निश्चय ही यज्ञोत्सव में दी गई बलि भी तुम्हें आहार रूप में प्राप्त होगी। गृह निर्माण से पूर्व जो व्यक्ति वास्तु पूजा नहीं करेंगे अथवा उनके द्वारा अज्ञानता से किया गया यज्ञ भी तुम्हें आहार स्वरूप प्राप्त होगा।

ऐसा कहने पर वह (अंधकासुर) वास्तु नामक प्राणी प्रसन्न हो गया। इसी कारण तभी से जीवन में शांति के लिए वास्तु पूजा का आरंभ हुआ।

वास्तु मण्डल का निर्माण एवं वास्तु-पूजन विधि: उतम भूमि के चयन के लिए तथा वास्तु मण्डल के निर्माण के लिए सर्वप्रथम भूमि पर अंकुरों का रोपण कर भूमि की परीक्षा कर लें, तदनंतर उतम भूमि के मध्य में वास्तु मण्डल का निर्माण करें।

वास्तु मण्डल के देवता 45 हैं, उनके नाम इस प्रकार हैं-

1. शिखी 2. पर्जन्य 3. जयंत 4. कुलिशायुध 5. सूर्य 6. सत्य 7. वृष 8. आकश 9. वायु 10. पूषा 11. वितथ 12. गहु 13. यम 14. गध्ंर्व 15. मगृ राज 16. मृग 17. पितृगण 18. दौवारिक 19. सुग्रीव 20. पुष्प दंत 21. वरुण 22. असुर 23. पशु 24. पाश 25. रोग 26. अहि 27. मोक्ष 28. भल्लाट 29. सामे 30. सर्प 31. अदिति 32. दिति 33. अप 34. सावित्र 35. जय 36. रुद्र 37. अर्यमा 38. सविता 39. विवस्वान् 40. बिबुधाधिप 41. मित्र 42. राजपक्ष्मा 43. पृथ्वी धर 44. आपवत्स 45. ब्रह्मा।

इन 45 देवताओं के साथ वास्तु मण्डल के बाहर ईशान कोण में चर की, अग्नि कोण में विदारी, नैत्य कोण में पूतना तथा वायव्य कोण में पाप राक्षसी की स्थापना करनी चाहिए।

मण्डल के पूर्व में स्कंद, दक्षिण में अर्यमा, पश्चिम में जृम्भक तथा उतर में पिलिपिच्छ की स्थापना करनी चाहिए।इस प्रकार वास्तु मण्डल में 53 देवी-देवताओं की स्थापना होती है। इन सभी का विधि से पूजन करना चाहिए।

मंडल के बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओं में दस दिक्पाल देवताओं की स्थापना होती है। इन सभी का विधि से पूजन करना चाहिए।

मंडल के बाहर ही पूर्वादि दस दिशाओं में दस दिक्पाल देवताओं- इंद्र, अग्नि, यम, निऋृति, वरुण, वायु, कुबेर,
ईशान, ब्रह्मा तथा अनंत की यथास्थान पूजा कर उन्हें नैवेद्य निवेदित करना चाहिए। वास्तु मंडल की रेखाएं श्वेतवर्ण से तथा मध्य में कमल रक्त वर्ण से निर्मित करना चाहिए। शिखी आदि 45 देवताओं के कोष्ठकों को रक्तवर्ण से अनुरंजित करना चाहिए।

पवित्र स्थान पर लिपी-पुती डेढ़ हाथ के प्रमाण की भूमि पर पूर्व से पश्चिम तथा उतर से दक्षिण दस-दस रेखाएं खींचें। इससे 81 कोष्ठकों के वास्तुपद चक्र का निर्माण होगा।

इसी प्रकार 9-9 रेखाएं खींचने से 64 पदों का वास्तुचक्र बनता है।

वास्तु मण्डल के पूर्व लिखित 45 देवताओं के पूजन के मंत्र इस प्रकार हैं-

ऊँ शिख्यै नमः, ऊँ पर्जन्यै नमः, ऊँ जयंताय नमः, ऊँ कुलिशयुधाय नमः, ऊँ सूर्याय नमः, ऊँ सत्याय नमः, ऊँ भृशसे नमः, ऊँ आकाशाय नमः, ऊँ वायवे नमः, ऊँ पूषाय नमः, ऊँ वितथाय नमः, ऊँ गुहाय नमः, ऊँ यमाय नमः, ऊँ गन्धर्वाय नमः, ऊँ भृंग राजाय नमः,, ऊँ मृगाय नमः, ऊँ पित्रौ नमः, ऊँ दौवारिकाय नमः, ऊँ सुग्रीवाय नमः, ऊँ पुष्पदंताय नमः, ऊँ वरुणाय नमः, ऊँ असुराय नमः, ऊँ शेकाय नमः, ऊँ पापहाराय नमः, ऊँ रोग हाराय नमः, ऊँ अदियै नमः, ऊँ मुख्यै नमः, ऊँ भल्लाराय नमः, ऊँ सोमाय नमः, ऊँ सर्पाय नमः, ऊँ अदितयै नमः, ऊँ दितै नमः, ऊँ आप्ये नमः, ऊँ सावित्रे नमः, ऊँ जयाय नमः, ऊँ रुद्राय नमः, ऊँ अर्यमाय नमः, ऊँ सवितौय नमः, ऊँ विवस्वते नमः, ऊँ बिबुधाधिपाय नमः, ऊँ मित्राय नमः, ऊँ राजयक्ष्मै नमः, ऊँ पृथ्वी धराय नमः, ऊँ आपवत्साय नमः, ऊँ ब्रह्माय नमः।

इन मंत्रों द्वारा वास्तु देवताओं का विधिवत पूजन हवन करने के पश्चात् ब्राह्मण को दान दक्षिणा देकर संतुष्ट करना चाहिए।

तदनंतर वास्तु मण्डल, वास्तु कुंड, वास्तु वेदी का निर्माण कर मण्डल के ईशान कोण में कलश स्थापित कर गणेश जी एवं कुंड के मध्य में विष्णु जी, दिक्पाल, ब्रह्मा आदि का विधिवत पूजन करना चाहिए। अंत में वास्तु पुरुष का ध्यान निम्न मंत्र द्वारा करते हुए उन्हें अघ्र्य, पाद्य, आसन, धूप आदि समर्पित करना चाहिए।

वास्तु पुरुष का मंत्र:

वास्तोष्पते प्रति जानीहृस्मान्त्स्वावेशो अनमीवो भवान्। यत् त्वेमहे प्रति तन्नो जुषस्वं शं नो’’ भव द्विपेद शं चतुषपदे।।

कलश पूजन: वास्तु पूजन में किसी विद्वान ब्राह्मण द्वारा कलश स्थापना एवं कलश पूजन अवश्य करवाना चाहिए। कलश में जल भरकर नदी संगम की मिट्टी, कुछ वनस्पतियां तथा जौ और तिल छोड़ें। नीम अथवा आम्र पल्लवों से कलश के कंठ का परिवेष्टन करें। उसके ऊपर श्रीफल की स्थापना करें। कलश का स्पर्श करते हुए (मन में ऐसी भावना करें कि उसमें सभी पवित्र तीर्थों का जल है) उसका आवाहन पूजन करें।

अपनी सामथ्र्य के अनुसार वास्तु मंत्र का जाप करें तत्पश्चात् ब्राह्मण और गृहस्थ मिलकर अपने घर में उस जल से अभिषेक करें।

हवन एवं पूर्णाहुति देकर सूर्य देव को भी अघ्र्य प्रदान करें, अंत में ब्राह्मण को सुस्वादु, मीठा, उतम भोजन कराकर, दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद ग्रहण कर घर में प्रवेश करें और स्वयं भी बंधु-बांधवों के साथ भोजन करें।

इस प्रकार जो व्यक्ति वास्तु पूजन कर अपने नवनिर्मित गृह में निवास करता है उसे अमरत्व प्राप्त होता है तथा उसके गृहस्थ एवं पारिवारिक जीवन में रोग, कष्ट, भय, बाधा, असफलता इत्यादि का प्रवेश नहीं होता है तथा ऐसे गृह में निवास करने वाले प्राणी प्राकृतिक एवं दैवीय आपदाओं तथा उपद्रवों से सदा बचे रहते हैं और ‘वास्तु पुरुष’ एवं वास्तु देवताओं की कृपा से उनका सदैव कल्याण ही होता है।

2-वास्तुदेव की तीन विशेषताएं होती हैं : -

चर वास्तु :

इसमें वास्तु पुरुष की नजर या रुख
· भाद्रपद ( अगस्त, सितम्बर ), आश्विन तथा कार्तिक ( अक्टूबर , नवम्बर ) महीनों के अवधि में वास्तु पुरुष की नजर या रुख दक्षिण की ओर होता है |
· मार्गशीर्ष (नवम्बर- दिसंबर ), पौष ( दिसंबर – जनवरी ), और माघ (जनवरी-फरवरी ) महीनों में वास्तु पुरुष की नजर या रुख पश्चिम की ओर होता है |
· फाल्गुन (फरवरी – मार्च ), चैत्र (मार्च – अप्रैल ), और वैशाख (अप्रैल – मई ) महीनों में वास्तु पुरुष की नजर या रुख उत्तर की ओर होता है |
· ज्येष्ठ (मई – जून ), आषाढ़ (जून – जुलाई ), तथा श्रावण (जुलाई – अगस्त ) महीनों की अवधि में वास्तु पुरुष की नजर या रुख पूर्व की ओर होता है |
· निर्माण कार्य का आरम्भ या शिलान्यास और मुख्य द्वार की स्थापना ऐसे स्थान पर होनी चाहिए जो वास्तुपुरुष की दृष्टी या नजर की ओर हो , ताकि मनुष्य उस मकान में शान्ति और सुख से रह सके |

स्थिर वास्तु :

वास्तु पुरुष का
सिर सदैव :- उत्तर-पूर्व की ओर रहता है
पैर :- दक्षिण – पश्चिम की ओर रहता है
दाहिना हाथ :- उत्तर-पश्चिम की ओर रहता है
बांया हाथ :- दक्षिण – पूर्व की ओर रहता है रहता है
इस बात को ध्यान में रखते हुए मकान का डिजाइन एवं प्लान बनाना चाहिए |

3-वास्तु पुरुष की नजर या नित्य वास्तु :

प्रत्येक दिन
· सुबह प्रथम तीन घंटे - वास्तु पुरुष की दृष्टी अथवा नजर सुबह प्रथम तीन घंटे पूर्व की ओर रहती है|
· इसके पश्चात तीन घंटे दक्षिण की ओर रहती है|
· तथा उसके बाद तीन घंटे पश्चिम की ओर रहती है|
· तथा अंतिम तीन घंटे उत्तर की ओर रहती है|
भवन का निर्माण कार्य इसी प्रकार समयानुसार करना चाहिए |
वास्तु पुरुष की तीन अवसरों पर पूजा अर्चना करनी चाहिये-
· निर्माण कार्य में शिलान्यास करते समय |
· दूसरी बार मुख्य द्ववार लगाते समय |
· तीसरी बार गृह प्रवेश के समय पूजा करनी चाहिये |
· गृह प्रवेश उस समय होना चाहिये जब वास्तुपुरुष की नजर उस ओर हो ये शुभ रहता है |

4-वास्तु में दिशाओं का महत्व एवं क्षेत्र :-

सूर्य जिस दिशामें उदय होता है उस दिशा को पूर्व दिशा कहते हैं एवं जिस दिशा में सूर्य अस्त होता है उस दिशा को पश्चिम दिशा कहते हैं , जब कोई पूर्व दिशा की ओर मुहँ करके खड़ा होता है , उसके बांयी ओर उत्तर दिशा एवं दांयी ओर दक्षिण दिशा होती है |

वह कोण जहाँ दोनों दिशाएँ मिलती हैं वह स्थान अधिक महत्वपूर्ण होता है क्योंकि वह स्थान दोनों दिशाओं से आने वाली शक्तियों को मिलाता है | उत्तर – पूर्वी कोने को ईशान , दक्षिण- पूर्वी कोने को आग्नेय , दक्षिण – पश्चिम कोने को नैरत्य , और उत्तर – पश्चिम कोने को वायव्य कहते हैं |

दिशाओं का महत्व निम्न प्रकार से है :-

· पूर्व - पित्रस्थान , इस दिशा में कोई कोई रोक या रुकावट नहीं होनी चाहिए , क्योंकि यह नर- शिशुओं व् संतति का स्त्रोत है |
· दक्षिण – पूर्व (आग्नेय) : यह स्वास्थ्य का स्त्रोत है , यहाँ अग्नि का वास रसोई आदि का कार्य करना चाहिए|
· दक्षिण - सुख , सम्पन्नता और फसलों का स्त्रोत है
· दक्षिण – पश्चिम ( नैरत्य) : व्यवहार और चरित्र का स्त्रोत है तथा दीर्घ जीवन एवं मृत्यु का कारण|
· पश्चिम- नाम , यश, और सम्पन्नता का स्त्रोत है |
· उत्तर – पश्चिम (वायव्य) :व्यापार , मित्रता, और शत्रुता में परिवर्तन का स्त्रोत |
· उत्तर - माँ का स्थान , यह कन्या शिशुओं का स्त्रोत है , अतः इसमें कोई रूकावट नहीं होनी चाहिये |
· उत्तर – पूर्व (ईशान) : स्वास्थ्य , संपत्ति , नर- शिशुओं , और सम्पन्नता का स्त्रोत है |

5- उपयुक्त भूखंड –

पूर्व मुखी भूखंड - शिक्षा एवं पत्रकारिता तथा फिलोस्फर जैसे लोगों के लिए उपयुक्त रहते हैं तथा हवा व् प्रकाश के लिए भी अच्छे रहते हैं |

उत्तर मुखी भूखंड - सरकारी कर्मचारी , प्रशासन से सम्बंधित कार्यों व् सेना के लोगों के लिए ज्यादा अच्छे रहते हैं |

दक्षिण मुखी भूखंड - ब्यापारिक प्रतिष्ठानों एवं व्यापार के कार्यों तथा धन के लिए अच्छे रहते हैं |

पश्चिम मुखी भूखंड सामाजिक कार्यकर्ताओं के लिए ज्यादा अच्छे रहते हैं |

शिलान्यास करने व् मुख्य द्वार लगाने का शुभ समय :-
· वैशाख शुक्ल पक्ष (अप्रैल – मई ),
· श्रावण मास (जुलाई – अगस्त ),
· मार्गशीर्ष मास (नवम्बर – दिसंबर),
· पौष मास (दिसंबर – जनवरी )
· और फाल्गुन मास (फरवरी – मार्च) महीने शुभ होते हैं
व् अन्य महीने अशुभ माने जाते हैं |

उपरोक्त महीनों के शुक्ल पक्ष की तिथि द्वितीया , पंचमी , सप्तमी, नवमी, एकादशी , त्रयोदशी तिथियों में वार , सोमवार, बुधवार, गुरूवार, शुक्रवार, आदि का दिन होना शुभ रहता है | तथा सूर्य की वृषभ राशी , वृश्चिक राशि , और कुम्भ राशि में सूर्य अनुकूल रहता है |
                 

शिव को क्यों अतिप्रिय रुद्राभिषेक और रुद्राष्टाध्याय ।।

बहुत ही सरल शब्दों में जानें रुद्राष्टाध्यायी किसे कहते हैं ? शिवलिंग का विभिन्न धाराओं से रुद्राभिषेक करने का क्या है का फल; साथ ही शतरुद्रिय, लघुरुद्र, महारुद्र व अतिरुद्र के बारे में जानकारी ।

भगवान शिव के मनभावन श्रावणमास में प्राय: सभी शिवमन्दिरों में रुद्राभिषेक या रुद्री पाठ की बहार देखने को मिलती है । भक्तगण शिवलिंग पर रुद्राध्यायी के मन्त्रों से दूध या जल का अभिषेक करते हैं परन्तु अधिकांश लोगों को यह पता नहीं होता है कि पंडितजी किन मन्त्रों का पाठ कर रहे हैं या उनकी महिमा क्या है ? आज इस पोस्ट में सरल शब्दों में रुद्राष्टाध्यायी और रुद्राभिषेक के बारे बताया गया है ।

वेद में शिव को ‘रुद्र’ कहा गया है क्योंकि वे दु:ख को नष्ट कर देते हैं । वेद में विभिन्न देवों की स्तुति के सूक्त (मन्त्रों का समूह) दिए गए हैं ।

यजुर्वेद की शुक्लयजुर्वेद संहिता में आठ अध्यायों में भगवान रुद्र का विस्तृत वर्णन किया गया है, जिसे ‘रुद्राष्टाध्यायी’ कहते हैं । जिस प्रकार मानव शरीर में हृदय का महत्त्व है, उसी प्रकार भगवान शिव की आराधना में रुद्राष्टाध्यायी अत्यंत ही मूल्यवान है क्योंकि इसके बिना न तो रुद्राभिषेक संभव है और न ही रुद्री पाठ ही किया जा सकता है ।

भगवान शिव को अत्यन्त प्रिय रुद्राभिषेक!!!!!!!

रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रपाठ के साथ जल, दूध, पंचामृत, आमरस, गन्ने का रस, नारियल के जल व गंगाजल आदि से शिवलिंग का जो अभिषेक किया जाता है, उसे ‘रुद्राभिषेक’ कहते हैं ।

रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों द्वारा शिवलिंग के अभिषेक का माहात्म्य
शिवपुराण के अनुसार पवित्र मन, वचन और कर्म द्वारा भगवान शूलपाणि का रुद्राष्टाध्यायी के मन्त्रों से अभिषेक करने से मनुष्य की समस्त कामनाओं की पूर्ति हो जाती है और मृत्यु के बाद वह परम गति को प्राप्त होता है ।

मनोकामना पूर्ति के लिए विभिन्न धाराओं से रुद्राभिषेक का फल
— रोगों की शान्ति के लिए—कुशा लगाकर जलधारा से
— पशुधन की प्राप्ति के लिए—दही की धारा से
— लक्ष्मी की प्राप्ति के लिए—गन्ने के रस से
— जिसकी संतान जीवित न रहती हो उस दम्पत्ति को पुत्र व संतान प्राप्ति के लिए—दूध की धारा से
— वंश के विस्तार के लिए—घी की धारा से
—प्रमेह रोग के नाश के लिए, जड़ता दूर कर बुद्धि प्राप्ति के लिए, संतान के विवाह के लिए व मुकदमें में विजय प्राप्ति के लिए—शक्कर मिले दूध की धारा से
— शत्रु नाश के लिए—चमेली के तेल की धारा से ।

रुद्राष्टाध्यायी के आठ अध्याय हैं!

रुद्राष्टाध्यायी का प्रथम अध्याय ‘शिवसंकल्प सूक्त’ कहा जाता है । इसमें साधक का मन शुभ विचार वाला हो, ऐसी प्रार्थना की गयी है । यह अध्याय गणेशजी का माना जाता है । इस अध्याय का पहला मन्त्र श्रीगणेश का प्रसिद्ध मन्त्र है—‘गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधिनां त्वा निधिपति हवामहे। वसो मम ।।’

रुद्राष्टाध्यायी का द्वितीय अध्याय भगवान विष्णु का माना जाता है । इसमें १६ मन्त्र ‘पुरुष सूक्त’ के हैं जिसके देवता विराट् पुरुष हैं । सभी देवताओं का षोडशोपचार पूजन पुरुष सूक्त के मन्त्रों से ही किया जाता है । इसी अध्याय में लक्ष्मीजी के मन्त्र भी दिए गए हैं ।

तृतीय अध्याय के देवता इन्द्र हैं । इस अध्याय को ‘अप्रतिरथ सूक्त’ कहा जाता है । इसके मन्त्रों के द्वारा इन्द्र की उपासना करने से शत्रुओं और प्रतिद्वन्द्वियों का नाश होता है ।

चौथा अध्याय ‘मैत्र सूक्त’ के नाम से जाना जाता है । इसके मन्त्रों में भगवान मित्र अर्थात् सूर्य का सुन्दर वर्णन व स्तुति की गयी है ।

रुद्राष्टाध्यायी का प्रधान अध्याय पांचवा है । इसमें ६६ मन्त्र हैं । इसको ‘शतरुद्रिय’, ‘रुद्राध्याय’ या ‘रुद्रसूक्त’ कहते हैं ।

शतरुद्रिय यजुर्वेद का वह अंश है, जिसमें रुद्र के सौ या उससे अधिक नाम आए हैं और उनके द्वारा रुद्रदेव की स्तुति की गयी है । रुद्राध्याय के आरम्भ में भगवान रुद्र के बहुत से नाम ‘नमो नम:’ शब्दों से बारम्बार दुहराये जाने के कारण इस भाग का नाम ‘नमकम्’ पड़ा । इसका प्रथम मन्त्र ही कितना सुन्दर है—

ॐ नमस्ते रुद्र मन्यव उतो त इषवे नम:।
बाहुभ्यामुत ते नम: ।।

अर्थ—‘हे रुद्रदेव ! आपके क्रोध को हमारा नमस्कार है । आपके बाणों को हमारा नमस्कार है एवं आपके बाहुओं को हमारा नमस्कार है ।’

इस मन्त्र में दुष्टों के नाश के लिए रुद्र के क्रोध, बाणों और बाहुओं को नमस्कार किया गया है ।

शतरुद्रिय की महिमा को इसी बात से जाना जा सकता है कि एक बार याज्ञवल्क्य ऋषि से शिष्यों ने पूछा—‘किसके जप से अमृत तत्त्व (अमरता) की प्राप्ति होती है ?’ ऋषि ने उत्तर दिया—‘शतरुद्रिय के जप से ।’

रुद्राध्याय में वर्णित भगवान रुद्र के सभी नामों में अमृतत्व प्रदान करने की सामर्थ्य है, इसके पाठ से मनुष्य स्वयं रोगों व पापों से मुक्त होकर मृत्युंजय (अमर) हो जाता है । 

केवल रुद्राध्याय के पाठ से ही वेदपाठ के समान फल की प्राप्ति होती है ।
भगवान रुद्र की शतरुद्रीय उपासना से दु:खों का सब प्रकार से नाश हो जाता है । दु:खों का सर्वथा नाश ही मोक्ष कहलाता है ।

रुद्राष्टाध्यायी के छठे अध्याय को ‘महच्छिर’ कहा जाता है । इसी अध्याय में ‘महामृत्युंजय मन्त्र का उल्लेख है—

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् । त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम् । उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुत: ।।

अर्थ—इस मन्त्र में भगवान त्र्यम्बक शिवजी से प्रार्थना है कि जिस प्रकार ककड़ी का पका फल वृन्त (डाल) से मुक्त हो जाता है, उसी प्रकार हमें आप जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त करें । हम आपका यजन करते हैं ।

सातवें अध्याय को ‘जटा’ कहा जाता है। इस अध्याय के कुछ मन्त्र अन्त्येष्टि-संस्कार में प्रयोग किए जाते हैं ।

आठवे अध्याय को ‘चमकाध्याय’ कहा जाता है । इसमें २९ मन्त्र हैं । भगवान रुद्र से अपनी मनचाही वस्तुओं की प्रार्थना ‘च मे च मे’ अर्थात् ‘यह भी मुझे, यह भी मुझे’ शब्दों की पुनरावृत्ति के साथ की गयी है इसलिए इसका नाम ‘चमकम्’ पड़ा । रुद्राष्टाध्यायी के अंत में शान्त्याध्याय के २४ मन्त्रों में विभिन्न देवताओं से शान्ति की प्रार्थना की गयी है तथा स्वस्ति-प्रार्थनामंत्राध्याय में १२ मन्त्रों में स्वस्ति (मंगल, कल्याण, सुख) प्रार्थना की गयी है ।

रुद्री, लघुरुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र अनुष्ठान!!!!!!!

रुद्राष्टाध्यायी के पांचवें अध्याय रुद्राध्याय की ११ आवृति (एकादश आवर्तन) और शेष अध्याय की एक आवृति के साथ अभिषेक से एक ‘रुद्री’ होती है इसे ‘एकादशिनी’ भी कहते हैं ।

एकादश (११) रुद्री से लघुरुद्र, ११ लघुरुद्र से महारुद्र और ११ महारुद्र (अर्थात् रुद्राध्याय पाठ के १२१ जप) से अतिरुद्र का अनुष्ठान होता है ।

रुद्री, लघुरुद्र, महारुद्र और अतिरुद्र से भगवान शिव का अभिषेक, पाठ व होम किया जाता है ।

‘लघुरुद्र’ से शिवलिंग का अभिषेक करने वाला साधक मुक्ति प्राप्त करता है । 
‘महारुद्र’ के पाठ, जप व होम से दरिद्र व्यक्ति भी भाग्यवान बन जाता है । 
‘अतिरुद्र’ पाठ व जप की कोई तुलना नहीं है । इससे ब्रह्महत्या जैसे पाप भी दूर हो जाते हैं।

सिद्ध महापुरुषों की गुप्त तपस्थलियाँ ---


सिद्धभूमियाँ विशेष एवं रहस्यमय होती हैं। यहाँ की
सत्ता पर देश एवं काल का प्रभाव नहीं पड़ता है।
ये सिद्धों की वासस्थली होती हैं, जिनकी तपस्या की
ऊर्जा से ये भूमियाँ ओत-प्रोत होती हैं। इन भूमियों के
कण-कण में सिद्धों की तपस्या सन्निहित होती है, अत: ये
भूमियाँ सिद्धों की इच्छाओं एवं विचारों से संचालित एवं
परिचालित होती हैं। इस विचित्रता का कारण यह है कि इन भूमियों की स्थिति स्थूल में होकर भी सूक्ष्मसत्ता में होती है।
इन भूमियों की प्रभा एवं आभा दिव्य एवं विशिष्ट होती है।
तपस्वियों के महातप से उनका निवासस्थल दिव्य
एवं सिद्ध बन जाता है। ध्रुवलोक तपस्वी बालक ध्रुव की
तपस्या से ओत-प्रोत है। सुखावती पुरी भगवान बुद्ध की
तपस्या से परिपूर्ण है। ज्ञानगंज का राजराजेश्वरी स्थल भी
सिद्धभूमि माना जाता है। गंगाद्वार से कैलासपर्यंत का
विशाल क्षेत्र सिद्धमंडल है। यमुनोत्तरी से लेकर नंदादेवी
तक का क्षेत्र सिद्धक्षेत्र के नाम से परिचित है। श्रीशैल
पर्वत, नंदा देवी, विंध्यांचल, दक्षिण भारत का अरुणाचलम् पर्वत, बिहार स्थित गुह्यकूट पर्वत सिद्धस्थली कहे जाते हैं। कैलास मानसरोवर तो भगवान शिव की विख्यात तपस्थली है। कैलास को तो धरती का ही नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि का केंद्रबिंदु माना जाता है। सारी सृष्टि उसी केंद्र पर आधारित मानी जाती है।

वाल्मीकि रामायण में ऐसे दिव्य एवं सिद्ध क्षेत्रों का
वर्णन प्रचुरता से आया है। किष्किंधाकांड में उल्लेख
मिलता है कि सीता माता की खोज करते-करते हनुमान
जी एवं वानरगण एक अलौकिक स्थान पर पहुँच गए थे।
इसका नाम था ऋक्षबिल, जो मंत्रशक्ति द्वारा नियोजित था और एक दानव इसकी रक्षा करता था। वह गुफा अत्यंत भयानक एवं रोंगटे खड़े कर देने वाली थी। गुफा में गहन अंधकार था। वानरगण किसी तरह से इस अंधकार को पार करने के बाद जब आगे पहुँचे तो उनको प्रकाश दिखाई दिया। यह प्रकाश स्वर्णिम आभायुक्त था और उसके प्रकाश से लता, वृक्ष, भवन और यहाँ तक कि जलाशय के जलचर भी प्रकाशित हो रहे थे।

हनुमान जी को वहाँ एक तपस्विनी तप करते हुए दिखाई दी। तपस्विनी ने हनुमान जी से कहा कि इस स्थान में प्रवेश करने के बाद यहाँ से अपने प्रयास के बल पर बाहर नहीं जाया जा सकता है। यहाँ के सिद्ध महात्मा ही उन्हें बाहर कर सकते हैं। हनुमान जी के आग्रह पर तपस्विनी ने उनको अपने तपोबल से बाहर निकाला। जब वे बाहर निकले तो समुद्र के पास प्रस्रवण के पर्वत के पास थे; जबकि गुफा में प्रवेश करते समय वे विंध्यपर्वत के नैऋत्य कोण से होते हुए दक्षिण भारत की पर्वतमाला तक पहुँचे थे।
मतंगाश्रम भी इसी प्रकार का दिव्यक्षेत्र था। भगवान
श्रीराम ने वहाँ पर भक्तिमती शवरी से भेंट की थी। उस
दिव्य आश्रम में बहुत सारे ऋषि तपस्यारत थे, परंतु भगवान राम के वनगमन के दस वर्ष पूर्व उच्चस्तरीय लोकों को प्रस्थान कर चुके थे। शबरी श्रीराम को वह स्थल दिखाते हुए कह रही थी कि दस वर्ष पूर्व जो ऋषि स्नान के पश्चात अपने गीले वस्त्र सूखने के लिए फैलाकर छोड़ गए थे, वे अभी तक इसी प्रकार गीले हैं। सिद्धों द्वारा छोड़ी कमल की मालाएँ, कई प्रकार के पुष्प, दूर्वा आदि वैसे ही थे, मुरझाए नहीं थे। इन वस्तुओं से एक विशेष प्रकार की किरणें निकल रही थीं, जो ऋषियों की तपस्या की ऊर्जा से सन्निहित थीं।

महाभारत के वनपर्व में भी ऐसे सिद्ध आश्रमों का उल्लेख मिलता है। दमयंती राजा नल को खोजते-खोजते एक ऐसे वन में चली गई थी, जहाँ का दृश्य अत्यंत मनोरम एवं सुंदर था। उस वन के अंदर एक तपोवन था।
अनेक ऋषि वहाँ तपस्या कर रहे थे। वे वल्कल एवं
मृगछाला धारण किए हुए थे। दमयंती ने जब उनको
प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई तो ऋषियों ने
आशीर्वाद दिया कि महाराज नल निषध प्रदेश पर पुनः
सिंहासनारूढ़ होंगे और तुम्हारे साथ उनका पुनर्मिलन
होगा। इसके पश्चात सभी ऋषिगण उस तपोवन के साथ
अदृश्य हो गए। दमयंती तमाम प्रयासों के बावजूद उस
दिव्य तपोवन का पुनः दर्शन नहीं कर सकी।

महाभारत में आए एक अन्य कथानक के अनुसार,
पांडवों ने भी अपने वनवास काल में महर्षि लोमश तथा
धौम्य के साथ अनेक सिद्धाश्रमों का दर्शन प्राप्त किया
था। कैलास पर्वत के पूर्व में स्थित मणिमंत प्रदेश को भी
सिद्धों की गुप्तस्थली कहते हैं। वर्तमान में इसे माणा
शिखर के नाम से जाना जाता है। भौगोलिक दृष्टि से
गंधमादन पर्वत तथा माणा को अलकनंदा के पश्चिम तट
पर तथा नंदादेवी को अलकनंदा के पूर्व तट पर स्थित
मानते हैं। अलकनंदा के दोनों भागों को सिद्धों का विचरण
स्थल माना जाता है। यहाँ पर सिद्ध महात्मा एवं ऋषि।      

अभी भी तपस्यारत हैं और स्वेच्छा एवं अनुग्रहवश कभी-
कभी जनसामान्य को दर्शन भी दिया करते हैं।
महाकवि कालिदास ने मंदाकिनी के पार्श्व में स्थित उपत्यका श्रेणी को गौरी का पिता कहा है। यह भी अत्यंत
रहस्यावृत प्रदेश है। आदिशंकराचार्य, गोरक्षनाथ, माधवाचार्य, गोस्वामी तुलसीदास, स्वामी रामतीर्थ आदि महापुरुषों को इस क्षेत्र में अलौकिक एवं अद्भुत दर्शन मिल चुके हैं।

यमुनोत्तरी पर आज भी कुछ सिद्ध रहते हैं तथा भीषण
हिमपात में भी वे वह स्थान नहीं छोड़ते। दीपावली के बाद होली तक वहाँ भोजन सामग्री नहीं मिलती और कहते हैं कि इस स्थिति में यक्ष लोग उनके लिए भोजन सामग्री की व्यवस्था कर देते हैं। इस तरह सिद्ध-महात्मा अपनी तपस्या में दीर्घकाल तक निमग्न रह पाते हैं।
एक बार महायोगी त्रिपुरलिंग असम के जयंतिया
पर्वत पर भ्रमण कर रहे थे। वहाँ उनको गहन वन में एक
गुफा दीखी। उन्होंने वहाँ पर रात्रि व्यतीत करना चाही।
अर्द्धरात्रि में संपूर्ण वन गंभीर निस्तब्धता से व्याप्त हो
उठा। तब योगिराज त्रिपुरलिंग भगवान शिव की आराधना
में तल्लीन थे। ध्यान से बाहर निकलने के बाद उन्होंने
देखा कि गुफा एक दिव्य ज्योति से उद्भासित है और
एक जटाजूटधारी तेजोदीप्त महापुरुष उनके सामने खड़े
हैं। वे योगिराज को अनेक प्रकार के उपदेश देकर अदृश्य
हो गए। योगिराज ने देखा कि महापुरुष के साथ वह गुफा
एवं वह सिद्ध भूमि भी सूक्ष्म में समाहित हो गई।

इसी तरह बंगाल के प्रख्यात लेखक प्रमोद कुमार
चट्टोपाध्याय ने प्रयाग क्षेत्र में झूसी के पास एक सिद्ध
गुफा के दर्शन किए थे। यह विवरण उनके बंगाली ग्रंथ
'अवधूत ओ योगिसंग' में उल्लेख है। उन्होंने वहाँ किले
के पास देखा कि किले के भग्नावशेष के नीचे पर्वत पर
कई गुफाएँ थीं, जिनके ऊपर कुछ कमरे थे और ८-१०
सीढ़ियाँ उतरते ही वहाँ एक गली जैसा संकीर्ण मार्ग था।
ऐसी ही एक गुफा में एक दीपक जल रहा था। उस
दीपक के प्रकाश में मृगचर्मासन पर बैठे एक सिद्ध का
दर्शन उन्हें हुआ। कहते हैं कि वे बाबा कल्पनाथ थे।
बाबा ने उस निर्जन गुफा में पूड़ी, साग, अचार तथा
मालपुआ प्रस्तुत किए। सभी वस्तुएँ ताजी लाई गई थीं।
भोजनोपरांत उन्हें उपदेश देकर पूरी गुफा ही अंतर्धान हो
गई। इस प्रकार सिद्ध एवं सिद्धाश्रम होते हैं, जहाँ पर वे
जनकल्याण हेतु तपस्या करते हैं। श्रद्धासिक्त एवं ज्ञानपिपासु को ही उनकी कृपा की प्राप्ति होती है    .
                             

आर्यावर्त क्यों सिमट रहा है?

     जिस प्रकार भारत वर्ष के निर्माण में गंगा ने भूमिका निभाई है उसी प्रकार सोवियत गणराज्य का उत्थान और पतन वोल्गा के तट पर ही हुआ है। राहुलजी इस देश के गिने-चुने तत्व चिंतकों में से हैं जिन्होंने अपना जीवन सुदूर, तिब्बत (जो कि आर्यावर्त का एक छोर है।) से लेकर सोवियत गणराज्य (अंतिम छोर) तक सम्पूर्ण जीवन एक तीर्थ यात्री के रूप में बिताया। उन्होंने अपने जीवन के अनेकों वर्ष रूस में बिताये, वहां पर उन्होंने उनकी संस्कृति, सभ्यता और भाषा का अति सूक्ष्म वेदान्ती भाव से अध्ययन किया। इन सबका मूल निचोड़ उन्होंने यही पाया कि वोल्गा से गंगा तक की भूमि ही वास्तविक आर्यावर्त है। आर्य क्या हैं ? कुछ लोग इन्हें जाति के तौर पर देखते हैं, वह भी ठीक है। कुछ लोग आर्यों को एक श्रेष्ठ नस्ल मानते हैं। वास्तव में द्वितीय विश्व युद्ध तो इसी सिद्धांत को लेकर हुआ। हिटलर आर्यों को ही श्रेष्ठ नस्ल मानता था और समस्त विश्व पर आर्यों का एकाधिकार चाहता था परन्तु वास्तव में वह ठीक उल्टा कार्य कर रहा था। ऐसे ही महानुभाव के कारण आर्य पतोन्मुख हुए।
     भगवान श्रीकृष्ण, भगवान श्रीराम एवं उनके समकालीन सभी यौद्धा, राजा आर्यपुत्र कहलाते थे। आर्य शब्द उस मानव जाति का द्योतक है जिसने सर्वप्रथम इस प्रथ्वी पर वास्तविक मनुष्य रूप में चेतना प्राप्त की। जिस जाति ने मनुष्य की अर्न्तमुखी खोज को प्रथम प्राथमिकता दी। ईश्वर क्या है ? सृष्टि क्या है ? ज्ञान क्या है? विज्ञान क्या है ? इन सब विषयों पर गम्भीरतम खोज प्रारम्भ की । यही खोज अंदर की यात्रा है। यह यूरोप वासियों के समान अमेरिका की खोज जैसी बाहरी यात्रा नहीं है। जिस समय समस्त विश्व अज्ञान के गहन अंधकार में डूबा हुआ था, रेगिस्तान में मनुष्य पशुओं के समान जीवन जी रहा था, यूरोप और अन्य जगहों पर मनुष्य और पशु के बीच अंतर अत्यंत ही क्षीण था उस समय आर्य ऋषि ब्रह्माण्ड से तारतम्य बैठाकर वेदों की संरचना कर रहे थे, प्रकृति के सूक्ष्म से सूक्ष्म रहस्य आत्मसात कर जीवन को ऊर्ध्वगामी बना रहे थे और तो और अहिंसा के पूर्ण भाव विकसित कर समस्त वनस्पति जगत, जीव-जगत और जड़-चेतन- जगत से संवाद कर मोक्ष तक की खोज कर चुके थे। 
        इन सब खोजों से ही उन्हें प्रचुर मात्रा में आंतरिक बल प्राप्त हुआ और सृष्टि के परम मातृत्व को प्राप्त कर वे उच्च कोटि की संतान उत्पत्ति में सक्षम हुये। आर्यों के सानिध्य में ही अति सूक्ष्म और विज्ञानमयी व्यवस्थाओं ने जन्म लिया। ऐसी व्यवस्था जिसमें सहजीविता, पूर्ण परिणाम और उच्च कोटि का अध्यात्म सम्मिलित था। कालान्तर यही आर्य पुत्र तिब्वत से लेकर यूनान, जर्मनी, ग्रीस, आज के ईराक, मिश्र और रूस गणराज्य के समस्त भागों तक फैल गये। ध्यान रहे यह लेख एक इतिहासकार का नहीं है। इसलिये इस बात पर चिंतन नहीं किया जा रहा है कि सर्वप्रथम आर्य उत्पन्न हुये ।
                आज भी आपको नील नदी के किनारे अनेकों सूर्य मंदिर मिलेंगे। मिश्र, ग्रीस, ईराक इत्यादि स्थानों में आज भी पर्यटक इन देवालयों को देखने जाते हैं। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि आर्य मुख्यतः काला सागर के आसपास सर्वप्रथम उदित हुये इसके पश्चात् अफगानिस्तान, पाकिस्तान, उजबेकिस्तान इत्यादि होते हुये सतलज के किनारे पहुँचे। भगवान श्रीराम इक्ष्वाकु वंश के राजा थे जिसमें कि सूर्य पूजा ही सर्वोपरि थी। आर्यों ने ही सर्वप्रथम सूर्य सिद्धि प्राप्त की थी। वह विलक्षण सिद्धि जिसके द्वारा सूर्य की रश्मि से कुछ भी उत्पन्न किया जा सकता है। भारतवर्ष में आज भी ऐसे योगी हैं जो कि इस कार्य को सम्भव कर लेते हैं। ध्यान, योग, तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, अंकगणित इत्यादि जैसी अति विकसित विद्यायें आर्यों की ही देन हैं। पाश्चात्य जगत तो पिछले 100 वर्षों में ही इनसे परिचित हुआ है। प्रकृति उपासना, सिद्ध देवालयों की स्थापना, शाश्वत् शक्ति पीठों की खोज विश्व को आर्यों ने ही प्रदान किया है। भौतिक रूप से अश्वों का संचालन, लौह शस्त्रों का निर्माण, रथों का आविष्कार, वस्त्रों की उपयोगिता से लेकर परिवार प्रणाली, विवाह प्रणाली, मृत्यु के पश्चात् ससम्मान संस्कार व्यवस्था यह सब आर्यों की ही देन है। इनके अभाव में मनुष्यों और पशुओं में कोई फर्क नहीं है।

    जिस आर्य कुल में कपिल, विश्वामित्र, परशुराम, अगस्त, वशिष्ठ, भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण इत्यादि-इत्यादि महानायकों ने जन्म लिया, जिन्होंने मनुष्यों को मर्यादा, सोलह कलायें, प्रकृति पूजन और मोक्ष मार्ग दिखाया आज वह क्यों सिमटता जा रहा है। भगवान श्रीराम वानर कुल के हनुमंत को भी अपने प्राणों से प्रिय मानते हैं, राक्षस कुल के विभीषण का भी करते हैं और शबरी एवं केवट को भी प्रेम की दृष्टि से देखते हैं, उन्हीं के वंशज अब इस पृथ्वी के छोटे से भूभाग में सिमटते जा रहे हैं। कहीं न कहीं कोई बहुत भारी भूल भारत वासियों से हो रही है। निश्चित ही मूल शक्ति का ह्रास हो रहा है। 2000 वर्ष पूर्व ईसाईयत प्रभाव में आई। 1400 वर्ष पूर्व इस्लाम का प्रादुर्भाव हुआ। इन दोनों धर्मों ने आज येन-केन-प्रकरेण पृथ्वी के 90 फीसदी भू-भाग के मनुष्यों को जोर जबरदस्ती से तलवार की नोंक पर और नाना प्रकार के लालचों से लिप्त कर धर्म परिवर्तन करा दिया। कितने ही वास्तविक दिव्य शक्ति स्थलों का नाश इन्होने किया यह एक प्रारम्भिक इतिहास का छात्र भी बता सकता है। क्यों भारत वंशी इतने कमजोर, निकम्में और शक्तिहीन हो गये ? यह किसी एक व्यक्ति के सोचने का विषय नहीं है। सम्पूर्ण राष्ट्र को इस विषय पर सामूहिक तौर पर सोचना पड़ेगा अन्यथा एक दिन केवल इतिहास के पन्नों में ही वेदान्त संस्कृति बचेगी। 
       शत्रु तो सामने चारों तरफ दुनिया भर की कुटिल चालों के साथ मुँह फाड़े खड़ा है। किसी और के उपर दोषारोपण करने से कुछ नहीं होगा। यह तो बस भागने की कला है सच्चाई से समुद्र मंथन की भांति आत्म मंथन करना होगा और वह भी सामूहिक तौर पर । समय अत्यंत सीमित है। यह एक सम्पूर्ण राष्ट्र और जाति का सवाल है। इसी मंधन में से योग्य नेतृत्व, समर्पित व्यक्तित्व और मर्यादित महापुरुषों का जन्म होगा। वैदिक संस्कृति श्रम प्रधान संस्कृति है अर्थात मनुष्यों को एक साथ सामूहिक रूप में सहजीविता पूर्वक रहने की कला आर्य संस्कृति ने ही सिखाई है। आर्य संस्कृति के कारण ही ग्राम और नगरों का आविष्कार हुआ। ग्रामों और नगरों की स्थापना पूर्ण वैज्ञानिक एवं ज्योतिष आधार पर की गई है। जैसे जैसे आर्य संख्यात्मक रूप से बढ़ते गये उन्होंने नये नगर और ग्रामों का निर्माण किया। आर्य सभ्यता जब तक ऋषि परम्परा से जुड़ी हुई थी तब तक वह बहुत ही फली फूली। प्रत्येक भारतवासी आज भी गोत्र के नाम से ही वास्तविक रूप से पहचाना जाता है। गोत्र अर्थात उस ऋषि का नाम जिसके द्वारा एक सम्पूर्ण वंश का निर्माण किया गया है। 
         जब ऋषि वंश निर्माण की परम्परा में पूरा सहयोग और जिम्मेदारी निभाते थे तब तक आर्यों में एक से एक उत्तम कुलों का निर्माण हुआ परन्तु कालान्तर ऋषि और संत भी आन्म कल्याण में जुट गये। समाज की तरफ से मुँह फेर लिया और लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया। ऋषि परम्परा आर्यों का मूल तत्व है। यहीं से ह्रास की शुरूआत हुई। ऋषियों की जगह पण्डितों और आचार्यों ने ले ली। आचार्य और पण्डित ज्ञानी हो सकते, कर्मकाण्ड में निपुण हो सकते हैं परन्तु यह सब वंश निर्माण की कला के मात्र अंग हैं। वंश का निर्माण दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा के द्वारा ही सम्भव है। जो जाति व्यवस्था कर्मों पर आधारित थी वही ऋषियों की अनुपस्थिति में जन्म पर आधारित हो गई। मनुष्य मशीन नहीं है। उसमें प्रत्येक पीढ़ी के बाद मूलभूत नैसर्गिक परिवर्तन हो जाते हैं। जाति प्रथा में ब्राह्माण और क्षत्रिय अपनी स्वार्थ सिद्धि के कारण आपस में मिल गये एवं ऊल-जलूल नियमों से समस्त आर्य समाज का नाश कर दिया। क्षत्रियों का काम केवल युद्ध करना रह गया और ब्राह्माणों का काम मात्र कर्मकाण्ड के द्वारा धन अर्जित करना।
        बाबर ने जब हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया तो वह बुरी तरह हार गया परन्तु उसके चतुर सेनापति ने एक ऐसी अनोखी चाल चली कि वह हारा हुआ युद्ध एक ही बार में पूरी तरह जीत गया। बाबर की सेना ने कई हजार गायें युद्ध के मैदान में क्षत्रियों के सामने छोड़ दी और खुद उनके पीछे छिप गये। गायों को सामने देख क्षत्रियों ने अस्त्र-शस्त्र नीचे कर लिये और फिर गायों के पीछे छिपे बाबर के सैनिकों ने सभी को एक के बाद एक निर्ममता से काट डाला। मूर्खतापूर्ण तरीके से दुष्ट शत्रु को कभी भी परास्त नहीं किया जा सकता। जब गौ रक्षक ही मारे गये तब फिर गाय तो काटी जाती ही रहेंगी। आज भी हमारे देश में बाबर के जमाने से लेकर अब तक निरंतर गायें काटी जा रही हैं। मूर्खता पूर्वक युद्ध करना मात्र आत्महत्या के समान है। जब समाज का एक वर्ग ही युद्ध करे और सब बैठकर तमाशा देखें तब तो पूरी की पूरी कौम ही बर्बाद होती है। क्षत्रिय ही अच्छे योद्धा हो सकते हैं ऐसा कहां लिखा है । ब्राह्माण ही उच्च कर्मकाण्डी होंगे ये बात तो समझ से परे है। 

जाति व्यवस्था एक मूर्खतापूर्ण व्यवस्था है और इसी व्यवस्था के चलते आज भी भारत गड्ढे में जा रहा है।
       मैं कितने राजपूतों को जानता हूँ जो 5 किलो वजन भी नहीं उठा सकते। अनेकों ब्राह्माण तो ठीक से अपना नाम भी नहीं लिख सकते। वे संस्कृत क्या पढ़ेंगे ? ऐसी स्थिति में जाति प्रथा कौन सा कल्याण कर रही है। क्षत्रिय लिख लेने से कोई वीर नहीं हो जाता है। इन्ही सब बातों के चलते आर्यों का पतन हो गया। रही सही कसर दो हजार वर्ष पूर्व अहिंसा रूपी आंदोलन ने पूरी कर दी। इसके प्रचारक गुरुओं ने कायर होते जा रहे समाज को भागने का एक सुनहरा अवसर दे दिया। समस्त क्षत्रिय, जैन और बौद्ध धर्म अपनाने लगे। क्या करते बेचारे ? लड़लड़कर थक चुके थे। वास्तव में इस स्थिति के लिये वे ही जिम्मेदार थे। उन्होंने अन्य वर्गों को युद्ध कला में पारंगत ही नहीं किया। ध्यान रहे किसी भी कार्य में दक्षता आने में पीढ़ियां बीत जाती हैं। वैदिक संस्कृति का मूल मंत्र यह है कि शरीर नश्वर है, आत्मा अजर-अमर है। यही शब्द हनुमंत को प्रेरित करता है विकट से विकट कर्मों को संपादित करने के लिये। उन्हें शरीर की परवाह होती तो फिर अकेले ही रावण की लंका में न जाते। जब शरीर नश्वर है तो फिर उसे क्यों न संवारा जाय वीरता से, बल से और पुष्टता से आज आप भारतवर्ष में देखिए आपको 6 फिट की लम्बाई दुर्लभता से ढूंढने पर मिलेगी। सब के सब शरीर से प्रेम करने लगे हैं, उसे कर्महीन बनाकर रख दिया है, कभी उसका उपयोग ही नहीं करते। शरीर को ऐसे संजोते हैं जैसे कि वह गुलाब का फूल हो। इस मानसिकता से ग्रसित समाज केवल भोगियों का समाज होगा थोड़ा सा भी भय उत्पन्न होने पर प्राणों की भीख के लिये गिड़गिड़ाने लगते हैं, पत्नी को बेच देते हैं, धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। मानसिंह ने तो पद के लिए अपनी बहन अकबर से ब्याह दी थी। 
           दिल्ली की गद्दी पर आखिरी हिन्दू राजा पृथ्वीराज चौहान हुआ है। उसने स्त्री लोभ में संयोगिता का हरण किया, जयचंद से दुश्मनी ली और जब महमूद गजनवी दिल्ली पर चढ़कर आया तो वह संयोगिता के साथ प्रेमालाप कर रहा था। मंत्री बेचारे चिल्लाते रहे पर वह तो स्त्री पाश में बंधा हुआ था। अंत क्या हुआ ? वह बुरी तरह पराजित होकर एक बंदी की तरह ले जाया गया। ऐसे राजा किस काम के जो अपना कर्त्तव्य भूल अय्याशी में डूबे रहें। इन्हीं महानुभावों के कारण भारत परतंत्र बना इतिहास तो झूठ बोलता है। वह ऐसे ही तथाकथित राजाओं को महिमामण्डित करता है। जब तक राजा धर्मधारण किये हुए होता है वह दिग्विजयी होता है। राम ने मर्यादा धारण की, आर्यों का गौरव बढ़ा। कृष्ण ने गीता उपदेश दिये आर्य अमर हो गये। अशोक ने बुद्ध को सम्मान दिया आर्य पुनः कन्धार से लेकर श्रीलंका तक सम्मानित हुये परन्तु पृथ्वीराज चौहान ने दिल्ली डुबो दी।       
          पतन बहुआयामी प्रक्रिया है। शारीरिक पतन के साथ-साथ मानसिक, अध्यात्मिक पतन भी होता है। वैदिक संस्कृति के मूल स्तम्भ वेदों में व्यक्ति पूजा कदापि नहीं की गई है। उसके बाद कुछ प्राकृतिक शक्ति स्थल प्रादुर्भाव में आये। यहां तक सब कुछ ठीक था। इस कारण से सम्पूर्ण समाज एक दूसरे से बंधा हुआ था परन्तु फिर शुरू हुआ व्यक्ति पूजन। सभी गुरु अपने आपको पूजवाने की होड़ करने लगे। धीरे-धीरे लोगों ने स्वयं के स्वजनों को भी पूजना शुरु कर दिया। रोम और यूनान की सभ्यता आर्य वंश की सभ्यता है। वह भी आर्यों की ही एक श्रृंखला थी वहां पर भी राजाओं ने स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। रानियां दवियां बन गई। एक दिन जनता इतनी उब गई कि उन सबको उठाकर कचरे के डब्बे में फेंक दिया। आज आप जिधर देंखे सभी गुरु अपने आपको शिष्यों के द्वारा पुजवाने में लगे हुये हैं। इसके अत्यंत ही गंभीर अध्यात्मिक परिणाम होते हैं। स्वजन सम्माननीय हो सकते हैं, आदरणीय हो सकते हैं परन्तु पूज्यनीय नहीं। पूजन एक अति वैज्ञानिक पद्धति है। एकलव्य ने द्रोणाचार्य की मूर्ति लगाकर धनुर्विद्या में अर्जुन से ज्यादा पारंगतता हासिल कर ली। मैंने पहले भी कहा है जाति का दक्षता से कोई लेना देना नहीं है। पर क्या हुआ ? द्रोण ने एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया और महाभारत के युद्ध में यही द्रोण अधर्म का साथ दे रहे थे। द्रोण अपने पुत्र मोह में इतना ग्रसित थे कि उन्होंने उसकी मृत्यु का भ्रामक समाचार सुन रणभूमि में ही शस्त्र त्याग दिये और इसी द्रोण के पुत्र ने जब उत्तरा के गर्भ में पल रहे अभिमन्यु पुत्र पर वार किया तब भगवान श्रीकृष्ण ने उसे दो हजार वर्ष के लिये शापित कर दिया।

ऐसे गुरुओं को क्या आप पूजेगें ? पूजना इतना सस्ता मत बनाइये। सत्य कड़वा होता है, प्रत्येक मां-बाप अपनी संतानों के लिये सब कुछ करते हैं। बंदर भी अपने मृत बच्चे को हफ्तों छाती से चिपकाये रखता है। इसका मतलब यह नहीं है कि स्वजनों को मंदिरों में स्थापित कर दें। पूजा पद्धति आध्यात्मिक विषय है। व्यक्तिगत और सामाजिक चिंतन को इसमें मत घसीटिये । मृत्यु के पश्चात् वही पूज्यनीय है जो कि मोक्षगामी है अन्यथा अनंत योनियों में भटक रहे व्यक्ति की पूजा से तो नास्तिक रहना ही भला है। वेदान्त संस्कृति में पूर्वजों के पिण्डदान की व्यवस्था है। उनकी आत्माओं के तर्पण की व्यवस्था है। उन्हें पूजना या बार-बार आंसू बहाकर उन्हें मोह में बांधे रखना दोनो पक्षों के लिये खतरनाक है। इस प्रकार मृत व्यक्ति प्रेतयोनी को ही प्राप्त होता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यही कहा कि रिश्ते, रक्त सम्बन्ध और शरीर को मत देख। जीवन-क्षण भंगुर है निष्काम कर्म को प्रधानता दे। 
       जब-जब आर्यवंशी कृष्ण के उपदेश को भूलकर शरीर में ही लिप्त हो गये पतन प्रारम्भ हो गया। जब भगवान श्रीकृष्ण कह रहे हैं कि रक्त सम्बन्धों पर ध्यान मत दे, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम हनुमंत को गले लगा रहे हैं, शबरी के बेर खा रहे हैं तो फिर जाति प्रथा आयी कहां से ? कृष्ण के बाद बुद्ध ही ऐसे महामानव हुये जिन्होंने वैदिक सभ्यता को परिष्कृत कर उसे सुदूर चीन, जापान और मंगोलिया तक पहुंचा। जिन मंगोलों ने भारत को लूटा-खसोटा वही बुद्ध के सामने नतमस्तक हो गये, यही वेदान्त की विशेषता है। वेदान्त अत्यंत सरल, सुपाच्य और अभेदात्मक है। समय के अनुसार जो सामूहिक धर्म स्वरूप परिवर्तन नहीं करता है वह धीरे-धीरे नष्ट हो जाता है। 
          एक पुस्तक, एक गुरु के द्वारा आबद्ध नियम ज्यादा से ज्यादा दो से ढाई हजार वर्ष तक ही प्रासंगिक रहते हैं। जब तक आर्य वंशी कल्पवृक्ष के समान कार्य करते रहेंगे तब तक आर्य सभ्यता सुरक्षित रहेगी। कल्पवृक्ष का तात्पर्य जो मांगो वह प्राप्त होगा। वेद कल्पवृक्ष है, उनमें शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य, आध्यात्मिक स्वास्थ्य, ब्रह्माण्डीय स्वास्थ्य सभी कुछ है। सभी ग्रंथ इसी से निकले हैं। यह मनुष्य का मूल है। अंग्रेजों ने इसे समझा, वे इन्हें उठाकर ले गये। इन पर शोध किया, नये-नये आविष्कार किये, अपने आयामों को विकसित किया। अंग्रेजों ने इन्हें अति महत्व प्रदान किया। आपको तो बस एक शब्द सिखा गये “अंध विश्वास"। 200 वर्षो से आप अपने प्रचुर ज्ञान को पेंट-बुट पहनकर अंध विश्वास कहते हुए लात मारते रहे। पर जब आंख खुली तो विश्व के सबसे गरीब, दुर्बल, शोषित, अज्ञानी और कायर समाज में परिवर्तित हो गये। अभी भी आंख नहीं खुली तो फिर आने वाले 100 वर्षों में पशुओं के समान जीना पड़ेगा। जब तक आप व्यथित नहीं होंगे, आत्मंथन नहीं करेगे, शरीर का मोह नहीं त्यागेंगे, कर्म को प्रधानता नहीं देंगे कुछ नहीं हो सकता। औषधि के द्वारा किसी जीवित जागृत कौम का निर्माण नहीं हो सकता। आपको अपने समाज के अंदर ही पुन: एक बार शंकराचार्य, बुद्ध, महावीर, जैसे व्यक्तित्व ढूँढने पड़ेंगे या फिर पैदा करना पड़ेंगे जो कि शक्तिपुंज बन स्वयं को सोऽम करने की ताकत रखते हुये सम्पूर्ण देश को पुनः एक बार गरिमा प्रदान कर सकेंगे।

                                    जय श्री राम
                   शिव शासनत: शिव शासनत:

आइये आज कुण्डलिनी से सम्बंधित कुछ बेसिक बातों की चर्चा करते हैं ।

 सबसे पहले कुण्डलिनी नाम पड़ा कुंड से कुंड मतलब गड्ढा । गड्ढा किस चीज का, उर्जा से भरा हुआ कुंड या गड्ढा । कुंडलिनी वलयाकार साढ़े तीन फेरे लगाते हुए मूलाधार चक्र में स्थित है । मूलाधार चक्र रीढ़ की अंतिम हड्डी के इर्द गिर्द स्थित है । मूलाधार से उपर स्वाधिष्ठान चक्र स्थित है जो जननेन्द्रिय के इर्द गिर्द स्थित है । ठीक इसके उपर मणिपुर चक्र स्थित है यह नाभि से दो अंगुल नीचे है । इसके ऊपर अनाहत चक्र है जो छाती के दोनों पसलियों के ठीक मध्य में स्थित है । इसके उपर ग्रीवा ( गर्दन ) में कंठ के पास विशुद्ध चक्र स्थित है । और इसके ऊपर दोनों भौंह् के बीच आज्ञा चक्र स्थित है । सहस्त्रार कोई चक्र नही है बल्कि यह कुण्डलिनी की पूर्ण जाग्रत अवस्था है जिस अवस्था में दिमाग का नस नस सक्रीय रहता है । इसलिए इसे हजार कमल वाला बताया जाता है । इसका अर्थ हुआ सहस्त्रार जाग्रति मतलब पूर्ण रूप से जागृत मष्तिष्क । 
कुछ यौगिक क्रियाएं करने पर कुण्डलिनी अपने स्थान मूलाधार से ऊपर उठती है और परस्पर प्रत्येक चक्रो को भेदती हुई सहस्त्रार तक पहुँचती है । यह जीवनी उर्जा है जो मूलाधार में कुंड में स्थित रहती है । यह उर्जा स्वाभाविक रूप में निचे क्षरण होते हुए सृजन का कार्य करती है । ध्यान के द्वारा चक्रो को सक्रीय किया जाता है जबकि चक्रो को पूर्ण जागृत यौगिक क्रियाओं के द्वारा किया जाता है जब कुण्डलिनी ऊपर उठती है । 
प्रत्येक चक्र के बीज मन्त्र नीचे लिखे हुए हैं ।
 
मूलाधार बीज मन्त्र - लं ( LAM )

स्वाधिष्ठान बीज मन्त्र - वं ( VAM )
मणिपुर चक्र बीज मन्त्र - रं ( RAM ) 
अनाहत चक्र बीज मन्त्र - यं ( YAM )
विशुद्ध चक्र बीज मन्त्र - हं ( HAM )
आज्ञा चक्र बीज मन्त्र - ॐ ( OM MMMM ....)
सहस्त्रार - यह चक्र नही बल्कि अवस्था है | ईश्वर लीन अवस्था | 
मन्त्रों का मानसिक जाप करते हुए चक्र ध्यान कर सकते हैं | ( साधारण गृहस्थ या जिन्हें ज्यादा ध्यान अभ्यास न हो दस मिनट से ज्यादा बीज मन्त्रों का मानसिक जाप न करें ) प्रत्येक चक्र की अपनी खासियत है और यह अपने खासियत के हिसाब से सक्रीय होते हुए अलग अलग सकारात्मक गुण उत्पन्न करने लगते हैं |

अधिक उर्जावान या क्रोधी व्यक्ति मणिपुर चक्र का बीज मन्त्र अधिक न जपे.