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क्या आप जीवित हो ??

एक बार एक शिष्य ने अपने गुरु से पूछा, क्या मैं जीवित हूँ?" गुरु ने प्रसन्नता से उत्तर दिया, "अहा! तुम सचमुच भाग्यशाली हो कि तुम्हारे मन में यह प्रश्न तो उठा ! क्योंकि अज्ञानी को तो ऐसा प्रश्न ही नहीं उठता। उसे यह भी संदेह नहीं होता कि वह मरा हुआ है या जीवित है। क्योंकि वह सांस ले सकता है, खा सकता है, इच्छा कर सकता है और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए परिश्रम कर सकता है, इसलिए उसे लगता है कि वह जीवित है।

जीवन में उच्च उद्देश्य का अन्वेषण करें

यदि केवल सांस लेना ही जीना है तो आप में और गोभी या फूलगोभी में क्या अंतर है? वे भी सांस ले सकते हैं। और यदि आप यह कहें कि, ' मैं तो इच्छा कर सकता हूँ और अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मेहनत भी कर सकता हूँ', तो आप में और जानवरों में क्या अंतर है? उनके मन में भी इच्छाएँ पैदा होती हैं, वे भी अपनी वृत्तियों को पूरा करने का प्रयास करते हैं और अपने तरीके से संतुष्टि प्राप्त कर लेते हैं। केवल सांस लेना और खाना ही मानव-जीवन नहीं हो सकता, वह शायद वनस्पति या पशु का जीवन हो सकता है, परंतु निश्चित रूप से मानव-जीवन नहीं। मानव-जीवन इससे कहीं अधिक है। चैतन्य, जो जन्म से पहले मौजूद था और मृत्यु के बाद भी मौजूद रहेगा, इस मूलतत्त्व को जानने में ही मानव जीवन की पूर्णता है।

क्या मैं जो जीवन जी रहा हूँ उसे सही अर्थ में मानव-जीवन कहा जा सकता है?' यह प्रश्न का उठना अध्यात्म की शुरुआत है। यह प्रकाश की पहली किरण है, जिसके बिना आपके जीवन में ज्ञान का सूर्य उदित नहीं हो सकता। जब तक यह प्रश्न नहीं उठता, तब तक आप बेहोश हैं अथवा आपका जन्म ही नहीं हुआ है। इस प्रश्न के साथ आपका एक नया जन्म हुआ है। इस नए जीवन का आपको वरदान मिला है। यह आपका वास्तविक जन्म है। यह आपके जीवन की सही शुरुआत है। धन्य है वह जिसे यह प्रश्न उठा है, एक बार भी अगर यह प्रश्न उठा तो उसके पश्चात वह अज्ञानता की निद्रा में अधिक समय नहीं रह सकता।

चुनना आपको है

जीवन केवल एक अवसर है। इसके साथ क्या करना है? यह निर्णय आपको करना है। जीवन न तो उद्देश्यपूर्ण है और न ही उद्देश्यहीन। वह एक कोरे कागज़ की तरह है।आप स्वतंत्र है, जो चाहे आप उस पर लिख सकते हैं। आप अपशब्द भी लिख सकते हैं या कोई सुंदर गीत भी लिख सकते हैं। यदि आपके लिखने में ही रूखापन है तो आप खुशी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? धन की प्राप्ति और इच्छाओं की पूर्ति की कोशिश में, शांति की अपेक्षा आप कैसे कर सकते हैं? यदि आप अपने जीवन को मधुर बनाना चाहते हैं तो आपको उस पर कविता लिखनी होगी, अर्थात उसे एक उच्च उद्देश्य देना होगा। उद्देश्य अपनेआप नहीं आएगा। यदि जीवन सुखपूर्वक बिताना है तो उस पर दिव्य और श्रेष्ठ लिखना होगा।आपकी मरज़ी है।आप कहते हैं आपको जीवन अर्थहीन प्रतीत होता है। यदि आप गलत चीजें लिखेंगे तो निश्चित रूप से ऐसा ही लगेगा। ज़्यादातर लोग या तो कागज़ पर अपशब्द लिखना पसंद करते हैं या कुछ भी नहीं लिखते हैं। उनका जीवन व्यर्थ हो जाता है। केवल कुछ ही साधक गीत लिखते हैं और अपने जीवन को सार्थक बनाते हैं।

मानव जन्म एक अवसर है जो आपको दिया गया है, जबकि मृत्यु तब आती है जब वह अवसर छीन लिया जाता है। जन्म और मृत्यु के बीच के क्षेत्र को जीवन कहा जाता है। आपको अकेले ही इसे जोतना होगा। यदि आप कुछ नहीं उगाओगे, तो भी जंगली घास अवश्य उगेगी। परन्तु, यदि आपको सुंदरता और खुशबू चाहिए तो आपको गुलाब के पौधे लगाने होंगे। हालांकि, गुलाब अपनेआप तो उगनेवाले नहीं है। पुरुषार्थ की आवश्यकता है; साधना की आवश्यकता है।

धर्म जीवन को अर्थ प्रदान करता है

यदि आप गुलाब की फसल चाहते हैं तो आपको अपने जीवन में परम उद्देश्य लाना होगा; आपको ध्यान का मार्ग लेना होगा। यदि आपको गुलाब में कोई रुचि नहीं है तो जंगली घास उगाने के लिए आपको कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि परद्रव्य में आसक्त रहना आपकी पुरानी आदत रही है। आपको आपका जीवन ध्यान की बजाय धन और पद प्राप्त करने में व्यतीत करना है, क्योंकि भीतर की गहराई से आप मानते हैं कि धन और पद की प्राप्ति से आपको सुख मिलेगा और आपकी सारी शक्ति और ऊर्जा उसे प्राप्त करने में खर्च हो जाती है। एक बार जब आपके जीवन में ध्यान का प्रवेश होगा तो आपकी मंजिल कब्र नहीं, आपका शास्वत स्वरूप होगा। यदि आपको खुश रहना है तो उसका एक मात्र उपाय है, `भीतर जाना'। धन और पद में सुख मानना, यह तो केवल आपका भ्रम है।

जीवन में उद्देश्य प्रदान करने की प्रक्रिया ही धर्म है। जीवन के सार को खोजने का विज्ञान ही धर्म है। धर्म का उद्देश्य है खुरदुरे पत्थर से सुंदर मूर्ति को तराशना। यदि आपके जीवन में उद्देश्य ही नहीं होगा तो आपका जीवन अनिवार्य रूप से आत्म-विनाश की ओर ही बढ़ेगा, और निश्चित रूप से दु:ख में समाप्त होगा।

धर्म ही जीवन का अर्थ है और धर्म का अभाव जीवन को व्यर्थ बना देता है। धर्म के अभाव में, देर-सवेर यह प्रश्न उठना निश्चित है कि `मैं इस रोज़बरोज़ के नीरस जीवन का क्या करूँ? मैं रोज सुबह उठता हूँ, खाता हूँ, काम पर जाता हूँ, घर आता हूँ और वापस सो जाता हूँ। क्या मैं सच में जीवित हूँ?'

अपने जीवन को तराशें

गोलकुंडा में एक किसान को एक अनगढ़ हीरा मिला। उसने उसे बच्चों को खेलने के लिए दे दिया। एक बार उसका दोस्त जो एक जौहरी था, उससे मिलने आया और उसने इस अनगढ़ हीरे को देखा। हीरे के मूल्य को जानते हुए, उसने उसे खरीदा और तराशना शुरू किया। जैसे-जैसे वह हीरे को आकार देता गया, हीरे का वजन कम होता गया और उसका मूल्य बढ़ता गया। अंत में, हीरे का वजन एक तिहाई हो गया पर उसकी कीमत कई गुना बढ़ गई।

आपके भीतर भी ऐसा अनगढ़ हीरा हीरा है, चैतन्य। उसके ऊपर क्रोध, लोभ आदि की परतें हैं, जिससे उसकी चमक दिखाई नहीं देती। जैसे-जैसे परतें हटती जाएगी, शुद्धता और चमक बढ़ती जाएगी। प्रेम, धैर्य और समझ के साथ थोड़े प्रयास से आंतरिक सौंदर्य प्रकट होगा और मानव जीवन का उद्देश्य पूर्ण हो जाएगा।

धर्म की महिमा रखें। धर्म का सार है ध्यान। ध्यान में प्रगति करें। निर्विचार और निर्विकल्प दशा प्राप्त करने, मौन में स्थापित होने, नि:शब्द में स्थिति करने और साक्षी में प्रतिष्ठित होने के लिए अंतर्मुख दृष्टि करें। भीतर की गहराइयों में उतरें और अपने शुद्ध स्वभाव को जानें। बेवजह बाहर न भटकें।आपका खज़ाना आपके भीतर छिपा है और फिर भी आप बाहर भटक रहे हैं। आपका साम्राज्य भीतर है और आप बाहर वैभव की तलाश कर रहे हैं। इस कारण, आपको जीवन निरर्थक और व्यर्थ लगता है। बस अपनी खोज की दिशा बदलें, भीतर की ओर मुड़ें और देखना आपके जीवन में क्रांति आ जाएगी। आज, आपका जीवन जैसे दिवालियापन की घोषणा है। ध्यान का आगमन उसे समृद्ध कर देगा और इसे दिपावली के त्योहार में बदल देगा।

आपको मानव-जन्म के महत्व का एहसास हो,अपनी भीतर मुड़ें और आत्मिक-सुख का अनुभव करें।

#SpiritualLife

KNOW YOUR ANCESTORS AND THEIR INVENTIONS.

1. Father of Astronomy: Aryabhatta ; work - Aryabhattiyam.

2. Father of Astrology: Varahamihira , works; Panchasiddhantika, Bruhat Hora Shastra.

3. Fathers of Surgery : Charaka and Sushruta , works : Samhitas.

4. Father of Anatomy: Patanjali , work: Yogasutra.

5. Father of Yoga : Patanjali , work : Yogasutra.

6. Father of Economics : Chanakya , work: Arthashshtra.

7. Father of Atomic theory : Rishi Kanada , Work : Kanada sutras.

8. Father of Architecture : Vishwakarma.

9. Father of Aero Dynamics: Mayasura , work : Vastu Darpana.

10. Father of Medicine: Dhanvanthri , first propounded Ayurveda.

11. Father of Grammar: Panini , work: Vyakarana Deepika.

12. Father of Natyashastra : Bharatamuni , work : Natyashastra.

13. Father of Kavya (literature) : Krishna Dwaipayana (VedaVyasa) works ; Mahabharata , Ashtaadasha Puranas.

14. Father of Playwriting : Kalidasa , works : Meghadhootam , Raghuvamsham , Kumara Sambhava etc etc.

15. Father of Ganita: Bhaskara II , works : Lilavati.

16. Father of Warfare and Weaponry: Rishi Parashurama, works: Kalaripayatu, Sulba Sutras.

17. Father of story writing: Vishnu Sharma, works: Panchatantra.

18. Father of Politics: Chanakya, works: Arthashashtra, Nitishashtra.

19. Father of Sexual Anatomy: Vatsyana, work: Kamasutra.

20. Father of Philosophy: Sri Krishna, work: Sribhagavadgeeta.

21. Father of Advaitha: Shankara, works: commentaries (Bhashyas), panchadasi, vivekachudamani.

22. Father of Alchemy: Nagarjuna, work: Pragnaparamita Sutras .

23. Father of Electricity - Rishi Agastya - Electro Voltic Cell

24. Father of Aviation Science - Rishi Bharadwaj - Vimana Sastra

25. Father of Gravity - Brahma Gupta II - Gravity.

26. Father of Pi value - Rishi Baudhyana - Baudhyana Sutra - value of Pi (Pythagoras theory)

The above list is just the tip of an iceberg. Let us take pride in sharing and educating the world what our ancestors did. Yet our ancestors bowed down to the world with their Humble "Namaste" 🙏

Be Proud HINDU. 🕉

स्वाहा का महत्व ।।

स्वाहा का महत्व हममें से ज्यादातर नहीं जानते हैं। ऋग्वैदिक आर्यों ने यज्ञीय परंपरा के दौरान देवताओं तक हविष्य पहुंचाने के लिए अग्नि का प्रयोग आरंभ किया। किंतु यज्ञ वेदी में हवि डालने के दौरान “स्वाहा” का उच्चारण किया जाता था। स्वाहा का अर्थ ही अपने आप में बहुत रोचक है।

देव आह्वान के निमित्त मंत्र पाठ करते हुए स्वाहा का उच्चारण कर निर्धारित हवन सामग्री का भोग अग्नि के माध्यम से देवताओं को पहुंचाते हैं। इस स्वाहा का निर्धारित नैरुक्तिक अर्थ है – सही रीति से पहुंचाना परंतु क्या और किसको? यानि आवश्यक भौगिक पदार्थ को उसके प्रिय तक। हवन अनुष्ठान की ये आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण क्रिया है। कोई भी यज्ञ तब तक सफल नहीं माना जा सकता है जब तक कि हविष्य का ग्रहण देवता न कर लें। किंतु देवता ऐसा ग्रहण तभी कर सकते हैं जबकि अग्नि के द्वारा “स्वाहा” के माध्यम से अर्पण किया जाए।

निश्चित रूप से मंत्र विधानों की संरचना के आरंभ से ही इस तथ्य पर विचार प्रारंभ हो चुका था कि आखिर कैसे हविष्य को उनके निमित्त देव तक पहुंचाया जाए? विविध उपायों द्वारा कई कोशिशें याज्ञिक विधान को संचालित करते वक्त की गईं। आखिरकार अग्नि को माध्यम के रूप में सर्वश्रेष्ठ पाया गया तथा उपयुक्ततम शब्द के रूप में “स्वाहा” का गठन हुआ।       

अग्नि और स्वाहा से रिलेटेड पौराणिक आख्यान भी बेहद रोचक हैं। श्रीमद्भागवत तथा शिव पुराण में स्वाहा से संबंधित वर्णन आए हैं। इसके अलावा ऋग्वेद, यजुर्वेद आदि वैदिक ग्रंथों में अग्नि की महत्ता पर अनेक सूक्तों की रचनाएं हुई हैं।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, स्वाहा दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं जिनका विवाह अग्निदेव के साथ किया गया था। अग्निदेव को हविष्यवाहक भी कहा जाता है। ये भी एक रोचक तथ्य है कि अग्निदेव अपनी पत्नी स्वाहा के माध्यम से ही हविष्य ग्रहण करते हैं तथा उनके माध्यम यही हविष्य आह्वान किए गए देवता को प्राप्त होता है। एक और पौराणिक मान्यता के अनुसार अग्निदेव की पत्नी स्वाहा के पावक, पवमान और शुचि नामक तीन पुत्र हुए।

इसके अलावा भी एक अन्य रोचक कहानी भी स्वाहा की उत्पत्ति से जुड़ी हुई है। इस मान्यता के अनुसार, स्वाहा प्रकृति की ही एक कला थी, जिसका विवाह अग्नि के साथ देवताओं के आग्रह पर सम्पन्न हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं स्वाहा को ये वरदान दिया था कि केवल उसी के माध्यम से देवता हविष्य को ग्रहण कर पाएंगे।   

यज्ञीय प्रयोजन तभी पूरा होता है जबकि आह्वान किए गए देवता को उनका पसंदीदा भोग पहुंचा दिया जाए। हविष्य के याज्ञिक सामग्रियों में मीठे पदार्थ का भी शामिल होना आवश्यक है तभी देवता संतुष्ट होते हैं। और सभी वैदिक व पौराणिक विधान अग्नि को.समर्पित मंत्रोच्चार एवं स्वाहा के द्वारा हविष्य सामग्री को देवताओं तक पहुंचने की पुष्टि करते हैं।

ह्रीं भुवनेश्वर्ये नमः ।।

        आनंद वन में चंद्रमा सम्पूर्ण था । सम्पूर्णता एवं सनातनता ही आनंदवन का लक्षण है। भगवति भ्रमराम्बिका के दिव्य मणिद्वीप के मध्य में स्थित है आनंद वन जहाँ पर वे परम् ब्रह्माण्डीय रास लीला करती हैं। इसी आनंद वन में श्री हरि का हंसावतार हंस बन भगवति पराम्बा के चरणों में पड़े प्रसाद को चुगते हैं, इसी आनंद वन में पंच-प्रेतासन सुशोभित है अर्थात ब्रह्माण्ड का सबसे जागृत, सबसे चैतन्य, सबसे क्रियाशील दिव्य सिंहासन। इसी दिव्यासन पर बैठकर भगवती भ्रमराम्बिका समस्त ब्रह्माण्ड के हित में, उनके जीवन मरण सम्बन्धित निर्णय लेती हैं। इसी पंच प्रेतासन पर बैठकर वे अनंत ब्रह्माण्डों में स्थित अति विकसित जीवों के मुख्य प्रतिनिधियों, उनके कर्ता धर्ता ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, इन्द्र, कुबेर, महालक्ष्मियों, महासरस्वतियों, महाकालियों, महाभैरवों इत्यादि से भेंट करती हैं। 

       अनंत ब्रह्माण्डों में अनंत विकसित सभ्यताएं हैं, अनंत राम हैं, अनंत लक्ष्मण हैं, अनंत सूर्य हैं, अनंत चंद्रमा हैं इत्यादि-इत्यादि भगवती भुवनेश्वरी अपनी महासभा आनंद वन में ही सम्पन्न करती हैं एवं भगवति भ्रमराम्बिका के चरणों में बैठकर दिव्य दिशा निर्देश आदेश को सब प्राप्त करते हैं। भ्रमराम्बिका जब आसन पर विराजमान होती हैं तो समस्त सभाजन उनके चरणों में अपने मुकुट अर्पित कर देते हैं। आनंद वन में भ्रमराम्बिका के दिव्य दर्शन प्राप्त करने हेतु, उनकी एक झलक देखने हेतु, उनके एक शब्द ग्रहण करने हेतु, उनके श्री विग्रह के दिव्य स्पर्श प्राप्त करने हेतु, उनके श्री चरणों की धूल को मस्तक पर लगाने हेतु | चयन प्रक्रिया अत्यंत ही जटिल, कठिन एवं उच्च कोटि के अनुशासन में बंधी हुई है। जब अनंत ब्रह्माण्डों के कर्ता धर्ता अम्बिका या राज राजेश्वरी विज्ञान, भुवनेश्वरी तत्वम्, श्री चिंतन, श्री श्री यंत्रम् की उपासना के द्वारा अपने सूक्ष्मतातीत शरीर को अति उच्च कोटि में सुसंस्कारित कर लेते हैं तभी वे अनंत ब्रह्माण्डों की मूल प्रकृति, मूल जननी, मूल शासिका, मूलेच्छा, मूल साम्राज्ञी के सानिध्य को प्राप्त होते हैं अन्यथा असम्भव ।

         भगवती भ्रमराम्बिका के इर्द-गिर्द सुनहरे रंग का आभामण्डल सदैव विराजमान रहता है जिसमें से ह्रींकार नाद अत्यंत ही सौम्यता के साथ उत्सर्जित होता रहता है। इस ह्रींकार नाद से सूक्ष्मातीत से सूक्ष्मातीत तल पर भी मल का निषेचन हो जाता है। मणिद्वीप में छाया नहीं रहती, वहाँ पर उन्हीं दिव्य, सिद्ध पुरुषों एवं शक्तियों का वास है जो कि छाया विहीन हैं। सबके शरीर से केवल पद्म गंध ही प्रवाहित होती है। दिन और रात भी मणिद्वीप में नहीं होते। वह स्व प्रकाशित, स्व विकसित, सर्व स्वतंत्र, स्व पूरक, स्व सक्षम लोक है। भगवति की सेना में एक से बढ़कर एक महायौद्धा देवियाँ हैं जो कि स्वयं अकेले ही अनेकों ब्रह्माण्डों को मिटाने और बनाने की क्षमता से युक्त हैं।मणिद्वीप के सिद्ध मठ में अनंत ब्रह्माण्डों में युक्त हैं। मौजूद सिद्ध साधक कड़ी परीक्षा के पश्चात्, घोर प्रतिस्पर्धा के पश्चात्, अघोर योग्यता हासिल कर ही स्थान प्राप्त करने में सफल होते हैं। समस्त कोशों के मूल बीज अर्थात सनातन रूप जो कि सदा नित्य रहते हैं, प्रलय विहीन रहते हैं वे भगवति पराम्बरा के सानिध्य में सुशोभित होते हैं।

        सनातन ब्रह्मा, सनातन विष्णु, सनातन शिव, सनातन दुर्गा, सनातन काली, सनातन ईश्वर, सनातन सूर्य, सनातन चंद्रमा, सनातन इन्द्र इत्यादि-इत्यादि सबके सब मणिद्वीप में ही निवास करते हैं। वहीं सनातन क्षीर सागर है जिसमें श्रीहरि शेष शैय्या पर निवास करते हैं, वहीं सनातन गौ लोक है जहाँ श्रीकृष्ण गोपियों के साथ विचरण करते हैं, ब्रह्माण्ड का सबसे सुरक्षित, सबसे विकसित क्षेत्र है मणिद्वीप जहाँ भगवति पराम्बरा निवास करती हैं।
                           शिव शासनत: शिव शासनत:

श्रीयंत्र पूजन की आसान एवं चमत्कारिक विधि ।।

      श्रीयंत्र में चौंसठ मातृका (मातृ) शक्तियों का निवास होता है। ठीक इसी प्रकार मणिद्वीप जो कि श्रीयंत्र का ही प्रारूप है उसमें भी मुख्य रूप से चौंसठ मातृ शक्तियाँ निवास करती हैं। श्रीयंत्र क्या है? बाजार से खरीदोगे तो सिर्फ एक पिण्ड है ठीक उसी प्रकार का पिण्ड जैसे कि आप बाजार से गुड़िया खरीद लाते हैं। देखने में वह मनुष्य के बच्चे के समान लगती है पर प्राणों के अभाव में वह निर्जीव है। अतः श्रीयंत्र गुरु के द्वारा ही प्राण-प्रतिष्ठित कराके ही प्राप्त करना चाहिए। आम जनता के लिए श्रीयंत्र एक प्रकार से वस्तु है परन्तु है आध्यात्मिक दृष्टिकोण से श्रीयंत्र प्रतीक हैं माँ भुवनेश्वरी का श्रीयंत्र की पूजा नहीं की जाती है बल्कि पूजा होती है उसमें प्रतिष्ठित माता भुवनेश्वरी पूजा चतुःषष्ठि पूजन से सम्पन्न की जाती है।.चतुःषष्ठि का मतलब चौंसठ दिव्य वस्तुओं का उन्हें समर्पण आम व्यक्ति के लिए लम्बा चौड़ा पूजन उपयुक्त नहीं है। नीचे मैं एक मंत्र लिख रहा हूँ जिसमें वाक बीज, माया बीज और लक्ष्मी बीज के साथ चौंसठ वस्तुएं समर्पित करने का प्रावधान है। यह अत्यंत ही उच्च कोटि का मानस पूजन एवं गृहस्थ पूजन है। इसके रचयिता हैं आदि गुरु शंकराचार्य जी इस पूजन के द्वारा कोई भी व्यक्ति श्रीयंत्र में स्थापित भुवनेश्वरी की अटूट कृपा को प्राप्त कर सकता है।

पूजन विधि ---
       सर्वप्रथम स्नानादि से निवृत्त होकर श्रीयंत्र को चाँदी की थाली में स्थापित कर लें तत्पश्चात् उनका श्री षोडशी स्वरूप में ध्यान करते हुए निम्नलिखित मंत्र को पढ़े।

बालार्कायुत तेजसां त्रिनयनां रक्ताम्बरोल्लासिनीं नानालंकृति राजमानवपुषं बालोडुराट् शेखराम्। हस्तैरिक्षुधनुः सृर्णिं सुमशरं पाशं मुदा विभ्रतीं। 
श्रीचक्रस्थित सुन्दरीं त्रिजगतामाधारभूतां स्मरेत् ।

       तत्पश्चात् एक चाँदी की कटोरी में चावल को कुंकुम, सिन्दूर, सुगन्ध, चन्दन, कपूर इत्यादि से मिश्रित कर लें फिर जैसे कि पाद्य के समय ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पाद्यम् कल्पयामि नमः कहते हुए चावल के दाने श्रीयंत्र को समर्पित करते जायें। प्रत्येक उपचार का नाम जोड़ते यही मंत्र बोलते जायें। जैसे कि सिमंत सिन्दूर समर्पित करते समय ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सिमन्त सिन्दूरम कल्पयामि नमः। नीचे चौंसठ उपचारों का वर्णन किया जा रहा है -

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पाद्यम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अर्ध्यम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आसनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सुगन्धितैलाभ्यङ्गम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मज्जनशालाप्रवेशनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मज्जनमणिपीठोपवेशनम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं दिव्यस्त्रानीयम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं उद्वर्तनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं उष्णोदकस्नानम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कनककलशस्थितसर्वतीर्थाभिषेकम् ॐ कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं धौतवस्त्रपरिमार्जनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अरुणदुकूलपरिधानम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अरुणदुकूलोत्तरीयम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आलेपमण्डपप्रवेशनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आलेपमणिपीठोपवेशनम् कल्पयानि मः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चन्दनागुरुकुङ्कुममृगमद-कर्पूरकस्तूरीरोच- नादिव्यगन्धसर्वाङ्गानुलेपनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं केशभारस्य कालागुरुधूपमल्लिका मालतीजाती-चम्पकाशोकशत-पत्रपूगकुहरीमुन्नाग कह्लारयूथीसर्वर्तुकुसुम-मालाभूषणम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भूषणमण्डपप्रवेशनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं भूषणमणिपीठोपवेशनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नवरत्नमुकुटम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चन्द्रशकलम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सीमन्तसिन्दूरम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं तिलकरत्नम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कालाञ्जनम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कर्णपालीयुगलम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नासाभरणम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अधरयावकम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ग्रथनभूषणम् कल्पयामि नमः ।

ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कनकचित्रपदकम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं महापदकम् कल्पयामि नमः।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मुक्तावलीम् कल्पयामि नमः।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं एकावलीम् कल्पयामि नमः।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं देवच्छन्दकम् कल्पयामि नमः।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं केयूरयुगलचतुष्कम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वलयावलीम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं ऊर्मिकावलीम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं काञ्चीदामकटिसूत्रम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं शोभाख्याभरणम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पादकटकयुगलम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं रत्ननूपुरम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पादाङ्गुलीयकम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं एककरे पाशम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अन्यकरे अङ्कुशम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं इतरकरेषु पुण्ड्रेक्षुचापम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अपरकरे पुष्पबाणान् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्रीमन्माणिक्यपादुकाम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं स्वसमानवेशास्त्रावरणदेवताभिः सह सिंहासनारोहणम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कामेश्वरपर्योपवेशनम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं अमृताशनम् कल्पयामि नमः। 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आचमनीय् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं कर्पूरवटिकाम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं आनन्दोल्लास-विलासहासम् कल्पयामि नमः। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं मङ्गलारात्रिकम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं श्वेतच्छत्रम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं चामरयुगलम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं दर्पणम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं तालवृन्तम् कल्पयामि नमः । 
ॐ ह्रीं श्रीं गन्धम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पुष्पम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं धूपम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं दीपम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं नैवेद्यम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पानम् कल्पयामि नमः ।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं पुनराचमनीयम् कल्पयामि नमः ।

          इसके पश्चात ताम्बूलम्, नमस्कारम् इत्यादि से भी पूजन करना चाहिए।

       इस प्रकार श्रीयंत्र का अत्यंत ही चमत्कारी पूजन सम्पन्न हो जायेगा.एवं आपको अविस्मरणीय सफलताएं जीवन में मिलने लगेंगी। पूजन के पश्चात् आदि गुरु शंकराचार्य जी द्वारा रचित श्री सूक्तम का पाठ कर लेना चाहिए। इस प्रकार पंद्रह मिनिट के अंदर आप सम्पूर्ण श्रीयंत्र पूजन सम्पन्न कर लेंगे।
                                   शिव शासनत: शिव शासनत: